लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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roadtaxआगरा एकमात्र जहां, स्मारकों के प्रवेश द्वारों पर पथकर लागू
डा. राधेश्याम द्विवेदी
पुरातत्व विभाग ने ऐतिहासिक स्मारकों की टिकट में बढ़ोतरी एक अप्रैल से लागू कर दी है । ताजमहल के दीदार के लिए विदेशी सैलानियों को अब 750 रुपये की जगह 1000 रुपये और भारतीय को 20 रुपये की जगह 40 रुपये की टिकट हो गई है। पूर्व में प्रस्तावित दरों में संशोधन किया गया है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा पहले टिकट की दरों में नवंबर में ही लागू करना चाह रहे थे, लेकिन पर्यटन लॉबी के विरोध के चलते मामला टल गया था। देश के 120 स्मारकों में टिकट के जरिए ही प्रवेश दिया जाता है। इनमें से 32 स्मारक विश्वदाय हैं। नई सूची के अनुसार विदेशी सैलानियों के लिए ताजमहल पर एएसआई और एडीए द्वारा पथकर के रूप में ली जाने वाली राशि बराबर हो गई है। ताजमहल में बढ़ी दरों की टिकट दो अप्रैल से लागू हो गई है। एक अप्रैल को शुक्रवार होने के कारण ताजमहल बंद रहता है। इसलिए उसके एक दिन बाद ही टिकटों की बिक्री लागू हो गई है। इसके लिए नया साफ्टवेयर तैयार किया गया है। ताजमहल में सैलानियों के लिए ई-टिकटिंग की व्यवस्था है। यदि सॉफ्टवेयर में कोई कमी रह जाएगी, तो मैन्युल टिकटों पर बढ़ी हुई राशि की मुहर लगाकर उसे सैलानियों को दिया जाएगा। वर्ल्ड हेरिटेज मान्यूमेंट: ताजमहल, किला, फतेहपुर सीकरी में शूटिंग करने के लिए अब एक लाख रुपये फीस के रूप में जमा करने होंगे। साथ ही जमानत राशि के रूप में 50 हजार रुपये भी जमा करने होंगे। ये राशि बाद में लौटा दी जाएगी। पहले इन स्मारकों पर बतौर फीस 20 हजार रुपये ही जमा कराए जाते थे। जमानत राशि के रूप में पांच हजार रुपये लिए जाते थे। ये फीस अन्य स्मारकों के लिए भी समान थी। इसी तरह अन्य स्मारकों पर अब 50 हजार रुपये फीस के रूप में जमा करने होंगे। जमानत राशि के रूप में 10 हजार रुपये जमा करने होंगे।
नई टिकट की दरें: विदेशी सैलानी
स्मारक टिकट का मूल्य
ताजमहल 1000
आगरा किला 550
फतेहपुरसीकरी 510
सिकंदरा 310
एत्मादुद्दौला 210
मेहताब बाग 200
रामबाग 200
मरियम टॉम्ब 200
नई टिकट की दरें: भारतीय सैलानी
स्मारक कुल
ताजमहल 40
आगरा किला 40
फतेहपुरसीकरी 40
सिकंदरा 20
एत्मादुद्दौला 20
मेहताब बाग 15
रामबाग 20
मरियम टॉम्ब 20
अफगानिस्तान पर्यटकों का हंगामा
ताजमहल के प्रवेश टिकट में की गई बढ़ोतरी पर 09.04.216 दोपहर अफगानिस्तान के छह पर्यटकों ने हंगामा कर दिया। दल 40 रुपये वाला भारतीय टिकट लेकर शनिवार दोपहर एक बजे ताज पूर्वी गेट पहुंचा था। लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिला। जांचकर्ता 530 रुपये का टिकट खरीदने पर जोर दे रहा था। पर्यटकों को बताया गया कि एडीए सार्क और बिम्सटेक देशों के सैलानियों को विदेशी मानते हुए 500 रुपये ही वसूलता है। ऐसे में उन्हें 530 रुपये का टिकट खरीदना पड़ेगा। इस पर अफगानी पर्यटक भड़क गए। सीआईएसएफ ने रोका तो उन्होंने टिकट फाड़कर विरोध जताया और ताज देखे बिना लौट गए।अफगानी पर्यटक एम. अयूब का कहना था कि भारत सरकार ने सार्क देशों के पर्यटकों को यह छूट दी है तो राज्य सरकार को भी यह मानना होगा। ताजमहल भारत में है तो भारत सरकार के नियम कानून क्यों नहीं पालन किए जा रहे ?
