लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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nilgai-controversyसंदर्भ- बिहार में नीलगाय का सरकारी स्तर पर शिकार-

प्रमोद भार्गव
वन्य प्राणी सरंक्षण अधिनियम 1972 के लागू होने के बाद जहां एक ओर सैकड़ों लुप्त होते, दुर्लभ वन्य प्राणियों को बचाना संभव हुआ, वहीं अधिक प्रजनन क्षमता वाले कुछ प्राणियों की संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गई कि वे खेत एवं मानव बस्तियों में भी आ धमकते हैं। ऐसे ही हालातों के चलते नीलगाय, काले हिरण, जंगली सूअर, बंदर और जंगली हाथी फसल और इंसानों के लिए संकट का सबब बन रहे हैं। बावजूद वन्य प्राणी सरंक्षण अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद इन 43 सालों में ऐसा पहली बार देखने में आया है कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गंभीरता से सोचे-विचारे बिना एक साथ कई प्राणियों के वैध शिकार की मंजूरी दे दी है। इनमें राष्ट्रीय पक्षी मोर भी शामिल है। यह थोड़ा समझ से परे है कि आखिर मोर जैसा पक्षी कैसे फसल या इंसानों को हानि पहुंचा रहा है ? इस लिहाज से कें्रदीय मंत्री मेनका गांधी का विरोध और गुस्सा एक हद तक जायज है।
मेनका गांधी द्वारा उठाए सवालों को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि वे पशु प्रेमी होने के साथ स्वयं भी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री रह चुकी हैं। उन्होंने अपने कथन में साफ तौर से कहा है कि प्रकाश जावड़ेकर दुर्लभ प्राणियों के वध को प्रोत्साहित कर रहे हैं। राज्य सरकारों को पत्र लिख कर पूछा जा रहा है कि ऐसे कौनसे दुर्लभ प्राणी है, जिन्हें आप मारना चाहते हैं। दूसरी तरफ जावड़ेकर भी बेहिचक प्रति उत्तर देते हुए कह रहे हैं कि किसानों की फसलें बर्बाद न हों, इसलिए राज्य सरकारों के आग्रह पर मंत्रालय ने शिकार की इजाजत दी है। अपनी सफाई में जावड़ेकर ने यहां तक कहा कि जंगली पशुओं की आबादी के प्रबंधन का यही वैज्ञानिक तरीका है। ‘वर्मिन‘ घोषित किए गए पशुओं को क्षेत्र विशेष में सीमित अवधि तक मारने की अनुमति दिए जाने के कानूनी प्रावधान हैं।
दरअसल वन सरंक्षण अधिनियम बनने के बाद ऐसा अवसर पहली बार आया है कि पर्यावरण मंत्रालय ने कई राज्यों की मांग पर एक साथ कई दुर्लभ प्रजातियों के प्राणियों को मारने की इजाजत दी है। बिहार में नीलगाय, पश्चिम बंगाल में हाथी, हिमाचल प्रदेश में बंदर, महाराष्ट्र में जंगली सूअर और गोवा में तो राष्ट्रीय पक्षी मोर तक को मारने की इजाजत दे दी है। इस आदेश के पालन में बिहार के मोकामा में करीब 250 नील गाय और महाराष्ट्र के चांदपुर में 53 जंगली सूअर मार दिए गए हैं। ये शिकार हैदराबाद के पेशेवर शिकारी अपनी लाइसेंसी बंदूकों से कर रहे हैं। किराए के इन शिकारियों को पति प्राणी 500 रुपए शिकार के दिए जा रहे हैं।
यह सही है कि वन सरंक्षण अधिनियम 1972 में विशेष परिस्थितियों में वर्मिन यानी उपद्रवी प्राणियों को मारने की अनुमति देने का प्रावधान है। बिहार में मारी गई नील गाय और महाराष्ट्र में मारे गए जंगली सूअर इसलिए उपद्रवी प्राणियों के दायरे में कहे जा सकते हैं, क्योंकि वे किसानों की फसलों को तबाह करने में हैं। दूसरी तरफ बंगाल में हाथी और हिमाचल प्रदेश में बंदर कुछ मानव बस्तियों में बर्बादी का सबब बने हैं। अलबत्ता यह थोड़ा सोचनीय तथ्य है कि गोवा में मोर किस कारण से मनुष्यों के लिए संकट का कारण बन रहे हैं ? मोर की प्रकृति न तो उपद्रवी व हिंसक पक्षी की है और न ही वे फसलों को चैपट करने में समर्थ हैं। फिर यह मंजूरी क्यों ? यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि इन समस्याओं का समाधन एकाएक इनकी हत्या के रूप में ही क्यों खोजा गया है ? जावड़ेकर ने अपने बयान में कहा है कि ‘पशुओं की आबादी के प्रबंधन का यही एक मात्र तरीका है।