लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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‘घर की मुर्गी दाल बराबर’- बाहर की मुर्गी मुर्ग मुसल्लम, अर्थात घर की मुर्गी दाल समान तुच्छ! मानव स्वभाव भी कितना विचित्र है! यह कहावत केवल मुर्गी पर ही नहीं, जोगी पर भी, ‘लॉन’ पर भी, ‘‘पड़ोसी की लॉन ज्यादा हरी होती है’’ और अनेकों पर लागू होती है। इसलिए जब एक चपल, सरस, सुगढ़ तथा सुंदर पंछी का नाम हो ‘मामूला खंजन’, तब मानव स्वभाव को विचित्र ही कहना पड़ता है।
जबकि इसी खंजन का एक चचेरा भाई है, इसकी 21 सेंमी0 लंबाई के विपरीत 18 सेंमी0 लंबा है, उसका नाम ‘धोबन’ है। धोबन नाम इसके पानी से गहरे संबंध का द्योतक है। पानी या जलाशय देखते ही हमारे मन में आनंद की लहरें उठने लगती हैं। अतएव ‘धोबन’ नाम ‘गांव की गोरी’ सा सुंदर है तो उचित ही है, और न भी हो तब भी ‘मामूला’ से तो विशिष्ट है और धोबन को मामूला खंजन की तुलना में वीआईपी- सा सम्मान तो दे ही देता है!
यदि ऐसे नामकरणों के कारण ज्ञात न हों तो उन्हें मानव-स्वभाव की विचित्रता कहकर ‘समझा’ दिया जा सकता है। पर यहां तो कारण स्पष्ट है। ‘धोबन’ पंछी ‘इंपोटैंड’ हैं, विदेशी हैं; पश्चिमी साइबेरिया से शीतकालीन प्रवास के लिए आते हैं। और ‘मामूला खंजन’ कश्मीर से कन्याकुमारी तक को रौनक देनेवाला, प्रफुल्लता देनेवाला बिचारा भारतीय है। विदेशियों का हमें आदर तो करना चाहिए। ‘इम्पोटैंड’ चीज विश िष्ट और बेहतर !, भारतीय चीज मामूली! अंग्रेजी भाषा विशेष रौबदार भाषा, तथा हिंदी अपढ़ लोगों की बोली!!
मामूला खंजन का नाम मैंने रखा है ‘सितोदर काला खंजन’, (लार्ज पाइड वैगटेल’, ‘मोता सिल्ला मदेदस पतेन्सिस’’); और धोबन का नाम रखा है ’भस्म/सित खंजन’ (‘व्हाइट वैगटेल’, ‘मोतासिल्ला अल्बा दुखुनिन्सिस’’)। मेरे दिये गए नाम के अनुसार ’धोबन’ के ऊपरी शरीर का रंग मुख्यतया भस्म या राख सरीखा, और नीचे का उदर सफेद। इसका मुंड तथा गला ग्रीष्म ऋतु में मुख्यतया काला होता है जो शीतकाल में सफेद ह� �� जाता है ‘‘किंतु माथा सदा सफेद ही रहता है’’। खंजन वंश के सारे पक्षी हमेशा ही अपनी पूंछ उपर-नीचे डुलाते हैं, इसलिए अंग्रेजी में इनके कुल के पक्षियों का पारिवारिक नाम ‘वैगटेल’ है। ऐसे नाम भ्रम पैदा करते हैं क्योंकि अनेक अन्य पक्षी हैं जो अपनी पूंछ डुलाते हैं, यथा: कत्थइ अश्वक (‘रॉक चैट’)। खंजन पंछी अपनी पूंछ कुतों की तरह नहीं हिलाते। वैसे भी ऐसे सुंदर पक्षी के लिए ’श्वेत पुच्छडो� ��’ (‘व्हाइट वैगटेल’) जैसा नाम उपयुक्त नहीं लगता। खैर।

