लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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oppositionडा. राधेश्याम द्विवेदी
भारत एक एसा लोकतंत्र देश है जहां प्रायः चुनाव होते रहते हैं। कभी लोकसभा, कभी विधानसभा कभी स्थानीय निकाय तो कभी कोई और ही। राजनीतिक दल जो एक बार चुनाव जीत जाते हैं, अगली बार अपनी पकड़ बनाये रखने में कम ही कामयाब हो पाते हैं। यहां दो दलीय व्यवस्था भी नहीं हैं। पहले तो एक दल सरकार में रहती थी बाकी सब विपक्ष में। परन्तु अब एसा नहीं अब एक समूह एक बार तो दूसरा समूह दूसरे बार अपनी किस्मत अजमाता है और देेश की सेवा करने का अवसर प्राप्त करता है। हर समूह में एक मुख्य पार्टी होती हैं। पहले कांगे्रस जनित सत्ता थी अब भाजपा जनित सत्ता है। जब ये दोनो पार्टियां कमजोर होती हैं तब तत्कालिक रूप में तीसरा मोर्चा सत्तासीन होता है। अनेक पार्टिया इनके इर्द गिर्द सत्ता में रहकर या बाहर रहकर सत्ता का भोग करती रहती हैं। यह अस्थाई और दुखःद परिणाम दायक होता है।
1989 से 2014 तक का पच्चीस साल की अवधि में कोई एक पार्टी सत्ता में नहीं रही, अपितु गठबंधन का दौर चलता रहा। इनमें सत्ता पार्टी की मनमानी भी चली तो छोटे दलों का दबाव भी देखा गया है। अति उत्साह में भाजपा ने 2004 की सत्ता को गवां दिया था। और उसे 10 वर्षो की कठिन साधना करना पड़ा था। इस बीच देश ने जो नुकसान उठाया उसकी भरपाई शायद ही यह देश आसानी से कर पाये। दस साल तक कांग्रेस का शासन बहुत आदर्शपूर्ण नहीं कहा जा सकता है। 2014 के आम चुनाव में 545 की संख्या वाले सदन में 280 भाजपा सदस्य चुने गये हैं। इतनी बड़ी जीत के बावजूद पार्टी वह सब कुछ नही कर पा रही है जिसकी उम्मीद थी अथवा जो वादा करके वह सत्ता की सीढ़ी तक पहुंच पायी है। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा की जो नीतियां घोषित की थी, लगता है वे सब की सब जारी नहीं हो पा रहीं हैं। अधिकांश कार्यकर्ता अपने कार्यक्रम और मुद्दों पर यकीन खोते जा रहे हैं । नेतृत्व उनको संभालने में असफल प्रतीत हो रहा है। इससे कार्यकर्ता व नेता समय-समय पर पूरक अथवा नेपथ्य में जा चुके मुद्दे अपनाने लगे हैं। विरोधियों की चालें सफल होने लगीं हैं। सौहार्द विगड़ते-बनते देखे गये हैं। असहिष्णुता से पार्टी को दो चार होना पड़ा है। लोकसभा में इतने बहुमत होने के बावजूद ये सदन चला पाने में समर्थ नहीं हो पा रहे हैं। कुछों पर अनुशासन की कार्यवाही की गई तो कुछ अब भी पार्टी को नुकसान पहुचाने वाले बयान अपने अपने तरीके से देते देखे जाते हैं। सबका विकास वाला इतना प्रभावोत्पादक नारा कारगर नही हो पा रहा है।
एक तरफ कांगेस तो इसे देखना पसन्द नहीं करती है क्योकि यह पार्टी उनकी सारी कलई खोलती जा रही है। कुछ क्षेत्रीय क्षत्रप भी अपनी साख तथा अस्मिता बचाने के लिए कांग्रेस का आंख मूंदकर समर्थन तथा भाजपा का निरन्तर विरोध करते देखे जा रहे हैं। दिल्ली में सख्त कानून तथा बिहार में कुछ क्षेत्रीयता व जातिवादी व्यवस्था के होते हुए भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके कुछ उच्चस्थ नेता निरन्तर पर्टी व सरकार की छवि सुधारने में लगे हैं। प्रधान मंत्री विदेशों में जा जाकर भारत की गिरी हुई साख को ठीक करने में तथा विकास के नये आयाम खोजने में संलग्न हैं। स्थानीय नेता देश के अन्दर की कृत्रिम विगाड़ी जा रही हालात को सामान्य कर पाने में स्वयं को असफल साबित हो रहे हैं। प्रमुख विपक्षी पार्टी अपनी साख बचाने में भी असफल रहे हैं, उन्हें पूरी सदस्य संख्या का एक दशम बहुमत भी हासिल नहीं हो पाया है। वह संविधान के अनुसार विपक्षी दल के काबिल भी नहीं हैं ।
