लेखक परिचय

जावेद अनीस

जावेद अनीस

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े पत्रकार है ।

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जावेद अनीस

पेशावर में बहाया गया मासूमों का खून अभी जमा भी नहीं था कि मजहबी पागलपन ने एक और हादसा अंजाम दे डाला है और इस बार नफरत की यह लकीर मोहब्बत के शहर कहे जाने वाले फ्रांस में खीची गयी है। नए साल के पहले हफ्ते में जब दुनिया भर में लोग शांति और प्रगति की कामना करते हुए एक दूसरे को शुभकामनायें दे रहे थे तो उसी दौरान पेरिस से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका के कार्यालय पर हमला करके 12 इंसानों को मार डाला गया। “शार्ली ऐब्डो” नाम की इस व्यंग्य-पत्रिका में इस्लाम के पैगंबर के कार्टून छापे गये थे। यह वही मैगजीन है जिससे तमाम कट्टरपंथी नाराज थे और इस मैगजीन से जुड़े तमाम लोग अलकायदा की हिटलिस्ट में शामिल थे। लेकिन जो हुआ उसका अंदाजा किसी को भी नहीं था। गौरतलब है कि इस हमले के कुछ दिन पूर्व ही मैगजीन ने टि्वटर पर आईएसआईएस चीफ अल बगदादी की तस्वीर वाली एक फोटो पोस्ट की थी। जिसमें व्यंग्य करते हुए बगदादी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की गई थी। इससे पूर्व 2011 में भी इस मैगजीन के ऑफिस पर बम फेंक कर से हमला किया गया था लेकिन कोई हताहत नहीं हुआ था। हमें लगा था की इंसानियत अपने मतभेद जाहिर करने के लिए मारकाट का खूनी शगल बहुत पीछे छोड़ आई है लेकिन यहाँ मतभेद निपटाने का पुराना और घिनौना रूप ही लागू है और अब तो हमारे हाथों में इस पुराने खेल को जारी रखने के लिए आधुनिकतम हथियार भी हैं।

इस बार हमला “फ़्री स्पीच” पर था, और वह भी उस मुल्क में जो पिछले कुछ सदियों से अभिव्यक्ति के आजादी बड़ा पक्षधर रहा है। फ्रांस आधुनिक सभ्यता और ज्ञानोदय का मरकज है, फ्रांस की क्रांति ने ही मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा की थी और इससे निकले समानता, स्वतंत्रता और भातृत्व के नारे आज आधुनिक समाजों के आधार स्तंभ हैं। पिछले करीब तीन सदियों से पूरी दुनिया विचारों,साहित्य और कलां के क्षेत्र में फ्रांस की ओर ही देखती रही है।

दरयाऐ सेन के किनारे बसा इसका शहर पेरिस दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत और आधुनिक शहरों में से एक है।  पेरिस में 1777 में ही “जूरनाल द पारी” नाम की पहली पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ था और देखते ही देखते दो सालों के दरमियान ही पेरिस से 79 पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं, उस दौरान वहां ऐसे लोग पैदा होने लगे थे जो फ्रांस की स्थितियों पर अपने कलम से व्यंग्य करते थे। ऐसे ही एक दार्शनिक विचारक थे “वोल्तेयर”(1694-1778) जिन्होंने तत्कालीन फ्रांस में चर्च पर व्यंग्य कसते हुए कहा था कि “अब तो कोई ईसाई बचा ही नहीं, क्योंकि एक ही ईसाई था और उसे सलीब पर चढ़ा दिया गया।” उन्होंने उस समय कैथोलिक चर्च को उसके असहिष्णुता, अंधविश्वास और पाखंड के कारण उसे नष्ट करने का आह्वान किया था।

“वोल्तेयर” अपने ही नहीं दूसरों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुत तरजीह देते थे, उन्होंने यहाँ तक कहा था कि “मैं जानता हूँ कि जो तुम कह रहे हो वह सही नहीं है, लेकिन तुम कह सको इस अधिकार की लडाई में, मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ”।

फ्रांस की मजाहिया पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ द्वारा छापे जा रहे व्यंग्य को इस पृष्टभूमि के बिना नहीं समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इसने सिर्फ इस्लाम और इसके पैगम्बर का ही मजाक उड़ाया हो, इसका लगभग सभी धर्मों उनके पोप, पैगंबरों,धार्मिक कट्टरपंथियों, राष्ट्राध्यक्षों का मजाक उड़ाने का इतिहास रहा है। अगर इसने पैगंबर मोहम्मद साहेब के ये कार्टून पब्लिश किए हैं तो यहूदी समुदाय को भी नहीं बक्शा है। जाहिर सी बात है कि सब की भावनायें आहत हुई होंगी लेकिन सवाल यह है कि खून की यह होली इस्लाम के नाम पे ही क्यों खेली गयी? जो मजहब यह दावा करता हो कि वह पूरी इंसानियत के लिए है और उसका पैगाम शांति और मोहब्बत का पैगाम है वह आत्मालोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में इतना डरावना क्यों नज़र आने लगता है ?