करोड़ों की कमाई : मनमाने तरीके से खर्च ताजमहल पर टिकट से कमाई करोड़ों की है लेकिन पर्यटकों की सहूलियत के संसाधनों में कोई सुधार नहीं हुआ है। खस्ताहाल सड़कों से गुजरकर ताज तक पहुंचने वालों की मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब परिसर में वॉशरूम, टॉयलेट और बेंच जैसी बुनियादी संसाधनों का टोटा दिखाई पड़ता है। इस धरोहर से होने वाली कमाई परिसर में संसाधन बढ़ाने पर खर्च होने के बजाय खामोशी से अफसरों की सुविधाओं पर खर्च हो जाती है।
पिछले साल यहां सात लाख विदेशी और 60 लाख भारतीय पर्यटक आए। इस हिसाब से देखें तो एएसआई-एडीए को टिकट से 64 करोड़ रुपये की आय हुई। ताज के टिकट पर वसूले जा रहे पथकर को खर्च करने के लिए कमिश्नर की अध्यक्षता में बाकायदा एक कमेटी बनी हुई है। डीएम, नगर आयुक्त, एएसआई के अधीक्षण पुरातत्वविद, एडीए के उपाध्यक्ष और होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष इसके सदस्य हैं। कमेटी पर्यटन सुविधाओं व सड़क-बिजली पर 40 फीसदी, पर्यावरण सुधार व सफाई पर 20 फीसदी, पर्यटन के इन्फ्रास्ट्रक्चर पर 15 फीसदी, टूरिस्ट पुलिस पर 10 फीसदी और पर्यटकों की सुविधा पर 15 फीसदी खर्च कर सकती है।वास्तविकता इसके उलट है। यह रकम अपेक्षाकृत गैरजरूरी सुविधाओं पर खर्च की गई है। जिला प्रशासन ने दो इनोवा व दो बोलेरो गाड़ियां खरीदने पर 45 लाख रुपये खर्च किए हैं। एएसआई अधिकारी के लिए टोयोटा इटियोस कार के लिए 8.67 लाख, दो स्कॉर्पियो के लिए 48.87 लाख, एडीएम (प्रोटोकॉल) आफिस के लिए लैपटॉप, कंप्यूटर, प्रिंटर, फोटोकापी मशीन पर 2 लाख रुपये खर्च किए गए। यही नहीं डिप्टी एसपी के आफिस की रंगाई-पुताई पर भी 5.92 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। कमिश्नर प्रदीप भटनागर का कहना है कि पथकर के इस्तेमाल से पर्यटन सुविधाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। किसी तरह के खर्च को लेकर जो भी प्रस्ताव आते हैं, उन पर सभी सदस्य चर्चा करते हैं। ताजमहल के 500 मीटर के दायरे में इलाके की सूरत बदलने के लिए 196 करोड़ रुपये का ताजगंज प्रोजेक्ट चल रहा है लेकिन छह महीने से इसका काम बंद है। छह महीने पहले ही ताजगंज की सड़कों को केबल डालने के लिए खोदा गया था। बाद में इसे मरम्मत के बिना ही छोड़ दिया गया। आए दिन पर्यटक इन सड़कों पर गिरकर घायल हो जाते हैं। राकेश चौहान,सदस्य, पथकर सलाहकार समिति का कहना है कि पथकर का पैसा सड़कों पर खर्च नहीं हो रहा है। अधिकारी मनमाने तरीके से पथकर की रकम को खर्च करते हैं।