चुकि भारत लोकतंत्रात्मक देश है और विपक्ष लोकतंत्र का एक स्तम्भ होता है। इसलिए लोकतंत्र के सिद्धान्तों की पूर्ति के लिए उसे विपक्ष का यह मान सम्मान दे दिया गया है। अब कांग्रेस ने अपनी मुख्य सत्ता होने की आस छोड़ क्षेत्रीय दलों के संरक्षण में अपना अस्तित्व बचाने में लग गयी है। बिहार का प्रयोग इसी प्रकार का रहा है। अब वह भाजपा को रोकने के लिए किसी भी पार्टी की अधीनता तथा गठबंधन करने को तैयार हो गई हैं। हार की अपनी खीझ मिटाने के लिए बेबुनियाद सत्ता पक्ष पर आरोप तथा कृ्रत्रिम संकट का नाटक कर अपना वजूद पुनः प्राप्त करने की कोशिश में लगी हुई है। वह एक जूनियर पार्टी की भूमिका निभाने के लिए भी कटिबद्ध हो गई है।
इतना होने पर भाजपा को अति उत्साह में नही पड़ना चाहिए कि अब यूपीए समाप्त हो चुकी है अपितु वह अपनी ऊर्जा के संरक्षण में लगी हुई हैं। वह हर हथकण्डे अपना कर पुनः सत्ता में आने कोशिश करेगी। सहिष्णुता, वेमूला को दलित करार देना तथा कन्हैया की गिरफ्तारी आदि भी कांग्रेस जनित तथा कृत्रिम मुद्दे हैं। जिससे उबरने में सरकार को एड़ी की चोटी लगाना पड़ा है। विपक्षी पार्टियां तथा कुछ तथाकथित मीडिया हर कृत्रिम समस्या को बढ़ाचढ़ाकर सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करेगी। यूपीए प्रमुख श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वीकार किया है कि अब कांग्रेस अपने बल बूते पर पुनः सत्ता में वापसी नहीं कर सकती है। उन्होंने 25 सालों तक कांग्रेस को जीवित रखा और बचाया भी । वह विगत दस साल से सत्ता का सुख भी माननीय मनमोहन को आगे करके भोगा भी है। 1989 में स्व. प्रधनमंत्री श्री राजीव गांधी जी ने बहुमत के अभाव में देविगोड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल व श्री चन्द्रशेखर आदि को मजबूरी में समर्थन दिया था। परिणाम स्वरूप यूपीए का अस्तित्व बना था। 2014 के चुनाव में भारी पराजय पाकर अब वह किसी भी घटक या संगठन का हिस्सा बनने को तैयार रहने लगी हैं।
भाजपा अपने मुख्य नेता के विचारों को भी अनुसरण नहीं कर पा रही है। अति उत्साह में वे भूल जाते हैं कि वे केवल अपने बलबूते सत्ता में नहीं आये हैं अपितु यूपीए के नाकामयाबियों के विकल्प होने के कारण आये है। कुछ सदस्य सत्ता दल की गंभीरता को समझ नही पा रहे हैं और अपनी मुख्य धारा से उल्टे चलने का भी प्रयास करने लगते हैं। उनकी यह आदत पार्टी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगा सकती है। इतना ही नहीं इस तथाकथित अनुशासित पार्टी के कुछ सदस्य विना चिन्तन व विचार के समय समय पर अनर्गल प्रलाप तथा संवेदनपूर्ण मुद्दों पर टिप्पणी करते रहते है।
विपक्ष तथा विपक्ष की सहमति से इस विशाल देश में एकाध छोटी मोटी घटनायें यदि हो जाती हैं तो उसपर पानी व धूल डालने के बजाय भाजपा के कुछ सम्मानित तथा कुछ अधिकार ना पा सकनेवाले नेता असंयमित टिप्पणी भी कर बैठते है। लव जेहाद,आरक्षण , राम मन्दिर, गोमांस या वीफ आदि मुद्दे सही होते हुए भी विपक्ष को ना तो स्वीकार हैं और ना ही वे इस पर बयान आने पर एक जुट होने का अवसर छोड़ना पसन्द करते है। वे एक होकर सही तथ्यों को भी गलत तर्कों व प्रक्रियाओं में सत्ता पक्ष को इतना उलझा दिया करते हैं कि इनसे उबर पाना सत्ता पक्ष को इतना आसान नहीं होता है। इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियां काले धन की वापसी, महगाई , कृत्रिम धार्मिक असहिष्णुंता आदि मुद्दे उठाकर भाजपा के नेताओं को उकसाते हैं। फिर उनके बयानों में किसी न किसी कमियों को हाई लाइट कर अपना उल्लू सीधा करते हैं व मोदी के नारे की खिल्ली उड़ाते हैं। साथ ही जातिवाद, क्षेत्रवाद, अगड़े-पिछडे़ की राजनीति , राष्ट्रीय लक्ष्य व आदर्श को पीछे ढकेलने का भी प्रयास करते हैं।
