लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्वर चतुर्वेदी

हिन्दी में कहावत है जो दूसरो के लिए गड़डा खोदता है उसे उसी गड्डे में सोना होता है। दूसरों के लिए यानी मार्क्सवादियों -साम्यवादियों के लिए भूमंडलीकरण का गड्डा अमेरिका द्वारा खोदा गया था। अंत में अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्रों को उसमें सोना पड़ा है। आर्थिकमंदी, युद्ध-अर्थव्यवस्था और वर्चस्व बनाए रखने के कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है।

सोवियत नेतृत्व की सबसे बड़ी असफलता यह थी कि वह अपनी पार्टी की सांगठनिक बर्बरता और भेदभावपूर्ण नीतियों के प्रति सतर्क नहीं हो पाया। उनसे दूसरी गलती यह हुई कि वे शीतयुद्ध और ग्लोबलाइजेशन के अंतस्संबंध को समझने और तदनुरूप नीतियों, अर्थव्यवस्था और पार्टी की कार्यशैली में परिवर्तन करने में असमर्थ रहा।

भूमंडलीकरण के कारण सोवियत संघ के सभी गणराज्यों ने जबर्दस्त क्षति उठायी है। आज पुराना सोवियत संघ नहीं है उसकी जगह 11 नए देश आ गए हैं। इनमें सबसे समर्थ और बड़ा देश है रूस। रूस की अर्थव्यवस्था में हाल के वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं।

अप्रैल 2010 में रूस के प्रधानमंत्री व्लादीमीर पुतिन ने रूस की संसद को बताया कि उनका देश मंदी से बाहर निकल आया है। अब हमारा लक्ष्य है स्वास्थ्य सुधारों को लागू करना। नीतिगत कौशल के कारण रूस की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचा लिया गया है। सन् 1998 में रूस की अर्थव्यवस्था को करारा झटका लगा था। मंदी के कारण अनेक देशों में पेंशन और भत्ते बंद कर दिए गए, लेकिन रूस मेंऐसा नहीं करना पड़ा। इसके विपरीत रूस के बजट खर्च में 27.3 प्रतिशत की वृद्घि हुई है। पगार, पेंशन और सामाजिक भत्तों में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

उल्लेखनीय है यह वह दोर है जिसमें अमेरिका में बेकारी बढ़ी है,सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कटौती हुई है। सैंकड़ों बैंक दिवालिया हुई हैं। अनेक नामी कंपनिया दिवालिया हुई हैं। अमेरिका में भूमंडलीकरण के कारण सबसे ज्यादा आर्थिक अराजकता देखने में आयी है।

अमेरिका में आम आदमी की आय में गिरावट आयी है इसके विपरीत रूस में 2008-09 और 2009-10 में आय में 2.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। कंपनियों के द्वारा सामाजिक सुरक्षा मद में दिए जाने वाले धन की राशि 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 34 प्रतिशत कर दी गयी है। इस पैसे से स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर ध्यान दिया जाएगा। पेंशन में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है। सैनिकों और माताओं के लिए अतिरिक्त धन का आवंटन किया गया है। बैंकों ने आम लोगों के लिए कर्ज देने शुरू कर दिए हैं।

रूस की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा संकेत है वहां पर गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों के आर्थिक स्तर में आया सुधार। सन् 1998-2009 के आंकड़े बताते हैं कि रूस में गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों की संख्या 33 प्रतिशत से घटकर मात्र 3 प्रतिशत रह गयी है। यह सर्वे इंटरनेशनल मानीटरिंग ऑफ इकोनोमिक कंडीशंस इन रशिया ने किया था।

गरीबी की रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या में आए सुधार का सबसे ज्यादा लाभ बच्चों और बूढ़ों को मिला है। अतिगरीबी में जीने वाले बच्चों की संख्या सन् 2008 में 3.1 प्रतिशत थी जो सन् 2009 में घटकर 1.4 प्रतिशत रह गयी है। इसी तरह बूढ़ों की अतिगरीबी में 2.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

उल्लेखनीय है रूस में पैरेस्त्रोइका लागू किए जाने के पहले आर्थिक हालात इतने खराब नहीं थे। कम्युनिस्ट पार्टी का शासन खत्म होते ही पूरे सोवियत संघ में सरकारी संपत्ति की देशी-विदेशी लोगों के द्वारा जमकर लूट की गयी, पूरी अर्थव्यवस्था अराजक और लुटेरे कारपोरेट पूंजीपतियों के हाथों में फंस गयी, सामाजिक-आर्थिक तानाबाना ठूट गया। खासकर युवाओं को निशाना बनाया गया उन्हें पूंजीवादी मूल्यों में ढुबो दिया गया, सारे समाज में अपराध और नशे की लत ने कब्जा जमा लिया। कोई सोच नहीं सकता कि जिस देश में कभी कोई पूंजीवादी संस्कारों का प्रचार नहीं किया गया हो वहां अचानक युवाओं पर सांस्कृतिक विपत्ति का पहाड़ कैसे टूट पड़ा ?

सारा देश सरकार के भरोसे सुरक्षित नींद सोता था, किसी के पास अभाव नहीं था,उस समाज में अचानक समाजवाद से मुक्ति के बहाने इतनी बड़ी मुसीबत आ जाएगी, ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा था। सोवियत संघ में समाजवादी व्यवस्था का गिरना असामान्य घटना थी, इसका सारी दुनिया पर बुरा असर पड़ा, सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था तो पूरी तरह तबाह हो गयी। इससे विश्व का आर्थिक संतुलन भी गड़बड़ा गया।

पूंजीवाद निरंकुश होकर सारी दुनिया में लूट मचाने लगा। खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विगत 25 सालों में जितनी लूट की है। उतनी लूट मानव सभ्यता के इतिहास में कभी नहीं हुई है। मानव इतिहास क समस्त लुटेरे शासकों की लूट से सैंकड़ो गुना ज्यादा थन की लूट बहुराष्ट्रीय कंरनियों ने विगत 25 सालों में की है। इस लूट को वैध बनाने के लिए भूमंडलीकरण,नव्य-उदारवाद, विश्व व्यापार संगठन आदि का निर्माण किया गया।

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