ताज का दीदार अभी और महंगा हो सकता है- प्राधिकरण की मांग पर अमल हुआ तो ताज का दीदार अभी और महंगा हो सकता है। एएसआई के एक अप्रैल से टिकट की दरें बढ़ाने के बाद एडीए ने इसके प्रयास तेज कर दिए हैं। असल में एडीए तो 2014 में ही ताज के टिकट में पथकर की राशि की बढ़ोतरी का प्रस्ताव पारित कर चुका था। संगमरमरी ताज से होने वाली कमाई से सिर्फ एएसआई का खजाना ही नहीं भरता पथकर के हिस्से से ताज का आंगन और शहर भी संवरता है। हाल ही में एएसआई ने ताज का टिकट महंगा कर दिया, लेकिन पथकर के नाम पर एडीए को मिलने वाला हिस्सा वर्ष 2000 के बाद से नहीं बढ़ा। प्राधिकरण बीते कई सालों से ताज के टिकट में मिलने वाले अपने हिस्से में बढ़ोतरी चाहता है, लेकिन बात नहीं बन पा रही। एडीए बोर्ड ने 15 दिसंबर 2014 को प्रस्ताव पारित कर शासन को भेज दिया था। तब से वो लंबित है। अब प्राधिकरण चाहता है कि एएसआई का हिस्सा बढ़ने के बाद उसके लंबित प्रस्ताव पर भी अमल हो जाए।
एडीए ने पत्राचार में तर्क दिए हैं कि ताज की सुरक्षा से लेकर साफ-सफाई और प्रकाश व्यवस्था तक का तमाम इंतजाम प्राधिकरण करता है। पर्यटकों को ताज तक पहुंचने में दिक्कत न हो सो सड़कों का निर्माण भी पथकर निधि से कराया जाता है। एडीए ने पथकर का हिस्सा बढ़ाने को जो सबसे प्रमुख तथ्य दिया है वो इनर रिंग रोड रोड का है। प्राधिकरण ने कहा है कि यमुना एक्सप्रेस-वे के जरिए आगरा आने वाले पर्यटकों को ताज तक पहुंचने में असुविधा न हो सो एडीए इनर रिंग रोड का निर्माण करा रहा है। पथकर निधि से रिंग रोड को हर साल 25 करोड़ रुपये दिया जाना है। यह सिलसिला दस साल तक चलेगा।
विश्व के तमाम दूसरे स्मारक भी महंगे एएसआई ने पहली अप्रैल से ताज का टिकट क्या महंगा किया, नई बहस छिड़ गई। यह बढ़ोतरी करीब डेढ़ दशक के बाद हुई है। कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे हैं तो कुछ विरोध। विरोध करने वालों का तर्क है कि पर्यटक घट जाएंगे। हालांकि इस तर्क में दम कुछ कम दिखता है। ताज न दुनिया के सात अजूबों में सबसे महंगा है और न विश्व प्रसिद्ध अन्य इमारतों में। संगमरमरी ताजमहल की खूबसूरती का लोहा दुनिया मानती है। बेशक, दुनिया यह भी मान चुकी है कि ताजमहल विश्व का पहला अजूबा है। लेकिन ताज के हक की लड़ाई लड़ने वाले अभी बहस को शायद सही दिशा नहीं दे पा रहे। ताज की चमक और बढ़ाने के लिए जरूरत इस शहर को चमकाने की है जिसकी बात नहीं होती। ताज के मोहपाश में बंधे पर्यटक दुनिया के कोने-कोने से खिंचे चले आते हैं, लेकिन यहां आकर उन्हें मायूसी होती है।
