लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
काले धन का निर्माण वस्तुतः व्यक्ति के काले-कलुषित मन के कारण होता
है । अत्यधिक भोग , संग्रह , स्वार्थपरता , लिप्सा , अभिप्षा , पशुता की
वृतियों से निर्मित कशाय-कल्मषों की प्रचूरता-युक्त अवांछित
महत्वाकांक्षी चिन्तना-विचारणा के परिणाम-स्वरुप जिस मन-मस्तिष्क का
विकास होता है , उसी की परिणति है ‘काला धन’ की निर्मिति व व्याप्ति ।
इसका सम्बन्ध आर्थिक , वाणिज्यिक , सामाजिक , शासनिक दुर्व्यवस्था से कम
; किन्तु व्यक्तिक , मानसिक , मनोवैज्ञानिक अवस्था से ज्यादा है ।
व्यक्ति को परमार्थ-पुरुषार्थपूर्वक सात्विक रीति-नीति से धनार्जन करने
वाला उद्यमी बनाने में अथवा अधर्म-अनीतिपूर्वक गलत रीति से धन कमाने व धन
संचय करने की मनोवृति से युक्त स्वार्थी-प्रपंची बनाने में उसकी
शिक्षा-दीक्षा की भूमिका ही सर्वाधिक होती है । शिक्षा के अलावे और भी कई
तत्व हैं , जिनका प्रभाव व्यक्ति और उसकी मनोवृति के निर्माण पर पडता
है ; यथा- धर्म , अध्यात्म , संस्कृति , स्वाध्याय , सत्संग आदि ,
जिन्हें दीक्षा कहा जा सकता है । आम तौर पर शिक्षा और दीक्षा दोनों एक
दूसरे के समानार्थी अथवा पूरक माने जाते हैं , किन्तु वास्तव में दोनों
एक दूसरे से भिन्न हैं । भिन्न-भिन्न तरह की जीवनोपयोगी विद्यायें
सिखना-सिखाना शिक्षा है, जबकि धर्म-अर्थ-काम-मोक्षाधारित कल्याणकारी
विचारों-संस्कारों का सम्प्रेषण-संग्रहण करना-कराना दीक्षा है । शिक्षा
संज्ञावाचक क्रिया है , जबकि विद्या क्रियावाचक संज्ञा है । शिक्षा के
भारतीय परिप्रेक्ष्य में दीक्षा उसके साथ स्वतः जुडी हुई होती है । यही
कारण है कि हमारे आम बोल-चाल की भाषा में शिक्षा के साथ दीक्षा स्वतः जुड
जाया करती है । किन्तु व्यवहार में ऐसा है नहीं । क्योंकि अपने देश में
शिक्षा की जो वर्तमान प्रचलित पद्धति है , सो भारतीय है ही नहीं ; यह
अभारतीय पद्धति है, जिसके तहत शिक्षा के साथ दीक्षा का कोई प्रावधान ही
नहीं है । और , यही सबसे बडी त्रासदी है । क्योंकि अभारतीय अथवा
पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति में व्यक्ति के कल्याण की अवधारणा
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष आधारित नहीं है , बल्कि उत्पादन-धनार्जन-मुनाफा व
उपभोग-आधारित है । वहां शिक्षा के साथ-साथ सदविचारों-सुसंस्कारों के
सम्प्रेषण-संग्रहण की बात अगर है भी , तो वह इसी अवधारणा के इर्द-गिर्द
इसी से प्रेरित-अनुप्राणित है । सेवा-सहयोग-त्याग-दान के पीछे भी परोक्ष
में कोई न कोई सौदा अवश्य छिपा रहता है । निष्काम कर्म की कोई धारणा ही
नहीं है पश्चिम के जीवन-चिन्तन , समाज-दर्शन और उनके शिक्षण में ।
शिक्षा की दीक्षाहीन व अभारतीय पद्धति के
स्कूलों-कालेजों में पढने वाले बच्चे आगे चल कर समाज के ऐसे व्यक्ति बनते
हैं , जो किसी भी तरीके से अधिकाधिक मुनाफा व अधिकाधिक धन अर्जित करना और
बेशुमार धन-संचय करना ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानते हैं । और
