लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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rssराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस दशहरे (22 अक्टूबर, 2015) पर अपने नब्बे वर्ष पूरे कर रहा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में जो बीज बोया था, आज वह वटवृक्ष बन गया है। उसकी अनेक शाखाएं समाज में सब दूर फैली हुई हैं। संघ लगातार दसों दिशाओं में बढ़ रहा है। नब्बे वर्ष के अपने जीवन काल में संघ ने भारतीय राजनीति को दिशा देने का काम भी किया है। आरएसएस विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है, फिर क्यों और कैसे वह राजनीति को प्रभावित करता है? यह प्रश्न अनेक लोग बार-बार उठाते हैं। जब ‘संघ और राजनीति’ की बात निकलती है तो बहुत दूर तक नहीं जाती। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निकटता से नहीं जानने वाले लोग इस विषय पर भ्रम फैलाने का काम करते हैं। राजनीति का जिक्र होने पर संघ के साथ भारतीय जनता पार्टी को नत्थी कर दिया जाता है। भाजपा संघ परिवार का हिस्सा है, इस बात से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन, भाजपा के कंधे पर सवार होकर संघ राजनीति करता है, यह धारणा बिलकुल गलत है। देश के उत्थान के लिए संघ का अपना एजेंडा है, सिद्धांत हैं, जब राजनीति उससे भटकती है तब संघ समाज से प्राप्त अपने प्रभाव का उपयोग करता है। सरकार चाहे किसी की भी हो। यानी संघ समाज शक्ति के आधार पर राजसत्ता को संयमित करने का प्रयास करता है। अचम्भित करने वाली बात यह है कि कई विद्वान संघ के विराट स्वरूप की अनदेखी करते हुए मात्र यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा ही संघ है और संघ ही भाजपा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेता है। संघ चुनाव नहीं लड़ता है। भाजपा के किसी उम्मीदवार के लिए संघ घर-घर जाकर वोट भी नहीं मांगता है। स्पष्ट है कि विरोधी संघ के माथे पर राजनीतिक संगठन होने का मिथ्या आरोप ही लगा सकते हैं, उनकी बातें किसी आधार पर टिकती नहीं हैं। समाज में संघ की पहचान सांस्कृतिक संगठन के नाते ही है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि 1925 से 1948 तक संघ ने राजनीतिक क्षेत्र में काम करने के विषय में सोचा ही नहीं था। राजनीति संघ की प्राथमिकता आज भी नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से जब किसी ने पूछा कि संघ क्या करेगा? डॉक्टर साहब ने उत्तर दिया- ‘संघ व्यक्ति निर्माण करेगा।’ अर्थात् संघ समाज के प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने के लिए ऐसे नागरिकों का निर्माण करेगा, जो अनुशासित, संस्कारित और देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत हों। बहरहाल, महात्मा गांधी की हत्या के बाद पहली बार यह विचार ध्यान में आया कि संसद में संघ का पक्ष रखने वाला कोई राजनीतिक दल भी होना चाहिए। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। संघ विचारधारा के बढ़ते प्रभाव से घबराए तत्कालीन राजनेताओं ने इस दुखद घड़ी में घृणित राजनीति का प्रदर्शन किया। संघ को बदनाम करने के लिए उस पर गांधीजी की हत्या का दोषारोपण किया गया। झूठे आरोप को आधार बनाकर कांग्रेस सरकार ने चार फरवरी, 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में, जब सरकार को मुंह की खानी पड़ी, सारे आरोप झूठे साबित हुए तब 12 जुलाई, 1949 को संघ से प्रतिबंध हटाया गया। प्रतिबंध के विरोध में 9 दिसम्बर, 1948 से संघ को एक देशव्यापी सत्याग्रह आंदोलन चलाना पड़ा था, जिसमें 60 हजार से भी अधिक स्वयंसेवक जेलों में गए थे।

