लेखक परिचय

श्रीराम तिवारी

श्रीराम तिवारी

लेखक जनवादी साहित्यकार, ट्रेड यूनियन संगठक एवं वामपंथी कार्यकर्ता हैं। पता: १४- डी /एस-४, स्कीम -७८, {अरण्य} विजयनगर, इंदौर, एम. पी.

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mohanjiइंदिरा युग में कुछ कालखंड के लिए एक दुश्प्रुवृत्ति ने जोर पकड़ा था। ये तब की बात है जब ’इंदिरा इज इंड़िया ” का उद्घोष चल रहा था। हालाँकि १९७१ में पाकिस्तान पर भारत की विजय ने इंदिरा जी को ’दुर्गा अवतार ’ घोषित कर दिया था। यह उपाधि तब के संघी’ अटल बिहारी वाजपेई ने इंदिराजी को प्रदान की थी। इतनी आत्ममुग्ध हो गईं कि अपने सारे व्यक्तिगत फैसले देश पर लादने लगीं। दिखावे के लिए देश की लोकतान्त्रिक संस्थाओं को सिर्फ मुहर लगवाने तक ही सीमित कर दिया गया । बाद में दुनिया ने जाना कि उन्हें ’ प्रभुता पाय काहि मद नाही ’ से भी आगे आपातकाल का कलंक धारक होना पड़ा। जेल भी जाना पडा। संघ परिवार के सर्वोसर्वा भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं।

सब कुछ पहले से नागपुर में तय हो जाता है। दिखावे के लिए भाजपा संसदीय बोर्ड या केन्द्रीय कार्य कारिणी की आम सहमति का ढोंग किया जाता है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार ६ बजे घोषित किया जाता है जबकि सारे देश में शाम ५ बजे ही भाजपा कार्यालयों में जश्न मनाने का अग्रिम फरमान जारी हो जाता है। आम कार्यकर्ता भी वाकिफ है कि फैसला तो संघ ने पहले ही कर रखा है केवल रस्म अदायिगी शेष है। उसमें भी कोई लालकृष्ण आडवानी जैसा न नुकर करे तो उसे धक्याकर मोदी की ताजपोशी की जाए। ये ताजपोशी भी बेहद अगम्भीर और प्रहसन पूर्ण है। सब जानते हैं कि भारत में प्रधानमंत्री का चुनाव डायरेक्ट जनता नहीं करती। आम चुनावो में जिस दल या ’गठबंधन’ का बहुमत होगा उसका संसदीय बोर्ड फैसला करेगा कि देश का प्रधानमंत्री कौन होगा ?भाजपा ,संघ परिवार और दक्षिण पंथी मीडिया यदि मोदी को प्रधानमंत्री जैसा ही ट्रीट कर रहा है तो ये ’नाटक-नौटंकी ’ नहीं तो और क्या है ?

