लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

धर्म को जनमाध्यमों के जरिए प्रक्षेपित करने के साथ ही, धर्म अब निजी मसला नहीं रह जाता। यह अंधलोकवाद का अंग बनकर लोकवादी (मासकल्चर) संस्कृति की इकाई के तौर पर भूमिका अदा करने लगता है। जनसमाज में धर्म की शक्ल एक माल की हो जाती है। वह लोगों में बिक्रीयोग्य होता है और राजनीतिक लामबंदी का उपकरण होता है, इसी अर्थ में जनसमाज में ईश्वर मर जाता है। उसकी जगह राजनीति ले लेती है। धर्म का यह उत्तर-आधुनिक रूप है।

यह ऐसा धर्म है जो माध्यम संस्कृति को अंतर्भुक्त करके और जनमाध्यमों के सहारे विकास करता है। हमारे देश में जनमाध्यम व्यावसायिक मनोरंजन के माध्यम हैं अत: धर्म का जब जनमाध्यमों से प्रसारण होगा तब धर्म व्यापार हो जाएगा। वह भी मनोरंजन, विखंडन एवं अलगाव की वस्तु हो जाऐगा। धर्म की धर्मनिरपेक्ष धारण यह रही है कि धर्म निजी मसला है किंतु जनमाध्यम सार्वजनीन होते हैं। धर्म का उनके माध्यम से प्रसारण धर्म को निजी नहीं रहने देता, उसे सार्वजनीन कर देता है। माध्यमों से प्रसारित धार्मिक अंतर्वस्तु का जब एक बार प्रसारण हो जाता है तो उसे सहज ही काटा नहीं जा सकता।

धर्म का सार्वजनीकरण धर्म को बाजारू और सांप्रदायिक बना देता है। जनमाध्यमों में जब धर्म प्रवेश करता है तब धार्मिक उत्सवों, आस्थाओं, पुराणपंथी प्राचीन प्रतीकों और मिथों को नई इमेज दे देता है। राष्ट्रीय एकता को धार्मिक एकता के रूप में पेश करता है। धर्मनिरपेक्षता और ‘सर्वधर्म समभाव’ को ‘सर्वधर्म सहभाव’ की धारणा के प्रक्षेपण के जरिए अपदस्थ कर देता है।

परिणामत: धार्मिक आधारों पर सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया पुनर्जीवित हो उठती है। इसी प्रक्रिया में राज्य और धर्म, राजनीति और धर्म के बीच में घालमेल का खतरा पैदा हो जाता है।

जनमाध्यमों के लिए ऑडिएंस का उपभोक्ता के रूप में महत्व होता है। ऑडिएंस जब तक उपभोक्ता है तब तक ही उपयोगी है। ऑडियो कैसेट से धार्मिक संगीत हो या टेलीविजन से धार्मिक प्रसारण हो या वीडियो में बनी धार्मिक फिल्म हो इन सबके निर्माण के पीछे ऑडिएंस की जो धारणा काम करती है वह ऑडिएंस को धार्मिक इकाई के रूप में निर्मित करते हुए संप्रेषित करती है। यहां उपभोक्ता मूलत: धार्मिक पहचान लिये होता है। इससे धर्मनिरपेक्षता और आधुनिक चेतना के विकास का रास्ता अवरुद्ध होता है। ऑडियो-वीडियो कैसेट की बाढ़ का प्रत्यक्ष संबंध टेलीविजन विस्तार से है। अत: टेलीविजन में धर्म के प्रति जो रवैया उभर रहा है वह मूलत: व्यापक धार्मिक और सांप्रदायिक ऑडिएंस तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। धार्मिक आधार पर राजनीतिक लामबंदी को मजबूत कर रहा है। माध्यम विशेषज्ञ सुधीश पचौरी के अनुसार टेलीविजन के माध्यम से धार्मिक उत्सवों और धार्मिक सूचनाओं का प्रसारण सिर्फ सूचनाओं का प्रसारण भर नहीं है, बल्कि इससे भी बढ़कर इसका अर्थ होता है। धर्म के सार्वजनीकरण के कारण धार्मिक समूहों और धार्मिक पहचान के नए आयामों का जन्म होता है। वह इन्हें संगठनबद्ध करता है। इस प्रक्रिया को सांप्रदायिक संगठनों के हित में किया गया विचारधारात्मक कार्य कहा जा सकता है। अथवा अनजाने ही इन संगठनों को इस प्रक्रिया में व्यापक जनाधार मिल जाता है जो उनके पास आधुनिक युग में कभी भी नहीं था। व्यापक जनाधार, आक्रामकता, असहिष्णुता और अतार्किकता के कारण कालांतर में ये संगठन या धर्मसमूह एक दबाव गुट का कार्य करते हैं और धर्म की राज्य के ऊपर वरीयता मिल जाती है।

