लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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india_sacred_cow_hindu_holy_vegetarगो-माता के विषय में यह तर्क देने की आवश्यकता हिन्दू समाज को नहीं है कि उससे हमको क्या-क्या फायदे हैं। समाचार-पत्र और पत्रिकाएं संभवतः स्मृतिहीन नई-पीढ़ी के लिये ही खनिज-लवण और पौष्टिक तत्वों की लिस्ट छापकर गाय के पक्ष में नारेबाजी करती रही हैं, और निष्कर्ष निकाले जाते हैं कि गाय क्योंकि हमारी आर्थिकी का केन्द्रीय-पशु है, क्योंकि पंचगव्य और अनेकानेक रसौषधियां चमत्कारी हैं, तो हमें इसलिए इस गुणी पशु की रक्षा करनी चाहिए। यह हिन्दू की वाणी नहीं है । हिन्दू अपने भगवानों से मिलने वाले फायदों की लिस्ट नहीं छाप सकता। गाय हमें प्रत्यक्ष रूप से जो देती है, वह उसे सुख, शान्ति और प्रभु की तरह अलौकिक आशीषों के सामने कुछ भी नहीं है, जिसकी वर्षा वह गोमाता निरन्तर करती रही है, और इसी पर्जन्य को भुलक्कड़ हिन्दू समाज आज लाभकारी पशु कह रहा है।

गाय पुराने समाज के लिए पशु नहीं थी, वह धरती पर खड़ी जीवंत देवशक्ति थी बल्कि समस्त देवताओं की आभा लिए उन्हीं अव्यक्त सत्ताओं की प्रतिनिधि थी । उस गाय को काटने-मारने के कारण ही यह भारत राष्ट्र इतनी मेधा-प्रतिभा और संसाधनों श्री-समृध्दि के स्रोतों के बावजूद यदि दिलद्दर से घिरा है तो यह उसी गो-माता का शाप है। हमारा सहस्त्रों वर्षो का चिंतन हमारा वांग्मय, हमारे योगी, तापस, विद्याएं सब लुप्त हो गये और जो कबाड़ शेष बचा है वही समाज के सब मंचों पर खड़ा होकर राष्ट्र का प्रतिनिधि बन बैठा है। प्रतिभा अपमानित है, जुगाड़ और जातियों के बैल राष्ट्र को विचार के सभी स्तरों पर हांक रहे हैं। गाय को काटने वालों ने भारतीय समाज की आत्मा को ही बीच से काट डाल है। गाय के कटने पर हमारा ‘शीश’ कट कर गिर पड़ा है। हम जीवित हिन्दू उस गाय के बिना कबन्ध हैं, हम श्वपचों की तरह इस कबन्ध के लिए ही मारा-मारी में जुटे हैं। अपराध, भ्रष्टाचार और राजनीति का दिलद्दर चेहरा ऐसे ही कबन्ध रूपी समाज में चल सकता था। वरना आज यदि गोमाता के सींग का भय होता, तो आपकी गृहलक्ष्मी आपको बताती कि भ्रष्टाचार और दिलद्दर विचारों के साथ आप आंगन में कैसे प्रवेश कर सकते हैं?

हमारी आर्थिकी की अनुभूत संरचना के कारण गाय हमारे जीवन के केन्द्र में भले ही आई हो, परन्तु अर्थतन्त्र जिस समाज को खड़ा करता है, उसका चरित्र भी आय के स्रोत के कारण अपना स्वरूप ग्रहण करता है। गाय थी तो हमारी कृषि एक आत्माभिमानी अर्थव्यस्था की रीढ़ ही, यह देश दूध-दही का देश था। कृष्ण यदि हमारे साहित्य में गाय का सहारा लिए खड़े दिखते हैं, तो कृष्ण को पूजने वाले समाज के लिए गाय कितनी बड़ी आश्रय स्थली थी, इसकी कल्पना की जा सकती है। गाय हमारी वैद्य थी, बच्चों को दूध पिलाने वाली मां थी, युवाओं की धमनियों में घी-मक्खन भरने वाली ऊर्जा थी, चलती-फिरती मन्दिर थी, भगवान की ही तरह उससे हम कष्ट के क्षणों में सब कुछ मांगते थे। इसी कारण वह हमारे धर्म का प्रतीक बनी, जीवन के प्रत्येक छोर में गाय होने के कारण, वह हमारे आंगन को मन्दिर बनाती थी। उसी के कारण हमारा अर्थतन्त्र, लूट-खसोट वाला दैत्य नहीं बना, बल्कि क्षमा, औदार्य, दान-दया अपने आप हमारे जीवन में उतरते चले गए। उसी मां के धारोष्ण दूध के कारण हमने विधर्मियों और लूटेरों तक में प्रभु के दर्शन किए, उन्हेंं आश्रय दिए और उन्हीं दैत्य-दानवों ने गाय को मारकर भारतीय जीवन की रीढ़ ही तोड़ दी। इसी कारण हम आज स्वतन्त्र होने के बाद भी पराधीन हैं । अंग्रेजी सत्ता से मुक्त आधुनिक भारतीय समाज का चरित्र गाय ने नहीं मशीन और फैक्ट्री तन्त्र ने निर्धारित किया।

