लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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modiप्रमोद भार्गव
आखिरकार गुजरात के सांप्रदायिक दंगों में से एक गुलबर्ग सोसायटी नरसंहार से जुड़े मामले में अदालत ने फैसला सुना दिया है। अहमदाबाद का 14 साल पुराना यह मामला कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या से जुड़ा था। बहुचर्चित इस मामले में विशेष जांच दल ने 66 आरोपियों को नामजद किया था। इनमें से 24 आरोपियों को दोषी और 36 को निर्दोष करार दिया गया है। 24 में से 11 को अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी पाया है। बांकी 13 को इससे कमतर अपराधों का दोषी माना है। कुल आरोपियों में से 6 की मौत भी हो चुकी है। इस फैसले की सबसे अहम् बात यह रही कि किसी भी आरोपी को धारा 120-बी के तहत पूर्व नियोजित साजिश का दोषी नहीं पाया गया है। अदालत ने इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से कहा कि ‘उपद्रवी भीड़ ने जो कुछ भी किया, वह क्षणिक या तात्कालिक उत्तेजना के चलते किया।‘ दरअसल कांग्रेस समेत जो भी वामपंथी दल, विदेशी धन से पोषित चंद एनजीओ और बौद्विक धड़े थे, जिन्होंने अपने बयानों और छद्म लेखन से यह धारणा रचने की पुरजोर कोशिश की थी कि गुजरात-दंगे तात्कालिक सत्तारूढ़ दल के षड्यंत्र का परिणाम हैं। साफ है, ये तथाकथित लोग इस मुगालते में थे उनकी मन-गढ़ंत धारणाएं नरेंद्र मोदी को संदेह के घेरे में ले लेंगे। दरअसल भयावह दंगों के समय मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री थे।
गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के कोच एस-6 में सवार 58 कारसेवकों को निर्ममतापूर्वक जिंदा जलाने की घटना थी। इसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया के चलते 28 फरवरी को पूरे गुजरात में सांप्रदायिक माहौल खराब हो गया। नतीजतन अहमदाबाद के मेघानी नगर क्षेत्र की गुलबर्ग आवासीय सोसायटी की इमारतों पर क्षणिक रूप से उत्तेजित होकर 400 लोगों की भीड़ ने हमला बोल दिया था। हमले में कांग्रेस के पूर्व सांसद जाफरी समेत 69 लोग मारे गए थे। मरे लोगों में 39 लोगों के शव तो मिल गए थे, लेकिन बाकी 30 की लाशें नहीं मिली थीं। नतीजतन इन्हें सात साल बाद कानूनी परिभाशा के अनुसार मृत मान लिया गया। गुलबर्ग के अलावा नरोदा पटिया, बेस्ट बेकरी और सरदारपुर में भी भीषण हिंसक वारदातें घटी थीं। इन घटनाओं पर नियंत्रण नहीं कर पाने के कारण गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार पर ये आरोप मढ़ने की कोशिशें हुई थीं कि उसने दंगों को उकसाने का काम किया था। दंगों के ठंडे पड़ने के बाद राज्य सरकार पर ये आरोप भी लगे थे कि वह आरोपियों को बचाने, सबूतों को नष्ट करने और कानूनी प्रक्रिया को कमजोर करने में लगी है। यही नहीं 2007 अक्टूबर में एक स्ंिटग ओप्रेशनके जरिए भी यही कोशिश की गई कि दंगे पूर्व नियोजित थे।
इस कार्यवाही पर आशंका प्रकट करने वालों में राष्ट्रीय मानवाधियकार आयोग भी था। अंत में आयोग, सरकारी संगठन सिटिजंस फाॅर जस्टिस एंड पीस और जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने भी की। याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने गुलबर्ग, नरोदा और सरदारपुर जैसे 10 बड़े नरसंहरों से जुड़े मामलों पर निचली अदालतों में चल रही न्यायिक प्रक्रिया पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी। साथ ही राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह मामलों की निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी गठित करे। राज्य की मोदी सरकार ने शीर्ष न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए तत्काल सीबीआई के पूर्व निदेशक आरके राघवन की अध्यक्षता में एसआईटी गठित कर दी। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने तो यहां तक मांग की थी कि जांच सीबीआई को सौंपी जाएं और मुकदमों की न्यायिक प्रक्रिया भी गुजरात से बाहर किसी अन्य प्रदेश में चले। साफ है, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और सिटिजंस फाॅर जस्टिस एंड पीस ने राज्य की अदालतों पर भी संदेह करने की बड़ी भूल की थी। जकिया ने तो मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दंगों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। लेकिन मोदी से लंबी पूछताछ के बाद अप्रैल 2012 में एसआईटी ने मोदी को क्लीन चीट दे दी थी।
