लेखक परिचय

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान

फ़िरदौस ख़ान युवा पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं. आपने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक भास्कर, अमर उजाला और हरिभूमि में कई वर्षों तक सेवाएं दीं हैं. अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का सम्पादन भी किया है. ऑल इंडिया रेडियो, दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहता है. आपने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनल के लिए एंकरिंग भी की है. देश-विदेश के विभिन्न समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं के लिए लेखन भी जारी है. आपकी 'गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत' नामक एक किताब प्रकाशित हो चुकी है, जिसे काफ़ी सराहा गया है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल सहित अन्य टेलीविज़न चैनलों के लिए स्क्रिप्ट लेखन भी कर रही हैं. उत्कृष्ट पत्रकारिता, कुशल संपादन और लेखन के लिए आपको कई पुरस्कारों ने नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा कवि सम्मेलनों और मुशायरों में भी शिरकत करती रही हैं. कई बरसों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम भी ली है. आप कई भाषों में लिखती हैं. उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में ख़ास दिलचस्पी रखती हैं. फ़िलहाल एक न्यूज़ और फ़ीचर्स एजेंसी में महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं.

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-फ़िरदौस ख़ान

देश की जनता को क़रीब साढ़े चार साल पहले मिले सूचना के अधिकार ने काफ़ी राहत दी है। इस सुविधा के चलते जहां लोगों के कामकाज होने लगे हैं, वहीं ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहां सूचना के अधिकार के तहत लोगों को सूचना न मांगने या मांगी गई सूचना का आवेदन वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया है। हैरत की बात तो यह भी है कि भ्रष्टाचार से जनता को निजात दिलाने की गर्ज से शुरू किए गए इस कानून के तहत सूचना देने के लिए रिश्वत मांगने तक की शिकायतें मिली हैं। इन्हीं मुद्दों से संबंधित हरियाणा में आरटीआई से जुड़े कुछ मामलों की बानगी देखिए-

एक मामला जो जनहित से जुड़ी जानकारी मांगने का है :

हरियाणा के शिक्षा विभाग में दायर सूचना के अधिकार आवेदन से जानकारी मिली है कि राज्य के लगभग 50 फ़ीसदी स्कूलों में मुख्याध्यापक नहीं हैं। मुख्याध्यापकों के 2004 पदों में से 984 पद रिक्त पड़े हैं। इनमें 607 पद हाईस्कूल और 377 पद मिडिल स्कूल के मुख्याध्यापकों के हैं। जीन्द निवासी सतपाल ने आरटीआई के तहत आवेदन कर शिक्षा विभाग से सरकारी स्कूलों के मुख्याध्यापकों के खाली पदों के बारे में जानकारी मांगी थी। शिक्षा विभाग के मुताबिक मुख्याध्यापकों के 75 फीसदी पद शिक्षकों को पदोन्नत करके भरे जाते हैं, जबकि 25 फीसदी मुख्याध्यापकों की सीधी नियुक्ति होती है। स्कूलों की यह हालत हाल ही में 426 मुख्याध्यापकों की नियुक्ति के बाद है, पहले स्थिति क्या होगी, सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है। मिडिल स्कूलों में 377 रिक्त पदों के अलावा 12 सौ अन्य मिडिल स्कूल ऐसे हैं, जिनमें मुख्याध्यापकों की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि ये स्कूल शिक्षा विभाग के सभी मापदंडों पर खरे उतरते हैं। राज्य में शिक्षा के हालात का अंदाज़ा फ़तेहगढ़ जिले के गोरखपुर गांव के बालिका उच्च विद्यालय को देखकर लगाया जा सकता है। इस स्कूल को लगभग 7 महीने पहले मुख्याध्यापक नसीब हुआ है, वह भी 14 साल बाद। स्थानीय निवासियों और विधायक के दख़ल देने के बाद ही स्कूल को शिक्षक और हेडमास्टर मिल पाए। निकटवर्ती मोची और चोबारा गांव के स्कूलों की दशा भी बेहतर नहीं है। दोनों स्कूल बिना हेडमास्टर के चल रहे हैं। सूचना के अधिकार के ज़रिये इस खुलासे के बाद शिक्षा मंत्री राजन गुप्ता ने खाली पदों को भरने का आश्वासन दे दिया है। हालांकि उन्होंने माना है कि पिछले कई वर्षों से पदोन्नति से भरे जाने वाले पद अभी तक नहीं भरे गए हैं।

दूसरे मामले में सूचना मांगने पर नौकरी ही मिल गई :