‘ विज्ञान सम्मत माना जाने वाला यह तरीका गले उतरने वाला नहीं है। यदि हम प्रबंधन की बात कर ही रहे हैं तो क्यों नहीं मोरों को पालने और मोर पंखों के व्यापार की इजाजत व्यक्तिगत स्तर पर देते ? इससे ग्रामीण अंचलों मे मोरों की फाॅर्मिंग होगी, वहीं कई लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।
नीलगाय, काले हिरण और जंगली सूअरों की आबादी पर नियंत्रण गर्भ निरोधक दवाएं देकर भी किया जा सकता है। ये दवाएं चारे में मिलाकर या ट्रेंकुलाइज करके दी जाती हैं। जिन प्राणियों की आज हत्या करने की जरूरत पड़ रही है, यदि उनके प्रति वन्य जीव सुरक्षा से जुड़े संस्थानों ने दूरदृष्टि से भरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया होता तो यह नौबत ही नहीं आती। हमारे यहां मद्रास में एक पूरा सर्प उद्यान है। जिसमें सांपों की प्राकृतिक रूप से वंशवृद्वि तो होती ही है, घरों व बस्तियों में निकलने वाले सांपों का भी यहां सरंक्षण किया जाता है। इन सांपों से प्राप्त होने वाले जहर से बनी दवा से सांप द्वारा काटे व्यक्ति का इलाज किया जाता है। सांपों का जहर निकालने का काम वन विशेषज्ञ या वनकर्मी नहीं कर पाते हैं, इसलिए इस काम में पेशेवर सपेरों को लगाया गया है। यदि इसी तर्ज पर जिन दुर्लभ प्राणियों को मारने की जरूरत पड़ रही है, उनका भी व्यावसायिक प्रबंधन कर दिया जाए तो शायद इन्हें भविष्य में किराए के शिकारियों से हत्या कराने की जरूरत ही न पड़े ? इस तरह से मारे गए प्राणियों को दफनाने की समस्या तो खड़ी होगी ही, प्रदूषण की समस्या भी पैदा होगी ? बावजूद यदि इन्हें मारकर ही आबादी पर नियंत्रण का उपाय करना है तो स्थानीय लोगों को साल में एक बार इन्हें मारकर खाने की इजाजत क्यों नहीं दे दी जाती ? इससे अवैध शिकार पर भी अंकुष लगेगा। मालूम हो फिल्म अभिनेता सलमान खान पर नीलगाय प्रजाति के ही हिरण ‘कृष्णमृग‘ का अवैध शिकार करने का मामला राजस्थान की अदालत में विचाराधीन हैं। ऐसे कई गरीब व लाचार लोग हैं, जो जाने-अनजाने इन प्राणियों का शिकार करके पुलिस व अदालत के कानूनी फेर में उलझे हुए हैं।
हाथियों द्वारा तबाही मचाने के मामले पश्चिम बंगाल उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में हर साल आते हैं। ये मतवाले हाथी न केवल फसलें चैपट करते हैं, बल्कि गांव के गांव उजाड़ देते है। लोगों को भी मार डालते हैं। हमारे यहां हर साल करीब 400 लोग हाथियों के हमले से मारे जाते हैं। दूसरी तरफ बड़ी संख्या में पेशेवर शिकारी इनका शिकार दांतों के लिए करते हैं। बड़ी संख्या में हाथी रेल दुर्घघटनाओं का भी शिकार होते हैं। इन हाथियों पर नियंत्रण के लिए कौषल प्रबंधन की जरूरत है। भारत में प्राचीन काल से हाथियों को प्रशिक्षित करके उनका उपयोग सैन्य गतिविधियों, लकड़ी ढोने, निर्माण क्षेत्र में परिवहन करने और धार्मिक, सांस्कृतिक व सामाजिक उत्सवों में किया जाता रहा है। किंतु इसे दुर्लभ प्राणियों की श्रेणी में लाकर इसके व्यावहरिक उपयोगों पर अंकुष लगा दिया गया है। जबकि चीन, इंडोनेशिया और थाइलैंड के जंगलों में अभी भी हाथी काटे गए पेड़ों के तने के परिवहन से जुड़े हैं। यही कारण है कि इन देशों में हाथी मनुष्यों के लिए न तो टकराव का कारण बन रहे हैं और न ही इनकी बढ़ी आबादी, सरकारों को ऐसा संकट बनी है कि इनकी सुनियोजित ढंग से हत्या कराने की जरूरत पडी हो ?