स्वयंसेवकों को बार-बार यह बात कचोट रही थी कि विरोधियों ने सत्ता की ताकत से जिस प्रकार महात्मा गांधी की हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ को कुचलने का प्रयास किया है, भविष्य में इस तरह फिर से संघ को परेशान किया जा सकता है। राजनीतिक प्रताडऩा के बाद ही इस बहस ने जन्म लिया कि संघ को राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए। विचार-मन्थन शुरू हुआ कि आरएसएस स्वयं को राजनीतिक दल में बदल ले यानी राजनीतिक दल बन जाए या राजनीति से पूरी तरह दूर रहे या किसी राजनीतिक दल को सहयोग करे या फिर नया राजनीतिक दल बनाए। स्वयं को राजनीतिक दल में परिवर्तित करने पर संघ का विराट लक्ष्य कहीं छूट जाता। परिस्थितियां ऐसी बन गईं थी कि राजनीति से पूरी तरह दूर नहीं रहा जा सकता था। उस समय कोई ऐसा राजनीतिक दल नहीं था, जो संघ की विचारधारा के अनुकूल हो। इसलिए किसी दल को सहयोग करने का विचार भी संघ को त्यागना पड़ा। लम्बे विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि संघ की प्रेरणा से नए राजनीतिक दल का गठन किया जाएगा। इसी बीच, कांग्रेस की गलत नीतियों से मर्माहत होकर आठ अप्रैल, 1950 को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से इस्तीफा देने वाले डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी संघ के सरसंघचालक श्रीगुरुजी के पास सलाह-मशविरा करने के लिए आए थे। वे नया राजनीतिक दल बनाने के लिए प्रयास कर रहे थे। श्रीगुरुजी से संघ के कुछ कार्यकर्ता लेकर डॉ. मुखर्जी ने अक्टूबर, 1951 में जनसंघ की स्थापना की। वर्ष 1952 के आम चुनाव में जनसंघ ने एक नये राजनीतिक दल के रूप में भाग लिया। यद्यपि इस चुनाव में जनसंघ को कोई विशेष सफलता नहीं मिली लेकिन राजनीति के क्षेत्र में उसकी दस्तक महत्वपूर्ण साबित हुई। जनसंघ के माध्यम से राजनीति को राष्ट्रवादी दिशा देने की संघ की यह सीधी शुरुआत थी।

जनसंघ को मजबूत करने में संघ के प्रचारक नानाजी देशमुख, बलराज मधोक, भाई महावीर, सुंदरसिंह भण्डारी, जगन्नाथराव जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, रामभाऊ गोडबोले, गोपालराव ठाकुर और अटल बिहारी वाजपेयी ने अहम भूमिका निभाई। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण नाम है पण्डित दीनदयाल उपाधयाय का। 25 सितम्बर, 2015 से पंडितजी की जन्मशती भी प्रारंभ हो गई है। पंडितजी ने भारतीय राजनीति को ‘एकात्म मानवदर्शन’ जैसा मंत्र दिया है। आज की भाजपा सरकारें दीनदयाल जी के इस दर्शन को आधार बनाकर ‘अंतिम व्यक्ति’ के कल्याण के लिए काम कर रही हैं। जनसंघ को खड़ा करने में संगठनात्मक जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय की ओर आई। अद्भुत संगठनात्मक क्षमता के धनी पंडितजी के प्रयास से भारतीय जनसंघ देश में एक मजबूत राजनीतिक दल के रूप में खड़ा हुआ। 17 साल में दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों बदल दीं। अगर उनकी हत्या नहीं की गई होती तो निश्चित ही आज का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। बहरहाल, जनसंघ की नीतियों में संघ का सीधा कोई हस्तक्षेप नहीं था। चूंकि संघ के कार्यकर्ता ही जनसंघ का संचालन कर रहे थे इसलिए संघ ने जनसंघ को स्वतंत्र छोड़कर संगठन के दूसरे आयामों पर अधिक ध्यान देना जारी रखा। हालांकि सालभर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और श्रीगुरुजी बैठते थे। दीनदयालजी गुरुजी को जनसंघ के संबंध में जानकारी देते थे। श्रीगुरुजी कुछ आवश्यक सुझाव भी पंडितजी को देते थे। जनसंघ से भाजपा तक आपसी संवाद की यह परम्परा आज तक कायम है। अब इसे कुछ लोग ‘संघ की क्लास में भाजपा’ कहें, तो यह उनकी अज्ञानता ही है। इस संदर्भ में श्रीगुरुजी के कथन को भी देखना चाहिए। उन्होंने 25 जून, 1956 को ‘ऑर्गनाइजर’ में लिखा था- ‘संघ कभी भी किसी राजनीतिक दल का स्वयंसेवी संगठन नहीं बनेगा। जनसंघ और संघ के बीच निकट का संबंध है। दोनों कोई बड़ा निर्णय परामर्श के बिना नहीं करते। लेकिन, इस बात का ध्यान रखते हैं कि दोनों की स्वायत्तता बनी रहे।’