जो लोग किसी खास शुचिता के लिए समर्पित हों ,जो नैतिक मूल्यों के हामी हों ,जिनको अपने चाल -चरित्र और चेहरे पर नाज हो जो स्वयम्भू ’राष्ट्रवादी और राजनैतिक दल के रूप में ’’ पार्टी विथ डिफ़रेंस” हों ऐंसे लोगों को यह कदापि शोभनीय नहीं है कि ’ प्रजातांत्रिक प्रक्रिया ’ का दिखावा करें। आप ये भी नहीं कह सकते कि ये तो संघ परिवार या भाजपा का अंदरूनी मामला है। देश के प्रमुख विपक्षी दल में क्या हो रहा है या क्या चल रहा है यह देश के भविष्य को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है। इतना ही नहीं ग्लोब्लाइजेसन के दौर में तो दुनिया में कहीं भी कुछ भला -बुरा होता है तो एक -दुसरे पर असर पड़ता है। अमेरिका में मंदी आती है तो दनिया कांपने लगती है। ईराक पर हमला होता है तो भारत में पेट्रोल के भाव बढ़ जाते हैं। सोवियत क्रांति असफल होती है तो सारी दुनिया के मेहनतकशों का शोषण फिर से होने लगता है। नाटो देश सीरिया पर हमले की धमकी देते हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था थर-थर कांपने लगती है। जब दुनिया का अन्योंनआश्र्तित सिद्धांत ये है तो देश के अन्दर भाजपाऔर संघ ने  देश का भावी प्रधानमंत्री किसे प्रत्याशित किया ? यह सारे देश को प्रभावित करने वाला विमर्श तो अवश्य ही है. यहाँ सिर्फ मोदी का समर्थन या विरोध महत्वपूर्ण नहीं है। लालकृष्ण आडवाणी का समर्थन या विरोध भी महत्वपूर्ण नहीं है. यहाँ राष्ट्र हित के लिए क्या है और राष्ट्र हित में क्या नहीं है यह महत्वपूर्ण हैं। यदि आडवाणी जी भाजपा के लिए चिंतित हैं तो और देश के लिए चिंतित हैं तो दोनों ही सूरत में उनके अभिमत को नज़र अंदाज करना कतई विवेकपूर्ण नहीं हैं। चन्द जोशीले युवाऔ या मीडिया की गफ्लात्पूर्ण लफ्फाजी से न तो मोदी को राज्यसत्ता मिलने जा रही है और न ही आडवाणी जी को कोई व्यक्तिगत घाटा होने जा रहा है। जो भी अच्छा बुरा होना है वो देश का ही होना है। इसलिए संघ परिवार के आंतरिक वैयक्तिक महात्वाकांक्षा संघर्ष के इस विमर्श को देश की जनता नजर अंदाज नहीं कर सकती।

जो लोग नरेन्द्र मोदी के’ उदय’ और लालक्रष्ण आडवानी के ’अस्त’ को दो व्यक्तियों के संघर्ष के रूप में देखते हैं वे अपने विवेक और बुद्धि कौशल का पूरा -पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। शायद नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने की उतनी उत्कंठा नहीं होगी जितनी व्यग्रता ’आर एस एस ’ को उन्हें इस पद पर देखने की है. संघ ने एक ओर तो अपनी इस व्यग्रता को नरेन्द्र मोदी के रूप में राजनैतिक पटल पर शिद्दत से उकेरने का काम किया है , दूसरी ओर स्वामी रामदेव,अन्य धार्मिक गुरुओं साधुओं -सन्यासियों ,विश्व हिन्दू परिषद् तथा तमाम हिन्दुत्ववादियों को अपने-अपने ’काम’ पर लगा दिया है। मोहन भगवत की अगुवाई में ’संघ’ ने जितनी राजनैतिक सक्रियता दिखाई है उतनी संघ के इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई।संघ की इस सक्रियता से कट्टरपंथी हिन्दू भले ही पुलकित होते हों किन्तु ’देशभक्त-धर्मनिरपेक्ष ’जनता की चिंताएं बढना लाजमी है। हालांकि संघ ने अपना हिंदुत्व वादी एजेंडा लागु करने के लिए जिस तरह मोदी को आगे बढ़ाया है ,आडवाणी को उखाड़ने में इस्तेमाल किया है. वैसा ही कृत्य कभी अटलजी को परेशांन करने और वही एजेंडा लागू करने के लिए आडवानी का भी इस्तेमाल किया गया है। अटलजी ने संघ को सत्ता और संविधान से ऊपर नहीं माना। उम्मीद है कि एक बार सत्ता मिल जाने पर नरेन्द्र मोदी भी संघ का एजेंडा भूल जायेंगे कितु खतरा ये है कि वे कहीं संघ की निरंकुश तानाशाही ’एक्चाल्कानुवार्त्तिव’ पर न चल पड़ें।

