लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सदा से सब भारतीय भाषाओं तथा बोलियों का समर्थक रहा है। संघ की मान्यता है कि भारत में उपजी तथा विकसित हुई सभी भाषाएं राष्ट्रभाषा हैं और सबको भरपूर सम्मान मिलना चाहिए। जो प्रचारक या पूर्णकालिक कार्यकर्ता अपने प्रांत से दूसरे प्रांतों में भेजे जाते हैं, वे कुछ समय में ही वहां की भाषा और बोली सीख लेते हैं। कुछ समय बाद पता ही नहीं लगता कि वे इस प्रांत के नहीं हैं। यही संघ की विशेषता है।

संघ के केन्द्रीय कार्यक्रमों में सब कार्यवाही हिन्दी में ही होती है, यद्यपि आंकड़ें अंग्रेजी में भी दिये जाते हैं। इस संबंध में कुछ प्रसंग प्रेरक तथा कुछ बहुत रोचक भी हैं।

आजादी के बाद दक्षिण भारत में भीषण हिन्दी विरोधी आंदोलन हुआ। वहां के कुछ नेताओं और बुद्धिजीवियों को भय था कि पूरे भारत पर उत्तर भारत वालों की भाषा हिन्दी थोप दी जाएगी और इस बहाने वे हम पर हावी हो जाएंगे। अंग्रेजों ने अब तक उन्हें यही पढ़ाया था। इस कारण वे हिन्दी विरोध और अंग्रेजी का समर्थन करते थे। वस्तुतः वहां हिन्दी नहीं, अपितु अरबी-फारसी मिश्रित उस हिन्दुस्तानी का विरोध था, जिसे मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए गांधी जी प्रचलित कर रहे थे। इसमें राजा राम को बादशाह राम और भगवती सीता को बेगम सीता कहते थे।

उन्हीं दिनों कोयम्बटूर में संघ का एक विशाल कार्यक्रम हुआ, जिसमें तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी मुख्य वक्ता तथा प्रबल हिन्दी विरोधी पूर्व केन्द्रीय मंत्री षणमुगम् शेट्टी अध्यक्ष थे। श्री गुरुजी ने हिन्दी विरोधी आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कि भारत की हर भाषा राष्ट्रभाषा है; पर संस्कृतनिष्ठ हिन्दी सम्पर्क भाषा के लिए सबसे उपयुक्त है। देश के सब लोगों को उसे अपनाना चाहिए। यह सुनकर श्री शेट्टी चकित हो गये। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि यदि संघ का यह दृष्टिकोण है, तो मैं उसका समर्थन करता हूं। सभा में आये संघ तथा हिन्दी विरोधियों के चेहरे उतर गये।

संघ के वरिष्ठ प्रचारक तथा उड़ीसा में संघ कार्य के सूत्रधार स्व0 बाबूराव पालधीकर ने अपने संस्मरणों में हिन्दी के संबंध में दो बहुत ही रोचक संस्मरण लिखे हैं।

संघ के प्रारम्भिक दिनों में नागपुर में होने वाले शीत शिविर या संघ शिक्षा वर्गाें में पूरे देश से स्वयंसेवक आते थे। वहां सारे कार्यक्रम हिन्दी में ही होते थे; पर उसे न जानने वाले स्वयंसेवक जब हिन्दी बोलते थे, तो उनके शब्द और उच्चारण से बड़ा विनोद निर्माण होता था।

भोजन के लिए सब अपनी थाली, कटोरी आदि लेकर भोजन मंडप में आते थे। इसकी सूचना देने वाले कार्यकर्ता हिन्दी न जानने से मराठी शब्दों को तोड़ मरोड़कर सूचना देते थे। हिन्दी में माटी के लिए मिट्टी, पाटी के लिए पट्टी जैसे शब्द हैं। सूचना देने वाला समझता था कि मराठी में थाली को ‘ताट’ कहते हैं, तो हिन्दी में इसका रूप ‘तट्टी’ जैसा कोई शब्द होगा। अतः वे कहते कि भोजन के लिए सब लोग अपनी तट्टी साथ लेकर आएंगे। कभी-कभी इसका उच्चारण ‘टट्टी’ भी हो जाता था। यह सुनते ही स्वयंसेवकों में हंसी के फव्वारे छूट जाते। ऐसे ही अनेक शब्दों को बदलकर परस्पर बातचीत में एक नयी राष्ट्रभाषा बन जाती थी; पर बाद में उनका सही अर्थ जानने पर उन शब्दों को प्रयोग करने वाले कभी-कभी लज्जित हो जाते थे। फिर भी सब लोग इसका आनंद उठाते थे। वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयंसेवकों को हिन्दी बोलने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वे कहते थे कि इसमें लज्जा की कोई बात नहीं है। राष्ट्रभाषा ऐसे ही बनती है।

