लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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sabka saath sabka vikasडा. राधेश्याम द्विवेदी

’’सबका विकास सबका साथ’’ एक छोटा नारा ही नहीं है, अपितु यह एक नये युग के सूत्रपात की पहली कड़ी एवं मूलमंत्र भी है।ं इस महामंत्र में भाजपा व एनडीए के बहुत सारे अन्य मंत्र व राज  तथा उसका राज चलाने की क्षमता व कौशलता भी समाहित हैं। भारत सरकार के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्रभाई दामोदरभाई मोदी का यह बहुत ही लोकप्रिय नारा रहा है। इस पर यकीन करवाकर  2014 का आम लोकसभा चुनाव की बैतरणी भाजपा ने पार कर लिया। इस लोक लुभावन नारे का असर खत्म नहीं हुआ है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों मे जनता ने इस पर विश्वास किया और पुनः मौका भी दिया। जम्बू काश्मीर में भी यह नारा कामयाब रहा , यद्यपि यहां भाजपा समर्थित मिली जुली सरकार अस्तित्व में आयी। महाराष्ट्र में शिव सेना से नम्बर दो पर रहने वाली भारतीय जनता पार्टी नम्बर एक पर आकर सत्ता का वागडोर अपने हाथों में लेने में कामयाब रही।

हाॅं, कुछ गलत प्रस्तुतीकरण और सही का गलत आंकलन करके दिल्ली प्रदेश इकाई तथा बिहार प्रदेश में यह नारा सफल नहीं हुआ। दिल्ली में मोदी सरकार द्वारा एकाएक भ्रष्टाचार को समाप्त करने , समय से कार्यालयों में आने तथा केन्द्रीय कार्यालयों में काम करने की संस्कृति अपनाने की नीति ने उक्त लोकप्रिय नारे की चमक को धुधला कर दिया। साथही आयातित एवं बाह्य नेता के नेतृत्व में चुनाव का लड़ना सफल ना हो सका। जिन नारों व वायदों के बलबूते पर 2014 का आम लोकसभा चुनाव की बैतरणी भाजपा ने पार कर लिया था, ठीक उसी प्रकार या यूं कहें उससे भी कुछ आगे बढ़ कर तथा उल्टे सीधे हथकण्डे अपनाकर आम आदमी पार्टी ने भाजपा का सपना दिल्ली प्रदेश में चकनाचूर कर दिया। इससे दिल्ली के निवासियों को दिन प्रतिदिन नयी नयी समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। यहां कार्यरत आप सरकार ढिढोरा तो ज्यादा पीटती है परन्तु वास्तविक धरातल पर क्या काम कर पा रही है ? यह हर भारतवासी देख भी रहा है और अनुभव भी कर रहा है। प्रतीत होता है कि मााननीय मोदी जी का सबका विकास सबका साथ के नारे की चमक फीकी हो गई है और जनता वास्तविक धरातल पर परखने की कसौटी में कामयाब रही। परिणामतः यहां एक लचार, कमजोर तथा केवल ढिढोरा पीटने वाली प्रदेश सरकार को सत्ता की कमान सौंपना पड़ा है।

इतना ही नहीं बिहार की जनता इससे भी आगे निकली जो माननीय प्रधान मंत्री जी तथा भाजपा के अध्यक्ष माननीय श्री अमित शाह के एक भी नारे व वायदे पर यकीन नहीं की। बिहार के पूर्व मुख्य मंत्रियों माननीय श्री नीतीश कुमार जी तथा श्री लालू प्रसाद जी के तत्कालीन बिहार के स्थानीय मुद्दे तथा उनका विगत वर्षो का प्रदर्शन पर ज्यादा यकीन कर सत्ता की कमान उन्हें सौंप दी गई है। वहां इन महारथियों ने राजनीति का एसा विद्रूप स्वरूप प्रस्तुत कर रखा था कि भाजपा  और संध के सारे प्रमुख नेता पूरे चुनाव सत्र तक साफ सफाई देते रहे फिर भी बिहार की जनता को यकीन दिलाने में कामयाब नहीं हो सके। यहां प्रधानमंत्री माननीय मोदी जी का सबका विकास सबका साथ वाला नारा पूर्णतः धरा का धरा रह गया।

 

भाजपा के कुछ मार्गदर्शक चिन्तक तथा लोकप्रिय नेता आरक्षण की समीक्षा, बीफ मुद्दा, राम मंदिर,लव जेहाद, मुस्लिम तुष्टीकरण आदि छोटे-छोटे मुद्दे उठाकर माननीय प्रधानमंत्री का सबका विकास सबका साथ वाले नारे को नेपथ्य में ढकेलने का काम कर, भाजपा को फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुंचाते देखे जा रहे हैं। इतना ही नहीं विपक्षी पार्टियां काले धन की वापसी, महगाई , कृत्रिम धार्मिक असहिष्णुंता आदि मुद्दे उठाकर भाजपा के नेताओं को उकसाते हैं। फिर उनके बयानों में किसी न किसी कमियों को हाई लाइट कर अपना उल्लू सीधा करते हैं व मोदी के नारे की खिल्ली उड़ाते हैं। साथ ही जातिवाद, क्षेत्रवाद, अगड़े-पिछडे़ की राजनीति , राष्ट्रीय लक्ष्य व आदर्श को पीछे ढकेलने का भी प्रयास करते हैं।