श्रम का शोषण और पूंजी के केन्द्रीयकरण से लूट की मानसिकता सिंचित हुई, जो कि वैभवशाली किसान को दिहाड़ी का मजदूर बनाती चली गई, व्यक्ति से उसकी सृजनशीलता, कल्पनाशीलता छीन ली गई। गाय का अपहरण हुआ तो खेती उजड़ी, किसान की बर्बादी के कारण, ग्रामीण भारत का पूरा अर्थतन्त्र छिन्न-भिन्न कर अंग्रेजों ने दलाल, बिचौलिये और मजदूर पैदा किए। यूरोप में मांस की अत्यधिक मांग होने के कारण, अंग्रेज विचारक चील-कौवों की तरह गाय के चारों ओर मंडराने लगे। गो-धन को समाप्त करने के लिये उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त कर निकले नीति निर्धारकों, अपने इन फाईल-माफियाओं को फैक्ट्री दर्शन के पाठ पढ़ाए, अनाज की कमी का भय दिखाकर रासायनिक-खाद की फैक्ट्रियां लगीं, दूध की कमी का दुःखी नाटक दिखाकर दूध के डिब्बे फैक्ट्रियों में तैयार होने लगे, घी मक्खन सभी कुछ डिब्बा बन्द, ताकि गो-मांस को निर्बाध निर्यात किया जा सके। शहरों में रहने वाले मध्यमवर्ग ने इन उत्पादों की चमक के कारण गाय के शरीर से आंखे फेर लीं, वह गोमूत्र को भूलता चला गया, उसका बच्चा गोबर को ”पौट्टी” कहने लगा और देश में गाय सहित हजारों पशुओं को काटने वाले कत्लगाह खुलने पर ऋषियों के पुत्र एक शब्द नहीं बोले। वे इन दूध के डिब्बों से एक चम्मच पाउडर निकाल कर चाय की चुस्कियां भरकर अंग्रेजी अखबार पढ़ते रहे।

यूरोप से आयातित मांसल सभ्यता के अचार पर चटकारें मारते रहे और गो-माता हमारे जीवन से अदृश्य हो गई। क्योंकि गोबर की जगह यूरिया की बोरियों ने ले ली, बैल की घन्टियों की जगह कृषि जीवन को आक्रान्त करने वाले ट्रैक्टर आ गये। तर्क है कि अनाज की कमी पूरी हो गई। यदि हम यूरिया के कारण आत्मनिर्भर हैं तो हमारा किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? गेहूँ आयात क्यों किया जा रहा है? आप के बन्दर मुखी बुध्दिजीवी जब मंहगे होटलों में बैठकर ये जो ‘जैविक-जैविक’ का जप करते रहे हैं, क्या उनके पैरों से ‘कॉफ-लेदर’ की मुलायम जमीन खिसका दी जाए? यूरोप-अमेरिका कब तक हमें मूर्ख बनायेगा? हमारी ही गायों को उबाल कर खाने वाले ये दैत्य हमें ही प्रकृति से जुड़ने की शिक्षाएं देते हैं, खेती-जंगल-जल से पवित्र सम्बन्ध रखने वाले भारतीय समाज की ऐसी-तैसी करके भाई लोग पर्यावरण पर उस समाज को शिक्षाएं देते हैं, जिनके जीवन में ‘गाय’ की पूंछ पकड़े बिना मुक्ति की कामना नहीं थी, पेड़ जिनके धार्मिक-चिह्न हैं, नदियाँ जिनकी मां हैं, जहाँ घाटों, नदियों, गायों के व्यक्तियों की तरह नाम हैं, ताकि उनके न रहने पर समाज में उनकी स्मृति बनी रहे, उस वृद्ध और घाघ समाज को सेमिनारों में पाठ पढ़ाये जा रहे हैं, वो भी हमारे खर्चे पर। हद है!

