लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन में जहाँ भगवान शिव आत्मा तत्त्व या सृष्टि के केंद्र विन्दु के रूप में स्वीकार किये जाते हैं , वहीं उनकी अर्धागिनी माता पार्वती शक्ति का शिखर बिन्दु मानी जाती हैं। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार आत्मा रूपी सत्य और शक्ति के संयोग से ही सृष्टि गतिशील होती है तथा आत्मा और शक्ति के मिलन से उनके पुत्र कार्तिकेय का प्रादुर्भाव हुआ। शिव पुत्र कार्तिकेय को स्कन्द के नाम से विभूषित किया गया। हिन्दुओं में एक प्रसिद्ध देवता के रूप में प्रतिष्ठित स्कन्द देव भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र और भगवान गणेश के छोटे भाई हैं। भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय और सुब्रहमन्य के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान स्कन्द शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया था। मयूर पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिकेय की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती है, यहाँ पर यह मुरुगन नाम से विख्यात हैं। प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न होते हैं। स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी अठारह पुराणों में सबसे विशाल है। स्कन्द भगवान भारत के विशेषकर हिन्दू धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों और विशेषकर तमिलनाडु में होती है तथा भगवान स्कन्द के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

 

विविध पुराणों में अंकित भगवान कार्तिकेय की जन्म कथा के अनुसार तारकासुर के नेतृत्व में जब दैत्यों का अत्याचार और  आतंक चारों ओर फैल जाता है और देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ता है। तो सभी देवता मिल भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचते हैं और अपनी रक्षार्थ उनसे प्रार्थना करते हैं। उनके दु:ख को जानकर ब्रह्मा उनसे कहते हैं कि तारक का अंत भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव है, परन्तु सती के अंत के पश्चात भगवान शिव गहन साधना में लीन हुए रहते हैं। इंद्र और अन्य देव भगवान शिव के पास जाते हैं, तब भगवान शिव उनकी पुकार सुनकर पार्वती से विवाह करते हैं। शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिव जी और पार्वती का विवाह हो जाता है। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता है और कार्तिकेय तारकासुर का वध करके देवों को उनका स्थान प्रदान करते हैं। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार जब शिव के दोनों पुत्र में ब्रह्माण्ड की परिक्रमा पूर्ण करने की प्रतियोगिता हुई, तब अपनी बुद्घि का उपयोग कर कार्तिकेय के छोटे भाई गणेश ने प्रतियोगिता अवश्य जीती, लेकिन कार्तिकेय ने इस प्रतियोगिता में ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर श्रम के महत्व को प्रतिपादित किया। दक्षिण भारत में उन्हें सुब्रमण्यम के नाम से सुशोभित किया गया, क्योंकि वे स्वयं ब्रह्मा स्वरूप हैं। इनके अनुयायी हिन्दू और प्रवासी भारतीय हैं । रोग, राग, दुःख और दरिद्रता का निवारण हेतु शिव पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय का पूजन स्कन्द षष्ठी को किया जाता है। स्कन्द षष्ठी के इस व्रत को चैत्र ,कार्तिक और पौष माह की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को संपन्न किया जाता है । स्कन्द षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को ही प्रमुखतः सम्पन्न किये जाने की परिपाटी है फिर भी तिथितत्त्व नामक ग्रन्थ में  चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कन्द षष्ठी कहा है। स्मृतिकौस्तुभ के अनुसार  यह व्रत संतान षष्ठी नाम से भी जाना जाता है। स्कन्द पुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है। निर्णयसिन्धु , पुरुषार्थचिन्तामणि ,  स्मृतिकौस्तुभ के अनुसार षष्ठी के एक दिन पूर्व से उपवास करके षष्ठी को कुमार अर्थात् कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। तमिल प्रदेश में स्कन्दषष्ठी महत्त्वपूर्ण है और इसका सम्पादन मन्दिरों या किन्हीं भवनों से होता है। पुराणों में अंकित कथाओं के अनुसार दक्षिण दिशा के अधिपति भगवान कार्तिकेय मंगल प्रधान हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द या चम्पा षष्ठी के रूप में जाना जाता है।  चूंकि यह तिथि ब्रह्मा को समर्पित है, अत: इस दिन भगवान शिव की पूजा कर कार्तिकेय भगवान की पूजा करने से समस्त अवगुणों से मुक्ति मिलती है। पुराणों में इस तिथि का बड़ा महत्व रेखांकित किया गया है ।भगवान कार्तिकेय ने असुर राज ताड़कासुर का वध कर लोगों को प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति दिलाई थी। अत: यह दिन प्राकृतिक आपदाओं से मुक्ति हेतु भी मनाया जाता है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने माया-मोह में पड़े नारद का इसी दिन उद्धार करते हुए मोह व लोभ से मुक्ति दिलाई थी। इस दिन भगवान विष्णु के पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है। षष्ठी के दिन ब्राह्मण भोज के साथ स्नान के बाद कंबल, गरम कपड़े दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान स्कन्द या कार्तिकेय का वाहन मयूर है। शास्त्रों में कार्तिकेय को शिवजी की सेना के सेनापति होने का गौरव प्राप्त है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया है कि स्कन्द षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता है। स्कन्द षष्ठी पूजा से पौराणिक परम्परा जुड़ी है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने पालन –पोषण और स्तनपान कराकर रक्षा की थी। इस छह कृतिकाओं के द्वारा रक्षा किये जाने के कारण ही इन्हें कार्तिकेय कहा गया। इन छह कृतिकाओं के कारण ही पौराणिक ग्रन्थों में इन्हें छह मुख वाला कहते हुए कहा है कि इनके छह मुख हैं, अत: इन्हें षणमुख भी कहा जाता है। स्कन्द पुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया है।