आरटीआई से सिर्फ़ सूचना मिलती हो, ऐसा नहीं है। आरटीआई के तहत जवाब मांगने पर कार्रवाई तक होती है। ऐसा ही हुआ रेवाड़ी की सपना यादव के साथ। मामला गुडगांव ग्रामीण बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी की नियुक्ति से जुड़ा है। सपना ने भी इस पद के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसका चयन नहीं हो पाया। सपना नतीजे से संतुष्ट नहीं थी। इसलिए उसने आरटीआई के तहत आवदेन कर चयन प्रक्रिया से संबंधित सवाल पूछे। 7 दिसंबर 2007 को दाखिल आवेदन में सपना ने लिखित परीक्षा में अपनी मेरिट चयन के लिए साक्षात्कार और शैक्षणिक योग्यता के लिए जानकारी मांगी। सपना को उम्मीद थी कि उसका निश्चित तौर पर चयन हो जाएगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उसने इसका कारण्ा आरटीआई की मदद से जानना चाहा। आवेदन के जवाब में बैंक ने जानकारी दी कि मांगी गई सूचनाएं आरटीआई कानून के दायरे में नहीं आती। बैंक अधिकारियों ने कानून की धारा 8 (1) डी की आड़ लेकर सूचना देने से मना कर दिया। पहली अपील भी कोई जवाब नहीं मिला। बाद में सपना में राज्य सूचना आयोग और फ़िर केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील की। सीआईसी ने अगस्त 2008 में मामले की सुनवाई की और सपना के पक्ष में फैसला सुनाया। आयोग ने बैंक को सभी सूचनाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया। दिलचस्प रूप से बैंक ने सूचना तो उपलब्ध नहीं कराई, लेकिन 11 सितंबर 2008 को सपना को प्रोबेशनरी अधिकारी के तौर पर नियुक्ति दे दी।

तीसरे मामले में सूचना देने के लिए रिश्वत मांगी गई :

हरियाणा राज्य औद्योगिक एवं संरचनात्मक विकास निगम द्वारा आरटीआई आवेदनकर्ता एच. आर. वैश्य से मांगी गई सूचना मुहैया कराने के लिए 8 लाख रुपये की मांग की गई थी। वैश्य ने निगम द्वारा गुड़गांव के उद्योग विहार में उद्यमियों को आबंटित किए प्लॉट उसके बदले लिया गया शुल्क और क्षेत्र के विकास में खर्च की गई राशि का ब्यौरा मांगा था। इस पर निगम के लोक सूचना अधिकारी की तरफ से सूचना शुल्क के लिए 8 लाख 27 हजार रुपये की मांग की गई। बताया गया कि 4 लाख रुपये दो हजार प्लॉट के विवरण से संबंधित कागज़ों के हैं। हर प्लॉट का विवरण 20 पेज में है। 4.27 लाख की राशि अन्य सूचनाओं के लिए मांगी गई। गौरतलब है हरियाणा में आवेदन शुल्क 50 रुपये और छायाप्रति शुल्क 10 रुपये प्रति पेज रखा गया है। आवेदनकर्ता ने निगम से सीडी में सूचना मांगी, लेकिन निगम के लोक सूचना अधिकारी जीवन भारद्वाज ने सीडी में सूचना देने से मना कर दिया और दलील दी कि बहुत से लोग उन्हें तंग करने के लिए सूचना के अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं। उनका कहना था कि वैश्य ने जो सूचना मांगी वो निगम के इतिहास की जानकारी मांगने के बराबर है। हम सीडी में सूचना नहीं दे सकते, क्योंकि सारा डाटा सीडी में देने योग्य नहीं है।

चौथे मामले में आरटीआई के तहत किया आवेदन वापस लेने का दबाव बनाया गया :

हिसार ज़िले के गांव सातरोड खास के निवासी नरेश कुमार सैनी द्वारा आरटीआई के तहत गांव की डिस्पेंसरी से संबंधित जानकारी मांगने के लिए किए गए आवेदन को वापस लेने का दबाव बनाया गया। उसने बताया कि गांव की सरकारी डिस्पेंसरी अकसर बंद पड़ी रहती थी। यहां न तो नियमित तौर पर डिस्पेंसर आता था और न ही यहां पर दवाइयां थीं। गांव में डिस्पेंसरी होने के बावजूद गांव के बीमार लोगों को इलाज के लिए शहर जाना पड़ता था। इसलिए नरेश कुमार सैनी ने गत 1 मई को आरटीआई के तहत आवेदन कर डिस्पेंसरी से संबंधित जानकारी मांगी। जब डिस्पेंसरी से जुड़े लोगों को इस बात का पता चला तो उन्होंने उससे आवेदन वापस लेने को कहा, लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने गांव के प्रभावशाली लोगों के साथ मिलकर पंचायत बुलाकर उसे आवेदन वापसे लेने को मजबूर कर दिया। पंचायत में प्रभावशाली लोगों ने उसे आश्वासन दिया कि डिस्पेंसरी की हालत को जल्द ही सुधार दिया जाएगा। पंचायत के दबाव के चलते नरेश कुमार सैनी को अपना आवेदन वापस लेना पड़ा, लेकिन इतना ज़रूर हो गया कि डिस्पेंसरी की हालत कुछ बेहतर हो गई।