वर्ष 1975 लोकतंत्र के लिए काला अध्याय लेकर आया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लाद दिया। संघ ने इसका पुरजोर तरीके से विरोध किया। संघ के कार्यकर्ताओं पर आपातकाल में बड़ी क्रूरता से अत्याचार किए गए। इसके बाद भी संघ लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल का विरोध करता रहा। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में संघ की भागीदारी स्पष्ट है। संघ के स्वयंसेवकों की भागीदारी के कारण ही आंदोलन व्यापक हो सका। दो साल लम्बे संघर्ष के बाद कांग्रेस की कद्दावर नेता इंदिरा गांधी को आपातकाल हटाना पड़ा। चुनाव में कांग्रेस की भारी हार हुई। वर्ष 1977 में जनता पार्टी का गठन किया गया। जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया। लेकिन, वाममार्गियों ने ऐसी परिस्थितियां खड़ी कर दी की जनसंघ के नेताओं को जनता पार्टी से बाहर आना पड़ा। सन् 1980 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। आज भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी के नाते देश चला रही है। छात्र राजनीति में भी संघ की प्रेरणा से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद कार्य कर रही है। परिषद का जन्म उस समय हुआ था जब संघ पर पहला प्रतिबंध लगा था। समाज में रचनात्मक कार्यों को जारी रखने के लिए और प्रतिबंध का विरोध करने के लिए संघ की प्रेरणा से एबीवीपी का गठन किया गया था। आज एबीवीपी युवा राजनेताओं की पौध खड़ी कर रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र की संप्रभुता के विषयों पर लगातार चिंतन करता रहता है। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा और अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल अनेक अवसर पर भारतीय राजनीति को संदेश देने के प्रस्ताव पारित कर चुके हैं। राष्ट्रीय भाषा-नीति-1958, गोवा आदि का संलग्र प्रांतों में विलय-1964, साम्प्रदायिक दंगे और राष्ट्रीय एकता परिषद-1968, राष्ट्र एक अखण्ड इकाई-1978, विदेशी घुसपैठिये-1984, पूर्वी उत्तरांचल ‘इनर लाइन आवश्यक-1987, अलगाववादी षड्यंत्र-1988, आतंकवाद और सरकार की ढुलमुल नीति-1990, सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण न हो-2005 जैसे अनेक प्रस्ताव हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय दिशा से भटकती राजनीति को सचेत किया है। संघ के प्रयत्नों के कारण ही देश में आज समान नागरिक संहिता और जम्मू-कश्मीर में अस्थाई धारा-370 हटाने की बहस जारी है। भारत और हिन्दू अस्मिता का प्रतीक रामजन्मभूमि का मुद्दा भी संघ की ताकत के कारण ही राजनीतिक बहसों में शामिल हो सका है। बोफोर्स, पनडुब्बी-खरीदी, शेयर, चीनी तथा बिहार के पशुपालन विभाग के घोटालों से लेकर हवाला काण्ड में राजनीति की सीधी भागीदारी के बाद संघ ने ही राजनीतिक शुचिता की बहस शुरू कराई। चुनाव प्रक्रिया में धन के प्रभाव को रोकने और अपराधियों के चुनाव लडऩे को प्रतिबंधित कराने के लिए संघ ने सामाजिक मुहिम चलाई है। इस संबंध में वर्ष 1996 में प्रतिनिधि सभा के प्रस्ताव को देखना चाहिए, जो राजनीति और भ्रष्टाचार पर केन्द्रित था।

वर्तमान में गोहत्या पर बहस छिड़ी हुई है। गौ-संरक्षण के लिए संघ ने अथक प्रयास किए हैं। संघ के आंदोलनों से बने जन दबाव के कारण कांग्रेस सरकारों को भी राज्यों में गोहत्या प्रतिबंध के संबंध में कानून लागू करने पड़े। असम और पश्चिम बंगाल में 1950 में, तत्कालीन बंबई प्रांत में 1954 में, उत्तर प्रदेश, पंजाब और बिहार में 1955 में गौहत्या प्रतिबंध संबंधी कानून बनाये गये, उस वक्त वहां कांग्रेस की सरकारें थीं। इसी तरह कांग्रेस के समय में ही तमिलनाडु में 1958 में, मध्यप्रदेश में 1959 में, ओडीसा में 1960 में तो कर्नाटक में 1964 में संबंधित कानूनों को लागू किया गया।