, इस जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिए धन कमाने व संचय करने की तमाम
अवैध-अनुचित रीति-नीति का इस्तेमाल करते हैं , जिससे काले धन की उत्पत्ति
होती है । सच तो यह है कि इस अभारतीय शिक्षा-पद्धति में शिक्षार्थियों को
नीति-धर्म-सत्कर्म-संस्कार-पुण्य-परमार्थ को छोड इनसे उलट तमाम तरह के
अनीति-अधर्म-छल-छद्म-स्वार्थ के तिकडम-तकनीक ही सिखाये-पढाये जाते हैं ,
जिनसे काले मन और काले धन का सृजन-संवर्द्धन होता है ।
आज दुनिया भर में विशेषकर अपने भारत में व्याप्त सभी प्रकार
की समस्याओं में सबसे प्रमुख है- भ्रष्टाचार , जिसके मूल में है
चारित्रिक पतन और नैतिक मूल्यों का क्षरण । इसका सीधा सम्बन्ध शिक्षा
और दीक्षा से ही है । चारित्रिक पतन और नैतिक-क्षरण का अर्थ सिर्फ
कानून-उल्लंघन मात्र नहीं है । यह तो इसकी पश्चिमी अवधारणा है । भारतीय
जीवन-चिन्तन और समाज-दर्शन में व्यक्ति-परिवार-समाज-देश-राष्ट्र अथवा
व्यष्टि-समष्टि-परमेष्टि के समग्र-समन्वित कल्याण के विरूद्ध किया जाने
वाला आचरण चरित्र-हीनता है और किसी भी स्तर की चरित्र-हीनता यहां नीति के
विरूद्ध- अनैतिकता है । हालांकि भारतीय अर्थ में ‘नीति’ भी पश्चिम की
‘पालिसी’ से सर्वथा भिन्न है । यहां आचरण की शुचिता चरित्र है और चरित्र
की वैचारिकता नीति है । सभी तरह की जीवनोपयोगी विद्याओं की शिक्षा के
साथ-साथ उसके सर्वकल्याणकारी उपयोग से युक्त नीति व तदनुसार उत्कृष्ट
चरित्र-चिन्तन की दीक्षा का समन्वय ही भारतीय शिक्षण-पद्धति की विशिष्टता
है ।
किन्तु पश्चिम की औद्योगिक क्रांति के औपनिवेशिक उफान से एक
ओर जहां व्यक्ति की जीवन शैली परिवर्तित हो गई , वहीं दूसरी ओर उसने
चरित्र और चिन्तन को बदल दिया तो नैतिक मूल्य भी स्वतः बदल गए । ये सारे
बदलाव व्यक्ति और समाज को बाजार की दिशा में उन्मुख कर दिए , जिसका
उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ उपभोग व मुनाफा हो गया । शिक्षा को भी विभिन्न
वस्तुओं के उत्पादन , बाजार के निर्माण , और अधिकाधिक मुनाफा अर्जित करने
के तकनीकी ज्ञान का माध्यम बना दिया गया । कई सौ वर्षों तक ब्रिटेन के
औपनिवेशिक गिरफ्त में फंस जाने के पश्चात ब्रिटिश उपनिवेशकों ने अपनी
काली कमाई-विषयक छद्म औपनिवेशिक नीति के तहत हमारी भारतीय शिक्षण-पद्धति
को उखाड कर हमारे बच्चों-पीढियों को अपना शासनिक उपकरण बनाने के जिस
कुटिल उद्देश्य से अंग्रेजी-मैकाले शिक्षण-पद्धति हमारे ऊपर थोप दी ,
उसमें चरित्र-निर्माण का पक्ष था ही नहीं, आज भी नहीं है । अपने देश में
काले धन का सृजन-संग्रहण करने वालों में पाश्चात्य पद्धति के शिक्षितों
की संख्या ही सर्वाधिक है ; धार्मिक-आध्यात्मिक विचारों-आदर्शों की
दीक्षा-युक्त भारतीय शिक्षा से सम्पन्न लोग आज भी बेईमान नहीं हैं ।
पाश्चात्य जगत में भी जो लोग साफ-सुथरे सेवानिष्ठ और ईमानदार हैं , वे भी
शिक्षा के साथ-साथ उच्चादर्शों की दीक्षा के कारण , अर्थात प्रकारान्तर
में भारतीय दृष्टि की शिक्षा के कारण ऐसा हैं न कि औपनिवेशिक
शिक्षा-पद्धति के कारण ।
यह कैसी विडम्बना है कि अंग्रेजों ने अपनी काली कमाई के