नीतीश या जदयू का उदाहरण तो भारतीय राजनैतिक हाँडी का एक मामूली चावल मात्र है।देश के ६ राष्ट्रीय और ४८ क्षेत्रीय दल धर्मनिरपेक्षतावादी हैं और सभी का अपना-अपना स्थाई वोट बेंक है। एक दो प्रतिशत की घटत -बढ़त से राज्य सरकारें आती जाती रहतीं हैं. भाजपा ,शिवसेना ,अकाली दल के अलावा एनडीए में अभी तो फिलहाल कोई नहीं है और जिन मोदी ने अपने ही वरिष्ठों का ’राजनैतिक बध ’ किया हो उनसे वही जुड़ना चाहेगा जिसे राजनैतिक हाराकिरी का शौक होगा। गठबंधन के दौर में भाजपा या संघ परिवार को नरेन्द्र मोदी के कारण मित्र विहीन होकर पुनः विपक्ष में ही रहना होगा। अयोध्या,काशी,मथुरा, धारा ३७० तथा ’राम जन्म भूमि ’ जैसे अश्त्र पहले ही प्रयुक्त हो चुके हैं। अब यदि संघ के बौद्धिक या चिन्तक सोचते हैं कि -जो हिदू हित की बात करेगा। । वही देश पर राज करेगा. … तो इन नारों पर भाजपा को २ सीटों से १८६ तक तो लाया जा सकता है। किन्तु अकेले दम पर सत्ता में नहीं आ सकते यह केवल लालकृष्ण आडवानी ही नहीं सारा भारत जानता है। संघ को यदि इल्हाम या वोधत्व प्राप्त हुआ है तो नरेन्द्र मोदी और संघ परिवार को जय-जय सियाराम. . . नरेन्द्र मोदी का प्रस्तावित उम्मीदवार होना या संघ के इस पुरातन ’एक्ला चलो रे’सिद्धांत से बहुत सारे वरिष्ठ और अनुभवी भाजपाई सहमत नहीं हैं किन्तु इन में आडवाणी जैसा माद्दा नहीं है जो डटकर मुकबला कर सके। हो सकता है कि आडवानी जी अपनी ढलती उम्र में राजनैतिक स्वार्थियों के विश्वाश्घात का शिकार हुए हों किन्तु भारतीय इतिहास में यह स्वर्णिम अक्षरों में दज होगा कि वे वाकई सच्चे लोह परुष थे।

लालकृष्ण आडवानी जी ने अपने विराट दीर्घजीवी राजनैतिक जीवन के अनुभवों से ये जान लिया था कि बहुलतावादी -बहुसंस्कृति धारक विराट भारत में किसी एक राजनैतिक दल ,विचारधारा या मजहब -धर्म पर आधारित पार्टी का शाशन सम्भव नहीं है। संघ परिवार या कट्टरवादियों की चाहत को जिद से पूरा करने के लिए एक नहीं करोड़ों नरेन्द्र मोदी भी नाकाफी हैं। देश के सारे मुसलमान ,ईसाई मिलकर भी मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को वोट कर दें तो भी भाजपा या मोदी सत्ता में नहीं आ सकते। क्योंकि विराट हिन्दू कौम का बहुमत ’धर्मनिरपेक्षतावादी और सहिष्णु’ है। हिन्दू समाज स्वभाव से ही धर्मनिरपेक्ष है उसे कोई भी नेता या संघठन अन्य कट्टरपंथी मजहबों की तरह न तो बेबकूफ बना सकता है और ना इस्तेमाल कर सकता है। संघ परिवार की हिंदुत्व वादी जिद जितनी ज्यादा होगी देश के अल्पसंख्यकों का कांग्रेस की ओर धुर्वीकरण उतना ही ज्यादा और थोकबंद होता चला जाएगा।

आगामी लोक सभा चुनाव की पूर्व वेला में ही देश की जनता के सामने दो प्रत्याशियों के नाम स्पष्ट रूप से उभरते नजर आ रहे हैं। देश में जिस नाम पर सबसे ज्यादा विवाद या विमर्श चल रहा है वो हैं गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी। उनके लिए संघ परिवार ने तो मानों जिद ही ठान रखी थी कि राज्यसत्ता भले ही न मिले किन्तु ’मोदी का पी एम् इन वेटिंग होना माँगता’ . दूसरी ओर देश के वर्तमान प्रधान मंत्री श्री मनमोहनसिंह जी ने कांग्रेस और यूपीए की ओर से कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गाँधी को भारत का भावी प्रधानमंत्री प्रस्तावित कर दिया है। हालाँकि ये न तो कांग्रेस और यूपीए का अधिकृत वयान है और न ही राहुल या उनकी माँ श्रीमती सोनिया गाँधी की इस में रजा मंदी है. उनका स्पष्ट मत है कि चुनाव के बाद तय किया जाएगा की किसे यह दायित्व सौंपा जायेगा।