गर्मियों में ये (’भस्म/सित खंजन’) पंछी बर्फीले साइबेरिया में तथा हिमालय में प्रजनन करते हैं; शावकों का लालन-पालन करते हैं। प्रजनन काल में अनेक पक्षी, विशेषकर नर, अपने सुंदर रूप में रहते हैं क्योंकि मादा जब नर का चुनाव करती है तब चपलता, उर्जा इत्यादि के साथ संभवत: सौंदर्य ( मुझे लगता है कि पक्षियों के शब्दकोश में सौन्दर्य का अर्थ पहचान और ’स्वास्थ्य’ अधिक होता है) भी एक गुण ह� ��ता है, जिसके आधार पर वह नर का चुनाव करती है। वास्तव में पक्षियों के विभिन्न कद, रूप तथा रंग जातियों की विभिन्नता दर्शाते हैं। एक ही जाति के पक्षियों के कद, रूप तथा रंग अत्यधिक समान होते हैं, इसलिए मादा नर का चुनाव वास्तव में चपलता, उर्जा, उड़ान आदि देखकर करती है। क्योंकि लगभग स्वस्थ नर एक समान ही सुंदर होते हैं। साइबेरिया में इन पक्षियों को अपेक्षाकृत कम खतरा रहता है, इसलिए मादा भी � ��पने मुंड पर भड़कदार काला रंग पसंद करती है, और श्रृंगार में अपने को, (सामान्यतया पक्षियों में नर मादा से अधिक सुंदर या आकर्षक होता है) , नर से कम नहीं आंकती। यह नाम जो भस्म/सित खंजन दिया गया है, वह इसकी अन्य पक्षियों विशेषकर खंजनों, से अलग पहचान दिखला देता है तथा हमें हमारी प्राचीन पक्षीप्रेम की ऋषि-परंपरा से जोड़ता है। पक्षियों के जो भी नाम मैंने गढ़े हैं वे वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण करते हैं।
सितोदर काला खंजन चूंकि प्रवासी नहीं है, भारत में ही रहता है, और ऋतुओं के अनुसार अपना रंग नहीं बदलता। इसकी मादा का काला रंग – प्रगाढ़ कत्थई-सा रहता है। काला रंग तो आज जबर्दस्त फैशन में है, वैसे भी काला रंग हमेशा, विशेषकर सफेद या पीले के साथ, एकदम विशिष्ट दिखता है। और आज के फ़ैशन के अनुसार तो सर्वाधिक सुंदर तथा आकर्षक! इस दृष्टि से सितोदर काला खंजन, भस्म/सित खंजन से कहीं अधिक सुंदर माना जाना चाहिए। किंतु भारतीय होने के नाते विदेशी के सामने उसे ‘मामूला खंजन’ का ही दर्जा दिया जाता है।
एक बात और दृष्टव्य है – भारत में प्रवासी (विदेशी) पक्षियों को सगुन-विचार तथा भविष्यवाणी के लिए उपयोगी मानते हैं। भारतीय पक्षियों को कम। क्या यह भी विदेशियों के प्रति पक्षपात है? नहीं ऐसा नहीं है। यह इसलिए कि प्रवासी पक्षी तो तभी भारत में आएंगे जब वे सुरक्षित महसूस करेंगे, उन्हें उचित भोजन प्राप्त होगा तथा उनका आवास स्थान, यथा: जलाशय, मैदान आदि, प्रदूषित नहीं होगा। वरना उन्हें � �्या, पंख फरफराकर कहीं और चले जाएंगे। इस तथ्य को हमारे ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पहले कैसे देख लिया था, आश्चर्य होता है। उस समय तो जल, थल तथा वायु प्रदूषण नहीं ही होगा। ऋषियों ने, मनु स्मृति ने, याज्ञवल्क्य स्मृति ने, चाणक्य ने, सम्राट अशोक इत्यादि ने ‘‘पक्षियों के’’ शिकार के नियम बना दिए थे। ऋषियों की गहरी समझ उनके न केवल गहरे प्रकृतिप्रेम से उपजी होगी वरन पैने तथा गंभीर अवलोकन से भी � �पजी होगी। तभी तो संत तुलसी दास किष्किंधा कांड में प्रकृति का वर्णन करते समय कहते हैं,
‘‘ जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।’’