मामला साल 2007 का है। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने ‘रामसेतु’ को तोडऩे की पूरी तैयारी कर ली थी। कांग्रेस की जिद इतनी अधिक थी कि उसने कोर्ट में हलफानामा दायर करके हिन्दुओं के आराध्य भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया था। लेकिन, रामसेतु को बचाने के लिए देशभर में संघ के आंदोलन से सरकार घबरा गई और उसे कदम वापस खींचने पड़े। कुछ इसी तरह के हालात यूपीए-2 के कार्यकाल में उस समय बने जब सोनिया गांधी की मंडली के सुझाव पर सरकार ने ‘सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथान विधेयक’ को लागू करने का विचार बना लिया था। संघ के विरोध के कारण सरकार का हौसला पस्त हो गया। अन्यथा तो सरकार तुष्टीकरण की राजनीति के चरम पर पहुंचने वाली थी। संघ के कारण ही भारतीय राजनीति में लम्बे समय से चली आ रही तुष्टीकरण और वोटबैंक की परंपरा का खुलासा हो सका।

जब कभी भारतीय राजनीति असंतुलित हुई है, संघ ने हस्तक्षेप किया है। अर्थात् सरकारों ने वोटबैंक की राजनीति के फेर में जब-जब राष्ट्रीय एकता के मूल प्रश्न की अनदेखी की है तब-तब संघ ने राजनीति में हस्तक्षेप किया है। भाजपा भले ही संघ परिवार का हिस्सा है, लेकिन संघ ने स्वयं को दलगत राजनीति से हमेशा दूर ही रखा है। देश की सामयिक परिस्थितियों और राजनीति के प्रति संघ सजग रहता है। राजनीति समाज के प्रत्येक अंग को प्रभावित करती है। संघ इसी समाज का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन है। इसलिए संघ और राजनीति का संबंध स्वाभाविक भी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा संगठन है जिसका ध्येय ‘राष्ट्र को परम्वैभव’ पर लेकर जाना है। आलोचक यदि इसका अर्थ ‘हिन्दू राष्ट्र’ या ‘सांप्रदायिक राष्ट्र’ से लगाते हैं तो यह उनकी संघ के बारे में अध्ययन की कमी को उजागर करता है। ‘संघ और राजनीति’ पुस्तक के लेखक एवं दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो. राकेश सिन्हा कहते हैं- ‘सांस्कृतिक संगठन का तात्पर्य झाल-मंजीरा बजाने वाला संगठन न होकर राष्ट्रवाद को जीवंत रखने वाला आंदोलन है। इसीलिए आवश्यकतानुसार संघ राजनीति में हस्तक्षेप करता है, जो आवश्यक और अपेक्षित दोनों है।’ हम समझ सकते हैं कि संघ राजनीति का उपयोग इतना भर ही करता है कि उसके मार्ग में बेवजह अड़चन खड़ी न की जाएं। मिथ्या आरोप संघ पर न लगाए जाएं। संघ के पास राजनीतिक शक्ति नहीं है, यह सोचकर कोई उसके वैचारिक आग्रह की अनदेखी न कर सके। संघ के खिलाफ षड्यंत्र होने पर संसद में भी संघ के हित की बात करने वाले लोग मौजूद रहें। एक बात स्पष्टतौर पर समझ लेनी चाहिए कि संघ राजनीति को प्रभावित करता रहा है और भविष्य में भी करेगा। इसके साथ यह भी स्पष्ट है कि संघ सीधे चुनाव में भाग नहीं लेता है और भविष्य में भी नहीं लेगा। संघ का राजनीति में प्रभाव अपनी उस ताकत से है, जो अपने नब्बे साल के कार्यकाल में जनता के भरोसे से हासिल हुई है। देश के खिलाफ कोई ताकत खड़ी होने का प्रयास करती है तब सम्पूर्ण समाज संघ की ओर उम्मीद से देखता है। संकट के समय में भी संघ से ही मदद की अपेक्षा समाज करता है। आखिर में, राजनीतिक ताकतों ने ही संघ को राजनीति के विषय में सोचने पर मजबूर किया है।
लोकेन्द्र सिंह

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