पुराणों में उल्लिखित कार्तिकेय , उनकी जन्म व कार्तिकेय की महिमा , उपासना से सम्बंधित विवरणों में षष्ठी व्रत की महिमागान से इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता स्वयं परिलक्षित होती है। यही कारण है कि यह व्रत स्कन्द भक्तों में बड़े ही उत्साह और श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। प्रचलित पौराणिक मान्यता के अनुसार स्कन्द षष्ठी के साथ राजा शर्याति और भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक भी जुड़ा हुआ है। पुराणों में उल्लिखित कथाओं के अनुसार स्कन्द  षष्ठी को कार्तिकेय की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई। ब्रह्मवैवर्तपुराण में अंकित कथानुसार  स्कन्द षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता है। स्कन्द षष्ठी पूजा की पौरांणिक परम्परा के अनुसार भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा कर रक्षा की थी। इनके छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। स्कन्द पुराण 4.04.1 में तथा उपनिषद में इनकी महिमा का उल्लेख मिलता है।
निर्णयामृत के अनुसार भाद्रपद की षष्ठी को दक्षिणापथ में कार्तिकेय का दर्शन लेने से ब्रह्महत्या जैसे गम्भीर पापों से मुक्ति मिल जाती है ।हेमाद्रि काल , कृत्यरत्नाकर आदि ग्रन्थों में ब्रह्म पुराण से उद्धरण देकर बताया गया  है कि स्कन्द की उत्पत्ति अमावास्या को अग्नि से हुई थी, वे चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को प्रत्यक्ष हुए थे, देवों के द्वारा सेनानायक बनाये गये थे तथा तारकासुर का वध किया था, अत: उनकी पूजा, दीपों, वस्त्रों, अलंकरणों, मुर्गों (खिलौनों के रूप में) आदि से की जानी चाहिए अथवा उनकी पूजा बच्चों के स्वास्थ्य के लिए सभी शुक्ल षष्ठियों पर करनी चाहिए। तिथितत्त्व व स्मृति कौष्तुभ ने चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को स्कन्दषष्ठी कहा है। यह व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। वर्ष के किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत आरंभ किया जा सकता है। वैसे स्कन्द षष्ठी व्रत नामक ग्रन्थ के अनुसार चैत्र अथवा आश्विन मास की षष्ठी को इस व्रत को आरंभ करने का प्रचलन अधिक है। यह व्रत विधिपूर्वक करने से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है। संतान को किसी प्रकार का कष्ट या रोग हो तो यह व्रत संतान को इन सबसे बचाता है।स्कन्द षष्ठी के अवसर पर शिव-पार्वती को पूजा जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसमें स्कंद देव (कार्तिकेय) की स्थापना करके पूजा की जाती है तथा अखंड दीपक जलाए जाते हैं। भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी महात्म्य का नित्य पाठ किया जाता है। भगवान को स्नान कराया जाता है, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और उनकी पूजा की जाती है। इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है। इसमें साधक तंत्र साधना भी करते हैं, इसमें मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का संयम रखना आवश्यक होता है। षष्ठी तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित हैं। शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन श्रद्धालु लोग उपवास करते हैं। षष्ठी तिथि जिस दिन पञ्चमी तिथि के साथ मिल जाती है उस दिन स्कन्द षष्ठी के व्रत को करने के लिए प्राथमिकता दी गयी है। इसीलिए स्कन्द षष्ठी का व्रत पञ्चमी तिथि के दिन भी हो सकता है। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। धरमसिन्धु और निर्णयसिन्धु में उल्लेखित नियम के अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य में जब पञ्चमी तिथि समाप्त होती है या षष्ठी तिथि प्रारम्भ होती है तब यह दोनों तिथि आपस में संयुक्त हो जाती है और इस दिन को स्कन्द षष्ठी व्रत के लिए चुना जाता है।

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