बाबा रामदेव के स्टालों से जब भी गोमूत्र लाता हूँ तो उसकी सुगन्ध से बचपन के दिनों का आंगन याद आता है। पांच खूंटों से बंधा तीन गायों का परिवार अपने परिवार जैसा ही लगता था, अपनी टीका वाली बछिया का ‘जलमबार’ जंगल में मानते सभी स्वयं-सेवक उस दिन चाय पकोड़ी और जंगली ‘झिरणे’ की पटड़ी बनाकर उस गो-माता के उपकारों का उत्तर अपने ही ढंग से देते थे। गाय-बछड़ों के जन्मदिन हमें अपने जन्मदिनों की ही तरह याद रहते थे, हमारी एक गाय बांझ भी थी, परन्तु चाची ने घास के आवंटन में कभी भेदभाव नहीं किया बल्कि बांझ गाय को भी चाटम-चाट का आनंद देने के लिये छोटी बछिया को उसके बगल वाले खूंटे मेें बांधा जाता था। यह चाची का अपना दर्शन था, वेदों ने हर उस स्थान को तीर्थ कहा जहां गाय का निवास हो, गाय को गतिमान मंदिर कहा, हमने तो मंदिरों को भी उद्योग बना दिया है। आज हम भारतीय ‘तोप’ हो गए हैं, हम अरबों डालर कमा रहे हैं, सेंसेक्स की ऊँचाईयों की धुन से मोबाइल की रिंग टोन्स की जुगलबन्दी कर रहे हैं। गाय को मात्र दुधारू पशु मान उसे गलियों में धकिया देते हैं, जहां विधर्मी लोग उन पर गर्म पानी फेंकते हैं, नोकदार डंडों से उन्हें घायल करते हैं। इसी कारण यह राष्ट्र साधन-संसाधन होते हुये भी दरिद्र है, इसीलिए अरब की जनसंख्या वाले लोगों की भाषा को कोई सम्मान नहीं है, क्योंकि उसने अपने क्षितिज में नजरें गड़ाकर ऋषियों के गहन ज्ञान को नहीं जाना। तैंतीस करोड़ देवताओं जैसी सुविधा-सुख देने वाली गाय को वह जब से ‘बीस्ट’ कहने लगा तो उसका पतन हुआ। गाय माय को एक समान समझने वाला समाज दूध को ‘व्हाइटनर’ कहने लगा, उसने राष्ट्र की नसों में दैवीय ऊर्जा भरने वाली गाय का जर्सीकरण करके ‘माता’ को उद्योग बना दिया है।

इम्पोर्टेड वीर्य से उत्पन्न ये सीधे डंडे जैसी पीठ वाली भयंकर आंखों वाली दैत्य संस्कृति की प्रतिनिधि इस ‘जर्सी-मैडम’ को माता कैसे कहें। यह तो विदेशी ताई लगती है, यह तो मुझे ‘मदर डेरी’ जैसी मिल्क-बूथ लगती है (यह भौंथरी गो-माता मुझे क्षमा करे) गाय का यही आकार, यही आचार-विचार यदि हमारे पुरखों का होता, यही दूध का उद्योग ही गाय पालने का कारण होता, तो हम भैंस को भी काली माता कहते, पश्चिम से हमें अधिक उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए वह गरीब राष्ट्रों का या तो ईसाईकरण करेगा या जर्सीकरण। वैसे दूध के हिसाब से भी सौराष्ट्र की गीर नस्ल की गाय विश्व की सर्वश्रेष्ठ गाय घोषित हो चुकी है। अंगोल,हल्लिकार,हिसार, अमृतमहल जैसी उन्नत नस्लें छोड़ हम नकलची लोग, घटिया पशुवीर्य आयात कर रहे हैं। केरल की दुर्लभ ‘वेचुर’ नस्ल की गाय जो कम चारा खाकर अधिक दूध देती है को स्काटलैण्ड ने हड़प लिया। ब्राजील में आज साठ लाख गीर गायें हैं और हम ‘काऊ’ तैयार कर रहे हैं जिसके बछड़े के सीधे कंधों में हल भी नहीं रखा जा सकता। क्या इस ‘काऊ’ की पूंछ पकड़ हम दानपुन्न कर सकते हैं? उनमें अपने पितरों-देवताओं का रूप देख सकते हैं? कहीं गाय को नियोजित ढंग से हमारे कर्मकान्डों से अलग करने का यह कोई षडयन्त्र तो नहीं है?