प्रवासी खंजन तथा उनके चचेरे भाइयों – भस्मी शिखर पीलकिया (‘ब्लू हैटेड यलो वैगटेल, मोतासिला फलावा बीमा’) तथा कलकंठी पीलकिया (‘ग्रे वैगटेल, मोतासिला कास्पिका’) – का भारत में आगमन शरद ऋतु में होता है। किंतु तुलसीदास इस तथ्य के वर्णन के आगे जाकर कहते हैं कि शरद ऋतु में खंजन आए क्योंकि यह लंबी अवधि में किए गए हमारे पुण्यकर्मों का सुफल है।
पक्षियों की सुरक्षा, वनों का जीवंत होना तथा जलाशयों का प्रदूषण रहित होना – इनमें लंबे समय तक कार्य करना पड़ता है, तब कहीं ये सुफल देते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि यदि हम ये वांछित पुण्यकर्म न करें, तब भी इनका ‘कुफल’ हमें देर से मिलेगा। जैसा भरतपुर के पक्षी अभयारण्य में ‘ललमुख सित क्रौंच’ (‘साइबेरियन क्रेन’, ग्रुस लेउको जैरानुस’) का साइबेरिया से आगमन पिछले 12, 15 वर्षों से कम ह� ��ता रहा और अब लगभग बंद ही हो गया है। एक तो, उनको अपने अफगानिस्तान पड़ाव में मानव शिकारियों से अत्यधिक क्षति होती है। दूसरे, भरतपुर की झील में पानी कम होता जा रहा है तथा गांव के ढोरडंगर अत्यधिक संख्या में अभयारण्य के मैदानों में चरने के लिए आ जाते हैं जो पक्षियों के जीवन में बाधा डालते हैं। ये मानव जाति के दीर्घकालीन पापकर्म हैं कि ललमुख सित क्रौंचों ने भारत में प्रवासन बंद कर दिया � ��ै।
जो भी व्यक्ति भारतीय साहित्य, ‘अंग्रेजी छोड़कर,’ से परिचित हैं वे खंजन से या कम से कम उसके नाम-गुणों से तो परिचित हैं। पहले तो इस पक्षी का नाम खंजन स्वयं काव्यमय है। खंजन का अर्थ है – आकाश में जन्म लेने वाला! यह कैसे? हमारे ऋषि हिमालय की पवित्र उंचाइयों पर रहने वाले थे। प्रकृति से उनका गहरा लगाव होता था तथा उसका पैना और गहरा अवलोकन भी उन्होंने किया। शरद ऋतु में भी वे रोज सुबह शाम प� �रकृति का आनंद लेते होंगे। तभी एक रूपहले दिन अचानक हिमालयी आकाश से हज़ारों की संख्या में ये प्रवासी पक्षी नीचे उतरते दिखे होंगे। ऋषियों ने इन सुंदर अतिथियों को नाम दे दिया ’खंजन!’ पक्षी-वैज्ञानिक कुछ वर्ष पूर्व तक यही मानते रहे कि साइबेरिया, रूस आदि से भारत आनेवाले प्रवासी पक्षी हिमालय की उंचाइयों को पार कर नहीं आ पाते होंगे, अतः वे हिमालय के दर्रों से ही आते होंगे। किंतु हमा� ��े ऋषि हिमालय की उंचाइयों ‘जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ, अमरनाथ आदि’ में रहनेवाले थे, दर्रों में रहनेवाले नहीं। किंतु जब एवरेस्ट पर चढ़नेवाले पर्वतारोहियों ने भी यह बतलाया तब पक्षी वैज्ञानिकों ने भी मान लिया कि ये प्रवासी पक्षी हिमालय के पार उड़कर आते हैं, मात्र दर्रों से नहीं।