काबिले-गौर है कि जागरूक नागरिकों ने आरटीआई के तहत आवेदन करके अपनी कई समस्याओं से निजात पा ली है। हिसार सहित हरियाणा के अन्य हिस्सों में पूजा स्थलों के पास बने शराब के ठेके जो बरसों के आंदोलन के बावजूद नहीं हटाए गए थे, वे आरटीआई के तहत किए गए आवेदनों के चलते रिहायशी इलाकों व पूजा स्थलों के पास से हटा दिए गए हैं। इसके अलावा गली-मोहल्लों की टूटी सड़कों की हालत भी सुधर गई है। आरटीआई कार्यकर्ता विजय गुप्ता का कहना है कि अगर लोग आरटीआई के अपने अधिकार का इस्तेमाल करें तो इससे भ्रष्टाचार में कमी आ सकती है, क्योंकि जानकारी के अभाव के कारण ही लोग प्रशासनिक लालफीताशाही का शिकार होते हैं। बस जरूरत है अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने की।

हरियाणा के मुख्य सूचना आयुक्त जी. माधवन का कहना है कि सूचना के अधिकार कानून के तहत अब लोगों को सूचना प्राप्त करने के लिए विभागों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। जल्दी ही प्रदेश के सभी जिलों में आरटीआई काउंटर खोले जाएंगे। किसी भी विभाग से संबंधित सूचना लेने के लिए इन काउंटरों पर आवेदन किया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि हरियाणा सूचना आयोग ने राष्ट्रीय सूचना आयोग से इसकी सिफारिश की थी। इस पर राष्ट्रीय सूचना आयोग ने हर जिले में स्थित ई.दिशा केंद्र में अलग से आरटीआई काउंटर खोलने की मंजूरी दी है।

उन्होंने कहा कि यह कानून सरकारी कामों में पारदर्शिता लाने के लिए लागू किया गया था और पिछले चार साल से सरकार इसे लोकप्रिय बनाने के लिए प्रयासरत है। इसके बावजूद अधिकांश लोगों को यह पता नहीं होता कि संबंधित जानकारी किस विभाग से लेनी है और उसका कार्यालय कहां है। इस समस्या को ध्यान में रखकर सूचना आयोग हरियाणा ने प्रथम रिपोर्ट में राष्ट्रीय सूचना आयोग को सुझाव दिया था कि सभी जिलों में स्थित ई-दिशा केंद्रों में आरटीआई के लिए विशेष काउंटर स्थापित कर दिया जाए। ई-दिशा केंद्र में स्थापित होने वाले इस काउंटर पर लोग किसी भी विभाग से जानकारी लेने के लिए आवेदन जमा करा सकेंगे। यहां से आवेदन संबंधित विभाग को भेजा जाएगा और विभाग काउंटर पर ही जानकारी भेज देगा। अगर जानकारी नहीं मिली तो वजह भी बताई जाएगी। फिलहाल सभी विभागों ने आरटीआई एक्ट के तहत सूचना देने के लिए जनसूचना अधिकारी या सहायक जनसूचना अधिकारी की नियुक्ति की है। कई बार लोगों को समय पर अधिकारी नहीं मिलते और उन्हें काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है।

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1 Comment on "आरटीआई : भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम"

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sunil patel
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आर टी आई – वाकई जन सामान्य या जागरूक जन सामान्य के लिए बहुत अच्छा कानून है. इस कानून का बहुत उपयोग हो रहा है. फिर भी बहुत से छेत्र गोपनियेता का बहाना लेकर जानकारी देने से आनाकानी करते है. अभी भी बहुत बल्कि बहुत कम लोगो को है इस कानून के बारे में पता है. बहुत से स्नातकोत्तर छात्रो को भी इस नें के बारे में पता नहीं है. हर सहर, कसबे और गाँव में आर टी आई के शिविर लगाने चाहिए.

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