लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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पियूष द्विवेदी

पश्चिम बंगाल के वीरभूमि जिले के मिरिती गाँव के वासी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं स्वतंत्रता सेनानी कामदा किंकर मुखर्जी के यहाँ ११ दिसंबर, १९३५ को जन्मे प्रणब मुखर्जी, सन १९६९ में जब कांग्रेस द्वारा राज्यसभा सद्स्य चुने गए, तब शायद ही किसीको अंदाज़ा होगा कि साधारण सा दिखाने वाला ये लड़का एकदिन इस देश का संविधानिक-सर्वोच्च यानी राष्ट्रपति होगा ! वैसे, राष्ट्रपति का अंदाज़ा तो राष्ट्रपति चुनाव के दो-चार महीने पहले तक भी किसीको नहीं था ! कुछ नामों की चर्चाएँ जरूर थीं, जिनमे से एक नाम प्रणब दा का भी था, पर उसकी संभावना बहुत ही कम जताई जा रही थी, क्योंकि किसीका मन ये मानने को कत्तई तैयार नही था कि कांग्रेस अपने इस संकटमोचक को छोड़ेगी ! पर हुआ यही, आखिर प्रणब दा ही राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार बने, और फिर उन्होंने प्रत्याशित जीत भी पायी !

प्रणब का अप्रत्याशित रूप से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनना तथा प्रत्याशित जीत दर्ज करके राष्ट्रपति भवन पहुँचना, बेशक ये संपूर्ण घटनाक्रम प्रत्यक्षतः आकस्मिक निर्णयों की उपज प्रतीत होता है, पर इसपर जरा गहराई से विचार करने पर हमें पता चलता है कि ये कोई आकस्मिक निर्णय नही, वरन मैडम की उस प्रायोजित सियासत का एक अंश मात्र है, जिसके द्वारा लोकसभा २०१४ में कांग्रेस और राहुल दोनों के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है !

इंदिरा गाँधी के समय से लेकर अबतक वित्त, विदेश, रक्षा आदि तमाम मंत्रालयों के विराट अनुभव एवं अपनी कार्यकुशलता तथा स्वच्छ छवि के ही कारण प्रणब अपनी पार्टी के साथ-साथ विपक्षी पार्टियों में भी एक विशेष कद रखते हैं ! प्रणब के इस विशेष कद को देखते हुए, लोकसभा २०१४ के मद्देनज़र सोनिया मैडम की ये सोच रही होगी कि प्रणब की मौजूदगी में राहुल को २०१४ में बतौर पीएम प्रस्तुत करना कत्तई व्यवहारिक नही होगा, इसका विरोध यूपीए में ही होने की पूरी संभावना है, और संभव है कि इससे राजनीतिक हानि भी उठानी पड़ जाए ! अगर सोनिया जी की सोच कुछ ऐसी है, तो गलत नही है, क्योंकि पार्टी में प्रणब दा जैसे अनुभवी, कद्दावर व्यक्ति के होते हुए अगर बतौर पीएम राहुल गाँधी, जिनके पास रैलियों और भाषणों के अतिरिक्त न कोई कार्यिक अनुभव है और न ही कोई राजनीतिक सफलता, को प्रस्तुत करना तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ही है ! इस समश्या को देखते हुए प्रणब को राष्ट्रपति बनाकर मैडम ने एक ऐसी सियासत रची, जिसने इस समश्या को खत्म करने के साथ-साथ राहुल को कुछ कार्यिक अनुभव हासिल करने के लिए रास्ते भी खोल दिए ! प्रणब के जाते ही कांग्रेसियों द्वारा राहुल को कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपने की मांग का उठना, इसका एक सशक्त प्रमाण है ! इस घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में अगर हम ये कहें, तो शायद अतिशयोक्ति नही होगी कि लोकसभा २०१४ में राहुल का रास्ता साफ़ करने के लिए ही प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के रास्ते पार्टी से बाहर किया गया ! इसके अतिरिक्त प्रणब को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाकर, उनकी जीत के प्रति मैडम को जो निश्चिन्तता रही होगी, वो किसी अन्य की उम्मीदवारी पर शायद कभी नही होती ! प्रणब की उम्मीदवारी ही इसका प्रमाण था कि कांग्रेस ने अपना राष्ट्रपति बनवा लिया ! अगर प्रणब निर्विरोध चुने जाते, तो भी कोई आश्चर्य नही था, पर बीजेपी की दलीय महत्वाकांक्षा के कारण ऐसा नहीं हुआ !

हो सकता है कि उक्त विश्लेषण से कुछ लोगों के मन में ये आये कि सोनिया मैडम बतौर पीएम प्रणब को ही प्रस्तुत कर देती लोकसभा २०१४ में, इससे उनकी सफलता के आसार भी बढ़ जाते ! बेशक, ये बात सही है कि बतौर पीएम प्रणब कांग्रेस को अच्छा समर्थन दिला सकते थे, पर एक पीएम के लिए सोनिया मैडम को जो गुण चाहिए, वो प्रणब दा में नही है ! सोनिया जी को पीएम एकदम ‘रोबोट’ के जैसा चाहिए, जो उनके रिमोट कंट्रोल से चले ! हमारे वर्तमान पीएम इसका अच्छा और जीवंत उदहारण हैं ! भविष्य में अगर राहुल पीएम बनते हैं, तो उनसे भी वर्तमान पीएम से कुछ ज्यादा की उम्मीद करना बेकार ही है, क्योंकि अब भी जो हो रहा है, उन्हिकी(सोनिया-राहुल) मर्ज़ी से हो रहा है, और तब जो होगा, उन्हिकी मर्ज़ी से होगा !

कुल मिलाकर अगर हम प्रणब दा के वित्त मंत्रालय से इस्तीफे से लेकर उनके राष्ट्रपति बनने तक का सार लिखें, तो सिर्फ एक ही बात सामने आती है कि प्रणब के राष्ट्रपति बनाने से कांग्रेस को तीन लाभ हुए हैं ! पहला कि लोकसभा २०१४ में राहुल का रास्ता साफ़ हो गया; दूसरा कि पार्टी ने अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनवा लिया, और तीसरा लाभ ये कि अब बड़ी सहजता तथा प्रत्यक्षता से राहुल को पार्टी में नंबर दो का नेता बनाया जा सकता है, जिसकी मांग भी होने लगी है ! इस कुल घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में अगर हम ये कहें, तो शायद गलत नही होगा कि सोनिया मैडम द्वारा अपने कुछ संकटों के हरण के लिए अपने एक संकटमोचक का बलिदान दिया गया !

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