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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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आशा शुक्ला

किसी भी देश की प्रगति का दारोमदार उसकी आधारभूत संरचनाओं पर निर्भर करता है। यदि मूलभूत आवश्‍यक तत्वों में कोई खामी हो तो उसे आर्थिक प्रगति के पथ पर निर्बाध रूप से आगे बढ़ने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हमारे देश में भी सड़क इस महत्वपूर्ण नीति का एक प्रमुख स्तंभ है। यही कारण है कि केंद्र सरकार इस ओर विषेश ध्यान देती रही है। 25 दिसंबर 2000 को शुरू किए गए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना इसे मूर्त रूप देने में विषेश भूमिका अदा कर रहा है। इस महत्वकांक्षी परियोजना को 11 वर्ष हो चुके हैं। सड़कों के माध्यम से गांव-गांव को जोड़ने का यह अभियान कुछ राज्यों में प्रभावी रूप से पूरा हो रहा है परंतु नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब भी यह भ्रष्‍टाचार के कारण अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया है। छतीसगढ़ जो नक्सल से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है, कार्ययोजना के पूरा होने का इंतजार कर रहा है। राज्य का बस्तर इलाका माओवादियों का गढ़ माना जाता है, परंतु यहीं सड़कों का सबसे बुरा हाल देखने को मिल जाएगा। हालांकि यहां की कुछ सड़के इतनी अच्छी हैं कि प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों में देखने को भी नही मिलेगी। परन्तु खासतौर से प्रभावित इलाकों की सड़कों को देखकर लगता हैं कि बरसों से बनी ही नही हैं। इनमें अधिकतर सड़कों का काम शायद पंचवर्षीय योजना के तहत हो रहा हैं। सड़कों की आड़ में करोड़ों का घोटाला करना अब एक आम बात हो गई हैं। आलम तो यह हैं कि नक्सलियों से लोहा लेने वाले सीआरपीएफ को भी इन्हीं टूटी फूटी सड़कों से होकर गुजरना होता है। कहीं-कहीं पर सीआरपीएफ के दो -दो कैंपों के बीच में भी दो-चार किलोमीटर की सड़क अब तक नहीं बन पाई हैं।

बस्तर की कुछ सड़कों का ब्यौरा उदाहरण के तौर पर दिया जा सकता है रायपुर से जगदलपुर जाने वाले एनएच 43 पर आज भी दो पुल बरसों से बन रहें हैं और बरसों से लोग इससे गुजरने की सजा भुगत रहें हैं। अलबत्ता पुल बनाने का सामान और उनका मलबा दुर्घटनाओं को अंजाम देने की सटीक जगह बन चुके हैं। कांकेर से भानुप्रतापपुर जाने वाली सड़क पर कुछ पुलों के निर्माण का कार्य आज भी अधूरा पड़ा है। यहां सड़क पर मिटटी का भराव नाममात्र का किया गया है जो वर्शा के दिनों में क्या कहर ढाएगा पता नहीं। इतना जरूर है कि यहां पड़ा मलबा माओवादियों अथवा अर्धसैनिक बलों के लिए बंकर का काम कर सकता हैं फिर चाहें जिसे पहले मौका मिले।