इसके अलावा टेलीविजन ने सांस्कृतिक पर्वों को धार्मिक पर्वों के रूप में प्रसारित किया है। वह होली, दीवाली, क्रिसमस, ईद जैसे सांस्कृतिक पर्वों को धार्मिक पर्व के रूप में पेश करता रहा है। सांस्कृतिक पर्वों के बारे में तथ्यपूर्ण बातें बताने के बजाय लोकप्रिय किंवदंतियों और अयथार्थपरक लोकप्रिय धारणाओं को ही उनके सारतत्व के रूप में पेश करता है। किंवदंतियों के उन रूपों का चयन करता है जो सांस्कृतिक उत्सव के बजाय धार्मिक उत्सव वाली छवि बनाने में मददगार हों। यह सांस्कृतिक एवं धार्मिक उत्सवों को एक-दूसरे से अलगाता नहीं है। इसके विपरीत घालमेल पैदा करता है।

टेलीविजन इमेज मात्र इमेज नहीं होती अपितु वह विशिष्ट अर्थ संप्रेषित करती है। तदनुरूप दर्शक को बदलती और संगठित-असंगठित करती है। जिस तरह हम विज्ञापन देखते हैं तो मात्र विज्ञापन नहीं देखते। अथवा टेलीविजन जब विज्ञापन पेश करता है तब वह हमारे घर में एक वस्तु पेश करता है और फिर यही वस्तु एक अन्य वस्तु को जन्म देती है।

इसी तरह टेलीविजन से जब धर्म का प्रसारण होता है तब धर्म पैदा नहीं होता बल्कि सांप्रदायिकता पैदा होती है। विज्ञापन के माध्यम से कंपनियां दर्शक से विनिमय मूल्य अर्जित करती हैं। इसी तरह धर्म जब प्रक्षेपित होता है तब दर्शक से अपना वैचारिक-सामाजिक एवं आर्थिक विनिमय मूल्य वसूल करता है। धर्म का जब विनिमय मूल्य प्राप्त होने लगे तो वह धर्म नहीं रह जाता और न ही धार्मिकता का प्रचार कर रहा होता है बल्कि वह सांप्रदायिकता का ही विनिमय करता है। धर्म और

धार्मिक विचार दोनों ही अब माल बन जाते हैं। अब धार्मिक सूचना का चेहरा और शरीर दोनों ही बदल जाते हैं।

सांप्रदायिक माध्यम रणनीति में जनता और नेता का भेद नहीं मिलता। इन दोनों में समानता दर्शाते हुए जनता एवं नेता की पहचान को एकमेक कर दिया जाता है। हिंदू एकता को देशभक्ति बताया जाता है। जबकि यह साम्प्रदायिकता है।साम्प्रदायिक नेता दंगों को स्वतस्फूर्त्त और स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहते हैं।वे यह भी आभास देते हैं कि दंगे संगठनविहीन और स्वत:स्फूर्त होते हैं। हकीकत में सांप्रदायिक दंगे आकस्मिक लगते जरूर हैं, किंतु वे सुनियोजित एवं संगठनबद्ध ढंग से कराए जाते हैं। वे स्वत:स्फूर्त एवं आकस्मिक नहीं होते।

असल में, दंगाई ताकतें लोकवादी संस्कृति की खूबियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने में सफल रहे हैं। लोकवादी संस्कृति आम जनता में समर्पण का भाव पैदा करती है। जनसभाओं की शिरकत को निष्क्रिय शिरकत में बदल देती है। फासीवादी ताकतें इन दोनों ही बातों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करती रही हैं। वे धार्मिक मुक्ति को जनता की मुक्ति कहते हैं, इस आधार पर जनता की एकता का शोषण करते हैं।

कामुकता, उपभोक्तावाद और अप्राकृतिक मैथुन के बढ़ते हुए प्रयोग ने भारत में फासिज्म की जड़ें जमाने में मदद की है। वे ऐसे नेता को उभारते हैं जो स्वभाव से अविवेकवादी एवं अधिनायकवादी होता है। बहुसंख्यक समुदाय में भावोत्तेजना पैदा करता है। नस्लपरक दंभ का सृजन करता है। सामूहिक अहंकार को उभारता है। उत्तेजनापूर्ण भाषणों से जनोद्वेग पैदा करता है। उसके पास कोई कार्यक्रम नहीं होता। वह ऐसे कार्यक्रम को चुनता है जो भ्रष्टाचार या अल्पसंख्यक विरोधी हो।