यूपीए या कांग्रेस में राहुल का न तो कोई प्रतिद्वंदी है और न ही उनके नाम पर असहमति की कोई गुञ्जाइस है. देश की चौतरफा बर्बादी और घनघोर एंटी इनकमवेंसी फेक्टर की दशा में भी यदि कांग्रेस या यूपीए को सत्ता में तीसरी बार आने की सम्भावना नजर आ रही है तो इसके लिए बिखरा हुआ तीसरा मोर्चा और छत-विक्षत एनडीए ही जिम्मेदार हैं । बचा खुचा एनडीए और संघ परिवार ज्यों-ज्यों ’नमो राग’ का आलाप का रहे हैं त्यों -त्यों देश में साम्प्रदायिक धुर्वीकरण की प्रक्रिया तेज होती जा रही है। दक्षिण भारत और पूर्वी भारत में तो वैसे भी एनडीए या भाजपा का कोई नाम लेने वाला नहीं हैं किन्तु यूपी से पर्याप्त समर्थन की आस भी धूमिल होती जा रहीहै। संघ परिवार ,मोदी ,अमित शाह ,अशोक सिंघल चाहें लाख जतना कर लें किन्तु वे यूपी के जातिवादी समाज को साम्प्रदायिकता में धुर्वीकृत नहीं कर सकेंगे। उधर अखिलेश के राज में सम्पन्न १०० से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगों के चलते हिन्दू वोट भले ही भाजपा की ओर ज्यादा पोलोराईज्द होते रहें किन्तु मुस्लिम वोट अब मुलायम को नहीं कांग्रेस को ही मिलेंगे। चुनाव उपरान्त जब एनडीए को पर्याप्त संख्या में सांसदों की जरुरत पड़ेगी तब गैर कांग्रेस और गैर भाजपा के लोग याने तीसरा मोर्चे-क्षेत्रीय दल और वाम दल महती भूमिका में होंगे। वे मोदी का समर्थन नहीं करेंगे ये बात लालकृष्ण आडवानी बखूबी जानते हैं और इसीलिये मोदी को नेता नहीं मान ने की बात कर वे एनडीए का भला ही कर रहे हैं। एनडीए और भाजपा की किरकिरी होगी ये बात वे ठीक से नहीं कह पा रहे हैं। उनकी असहमति को लोग ’पदलोलुपता’ करार दे रहे हैं और ये घ्रणित कार्य भी संघ के लोग हक कर रहे हैं। इस निंदनीय कर्म में वे पातकी भी लिप्त हैं जो कल तक आडवाणी के चरणों में धोक दिया करते थे। शनैः शनैः भाजपा और उसकी ’परामर्शदात्री’ मात्र संस्था याने ’आर एस एस ’ के आंतरिक द्वंद की भनक सभी को लग चुकी है। भाजपाई भले ही कभी अपने आपको ’पार्टी विथ डिफ़रेंस’ के निर्माता -निर्देशक कहा करते थे किन्तु उसके जन्म से ही आंतरिक वैचारिक संघर्ष की मरोड़ निरंतर महसूस की जाती रही है। संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य , बाहर भले ही किसी खास विषय पर एकमत से एक स्वर में अपने को अभिव्यक्त करते देखे -सुने जाते हों किन्तु अन्दर का घमासान किसी भी छिपा नहीं है। संजय जोशी से पूर्व गोविन्दाचार्य और उनसे भी पूर्व कई वरिष्ठ बौद्धिक प्रचारक -संगठक सिर्फ इसलिए गुमनामी के अँधेरे में धकेले जाते रहे हैं कि आंतरिक द्वन्द के संघर्ष की अवस्था में उन के पास पर्याप्त ’जन-समर्थन’ नहीं था।उनका राजसत्तात्मक वर्चस्व कमजोर था या नैतिकता का पक्ष कमजोर था। संघ की आनुषांगिक राजनैतिक शाखा ’भाजपा’ में और उसके पूर्ववर्ती स्वरूप ’जनसंघ’ में भी यही सिद्धांत लागू किया जाता रहा है।