”एनिमल वेलफेयर बोर्ड” की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1951 में प्रति हजार मनुष्यों पर 426 गायें थीं जो 1993 तक घटकर मात्र 176 रह गयीं। सन सैंतालिस में देश की आबादी लगभग सत्ताईस करोड़ थी और पशुओं की कुल संख्या छत्तीस करोड़ थी। आज अरब से ऊपर सभ्य भारतीयों के बीच मात्र दस करोड़ पशु रह गये हैं, कारण स्पष्ट है- परतंत्र भारत में जनदबाब के कारण मात्र तीन सौ कत्लखाने थे जबकि पिछले पचास वर्षों में 24 निर्यातोन्मुखी, 7 अत्याधुनिक कत्लखानों सहित सेकुलर देश में कत्लखानों की संख्या 36 करोड़ तक पहुंच गयी है। गोकशी पर प्रतिबन्ध के बाद हमें गाय को समझना होगा। गांव की पुस्तकें उलटकर गो-माता से जुड़े दृष्टातों के जीवाश्म ढूंढने होंगे, गो-दर्शन का डीएनए प्राप्त करके हम वैदिक-जीवन को चलचित्र की तरह देख सकते हैं। वेदों के बीजाक्षर पढ़ने की क्षमता आज यदि हममें होती तो हम उपसर्या, अद्यश्वीना, वष्कयणी, धेनुष्या और लोहितक, लाक्षिक, श्यामा, कपिला जैसे गोधन से जुड़े शब्दों को माला के दानों की तरह नई भाषा में पिरोकर रखते। हम नाथहरि, धौरेय, शाकट, महोक्ष का अन्तर समझकर ‘महाकाल’ के विभिन्न माडलों के इन वाहनों को पहचान कर वैसा आचरण करते, परन्तु अब तो अपने लोग भी गाय के दूध के गुणों को गिनाकर उसे पूजने का आदेश देते हैं। तो क्या बांझ गाय पूजनीय नहीं है? सोमरस और संजीवनी जैसी वनस्पतियां जिनके गुणों का बखान वेदों में है, उन्हें तो ऋषियों ने कभी पूजनीय नहीं कहा । गाय चार पैरों पर खड़ा जीवंत देवस्थान है, वैदिकता का वह आखिरी सूत्र है, जो कलयुग में नगरपालिका के डस्टबिन के किनारे खड़ा होकर भारतीयता का उपहास कर हमें बार-बार चेता रहा है। हमें हमारा चेहरा दिखा रहा है। हम भारतीय जो साड़ियों, जूतों के ढेर लगाने में इतने मग्न हैं, एटीएम की रकमों के नशे में विेदशी होटलों, स्टालों, सार्वजनिक स्थानों में अपने झूठे प्रदर्शनों में इतने व्यस्त हैं कि हमें विश्व के इस सर्वोन्नत दर्शन की जननी, अपनी उस गो-माता की दुर्दशा विचलित नहीं करती है। शायद इसीलिये हम मातृ स्वरूपा भूमि के प्रति सत्यनिष्ठ नहीं है। इसीलिये हम माता-पिता को कबाड़ समझकर उन्हें घर के पिछवाड़े के अंधेरे कमरों में जमा कर रहे हैं। गो-माता जब से पशु बनी तभी से हम भारतीयों का समाज भी कबन्ध हो गया है। गाय इस भौतिक जगत और अव्यक्त सत्ता के बीच खड़ा जीवित माध्यम है, उस विराट के समझने का प्रवेशद्वार है। जो लोग, जो सभ्यतायें, जो धर्म गाय को मार-काट कर, खा-पका रहे हैं, वे प्रभु और अपने बीच के माध्यम को जड़ बना रहे हैं। वे जीवित धर्म का ध्वंश कर रहे हैं। अब चाहे वे धर्म के नाम पर जितनी बड़ी अट्टालिकाएं गुबंद बना लें, वे परमात्मा की कृपा से तब तक वंचित रहेंगे, जब तक वे गाय को अध्यात्मिक दृष्टि से नहीं देखेंगे। वैसे विटामिन प्रोटीन और पौष्टिकता से भरे तो कई डिब्बे और कैप्सूल बाजार में उपलब्ध हैं। यदि ऋषियों ने भौतिक-रासायनिक गुणों के कारण गाय को पूजनीय माना होता, तो हिन्दू आज इन दूध के डिब्बों, कैप्सूलों की भी पूजा कर रहा होता। विज्ञान वही नहीं है जो अमेरिका में है, विज्ञान का नब्बे प्रतिशत तो अभी अव्यक्त है, उसे अविष्कृत होना है। हमनें अन्तर्यात्राएं करके उसकी एक झलक सभ्य संसार को दिखाई थी, असभ्यों ने वो समस्त पोथी-पुस्तक ही जला दिए। अब गाय बची है, उस माता की पूंछ ही वह आखिरी आशा है जिसे पकड़ कर हम पुनः महाविराट सत्ता का अनावरण कर सकते हैं।

– शाक्त ध्यानी

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1 Comment on "रंभाती संस्कृति को भूलता समाज"

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Jeet Bhargava
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गाय कई मायनों में समाज के हित में हैं. लेकिन न जाने क्यों कुछ तुच्छ लोगों और सेकुलरों को यह बात समझ में नहीं आती? जब तक स्वयं हिन्दू समाज सोता रहेगा, उसके धर्म-संस्कृति-राष्ट्र के प्रतीकों को मिटाया जाता रहेगा.

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