फासीवाद को असली समर्थन बड़े औद्योगिक घरानों एवं उपभोक्तावाद से मिलता है। वह ऐसी भीड़ का निर्माण करता है जो असहिष्णु एवं घृणा से भरी होती है। विवेकपूर्ण संवाद की जिसके साथ गुंजाइश ही नहीं होती। हिंसा और घृणा उसका स्थायी भाव है। आस्था उसकी संपत्ति है। संकीर्ण एवं अवैज्ञानिक दृष्टि से संस्कृति, इतिहास एवं राजनीतिक प्रश्नों की व्याख्या उसकी विचारधारात्मक संपत्ति है। अभी तक इन्हीं विशेषताओं के कारण हिंदू समाज में फासीवाद अपील भी करता रहा है। इतिहासकार अमर्त्यसेन ने सही लिखा है कि हाल की हिंदू राजनीति का उल्लेखनीय पक्ष सिर्फ यह नहीं है कि इसमें अयोध्या की मस्जिद के बारे में, भारतीय मुसलमानों के उदय के बारे में, खुद हिंदू धर्म की सहिष्णु प्रकृति के बारे में, लोगों के अज्ञान का तिकड़मी ढंग से इस्तेमाल किया गया, बल्कि इसका उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि खुद हिंदू नेताओं द्वारा भारतीय सभ्यता की कहीं बड़ी उपलब्धियों को, यहां तक कि स्पष्ट रूप से हिंदू योगदानों को भी अनदेखा कर संदिग्ध विशेषताओं को ग्रहण किया गया। उनके लिए न तो उपनिषदों या गीता की बौध्दिक ऊंचाइयों का कोई अर्थ है, न ब्रह्मगुप्त या शंकर या कालिदास या शूद्रक की सूक्ष्मदर्शिता का। उनके लिए राम की मूर्ति और हनुमान की छवि के सामने माथा टिकाना ज्यादा महत्वपूर्ण है। उनका राष्ट्रवाद भारत की तर्कवादी परंपराओं की भी अनदेखी करता है। यह वह देश है जिसने बीजगणित, ज्यामिति तथा खगोलशास्त्र के क्षेत्र में कुछ कदम सबसे पहले उठाए थे। यहां दशमलव प्रणाली विकसित हुई, यहां आरंभिक दर्शन, चाहे धार्मिक हों या अधार्मिक, असाधारण ऊंचाइयों पर पहुंचा, यहां लोगों ने शतरंज जैसे खेलों का आविष्कार किया, सबसे पहले यौन शिक्षा शुरू हुई और पहले-पहल राजनीतिक अर्थव्यवस्था का व्यवस्थित अध्ययन हुआ। लेकिन हिंदू लड़ाके इन सबके बजाय प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत को मूर्तिपूजकों, धर्मोन्मादियों, युध्दोन्मत्त भक्तों और धार्मिक हत्यारों के ही देश के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

जाहिर है कि यही भारत के सिलसिले में जेम्स मिल की साम्राजी दृष्टि थी। इस दृष्टि के हिसाब से भारत एक बौध्दिक रूप से दिवालिया, किंतु जघन्य विचारों और बर्बर सामाजिक प्रथाओं से भरा हुआ देश है। अतीत में भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस छवि की प्रामाणिकता को चुनौतियां दी थीं। लेकिन आज के हिंदू राष्ट्रवादी जेम्स मिल को सही साबित करने पर तुले हुए हैं।

अमर्त्यसेन की राय है समकालीन हिंदू राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी विभिन्न स्तरों पर व्याप्त अज्ञान पर उनकी निर्भरता में है। यह निर्भरता, लड़ाकू कठमुल्लापन को बढ़ाने के लिए लोगों के धार्मिक भोलेपन को भुनाने से लेकर संकीर्ण राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक फासीवाद को बढ़ावा देने तक भारत के अतीत की विकृति तक जाती है। सीधे-सादे और सूक्ष्म दोनों तरह के अज्ञान पर यह बुनियादी निर्भरता, इस संकीर्णतावाद की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी है। इसी कड़ी पर टकराव की स्थिति खास तौर से प्रतीक्षित है।

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1 Comment on "धार्मिक प्रसारण की साम्प्रदायिक रंगतें"

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श्रीराम तिवारी
Guest

बहुत सटीक ,समसामयिक और जरुरी आलेख …….बधाई …..

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