इसी तरह बीजापुर में आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाएं इसका जीवंत उदाहरण है। इसमें सड़क का कोई दोश नहीं हैं क्योंकि इस क्षेत्र में अधिकांश सड़कें पता नहीं किस ईसवी में बनी थीं और अब उनके रखरखाव का कौन जिम्मेदार है कोई नहीं जानता। जिले के भैरमगढ़ घाटी से लेकर नेमेड़ तक सड़क यात्रा बहुत कश्टदायक हैं जबकि यहां भी सड़क के दोनों ओर सीआरपीएफ के कई कैंप हैं। कई जगहों पर सड़क निर्माण में लगी हुई जिन मशीनों को माओवादियों द्वारा जलाए जाने की खबरें पढनें में आती हैं उन्हें देखकर ऐसा लगता हैं कि ये मशीनें बकायदा कबाड़ से लाकर जलाई गई हैं। जबकि इसी नक्सल प्रभावित इलाके बस्तर में जहां-जहां पूरी गुणवता का ध्यान रखकर सड़के बनाई गई है वह ऐसा कुछ भी नहीं हुआ हैं। ज्ञात हो कि बस्तर में पूरा आवगमन इन्हीं सड़को पर निर्भर हैं। जिला मुख्यालय नारायणपुर से कोंडागांव की सड़क भी अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत की बेदी चढ़ गई है। नारायणपुर से देवगांव मात्र पांच किलोमीटर दूर स्थित मुख्य सड़क अब भी निर्माण की बाट जोह रहा है तो आगे कोंडागांव तक सड़कें कब तक बनेंगी इसका अंदाजा स्वंय लगाया जा सकता है। इसी तरह नारायणपुर से ऐंड़का और उससे आगे सीआरपीएफ के दो कैंप हैं जहां से फोर्स को रोजाना इन्हीं कच्ची सड़कों से गुजरकर गश्‍त पर जाना होता है। यहां एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर बिना परमीशन के जंगल कट जाता हैं परंतु जब गांव के अंदर सड़क और बिजली पहुंचाने की योजना होती है तो हजारों कानून सिर उठाकर कैसे खड़े हो जाते हैं?

कई जगहों पर माओवादियों के पहुंच की बात तो दूर आहट भी नही हैं इसके बावजूद उन क्षेत्रों में सड़कों की हालत जर्जर बनी हुई है। जबकि केशकाल ब्लाक के बहीगांव इलाके में तो एक पूरी सड़क कागज पर बन गई है ऐसे संवेदनशील इलाके के लिए हमारी ये असंवेदनशीलता भ्रष्‍टाचार में डूबे हमारे तंत्र के असली चेहरे को उजागर करता हैं। सरकारीतंत्र में भ्रष्‍टाचार की पराकाष्‍ठा यदि देखना हो तो बस्तर दुर्भाग्य से उसका एक अच्छा उदाहरण हैं। बस्तर में नियुक्त अधिकांश अधिकारी बेवजह खौफ में जीते हैं। वास्तव में उन्होंने एक अनजाने डर को अपने बचाव के लिए ढाल बना लिया हैं। नक्सल के नाम का खौफ दिखाकर ये क्षेत्रों में दौरा करने से इसलिए घबराते हैं क्योंकि ग्रामीणों के सवालों का जबाव इनके पास नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि समूचा तंत्र ही भ्रश्टाचार में डूबा हुआ है। इन क्षेत्रों में ऐसे भी अफसर हैं जो ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं यही कारण है कि वे आज भी बेखौफ अपने जिले का दौरा करते हैं।

बस्तर के पांचों जिलों में इस वक्त सड़क, पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और रोजगार गारंटी के कामों की सतत निगरानी और समीक्षा की सख्त जरूरत है। बस्तर के स्कूलों में विगत दो तीन वर्शो से यह देखने में आ रहा हैं कि जब से शिक्षाकर्मियों की भर्ती में स्थानीय लोंगों को प्राथमिकता मिली है तब से हालात सुधरे हैं इसलिए स्थानीय लोगों को अधिक से अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परंतु ठेकेदारों, अफसरों और चंद नेताओं की मिलीभगत ने तंत्र को इस कदर भ्रष्‍ट बना दिया है कि सक्षम कानून होने के बावजूद भी ऐसे लोगों को दंड देने में अक्षम साबित हो रहें हैं। प्रश्‍न उठता है कि सड़क निर्माण में जो गड़बड़ियां हैं उसके लिए कौन जिम्मेदार है? निर्माणकर्ता पर नजर रखने के लिए गठित निगरानीतंत्र की भूमिका क्या है? क्या दोषियों के खिलाफ कभी कार्रवाई हो पाएगी? घटिया सड़क निर्माण के कारण जिन लोगों को अकाल मौत का सामना करना पड़ा है उसका जिम्मेदार कौन है? बुजुर्गों ने कहा हैं- भय बिन प्रीत न होत गोसाई इसलिए कानून का भय दिखाए बिना सिस्टम को ठीक करना मुश्किल है। अच्छा तो यह होता कि सरकार पारदर्शी तरीके से कुशल व आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर बस्तर में मजबूत सड़कें बनाने पर जोर देती। (चरखा फीचर्स) 

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