लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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-प्रवीण दुबे-    dhyanchandr
क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से अलंकृत करके सरकार ने सराहनीय कार्य किया है, इससे किसी को कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जिस प्रकार से इस देश में क्रिकेट को बढ़ावा मिल रहा है और उसकी  चकाचौंध में अन्य खेलों की अनदेखी सी हो रही है, इसकी चर्चा जरूर होना चाहिए। बड़े अफसोस की बात है कि राष्ट्रीय खेल का दर्जा प्राप्त हॉकी हो, या फिर हमारे परम्परागत खेलों में शामिल कबड्डी, खो-खो आदि को हम देश में वह सम्मान नहीं दिला पाए हैं जो क्रिकेट को प्राप्त है। यही स्थिति इन खेलों से जुड़े खिलाड़िय़ों की भी कही जा सकती है। तमाम ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने पूरे जीवन शानदार खेल का प्रदर्शन किया, तमाम राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए पर हमेशा गुमनामी में खोए रहे। अब हॉकी के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध मेजर ध्यानचंद को ही लीजिए। पूरी दुनिया भारत के इस खिलाड़ी के हॉकी कौशल का लोहा मानती रही। ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तीन ओलम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। दूसरा विश्व युद्ध न हुआ होता तो वे छह ओलंपिक में शिरकत करने वाले दुनिया के संभवत: पहले खिलाड़ी होते और इस बात में शक की कतई गुंजाइश नहीं, इन सभी ओलंपिक का स्वर्ण पदक भी भारत के नाम होता। ध्यानचंद हॉकी के इतने महान खिलाड़ी थे कि जब वे हॉकी लेकर मैदान में उतरते थे तो गेंद इस तरह उनकी स्टिक से चिपक जाती थी जैसे कि वे किसी जादू की हॉकी से खेल रहे हों। हॉलैंड में एक मैच के दौरान हॉकी में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई। स्टिक में गोंद होने का आरोप उन पर जापान में लगाया गया जो झूठा निकला। ध्यानचंद ने हॉकी में जो कीर्तिमान बनाए, उन पर आज भी कोई खिलाड़ी नहीं पहुंच सका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस महान खिलाड़ी को भारत सरकार ने आज तक भारत रत्न के लिए क्यों नहीं चुना? क्या वे इसके लायक नहीं? एक आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा प्राप्त जानकारी में सामने आया है कि 17 जुलाई 2013 को खेल मंत्रालय द्वारा मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की विधिवत सिफारिश प्रधानमंत्री को भेजी थी। उस सिफारिश को दरकिनार कर दिया गया। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि सचिन के नाम को आगे बढ़ाने के लिए ध्यानचंद के नाम पर कोई विचार नहीं किया गया। क्या यह भारत के राष्ट्रीय खेल सहित उस महान खिलाड़ी का अपमान नहीं है जिसने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया। जैसा कि हमने शुरुआत में ही लिखा है सचिन तेंदुलकर का नाम भारत रत्न के लिए चयनित किया जाना एक अच्छा निर्णय है और तेंदुलकर की प्रतिभा इस काबिल है कि उन्हें भारत रत्न जैसा श्रेष्ठ सम्मान मिले। लेकिन खेल के क्षेत्र में मेजर ध्यानचंद की प्रतिभा को भारत रत्न के लिए अब तक नजर-अंदाज किया जाना भारत सरकार की बड़ी भूल है। अकेले खेल ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी कई ऐसे प्रतिभाशाली भारतीय हैं जिन्हें आज तक भारत रत्न से अछूता रखा गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि देश के इस सबसे प्रतिष्ठित सम्मान को लेकर राजनीति की जाती रही है। महान राजनेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी ऐसे ही प्रतिभाशाली भारतीय हैं  जो आज तक कांग्रेस की राजनीतिक दुर्भावना का दंश झेल रहे हैं। जीवन भर बेदाग व्यक्तित्व के धनी रहे अटल बिहारी वाजपेयी भारत ही नहीं विश्व के उन गिने-चुने राजनेताओं में सुमार हैं जिनका लोहा विश्व विरादरी भी मानती है। बावजूद इसके इनको भारत रत्न से अछूता रखा गया है। यह बेहद निंदनीय है। निश्चित ही मंगलवार का दिन का दिन बेहद शुभ है जब एक महान क्रिकेट खिलाड़ी को भारत रत्न प्रदान किया जा रहा है। यही समय है जब भारत सरकार ऐसे तमाम प्रतिभाशाली भारतीयों को भी याद कर अपनी गलती सुधारे जो इस सम्मान से आज तक अछूते हैं। इन्हें भारत रत्न घोषित किए जाने की कार्रवाई प्रारंभ की जाए।

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1 Comment on "सचिन के साथ ध्यानचंद क्यों नहीं ?"

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mahendra gupta
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कांग्रेस का वोट बैंक बढ़ानेके लिए आज ध्यानचंद जिन्दा क्यों नहीं है यह उनका कसूर है.भारतरत्न मिला यह अच्छी बात है पर सचिन को कांग्रेस के प्रति अपने झुकाव से बच दिखाना चाहिए कि वे राजनीती से परे हैं

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