2014 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा की जो नीतियां थी, लगता है वे सब की सब जारी नहीं रहीं। अधिकांश कार्यकर्ता अपने कार्यक्रम और मुद्दों पर यकीन खोते गये। नेतृत्व उनको संभालने में असफल रहा। इससे कार्यकर्ता व नेता समय-समय पर पूरक अथवा नेपथ्य में जा चुके मुद्दे अपनाने लगे। विरोधियों की चालें सफल होने लगीं। सौहार्द विगड़ते-बनते देखे गये। असहिष्णुता से पार्टी को दो चार होना पड़ा। लोक सभा में इतने बहुमत होने के बावजूद ये सदन चला पाने मंे समर्थ ना रहे। कुछ पर अनुशासन की कार्यवाही की गई तो कुछ अब भी पार्टी को नुकसान पहुचाने वाले बयान अपने अपने तरीके से देते देखे जाते हैं। सबका विकास वाला नारा न जाने कहां खो गया है।

माननीय प्रधान मंत्री जी विदेश जाकर जाकर जितना भारत की छवि सुधारते हैं और विश्व के नेताओं और उद्योगपतियों को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं।ं देश में न तो उसका उतना प्रचार प्रसार होता है ना ही देश उसे उतनी गंभीरता से ले पा रहा है। पार्टी के नेता उसकी प्रस्तुतीकरण भी उतने सटीक ढ़ंग से नहीं कर पा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर पार्टी, विरोधियों द्वारा उत्पन्न की जा रही कृत्रिम समस्याओं से भी भली भंाति नहीं निपट पा रही है। भारतीय मीडिया भी उतना सकारात्मक रोल नहीं निभा पा रहा है जितना वह कर सकता है। मीडिया को प्रजातंत्र का चैथा स्तम्भ कहा जाता है जो अन्य तीनों- कार्यपालिका व्यवस्थापिका तथा न्यायपालिका को आइना दिखा सकता है। परन्तु खेद है कि मुझे वह ताकत नहीं दिख रही है।

अब मैं भाजपा के कुछ प्रमुख नीतियों का उल्लेख करना चाहूंगा। माननीय प्रधानमंत्री जी का प्रथम लोकप्रिय कार्यक्रम ’भ्रष्टाचार मिटाना’ था। इसमें काफी कुछ वह कामयाब भी रही। यह देश की रग रग में इतना घुल मिल गया है कि इससे निजात पाने में वक्त तो लगेगा ही साथ ही त्याग भी करना पड़ेगा। कांग्रेस सरकार का जाना ,एन डी ए का आना इसी की एक कड़ी के रूप मे देखा जा सकता है। दिल्ली प्रदेश मे यह प्रयोग सफल नहीं हो सका। सख्ती दिखाने के एवज में भाजपा को अपना आधार खोना पड़ा। देश धीरे धीरे इसके लिए तैयार होगा। जल्दबाजी नुकसान दायक होगी। जब जनता का काम विना भ्रष्टाचार के होने लगेगा तब जाकर इसमें कामयाबी दिखाई पड़ेगी और गति आयेगी।

प्रधानमंत्री जी का दूसरा प्रमुख कार्यक्रम ’स्वच्छता अभियान’ रहा। इसमें काफी हद तक सफलता मिली है। वैेसे यह तो अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है। इसे हर हाल में और ज्यादा गति से चलने देते रहना चाहिए। इसमें स्थानीय जनता और राज्य सरकारों की भागेदारी ज्यादा होती है। और इसी सामंजस्य पर यह सफल हो सकेगा। ’बेटी पढ़ाओ देश बचाओ’ कार्यक्रम को सफल कहा जा सकता है। बेटियों की स्थिति मे काफी सुधार आया है। ’जन धन योजना’ तो इस सरकार के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। एक सुधार की गुंजाइश प्रतीत हो रहा है कि इस योजना से बैंको पर काम का दबाब बढ़ा है। इससे नियमित बैंक के काम प्रभावित हो रहे हैं और समय ज्यादा लग रहा है। बैंको में स्टाफ बढ़ाकर यह कमी पूरी की जा सकती है। ’

मेक इण्डिया’ का प्रयोग भी आकर्षक एवं उपयोगी है परन्तु इसमें सुधार की अभी बहुत गुंजाइश है। ’इन्टरनेट कनेक्टेवटीज’ से देश में बहुत सुधार तथा सफलता मिली है। इस प्रकार हम देखते हैं कि इस सरकार के इस प्रकार के अन्य अनेक पूरक कार्यक्रम भी संचालित हो रहे हैं जो यदि शत प्रतिशत खरे नहीं हैं तो इतने खराब तथा निराशपूर्ण भी नहीं है कि जनता इन्तजार ना कर सके। इन सभी कार्यक्रमों के सामूहिक परिणाम से ही माननीय प्रधान मंत्री जी का प्रथम नारा ’सबका विकास सबका साथ’ पूरा हो सकेगा। मैं इसे पूरा होने की मंगल कामना करता हूॅ तथा इस आलेख में दर्शायी गयी कुछ कमियों को दूर करने की आपेक्षा करता हॅूं।

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2 Comments on "’’सबका विकास सबका साथ’’ का नारा कितना हसीन कितना यकीन"

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इंसान
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डा: राधेश्याम द्विवेदी जी द्वारा प्रस्तुत विश्लेषणात्मक और सारगर्भित लेख “सबका विकास सबका साथ’’ का नारा कितना हसीन कितना यकीन पर रमश सिंह जी की टिप्पणी पढ़ मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि कोई उदंड व्यक्ति मंदिर में घुस भले लोगों का उपहास कर रहा है|

आर.सिंह
Guest

आपने अच्छे जन संपर्क विभाग का काम कियाहै.ऐसे आप बिना दिल्ली में रहते हुए दिल्ली वालों की खराब हालत देख पा रहे हैं.इस दिव्य दृष्टि के लिए भी आप धन्यवाद के पात्र हैं.

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