बाबूराव पालधीकर नेे ऐसे ही एक दूसरे प्रसंग की चर्चा अपने संस्मरणों में की है।

एक बार उनकी शाखा पर भारत सेवाश्रम संघ के एक संन्यासी आये। स्वयंसेवक तथा संन्यासी महोदय को एक दूसरे की भाषा नहीं आती थी। अतः संन्यासी महोदय ने जैसी हिन्दी उन्हें आती थी, उसमें ही बोलना उचित समझा। वे खड़े होकर जोर से कहने लगे, ‘‘खड़े हो जाओ, खड़े हो जाओ। भारतमाता डाकता है।’’ स्वामी विवेकानंद के ‘उतिष्ठत् जाग्रत’ वाले उद्बोधन का उन्होंने अपनी हिन्दी में अनुवाद कर बड़े जोश से यह कहा। इसे सुनकर कुछ स्वयंसेवक सचमुच खड़े हो गये। इस प्रकार की भाषा सुनकर सबको हंसी आ गयी। ‘भारतमाता डाकता है’ का अर्थ कोई भी नहीं समझ सका; पर अखिल भारतीय संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में यह सब सहज रूप से चलता था।

ऐसे कुछ रोचक संस्मरण और भी हैं। 1981 में दीपावली पर देश भर के जिला प्रचारकों का शिविर बंगलौर के पास चनेनहेल्ली के एक आवासीय विद्यालय में हुआ। उस समय कर्नाटक के प्रांत प्रचारक श्री अजीत कुमार जी थे, जो बाद में एक कार दुर्घटना में चल बसे। उनकी हिन्दी भी ऐसी ही मिलीजुली थी।

प्रातःकाल शौचालयों के बाहर प्रायः लम्बी पंक्ति लग जाती थी। एक बार किसी ने संभवतः अधिक दबाव होने पर लघुशंका स्थल का ही इस काम के लिए प्रयोग कर लिया। इस पर अजीत जी ने शाम की सभा में सूचना दी, ‘‘कुछ लोग लघुशंका स्थान से शौच कर रहे हैं। कृपया वे ऐसा न करें।’’ पाठक समझ सकते हैं कि हिन्दी जानने वालों ने इस पर कैसा ठहाका लगाया होगा।

संघ के प्रशिक्षण में संघ शिक्षा वर्ग का बड़ा महत्व है। प्रथम और द्वितीय वर्ष के 20 दिवसीय वर्ग अपने क्षेत्र में ही होते हैं; पर तृतीय वर्ष का 30 दिवसीय वर्ग प्रतिवर्ष नागपुर में ही होता है। इसमें सारे देश से सभी प्रकार की भाषा बोलने वाले आते हैं। वहां भी ऐसे अनेक रोचक प्रसंग देखने और सुनने को मिलते हैं।

जब मैं तृतीय वर्ष के लिए नागपुर गया था, उस वर्ष हमारे कक्ष में एक बहुत शरारती स्वयंसेवक था। उसने दक्षिण के एक हिन्दी बिल्कुल न जानने वाले हृष्ट-पुष्ट शरीर वाले स्वयंसेवक को न जाने कैसे समझा दिया कि चूहे का अर्थ बलशाली होता है। वह दक्षिण भारतीय स्वयंसेवक यह दिखाने के लिए कि उसने भी कुछ हिन्दी सीख ली है, बार-बार अपनी भुजाओं की मछलियां दिखाकर कहता था – मैं चूहा हूं। इसे सुनकर सब हंसते थे। कई दिन बाद उसे इस मजाक का अर्थ समझ में आया। वहां ऐसी भाषायी चुहल होती रहती थी; पर संघ की तंरग में मस्त रहने के कारण कोई बुरा नहीं मानता था।

तृतीय वर्ष के वर्ग में सभी भाषण, सूचनाएं आदि हिन्दी में होती हैं। ऐसे में दक्षिण या पूर्वोत्तर भारत के कई लोग उन्हें बिल्कुल नहीं समझ पाते। फिर भी उन्हें वहां बैठना तो पड़ता ही है। कार्यक्रम के बाद उनके प्रांत के हिन्दी जानने वाले कार्यकर्ता उन्हें अपनी भाषा में बौद्धिक का सारांश समझाते हैं। इसमें भी कई बार बड़े रोचक प्रसंग उपस्थित होते हैं।

बौद्धिक के बीच में वातावरण को हल्का करने के लिए वक्ता प्रायः कुछ हंसाने वाली बातें या घटनाएं सुनाते हैं। इन्हें सुनकर सब हंसते हैं; पर जिन्हें हिन्दी समझ नहीं आती, उनकी स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती है। अपने आसपास वालों को देखकर वे भी हंसते हैं। कार्यक्रम के बाद जब उनके प्रांत प्रमुख अपनी स्थानीय भाषा में बौद्धिक का सारांश बताते हैं, तो उस प्रसंग की चर्चा आने पर वे फिर ठीक से हंसते हैं।

ऐसे बहुत से रोचक प्रसंग संघ के अखिल भारतीय कार्यक्रमों में जाने वाले कार्यकर्ताओं के अनुभव में आते हैं, जो उनके जीवन की अमूल्य निधि बन जाते हैं।