उन्हें ताज में प्रवेश करते वक्त उस महक का अहसास नहीं होता, जो वे अपने जेहन में बसाकर लाते हैं। उनका सामना जगह-जगह गंदगी, उफनते नालों से उठती दुर्गंध और अपना सामान खरीदने के लिए खींचतान करते लपकों से होता है। सवाल यह है कि पेरू के माचू पिच्चू को देखने के लिए जब लोग 41 से लेकर 72 डॉलर तक खर्च कर सकते हैं। जार्डन के पेट्रा के लिए 71 डॉलर चुका सकते हैं तो ताज के लिए 15 डॉलर क्यों नहीं। जानकार कहते हैं कि विदेशी पर्यटकों की कम आमद का कारण कम से कम ताज का टिकट तो नहीं हो सकता। दुनियाभर में ऐसी तमाम ऐतिहासिक चीजें हैं, सात अजूबों में शुमार नहीं हैं और खूबसूरती की रैंकिंग में भी ताज से काफी पीछे हैं। मगर इनका दीदार ताज से महंगा है। यूएसए का स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी, फ्रांस का एफिल टॉवर, ब्रिटेन का स्टोनहेंग, ग्रीस के एक्रोपोलिस जैसे दुनिया के तमाम नामचीन स्मारक टिकट के मामले में ताज से महंगे हैं। पीसा की मीनार के तो हर फ्लोर का टिकट अलग है।
ये हैं दुनिया के सात अजूबे और उनकी टिकट दर
1. माचू पिच्चू (पेरू) -41 से 72 डॉलर
2. पेट्रा (जॉर्डन) – 71 डॉलर
3. क्राइस्ट द रिडीमर (ब्राजील) -22 से 78 डॉलर
4. ताजमहल – 15 डॉलर
5. कोलोसियम (रोम, इटली) -14 डॉलर
6. चीचेन इट्जा (मैक्सिको) -13 डॉलर
7. ग्रेट वॉल ऑफ चाइना -6.5 डॉलर
आगरा में स्मारकों के टिकट भंडारण की समुचित व्यवस्था नहीं आगरा के एतिहासिक स्मारकों में पहले निशुल्क प्रवेश की व्यवस्था थी. फिर टोकन के रूप में भारतीयपुरातत्व सर्वेक्षण ने एक आने का टिकट शरू किया था.प्रत्येक शुक्रवार को स्मारक निःशुल्क रहता था. 1975 के आपात् काल में आगरा के विकास के नाम पर पूर्व कांग्रेस युवराज श्री संजय गांधी की पहल पर पथकर आगरा पर थोपा गया था. पुरातत्व के अधिकारी इसे लागू करने के पक्ष में नहीं थे. राज्य सरकार ने उन्हें बन्द करने की धमकी, स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से दिलवाकर, यह पथकर जबरन लागू करवाया था. उस समय पुरातत्व विभाग का टिकट 50 पैसा तथा पथकर रू1.50 शुरू किया गया था. उत्तर प्रदेश के सभी स्थानीय निकायों में टोल टैक्स जिले के सीमा पर वसूले जाते थे. आगरा ही एक मात्र जिला था जहां प्रवेश शुल्क की दोहरी व्यवस्था थी. जिले की सीमा पर चुंगी तथा हर स्मारकों के प्रवेश द्वारों पर पथकर चालू किया गया था. एसा उदाहरण ना तो उत्तर प्रदेश और ना ही हिन्दुस्तान के किसी अन्य शहर में कहीं था और ना और कहीं वर्तमान में एसी व्यवस्था है. बाद में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री माननीय श्री मुलायम सिंह जी ने पूरे प्रदेश से चुंगी व्यवस्था समाप्त कर दी थी, परन्तु स्मारकों पर वसूलने वाले पथकर अभी भी मनमानी तरीके चलाये जा रहे है.