असहिष्णुता आदि बहुत ही संवेदनशील मुद्दों को हर कोई अपने अपने हिसाब से बोलता जाता है जो डैमेज कन्ट्रोल कम डैमेज ज्यादा करता है। केवल उन प्रवक्ताओं को वयान व टिप्पणी करने की छूट होनी चाहिए जो देश की समरसता को विगड़ने से बचा सकें। विरोधी ऊल जलूल बयान देकर भाजपा को काम करने से रोकना ही चाहेंगे। वे तो सब कुछ खो ही चुके हैं उन्हें कुछ खास खोना नहीं हैं। जनता ने तो एनडीए या भाजपाको इतना वड़ा बहुमत दिया है। वह तो इनसे हिसाब मांगेगी। अभी तो विपक्षी हिसाब मांग रहे हैं लंेकिन पांच साल बाद आपको फिर इन्हीं जनता के समक्ष ही जाना है। इस हालत में काजल की कोठरी की भांति आपको बहुत संभल कर रहना भी है और अपने लक्ष्यों को पूरा भी करना है।
माननीय प्रधानमंत्री जी का प्रथम लोकप्रिय कार्यक्रम ’भ्रष्टाचार मिटाना’ था। इसमें काफी कुछ वह कामयाब भी मिली है। यह देश की रग रग में इतना घुल मिल गया है कि इससे निजात पाने में वक्त तो लगेगा ही साथ ही त्याग भी करना पड़ेगा। कांग्रेस सरकार का जाना ,एन डी ए का आना इसी की एक कड़ी के रूप मे देखा जा सकता है। दिल्ली प्रदेश मे यह प्रयोग सफल नहीं हो सका। सख्ती दिखाने के एवज में भाजपा को अपना आधार खोना पड़ा। देश धीरे धीरे इसके लिए तैयार होगा। जल्दबाजी नुकसान दायक होगी। जब जनता का काम विना भ्रष्टाचार के होने लगेगा तब जाकर इसमें कामयाबी दिखाई पड़ेगी और गति आयेगी।
प्रधानमंत्री जी का दूसरा प्रमुख कार्यक्रम ’स्वच्छता अभियान’ रहा। इसमें काफी हद तक सफलता मिली है। वैसे यह तो अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। इसे हर हाल में और ज्यादा गति से चलने देते रहना चाहिए। इसमें स्थानीय जनता और राज्य सरकारों की भागेदारी ज्यादा होती है। और इसी सामंजस्य पर यह सफल हो सकेगा। ’बेटी पढ़ाओ देश बचाओ’ कार्यक्रम को सफल कहा जा सकता है। बेटियों की स्थिति मे काफी सुधार आया है। ’जन धन योजना’ तो इस सरकार के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। एक सुधार की गुंजाइश प्रतीत हो रहा है कि इस योजना से बैंको पर काम का दबाब बढ़ा है। इससे नियमित बैंक के काम प्रभावित हो रहे हैं और समय ज्यादा लग रहा है। बैंको में स्टाफ बढ़ाकर यह कमी पूरी की जा सकती है।
‘मेक इण्डिया’ का प्रयोग भी आकर्षक एवं उपयोगी है परन्तु इसमें सुधार की अभी बहुत गुंजाइश है। ’इन्टरनेट कनेक्टेवटीज’ से देश में बहुत सुधार तथा सफलता मिली है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस सरकार के इस प्रकार के अन्य अनेक पूरक कार्यक्रम भी संचालित हो रहे हैं जो यदि शत प्रतिशत खरे नहीं हैं तो इतने खराब तथा निराशपूर्ण भी नहीं है कि जनता इन्तजार ना कर सके। इन सभी कार्यक्रमों के सामूहिक परिणाम से ही माननीय प्रधान मंत्री जी का मुख्य नारा ’सबका विकास सबका साथ’ पूरा हो सकेगा। मैं इसे पूरा होने की मंगल कामना करता हूॅ तथा इस आलेख में दर्शायी गयी कुछ कमियों को दूर करने की आपेक्षा करता हॅूं।
कांग्रेस, यूपीए, वाम दल सपा व बसपा भाजपा को किसी न किसी कृत्रिम या उकसावे पूर्ण मुद्दों को लाकर उलझा सकती हैं और उन्हें 5 वर्षों तक सत्ता का भोगकर आगे अपना आधार मजबूत करने में रोकने का प्रयास कर सकती है। यदि भाजपा संयम, दूरदर्शिता तथा आमजन से जुड़े संवेदनशील मुद्दांे से संतुलित रूप में जुड़ेगी तभी 2017 का उत्तर प्रदेश तथा 2019 का केन्द्र की सरकार के लिए अपना आधार बना व बचा सकती है। आगे भाजपा जनित राजनीति को मजबूत कर सकती है। उसे मध्यम तथा सुलझे हुए मार्ग को अपनाना होगा तथा अनुशासन की अपनी परम्परा का सख्ती से पालन करना होगा।

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