ऋषियों ने, तथा ‘संस्कृत के’ कवियों ने इनका अवलोकन कर इन्हें बहुत उपयुक्त तथा सुंदर नाम दिए हैं। सितोदर काला खंजन का कंठ काला होने के कारण-‘कालकंठ’ तथा ‘नीलकंठ’, उपर काला होने के कारण ‘काकच्छदि खंजन’, घास के मैदानों में अद्भुत शोभामय चपलता से दौड़ने के कारण ‘कर्कराक्ष’, सुगढ़ शरीर होने के कारण ‘कर्करांग’ तथा पछली से भी अधिक सौंदर्यमय गति के कारण ‘मीनाम्रीण’ आदि नाम दिए हैं। भस्म/ सित खंजन पाकिस्तान से लेकर असम तक और समस्त दक्षिण भारत को शीतकालीन प्रवास में अपने सरस सौंदर्य के लालित्य की तथा नृत्यांगना चाल की -सी भव्यता प्रदान करते हैं। ‘सितोदर काला खंजन’ आवासी है, क्योंकि यह सारे भारत में प्रजनन करता है। यह खंजन उपर है तो काला, किंतु इसकी लंबी सुगढ़ भौंहें इसके नयनों को आकर्षक बनाती है। रामचरित मानस ‘‘तुलसी’’ में वनवास के समय जब ग्रामीण महिलाएं सीताजी स े पूछती हैं कि साथ के दो सुंदर सशक्त युवकों में से उनके पति कौन हैं, तब सीताजी रामचंद्र जी का न तो नाम लेकर और न हाथ से इशारा कर उतर देती हैं, वरन ’कहती’ हैं, ‘‘खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि।’’ अपने खंजन के समान सुंदर नयनों से रामचंद्र जी की तरफ तिरछे देखते हुए मानो ’कह’ देती हैं कि यही हैं मेरे पति। ये लंबी सुगढ़ भौंहों वाले खंजन भारतीय, सर्वसुलभ सितो दर काले खंजन ही हैं।
जब तक मैंने खंजन पक्षी देखे-पहचाने नहीं थे, मैंने मान लिया था कि जब तुलसी सीताजी के सुंदर नेत्रों की उपमा खंजन से देते हैं तो निश्चित रूप से खंजन के नयन असाधारण सुंदर होंगे। किन्तु जब मैंने इन अति सुंदर चपल सरस खंजनों को देखा तब पता लगा कि खंजन के नयन अन्य पक्षियों के नयनों के समान ही साधारण होते हैं। तब यह उपमा कैसी? उअह मैने अनेक कवियों से पूछा, किन्तु कोई संतोषप्रद उनर न मिला। जब के0एन0 दवे की पुस्तक ‘बर्ड्स इन संस्कृत लिटरेचर’ ‘‘मोतीलाल बनारसी दास’’ हाथ लगी तब यह रहस्य समझ में आया।
खंजन बहुत ही चपल पक्षी है। अधिकतर पानी के पास दिखता है इसलिए सरस है। इसका शरीर छरहरा और सुगढ़। फिर इस ‘खंजन की दोनों जातियां सरस है। रंग केवल काले और सफेद। कल्पना, रचनाशीलता, पैना तथा गहरा अवलोकन का उत्तम उदाहरण देखना है तो यही उपमा या रूपक देखिये । यदि कोई चित्रकार दो खंजनों को आमने – सामने खड़ा करके उनका चित्र बनाए तो वे बहुत ही सुंदर आंखें लगेंगी। ‘एक बार जबलपुर विश्वविद्यालय � ��ें जब मैं खंजनों के विषय में यही बोल रहा था, तब श्रोताओं में बैठे प्रसिद्ध चित्रकार श्री राममनोहर सिन्हा ने अचानक आकर ब्लैक बोर्ड पर दो खंजनों का ऐसा ही सुंदर चित्र खींचा। श्रोताओं ने करतल ध्वनि से उनको धन्यवाद दिया।’’ इसलिए सुंदर स्त्री के सुंदर चपल सरस काले विशाल व सुगढ़ नयनों की उपमा ‘खंजन’ से देना न केवल बहुत उतम उपमा है वरन अद्भुत कवि-कल्पना की ओर इंगित करती है। आमरु शतक मे� �� गंगा नदी की उपमा एक मनोहर युवती से करते हुए उसके नयनों की तुलना खंजन के एक युगल से की है।
खंजन नैन, रूप रस माते,
उड़ि उड़ि जात निकट श्रवनन के,