आज का फ्रांस अनेक देशी और विदेशी भाषाओं, बहु-जातीयताओं और धर्मों तथा क्षेत्रीय विविधता वाला देश है। कैथोलिक धर्म के बाद आज फ़्रांस में “इस्लाम” दूसरा सबसे बड़ा धर्म है और किसी भी पश्चिमी यूरोपीय देश की तुलना में इस देश में सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी है। हाल के वर्षों में फ़्रांस ही नहीं पूरे यूरोप में नस्लवादी और आप्रवासी-विरोधी भावनाएं बढ़ी हैं, इसका एक कारण वहां की आर्थिक स्थिति का कमजोर होना भी है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इराक़ और सीरिया में जो यूरोपीय जिहादी लड़ने गए हैं उनमें सबसे ज़्यादा फ़्रांस के हैं।

इसी तरह से पेरिस हमले से चंद दिनों पहले ही जर्मनी में पेगिडा (पेट्रिओटिक यूरोपियन्स अगेंस्ट दि इस्लामिज़ेशन ऑफ़ दि वेस्ट) नाम के एक संगठन के एक रैली में क़रीब 18,000 लोगों ने हिस्सा लिया था। इस संगठन का मानना है कि यूरोप का ‘इस्लामीकरण’ हो रहा है और इसके वे लगातार प्रदर्शन शुरू कर रहे हैं।

वर्तमान में दुनिया का बड़ा हिस्सा मजहबी हिंसा और नफरतों के चपेट में है, ऐसा लग रहा है कि समय का पहिया रिवेर्स होकर हमें बर्बरता के दौर में वापस ले जा रहा है। एक तरफ सीरिया और इराक में जिहाद चल रहा है तो वहीँ इजराईल में एक फिलिस्तीनियों के लाशों पर “खुदा का मुल्क” बनाया जा रहा है. इधर पकिस्तान तो अपने ही खेल से लहुलाहान हुआ जा रहा है और हिन्दुस्तान में भी उसी दिशा में हांकने के पूरी कोशिश जारी है . नाईजीरिया से खबरें आ रही कि वहां बोको हराम ने “बागा” नाम के शहर को पूरी तरह से जला दिया है, इसमें कम से कम 2,000 इंसानों की जानें गयी हैं।

क्या मानव सभ्यता के केंद्र में मज़हब एक बार फिर वापस आ रहा है और ज्ञानोदय की लौ धीमी पड़ रही है? शायद इंसानियत ऐसे दौर में पंहुचा गयी है जहाँ मजहब अपनी रेलेवेंस खोते जा रहे। इनसे इंसानियत को फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है, आस्था के नाम पर लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हुए जा रहे है। धर्माधिकारियों को “ऐसे हादसों को अंजाम देने वाले असल मजहब को नहीं जानते” कहकर इसकी आड़ लेना बंद करके आत्ममंथन करना चाहिए कि असल में गलती कहाँ हो रही है। प्राचीन यूनानी दार्शनिक-एपिक्युरस ने कहा था कि “वास्तव में धर्मविरोधी व्यक्ति वह नहीं है जो जन-साधारण द्वारा पूजे जाने वाले देवताओं को नकारता है, बल्कि वह है जो देवताओं के बारे में जनसाधरण के मान्याताओं की पुष्टि करता है। सही में अब मान्यताओं के नकारने का समय है और यह काम आधे-अधूरे रूप में नहीं समग्रता में करना होगा।

मान्यताओं के आधा-अधूरा नकारने का खामियाजा हम भारतीय भी भुगत रहे हैं और भारत में सेक्युलरिज्म की हालत इतनी पतली क्यों है इसका अंदाजा पेरिस हादसे के बाद तथाकथित सेकुलरिज्म के झंडाबरदारों द्वारा दिए गये बयानों से लगाया जा सकता है जिसमें वे भारतीय मुसलमानों की शास्वत पीड़ित मनोग्रंथि को एक्स्प्लोईटेशन करने की कोशिश में एक तरह से पेरिस हमले को जायज ठहरा रहे हैं। इसी आधी-अधूरी सेकुलरिज्म के बल पर ही हाजी याकूब जैसे लोग नेता पेरिस के हमलावरों के काम को सही ठहराते हुए उन्हें बतौर इनाम 51 करोड़ रुपये देने का एलान करने का कारनामा अंजाम देते हैं और इन्हीं गुनाहों के बल पर संघ मंडली को भारत का तकदीर तय करने का भरपूर मौका मिल जाता है।

वोल्तेयर की ही एक उक्ति है “ईश्वर ना होता तो उसके अविष्कार की आवश्यकता पड़ती।” ईश्वर के अविष्कार की आवश्यकता तो नहीं पड़ रही है लेकिन ईश्वर और उसके मजहबों को बनाया- बिगाड़ा जा रहा है और यह खेल बहुत जानलेवा साबित हो रहा है।

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