दुनिया के कई देशों के उद्यानों व चिड़ियाघरों को दुर्लभ प्राणियों की जरूरत रहती है। इन देशों को हाथी बेचकर भी हम एक तो इनकी आबादी पर नियंत्रण कर सकते हैं और बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी भी कमा सकते है। पेशेवर महावतों और साधु-संतों को भी हाथी पालने की सुविधा देकर सरकार इनकी क्षेत्र विशेष में बढ़ी आबादी को नियंत्रित करने का उपाय कर सकती है। हालांकि हाथी नवजात शिशु के रुप में ही पालना संभव है। उसे शिशु अवस्था से ही प्रशिक्षण देकर मानव उपयोगी बनाया जा सकता है। चीन तो बाकायदा बाघ जैसे दुर्लभ प्राणी की व्यावसायिक फार्मिंग करके, उसकी हड्डियों से शराब का निर्माण कर रहा है। भारत में बाघ के अवैध रूप से किए गए शिकार की कीमत सबसे ज्यादा चीन में ही मिलती है।
वैसे, प्राणियों की हत्या इसलिए भी अनुचित है, क्योंकि एक तरफ तो हम इनके संस्थागत सरंक्षक पर प्रतिमाह करोड़ों रूपए खर्च कर रहे हैं और जब सरंक्षण के चलते इनकी आबादी बढ़ गई तो नियंत्रण के उपाय वैध शिकार के जरिए तलाश रहे हैं। इससे तो अच्छा है, सरंक्षण के उपाय ही बंद कर दिए जाएं ? दरअसल वन्य प्राणियों की आबादी बढ़ने या उनके बस्तियों में घुसने से जो संकट खड़े हो रहे हैं, वे संकट इंसान के ही पैदा किए हुए हैं। हकीकत अथवा विरोधाभासी संकट तो यह है कि आबादी प्राणियों की नहीं बढ़ी, बल्कि इंसानों की बढ़ी है। इंसान ने अपनी सुविधा के लिए जंगलों का विनाश तो किया ही, जंगल क्षेत्र में भी अतिक्रमण कर लिया। इस वजह से प्राणियों के लिए वनों में प्रकृति ने जो खाद्य श्रृखंला बनाई थी, वह टूटती चली गई। नतीजतन, जंगली प्राणियों को भोजन की तलाश में न केवल खेतों को उजाड़ता पड़ रहा है, बल्कि इंसानी बस्तियों में भी घुसपैठ को विवश हो रहे हैं। तेंदुओं के घरों में घुसने की जानकारियां पूरे देश से आ रही हैं। मध्यप्रदेश के शिवपुरी के चांदपाठा तालाब में मगरों की संख्या इतनी अधिक हो गई हैं कि वे घरों और गलियों में घुसे चले आते हैं। ये मगर कई लोगों का शिकार कर चुके हैं। हो सकता है, कलकों इन्हें भी मारने की वैधानिक जरूरत पड़े ? इसीलिए प्राणियों की बढ़ी आबादी पर नियंत्रण के कुछ ऐसे नए तरीके खोजने होंगे, जिससे इनकी समूह में हत्या कराने की जरूरत ही न पड़े ? वैसे तो इनके प्रबंधन का सर्वोत्तम तरीका है कि इन प्राणियों की फाॅर्मिंग की जाए, इससे जहां परंपरागत पेशेवरों को रोजगार मिलेगा, वहीं इनके स्वाभाविक रूप से मरने पर इनके अंगों से विदेशी पूंजी कमाने के भी अवसर सुलभ होंगे।

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