यह तो सच ही है कि किसी भी भाषा का प्रचार-प्रसार उसे बोलने से ही होता है। प्रारम्भ में बोलने में कुछ झिझक होती है; पर एक बार वह टूट गयी, तो फिर बोलना स्वाभाविक हो जाता है। एक समय आर्य समाज ने हिन्दी के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महर्षि दयानंद सरस्वती गुजरात के निवासी थे; पर उन्हें यह अनुभव हुआ कि यदि देश भर में अपनी बात पहुंचानी है, तो वह हिन्दी में ही पहुंचाई जा सकती है, गुजराती या संस्कृत में नहीं। इसलिए उन्होंने हिन्दी का प्रयोग प्रारम्भ किया और अपना प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ भी हिन्दी में ही लिखा।

इसी प्रकार का अनुभव गांधी जी को भी हुआ। उन्होंने अपने कई अनुयायियों को हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण भारत में भेजा। उन लोगों ने हर प्रांत में हिन्दी सभा बनायीं, जो आज भी किसी न किसी रूप में काम कर रही हैं। यद्यपि पूर्णतः शासन पर आश्रित होने के कारण उनके काम में वह तेजस्विता नहीं रही, फिर भी हिन्दी के लिए कुछ काम तो हो ही रहा है।

संघ ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वार्तालाप को ही महत्व दिया। सभी राज्यों में प्रचारकों तथा अन्य कार्यकर्ताओं को हिन्दी बोलने और सीखने को प्रोत्साहित किया जाता है। इससे बिना शोर किये हिन्दी का प्रचलन बढ़ रहा है।

जहां एक ओर समाचार पत्र-पत्रिकाओं और दूरदर्शन पर हिन्दी के विकृतिकरण का अभियान चल रहा है, वहीं दूसरी ओर अनेक लोग तथा संस्थाएं इसके प्रचार-प्रसार में लगी हैं। यदि स्वाधीन होते ही संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के चलन को प्रोत्साहन दिया जाता, तो भाषा के नाम पर हुए और हो रहे झगड़े नहीं होते; पर कांग्रेसी प्रधानमंत्री नेहरू जी ने यह नहीं होने दिया। परिणाम यह है कि अब हिन्दी क्रमशः अंग्रेजी और उर्दू के बाद फारसीनिष्ठ हो चली है। नागरी अंकावली तो हिन्दुत्व प्रेमियों की पत्र-पत्रिकाओं से भी गायब हो गयी है।

हिन्दीप्रेमियों को चाहिए कि वे हिन्दी के साथ दुराचार करने वालों का हर प्रकार से विरोध करें। साथ ही इसके पक्ष में काम करने वालों को सहयोग भी दें। हिन्दी तथा भारत की अन्य सभी राष्ट्रीय भाषाओं के समर्थक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों को इसी दृष्टि से देखना चाहिए।

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3 Comments on "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दी"

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Ashwani Garg
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Sangh has created and demonstrated a practical model for popularizing Hindi in entire India with an objective of connecting people with each other. Sangh has butifully implemented it in a way that Hindi finds easy acceptance among non Hindi speaking people.
Sangh swayamsevaks are driven by a higher objective which is to build character, and make oneself useful asset for the society. In such a positive environment what really communicates is your very being. Language plays a secondary role.

This method of Sangh is definitely worth emulating by all other organizations.

डॉ. मधुसूदन
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श्री. अनिल सहगल जी से निम्न विचारोंपर सोचने के लिए बिनती: आप द्वारा व्यक्त किए गए विचारोंके समान विचार और दिशाके कारण ही,और अन्य उत्तर भारतीयों की इसी गलती के कारण ही, दक्षिण में राष्ट्र भाषा को स्वीकार कराने में अधिक कठिनाइयां खडी हुयी।{ऐसा पूरी प्रामाणिकतासे मानता हूं} संस्कृत प्रचुर (बहुल) हिंदी ही सारे भारत में लागु करनेमें कम कठिनाई होगी। जिस गलती के कारण हमें राष्ट्र भाषा प्राप्त ना हुयी उसे दोहराना अनुचित है।== (१) संस्कृतमें २००० धातु, २२ उपसर्ग, और ८० प्रत्यय, केवल इन्हीके आधारपर ३५ लाख शब्द रचे जा सकते हैं। इससे अतिरिक्त समास, संधि इनका आधार… Read more »
Anil Sehgal
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दी -by- विजय कुमार संस्कृतनिष्ठ हिन्दी – versus – मिश्रित (चालू) हिंदी आज हिन्दी भाषा में समाचार पत्र, पत्रिका, पुस्तकें, अन्य अच्छी / बुरी प्रेस, फिल्म, रेडियो, टीवी, वीडिओ, ऑडियो, आदि का २० – २५ हज़ार रु का धंधा हो गया है. इस विशाल राशी के व्यापार का कारण कौन सी हिन्दी है ? जनाब, संस्कृत वाली हिन्दी या चालू हिन्दी – हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए. सभी अपना योगदान कर रहे है न. इससे हिन्दी का विस्तार एवं प्रसार तो ही रहा है न. हिन्दी में सवा लाख शब्द हैं जबकि इंग्लिश में… Read more »
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