उलटि-पुलटि ताटंक फंदाते।
ये रूपरस के प्यासे नयन खंजन के समान चपल हैं, कान तक उड़-उड़ जाते हैं, और कान के आभूषण तक को फलांग जाते हैं।
उत्तर भारत में सितोदर काला खंजन का प्रजनन-काल मार्च-जून है क्योंकि शावकों की अमिट भूख मिटाने के लिए वर्षाकाल उपयुक्त है। और दक्षिण भारत में दिसंबर से जून तक है क्योंकि दक्षिण में, विशेषकर तमिलनाडु तथा आंध्र तट पर वर्ष में दो बार वर्षा होती है। इनका घोंसला एक कटोरे के आकार का होता है जो सूखी टहनियों, जड़ों, घास आदि के चबूतरे के बीचोंबीच गढ़ा जाता है। इस कटोरे को आरामदेह बनाने के लि� � उसमें उन, बाल आदि का अस्तर बिछाया जाता है।
इनका प्रणयगान तथा प्रणयनृत्य बहुत ही भावनापूर्ण होता है। नर आवेगमय गान के साथ, अपने परों को फुलाकर, अपनी सुंदरता में शक्ति का पुट देते हुए, धीरे-धीरे उड़ते हुए ‘धीरे उड़ना पक्षियों में तथा तेज विमानों में बहुत विशेष योग्यता का परिचायक होता है।’ गर्व से मादा के सामने जमीन पर उतरता है; फिर वक्ष के परों को फुलाकर, दोनों पंखों को पूरा फ़ैलाकर, उन्हें पीछे ले जाता है, फिर उन पंखों के छोरो� � के थिरकते तीव्र कंपन के साथ अपनी प्रिया के निकट शान से आता है। यह तीव्र कंपन खंजन का अपने पंखों पर अत्यंत कुशल नियंत्रण का परिचायक है। उसकी प्रिया, मोहित होने पर उस प्रणयनृत्य की युगलनृत्य में पदोन्नति कर देती है। कहा जा सकता है कि एक से दो नृत्य करने वाले हो गए, किंतु शायद अधिक सच यह है कि दो हदय एक हो गए। वह प्रेमवश थोड़ा-सा झुकती है, पंखों को कंधे तक खोलती है और उन पंखों के छोर ऐसे � �र-थर कांपते हैं जैसे उसका तेजी से धड़कता ह्दय। इसके बाद मैथुन होता है जिसमें नर का गान गुंजित होता रहता है। इसलिए इन खंजनों ‘सितोदर काला’ का एक नाम रतनिधि अर्थात रति की निधि भी है। मादा एक खेप में 3-5 अंडे तक देती है। नीड़निर्माण तथा शावक का पालन-पोषण नर-मादा मिलकर करते हैं। भृंग की एक जाति का ‘त्रिदाक्ताइलिनी भृंग’ न केवल चपल होता है वरन रेत में लुक-छिपकर भागता भी है। ऐसे में दोनों द� ��्पति इस भृंग का पीछा करते हैं। फिर रेत की एक धार-सी उड़ती नजर आती है और दूसरे ही क्षण वह भृंग एक खंजन की चोंच में। भृंगों के अतिरिक्त ये खंजन टिड्डी, चिड्डे, घोंघे, छोटे बीज भी खाते हैं।
सितोदर काला खंजन की मादा अपना घोंसला तो आरामदेह ‘दोनों मिलकर’ बनाती है, किंतु उस स्थल का चुनाव बहुत सावधानी से करती है। वह पानी के पास होता है, सुरक्षित स्ािान में होता है जैसे पुल के नीचे, वृक्ष के कोटर, दीवार के छेद आदि। मादा एक खेप में 3-5 अंडे देती है। भस्मी अंडों पर भूरे चित्ते होते हैं जो घोंसले से समरूपता रखते हैं तथा सरलता से दिखते नहीं हैं।