दीन दयाल उपाध्याय ,बलराज मधोक ,नानाजी देशमुख ,मदनलाल खुराना ,केशुभाई उमा भारती , येदुरप्पा तपन सिकदार और राम जेठमलानी के साथ क्या व्यवहार किया गया ये भाजपा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय तो नहीं कहा जा सकता। इस अध्याय में एक और क्षेपक जुड़ जाने की संभावना है। किन्तु इसमें संघ के करता धर्ताओं को शायद ही सफलता मिल पायेगी। लालकृष्ण आडवाणी के नेतत्व में एक शसक्त ग्रुप संघ की दादागिरी को चुनौती देने की ओर अग्रसर हो रहा है। यह सर्वविदित है किअब लालकृष्ण आडवानी किसी व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि राजनैतिक ध्रुव का नाम है जो भारतीय राजनीती में खास मुकाम रखता है।

संघ और भाजपा में सार वस्तु का कोई भेद भले ही न हो किन्तु रूप और आकार में जमीन आसमान का फर्क है। संघ अपने विराट रूप और आकार की कीमत पर सत्ता की जिम्मेदारी से दूर रहते हुए भी दुनिया के तमाम स्वार्थ सिद्ध करने के लिए जाना जाता है।अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसने ’भाजपा’ रुपी राजनैतिक दल का सृजन अवश्य किया है किन्तु इस राजनैतिक पार्टी को ताकतवर वनाने में जिन लोगों ने अपनी जिन्दगी खपा दी उनमें ’लालकृष्ण आडवानी का नाम सबसे उपर है। अतएव मोदी बनाम आडवानी के लिए नहीं बल्कि कट्टरवाद बनाम बहुलतावाद के लिए यह संघर्ष भविष्य में याद क्या जाता रहेगा।

 

श्रीराम तिवारी

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3 Comments on "’ संघ परिवार ’ में व्यक्तियों के बहाने महत्वाकांक्षाओं का संघर्ष। ।"

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श्रीराम तिवारी
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श्रीपाद अमृत डांगे के बारे में शैलेन्द्र जी की जानकारी दुरुस्त है .इसीलिये तो देश में वामपंथी समाजवादी धर्मनिरपेक्ष विकल्प को गहरी चोट पहुंची है और वो अभी केवल जन-संघर्षों के लिए कटिबद्ध है किन्तु आज देश में पस्त हो चुकी कांग्रेस और यूपीए के समक्ष विकल्प के रूप में कुछ लोग साम्प्रदायिक विकल्प तैयार करने में जुटे हैं . मेरे प्रस्तुत आलेख में इस पर भी कोई विशेष जोर नहीं है ,मेने तो संघ परिवार के पितृ पुरुषों के मान मर्दन पर अपनी पीड़ा ही व्यक्त की है . मोदी बनाम आडवाणी ही नहीं बल्कि नितीश बनाम मोदी ,शिवराज… Read more »
शैलेन्‍द्र कुमार
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श्रीमान बीजेपी में सभी सांप्रदायिक है या सभी धर्मनिरपेक्ष है यह आप कब समझेंगे, संघ ने बीजेपी की स्थापना जिस लिए की है अगर वो छोड़ कर वो कोई और काम करती है तो वो कांग्रेस की बी टीम ही कहलाएगी, मोदी के आते ही “पार्टी विथ ए डिफरेंस” का तमगा जुड़ जाता है अब उसे नकारात्मक रूप में ले या सकारात्मक रूप में ले

शैलेन्‍द्र कुमार
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पर उपदेश कुशल बहुतेरे
कृपया कर के इमरजेंसी के बारे में हमें वामपंथियों से जानने की जरूरत नहीं है, श्रीपाद अमृत डांगे को देश युवा भले न जानता हो लेकिन श्रीमान आप तो जरूर जानते होंगे जिन्होंने देश में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना की और १९७५ में इमरजेंसी के दौरान अध्यक्ष रहे और कांग्रेस और इंदिरा की दलाली की और सत्ता का मजा लिया बाद में देश को दिखाने के लिए उन्हें पार्टी से निष्काषित कर दिया गया

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