लिए भारत पर अंग्रेजी शासन को सुदृढ करने के निमित्त भारतीय जीवन-चिन्तन
व समाज-दर्शन के विरूद्ध जिस मैकाले शिक्षण-पद्धति को हमारे ऊपर थोप रखा
था , वही पद्धति अंग्रेजों के चले जाने के बाद तथाकथित स्वतंत्र भारत में
आज भी यथावत कायम है । अंतर सिर्फ इतना ही हुआ है उस शिक्षण-पद्धति में
अब एक नया उद्देश्य जुड गया है- अधिक से अधिक पैसा-मुनाफा कमाओ और अधिक
से अधिक उपभोग करो । आज शिक्षा की उपादेयता सिर्फ और सिर्फ नौकरी पाने व
धन कमाने की अर्हता भर है , जबकि नौकरियां इतनी कम हैं कि सबके लिए सुलभ
तो कभी हो ही नहीं सकती और धनार्जन के स्रोत चूंकि औपनिवेशिक तरीके से आज
भी सिमटे हुए हैं , इस कारण काली कमाई की प्रवृति एवं काले धन की
व्याप्ति बढती जा रही है । सात्विक स्वावलम्बन तथा प्राकृतिक सह-जीवन
और आध्यात्मिक उन्नयन की जीवन-विद्या से कोशों दूर की इस शिक्षण-पद्धति
में सर्वकल्याणकारी भाव का सर्वथा अभाव है । यह बिल्कुल एकाकी व
एक-पक्षीय है ; मात्र पदार्थ और स्वार्थ ही इसके केन्द्र में हैं, जिसके
कारण भौतिक विकास की ऊंचाइयों को छूने में सहायक होने के बावजूद समाज की
समस्त बुराइयों, समस्याओं एवं अवांछनीयताओं की वाहक भी यही है ।
अहमदाबाद , गुजरात में प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति की
उत्कृष्टता सिद्ध करने के लिए ‘हेमचन्द्राचार्य संस्कृत पाठशाला’ नाम से
गुरुकुल चला रहे प्रखर शिक्षाविद उत्तमभाई जवानमल शाह और मैकाले-अंग्रेजी
शिक्षा-पद्धति का बहिष्कार कर विशुद्ध वैदिक पद्धति की शिक्षा-दीक्षा
ग्रहण कर उक्त गुरुकुल के संचालन में सक्रिय उनके युवा सुपुत्र अखिल भाई
का दावा है कि भारत की समस्त समस्याओं के जड-मूल पाश्चात्य पद्धति के ये
स्कूल ही हैं , क्योंकि ये यहां के जीवन-चिन्तन और समाज-दर्शन के विरूद्ध
ही नहीं, विरोधी भी हैं । सच भी यही है । प्राचीन ‘भारतीय गुरूकुलीय
शिक्षण-पद्धति’ में पदार्थ और अध्यात्म , दोनों दो पहलू रहे हैं शिक्षा व
दीक्षा के, जिनके बीच में परमार्थ और मोक्ष इसका उद्देश्य रहा है ।
पदार्थ की विविध विद्याओं की शिक्षा से शरीर व संसार की जरुरतें पूरी
होती हैं , तो अध्यात्म के ज्ञान की दीक्षा से आत्मा को परमानन्द की
प्राप्ति । परमार्थ भाव व्यक्ति को परिवार-समाज-राष्ट्र के प्रति ही नहीं
, बल्कि समस्त प्रकृति और पर्यावरण के प्रति भी कर्त्तव्यपरायण व
निष्ठावान बनाता है, तो मोक्ष भाव उसे #भ्रष्टाचार- #बलात्कार- #व्याभिचार व
#जमाखोरी जैसे कुकर्मों के कुमार्ग पर जाने से रोकता है व आत्मसंयमी बनाता
है । अतएव , काले धन के विष-वृक्ष से समाज व देश को अगर सचमुच ही मुक्त
करना है , तो इसकी पत्तियों व डालियों के ‘विमुद्रीकरण’ अथवा लेन-देन की
प्रक्रिया के ‘कम्प्युटरीकरण’ से कुछ नहीं होगा ; बल्कि इसके लिए इसके
जड-मूल अर्थात दीक्षाहीन पाश्चात्य शिक्षा-पद्धति को उखाड कर
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-सम्पन्न भारतीय शिक्षण-पद्धति का पुनर्पोषण करना
होगा ।
• मनोज ज्वाला

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