‘सितोदर काला खंजन’ जबकि लगभग सारे भारत में सारे वर्स पूंछ डुलाता और नृत्य करता है, भस्म/सित खंजन केवल शीत ऋतु में। हां, इस प्रवासी की यह शीत ऋतु सितंबर या अक्टूबर से अप्रैल या मई तक लंबी होती है। यह इसके भारत-प्रेम को दर्शाती है। भस्म/सित खंजन-सारे भारत में नृत्य तो करता है किंतु भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अपनी भिन्न-भिन्न पांच उपजातियों के रूप में। वैसे सारे खंजन जलप्रिय हैं, किं� ��ु यह भस्म/सित खंजन अधिकांशतया पानी के पास ही दौड़ता-नाचता, पूंछ डुलाता मिलेगा। इसलिए इसका ‘धोबन’ नाम भी बहुत उपयुक्त है। किंतु इस नाम से इसकी पहचान करना थोड़ कठिन है। प्रवास काल में ‘भारत में’ ये अधिकांशतया अकेले ही भोजन की खोज करते दिखते हैं। किंतु प्रजनन काल में नर अपने क्षेत्र की रक्षा डअकर करता है, वागा -पाकिस्तान-हिंदुस्तान’ सीमा पर सैनिकों की ही भांतिये परेड करते हैं, किंत� � इनके लिए यह मात्र नाटक नहीं। जरा भी घुसपैठ का संदेह हाने पर, दूसरा उस पर उड़कर आक्रमण कर देता है तथा पहले को अपना बचाव करना पड़ता है। अंततः घुसपैठियों को हार मानकर पीछे हटना ही पड़ता है।
प्रवासी पक्षियों के प्रवास-व्यवहार का अध्ययन करने के लिए विशेस स्थानों पर उन्हें धातु की हल्की पतली अंगूठी पहनाई जाती है जिसमें उस स्ािान का नाम तथा तिथि अंकित कर देते हैं। 16 तथा 17 मार्च 1961 में दो भस्म/सित खंजनों को कच्छ में प्रवास के पश्चात लौटते समय अंगूठियां पहनाई गई थी। उनमें से एक को जून 1961में ‘किरोब’ ’रूस’ में तथा दूसरे को जुलाई 1961 में वोल्गाग्राद ‘रूस’ में पहचाना गया। ये दो नों स्थान कच्छ से क्रमशः 4200 तथा 3600 किमी दूर हैं। इससे यह व्यवहार सामने सामने आता है कि भारत में प्रवास हेतु आनेवाले खंजन कुल के पक्षी न केवल हिमालयी प्रजनन क्षेत्र से आते हैं वरन साइबेरिया, रूस, मंगोलिया, कैस्पियन आदि क्षेत्रों से भी आते हैं।
खंजन वंश ‘मोतासिला जीनस’ की तीन और जातियां हैं जो भारत में गर्व से नृत्य प्रदर्शन करती हैं। इन तीनों जातियों को खंजन नाम न देकर पीलकिया नाम दिया गया है क्योंकि खंजन के धवल या रजत के स्ािान पर इनमें नींबुई पीला रंग होता है। संस्कृत में इनका एक नाम इसीलिए हरिद्रव ‘हल्दी-सा पीला’ है। एक जाति है ‘कलकंठी मेघा पीलकिया’ ‘‘ग्रे वैगटेल, मोतासिला कास्पिका’’ जिसके प्रजननकालीन ‘पक्षियो� �� के रंगों के विवरण मैंने हमेशा नर से प्रजननकालीन रंगों के दिए हैं, अन्यथा स्थिति स्पस्ट कर दी गई है। ग्रहणकाल के रंगों से पंछियों की पहचान करना कठिन होता है।’ नर का कंठ काला होता है, शरीर उपर मेघ समान या सलेटी तथा नीचे सुनहरा होता है। इसकी भौंहें भी स्पस्ट सफेद होती हैं, साथ ही इसके काले कंठ तथा मेघी आंखों के बीच सफेद रेखा होती है। केवल ‘ग्रे वैगटेल’ कहने से स्पस्ट पहचान नहीं बनती क्योंकि भस्म/सित खंजन भी उपर उपर भस्मी या ‘ग्रे’ होता है। हम भारतीय चाहे पीलकिया की तुलना में खंजन को अधिक सम्मान दें, पर जिस गर्व से यह कलकंठी मेघा पीलकिया पूंछ मटकाती नृत्य करती है, चलती है, लगता है कि इसे भस्म/सित खंजन के रजत के स्थान पर अपने स्वर्ण का अधिक मान है। ये ‘कलकंठी मेघा पीलकिया’ प्रजनन बलूचिस्तान तथा हिमालय क्षेत्र में करते हैं, तथा प्रवास सारे भारतीय उपमहाद्वीप मे� ��। एस बार में नामदाफा के जंगलों में जंगली-सड़क पर जिप्सी कार से घूम रहा था। वृक्ष पर बैठी इस पीलकिया को मैंने निहारा, और आश्चर्य कि वह पीलकिया उड़ा और मेरी जिप्सी के आगे-आगे उड़ने लगा। मेरे साथी बोल उठे, ‘‘हमारे एयर मार्शल की जिप्सी के सामने बाकायदा एक पायलट ‘मोटर साइकिल सवार सैनिक जो वीआईपी के वाहनों के सामने चलते हैं-पायलट कहलाते हैं’ चल रहा है। उसने लगभग डेढ़ या दो किमी तक हमारी पाय लटिंग की। उसके बाद शायद उसका ‘क्षेत्र समाप्त हो गया होगा। पर उसने ऐसा क्यों किया? या फिर उसने पायलटिंग नहीं की, बस वह अपनी उड़ान भर रहा था, और यह संयोग है कि मैं उसके पीछे-पीछे चल रहा था?
कलकंठी मेघा पीलकिया बलूचिस्तान, पाकिस्तान, हिमालय ‘पाकिस्तान से लेकर भूटान तक’, यूरोप, कैस्पियन क्षेत्र ‘इसलिए इसके लातिन नाम में कास्पिका है’, साइबेरिया, मंगोलिया, चीन आदि में प्रजनन करती हैं। इनका प्रजननकाल अप्रैलांत से जुलाई अंत तक है।
खंजन वंश के पक्षियों की गिनती विश्व में सर्वाधिक लंबी पूंछ ‘शरीर के अनुपात में 50 प्रतिशत,’ वाले दस पक्षियों में की जाती है। उस पर, कलकंठी मेघा पीलकिया की पूंछ खंजन कुल की जातियों में सर्वाधिक लंबी ‘शरीर के अनुपात में’ है।
दूसरी जाति की पीलकिया है ‘जैतूनी पीलकिया’ ‘यलो वैगटेल’, ‘मोतासिला फलावा’ जिसकी सात उपजातियां सारे भारत के विभिन्न भागों को आबाद करती हैं। सभी पीलकियां पीली होती हैं, अतएव ‘यलो’ कहने से कुछ विशेस जानकारी नहीं मिलती। इन उपजातियों के पीठ के रंग तो जैतून की विभिन्न आभाओं वाले होते हैं, सिर के रंग भिन्न होते हैं जिनके आधार पर ये पहचानी जाती हैं। इनके उदर के रंग तो सभी पीलकियों के स पीले ही हैं। यह कश्मीर, लद्दाख तथा साइबेरिया में प्रजनन करती हैं, पानी के आसपास कीड़े तो इसके आहार हैं ही। यह चरते ढ़ोरों के पास भी ‘गो-पिंगला’ की तरह सरकसी उड़ानों से कीड़ों को पकड़ते देखी जा सकती है। ‘इसीलिए संस्कृत में इसका एक नाम गोप या गोपुत्र है।’ तीसरी जाति की पीलकिया है ‘स्वर्णमुंड पीलकिया’ ‘सिट्रीन वैगटेल’, ‘मोतासिला सित्रिओला’ जिसकी तीन उपजातियां भारत के विभिन्न जलसमद्ध भागों की शोभा बढ़ाती हैं। ये भी प्रजनन बलूचिस्तान, पाकिस्तान तथा हिमालयी क्षेत्रों में करती हैं।