आगरा से लेकर लखनऊ तक के अधिकारियों को पथकर सोने का अंडा देने वाली मुर्गी दिखाई पड़ने लगी. प्रवेश शुल्क का तीन गुणा पथकर आगरा के स्मारकों पर जबरन आगरा विकास प्राधिकरण के माध्यम से प्रदेश सरकार ने थोप रखा है. यह वहुत ही आश्चर्य का विषय है कि पर्यटकों से वसूलने वाले इस शुल्क का कोई लाजिक नहीं निभाया जा रहा है. भारत सरकार सार्क देश के पर्यटकों को भारतीय टिकट चलाता है और विकास प्राधिकरण उनसे विदेशी शुल्क वसूलवाता है. भारत सरकार उन्हें अखण्ड भारत का अपना भाई मानता है. उत्तर प्रदेश सरकार तो उन्हें अपनाने को तैयार नहीं और उनसे कोई हमदर्दी न दिखाते हुए विदेशी का शुल्क वसूलवाती हैं. पुरातत्व सर्वेक्षण के भारत सरकार के कर्मचारी इस दोगली नीति को अपनाने के लिए मजबूर बन आत्म समर्पण कर बैठे हैं. आगरा विकास प्रधिकरण पुरातत्व विभाग से कई गुना पथकर लगाने के जुगत में हमेशा लगा रहता हैं. इस जबरन वसूली से आये धन का माननीय आयुक्त के संरक्षण में बन्दर बांट द्वारा जिले के गैर पर्यटन मदों में भी भारी मात्रा में खर्च करने की सारी औपचारिकतायें पूरी कर ली जाती है.
पहले टिकटों की छपाई कलकत्ता के नामचीन कम्पनी के माध्यम से की जाती थी. फिर अधिकारियों ने इसे नासिक के सरकारी नोट छापने वाली कम्पनी के माध्यम से छपवाना शरू करा दिया. इन प्रवेश टिकटों का आकार बड़ा कर दिया गया. इससे यह अब ज्यादा स्थान घेरने लगा| पहले इन टिकटों का भंडारण विभाग के भंडारण कक्ष में होता था. अब चंकि वह स्थान आवास के रूप में उपयोग में लिया जा रहा है, इसलिए टिकटों के भंडारण की व्यवस्था विभागीय पुस्तकालय में कर दिया गया है. जहां ना तो पाठकों का प्रवेश आसान रह गया है और ना ही पुस्तकालय अधिकारी की. अब तो यहां पढने-पढ़वाने जैसी कोई सुविधा भी नहीं रह गयी है. टिकटों के अलावा विभागीय अन्य बहुत सी बस्तुएं पुस्तकालय हाल में बेतरतीब लगवा दिये गये हैं कि यहां बैठ पाना मुश्किल हो गया है.
लाखों- करोड़ों रूपये की आमदनी करने वाले दोनो विभाग इन टिकटों के भंडारण के प्रति कत्तई गंभीर नहीं हैं और सदियों से चली आ रही विभागीय व संदर्भ सेवा की यह पुस्तकालय लगभग बन्दी के कागार पर पहुंच गई है. जहां ना तो साफ सफाई की समुचित व्यवस्था रहती है अैर ना ही पुस्तकालय अधिकारी के सहयोग के लिए किसी सहयोगी को नियत किया गया है. किसी समय विभाग के दिल्ली व प्रदेश सरकार के अधिकारियों को यह पुस्तकालय अपनी थाती के रूपमें दिखलाया जाता था. अब सारी प्राथमिकतायें हीं बदल गयी हैं. पुस्तकालय अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है. जिले के नामचीन समाचार पत्रों के संवादाता अपने समाचार कहानियों के संकलन के लिए इस पुस्तकालय का उपयोग तो करते हैं, परन्तु उन्हें पुस्तकालय की वर्तमान दुदर्शा दिखलाई नहीं पडती है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा आगरा विकास प्राधिकरण को टिकटों के भंडारण के लिए कोई स्थाई समाधान निकालना ही चाहिए ओर पुस्तकालय सेवा को अबाधित करते हुए उसे पुनः पूर्ववत चालू किया जाना चाहिए.

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