चूंकि एसआईटी को शीर्ष न्यायालय की निगरानी में काम करने की इजाजत थी, इसीलिए एसआईटी ने अपनी पहली रिपोर्ट मई 2010 में न्यायालय को सौंपी। लेकिन रिपोर्ट के निष्कर्ष सामने आए तो कथित संगठन व राजनीतिक दलों ने एसआईटी की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए। यही नहीं शीर्ष न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए न्यायमित्र ने भी सवाल उठाए। बेबुनियाद दलीलें देते हुए कहा गया कि राज्य के राजनीतिक नेतृत्व ने राजनीतिक लाभ के लिए, दंगों को मनमाने ढंग से हवा दी और प्रशासनिक अमले व पुलिस का अपने हितों के लिए दुरुपयोग किया। अदालत ने जांच प्रक्रिया में संपूर्ण निष्पक्षता व पारदर्शिता लाने की दृष्टि से एसआईटी को फिर निर्देशित किया कि वह उठाई जा रही सभी शंकाओं का निराकरण करे। इसके बाद एसआईटी ने कुछ नए तथ्यों, साक्ष्यों, बयानों व ब्योरों को नत्थी करके अंतिम रिपोर्ट 2012 में न्यायालय को सौंपी। इसी रिपोर्ट में मोदी को क्लीन चिट दी गई थी। एसआईटी की रिपोर्ट में मेघानी नगर के थाना प्रभारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक केजी एरडा को कटघरे में खड़ा करते हुए दलील दी थी कि एरडा ने ड्यूटी पर रहते हुए लापरवाही तो बरती ही, सबूतों के साथ भी छेड़छाड़ की। एरडा को हिरासत में भी लिया गया था। किंतु अदालत ने सब दलीलों को दरकिनार करते हुए एरडा को बरी कर दिया।
इन सब के बावजूद मीडिया की उत्तेजक व फिजूल बहसों में यह कहा जा रहा कि न्याय प्रक्रिया लंबी खिंचने से साक्ष्य कमजोर व नष्ट हुए। अनेक गवाह मुकर गए व कई ने लालच के चलते बयान बदल दिए और कई मर भी गए। यह दलील भी दी जा रही है कि न्याय वैसा दिखाई नहीं दिया, जो संपूर्ण समाज को सच लगे। न्याय का लंबा खिंचना, हमारे प्रशासनिक व न्यायिक ढ़ांचे की विसंगति का नतीजा हो सकती है, लेकिन किसी भी मामले में ऐसा फैसला कभी नहीं आ सकता, जो संपूर्ण समाज और वादी के साथ प्रतिवादी को भी सच या न्यायसंगत लगे। यदि यही फैसला समय पर आ जाता तो शायद पीड़ितों को अधिक संतोष होता। अलबत्ता यह भी कम नहीं है कि निर्दोषों की हत्या में शामिल 24 लोग सजा के दायरे में आए। इनमें भी 11 दफा 302 के दोषी हैं। इन्हें अदालत 6 जून को फांसी अथवा आजीवन कारावास की सजा सुना सकती है ? यह उन लोगों के लिए भी कठोर चेतावनी है, जो किसी संप्रदाय विशेष से जुड़े मामले में भावनात्मक उत्तेजना के वशीभूत होकर कानून अपने हाथ में लेने से नहीं चूकते हैं। जकिया जाफरी इस फैसले को अधूरा मान रही हैं। पीड़ित होने के नाते उनकी यह दलील उचित है। इसलिए उन जैसे फैसले से असंतुष्टों के लिए उच्चतर न्यायालयों में अपील का दरवाजा खुला है।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे यहां सांप्रदायिक दंगों से जुड़े प्रकरणों में दोषियों को सजा मुश्किलसे ही मिल पाती है। अपराध अदालत की दहलीज पर पहुंचकर सिद्ध ही नहीं हो पाते हैं। यह गुजरात में ही संभव हुआ है कि दंगों के 10 मामलों में से 8 पर फैसले सुनाए जा चुके हैं। दोषियों को कठोर सजाएं भी हुई हैं। वरना हम जानते है कि इंदिरा गांधी की बेरहम हत्या के बाद 1984 के सिख विरोधी दंगे हों, अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद 1992-93 के दंगे हों या अन्य दंगे हों, अपेक्षाकृत कम ही मामलों में दोषियों को सजा सुनाई जा सकी है। जबकि गुजरात में हमलावरों की पहचान हुई, पर्याप्त साक्ष्य जुटाए गए, गवाहों के बयान हुए और 8 मामलों में आरोपियों को सजाएं भी सुनाई गई हैं। इससे यह विश्वास पुख्ता हुआ है कि भारतीय राज्य एवं न्याय व्यवस्था अपने-अपने दायित्वों के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई देने लगी है।

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