प्रवासी पीलकियों का संस्कृत में एक नाम ‘गूढ़नीड़’ भी है, अर्थात जिसका नीड़ या तो बिल्कुल गुप्त है अथवा है ही नहीं। प्रवासी पीलकियां ‘या अन्य पक्षी’ प्रवास क्षेत्र में घोंसल के लालन-पालन हेतु बनाते हैं, अपने आराम या बचाव के लिए नहीं। वैसे अधिकांश आवासी पंछी हैं जो साल-भर घांेसलों में रहते हैं। संस्कृत में पीलकियों को गोपृत्र, खंजरीट ‘खंजन नहीं’, मुनिपुत्र या ऋसिपुत्र भी कहते हैं। ऋसिपुत्र या मुनिपुत्र नाम तो सम्मानजनक है, परंतु क्यों? खंजन ऋसियों को, कवियों को अतिप्रिय रहे हैं। जब उन्होंने इस पक्षी को खंजन अर्थात आकाश में जन्म लेनेवाला नाम दे दिया तब इसे ऋसिपुत्र कहना एक कदम आगे ही जाना कहलाएगा। यह पक्षी ऋसिपुत्र केवल इसलिए नहीं कहलाए गए होंगे कि वे ऋसियों के आश्रयों की भूमि पर विचरते हों, खंजन गामिनियों की तरह उत्साहपूर्वक चलते होंगे, नृत्य करते होंगे , जलक्रीड़ा करते होंगे, वरन् इसलिए भी कि उनकी भूमि पर इनका शुभागमन उस समय होता था जब अगस्त्य तारा ‘केनोपस’ का क्षितिज पर उदय होता था, अतएव इनका नाम अगस्त्य-पुत्र या ऋसिपुत्र उचित ही है। ब्रह्ााण्ड की एकता, अन्तर्संबंध तथा प्रकृति-संरक्षण का यह एक उतम उदाहरण है।
खंजन कुल ‘मोतासिला’ की छइी जाति है ‘दुकंठी खंजनिका’ ‘मोतासिला इंदिका’। यह न तो खंजनों के समान काले-धवल रंग की है और न पीलकिया के समान सोनल है। इसकी पीठ का प्रमुख रंग जैतूनी हरा है जिसपर हल्की-सी जामुनी रंग की आभा होती है। पंख के पिछले भाग में ‘काले पर सफेद पट्टियां होती हैं। निचले सफेद शरीर में दो काली मालाएं खंजनों में इसकी स्पस्ट पहचान बनाती हैं। इसीलिए इसका नाम मैंने ‘दुकंठ� � खंजनिका’ ‘फॉरेस्ट वैगटेल’, ‘मोतासिला इंदिका’ बनाया है। नर मादा एक समान होते हैं। यह पंछी सितोदर काला खंजन के समान प्रमुखतः भारतीय हैं। यह असम के कछार जिले में मई माह में प्रजनन करता है तथा श्रीलंका सहित सारे भारत में शीतकालीन प्रवास करता है।
यद्यपि अंग्रेजी में इसे ‘फॉरेस्ट वैगटेल’- अर्थात वन में रहनेवाला पूंछ मटकानेवाला पंछी कहते हैं। इस उपकुल के अन्य ‘वैगटेल अपनी पूंछ उपर-नीचे डुलाते हैं, ‘इसलिए संस्कृत में खंजन कुल के पक्षियों का एक नाम डुलिका भी है।’ उनके विपरीत यह अपनी पूंछ दाएं-बाएं हिलाती है। जलाशयों या नदियों से इसका प्रेम नहीं है, यह तो आरण्यकों के समान अरण्यप्रेमी हैं। इसकी चाल में चपल सोडशी के समान उत्ह नक होकर, वयस्कों के समान गंभीरता है। चपल सुंदर सोडशियों की चाल को ‘खंजनगामिनी’ भी कहते हैं।
पीलकिया खंजरीट यूथप्रिय हैं। सभी पीलकिया बहनें भी साथ-साथ किसी विशाल सौभाग्यशाली नरकुल पर हज़ारों की संख्या में वास करती हैं। जब उसाकाल में वे अपने आहार की खोज में एक साथ उड्डयन करती हैं तब आकाश और सुनहला हो जाता है, और संध्या समय जब वे लौटती हैं तब पुनः आकाश में सुनहलेपन में चमक आ जाती है। यदि जमीन पर हम दोनों उसा तथा संध्या को गोधूलि बेला बोलते हैं, तब ऐसे आकाश में इन दोनों बेला� ��ं को हम पीलकिया स्वर्णबेला कह सकते हैं।

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