लेखक परिचय

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

‘नेटजाल.कॉम‘ के संपादकीय निदेशक, लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन तथा भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष।

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NepaleseConstitutionडॉ. वेदप्रताप वैदिक

 

नेपाल में नए संविधान की घोषणा का दिन वैसा क्यों नहीं हो सकता था,जैसा कि अन्य देशों में प्रायः होता है? नेपाल के सातवें संविधान की घोषणा के पहले 40 लोग मारे गए और अभी मधेस में प्रदर्शनों का तांता लगा हुआ है। राष्ट्रपति रामबरन यादव खुद मधेशी हैं। उन्होंने इस संविधान को सिर पर रखा और इस पर हस्ताक्षर किए। फिर भी क्या वजह है कि संविधान सभा के 601 सदस्यों में से सिर्फ 85 प्रतिशत सदस्यों ने इसके पक्ष में मत दिया जबकि समस्त मधेसी और थारु सदस्यों (60) ने इसका बहिष्कार किया?

इस बहिष्कार के तीन मुख्य कारण हैं। पहला, इस संविधान में पूरे नेपाल को सिर्फ सात प्रांतों में बांटा गया है। यदि प्रांतों की संख्या बढ़ा दी जाती तो यह संविधान सचमुच संघात्मक बन जाता। शक्तियों का विकेंद्रीकरण होता। वंचितों को लगता कि सत्ता में उनकी भी हिस्सेदारी है। दूसरा, जो सात प्रांत बनाए गए हैं, उनकी सीमाओं में भी ऐसी कतर-ब्योंत की गई है कि ‘पहाडि़यों’ के मुकाबले ‘मधेसियों’ और ‘थारुओं’ की जनसंख्या समान होने पर भी उनको सीटें काफी कम मिलेंगी। तीसरा, आरक्षित सीटों में कुछ घपले की आशंका है। जो सीटें सिर्फ पिछड़ों के लिए रखी जानी थीं, उनमें कुछ पहाड़ी जातियों को भी शामिल कर लिया गया है। पहाड़ी नेपाली लोग सबसे शक्तिशाली और समृद्ध लोग हैं।

 

यदि मधेसी और थारु लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तो नेपाल में कोहराम मचेगा। यह ठीक है कि वे अल्पसंख्यक हैं लेकिन वे भी माओवादियों की तरह हिंसा का रास्ता पकड़ सकते हैं। वे जिस क्षेत्र में बसे हुए हैं याने तराई का इलाका भारत से लगा हुआ है। यदि हिंसा के कारण पलायन होता है तो लाखों लोग बिहार और उ.प्र. में भर जाएंगे। भारत के लिए नया सिरदर्द खड़ा हो जाएगा।

 

इसलिए विदेश सचिव जयशंकर को प्रधानमंत्री ने नेपाल भेजा था। उन्हें तो खाली हाथ ही लौटना था। कोई अफसर कितना ही योग्य हो, नेताओं के आगे उसकी हैसियत क्या होती है? इसीलिए भारत सरकार को नए नेपाली संविधान का गरम-नरम स्वागत करना पड़ा है। मोदी और सुषमा को चाहिए था कि वे नेपाली नेताओं से खुद बात करते या ऐसे लोगों को काठमांडो भेजते, जो अनुभवी होते और जो नेपाली नेताओं को अच्छी तरह से जानते होते। अभी भी समय है। सात प्रांतों को अगले एक साल में पक्का रुप दिया जाएगा। भारत चाहे तो एक मददगार मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। यदि हमने सावधानीपूर्वक काम नहीं किया तो हमारे माथे पर ‘हस्तक्षेपवादी भारत’ का काला टीका काढ़ दिया जाएगा। भारत को नेपाल में फूंक-फूंककर कदम रखना है।

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