लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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 विजय कुमार

शर्मा जी में यों तो कई विशेषताएं हैं; पर सबसे बड़ी विशेषता है कि वे स्वयं भी खुश रहते हैं और बाकी लोगों को भी खुश रखते हैं। अतः लोग उन्हें सदाखुश बाबू भी कहते हैं।

जिस दिन विश्व की जनसंख्या सात अरब हुई, उससे अगले दिन मिले, तो खुशी मानो गिलास से बाहर छलक रही थी। देखते ही गले से लिपट गये और मेरे बीमार दिल को इतनी जोर से दबाया कि वह राम-राम से ‘राम-नाम सत्य है’ की तैयारी करने लगा। इसलिए जैसे-तैसे अलग होकर मैंने इस प्रसन्नता का कारण पूछा।

उन्होंने मेरे सामने एक अखबार में प्रकाशित जनसंख्या विश्लेषण रख दिया। उसमें कहा गया था कि जनसंख्या वृद्धि की गति पूरे विश्व में क्रमशः घट रही है। पांच से छह अरब वह 11 साल में हुई, तो छह से सात अरब तक पहुंचने में 13 साल लग गये। अखबार के अनुसार अब सात से आठ होने में 15 साल, आठ से नौ होने में 18 साल लगेंगे और फिर इसके बाद जनसंख्या स्थिर हो जाएगी।

मैं समझ नहीं पाया कि वे कहना क्या चाहते हैं ? अब उन्होंने उस विश्लेषण का दूसरा भाग मेरे सामने रखा। उसके अनुसार 2050 ई0 के बाद जनसंख्या घटने लगेगी और बाइसवीं सदी प्रारम्भ होने तक वह फिर उसी तीन अरब के आंकड़े पर पहुंच जाएगी, जहां बीसवीं सदी के प्रारम्भ में थी।

मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। मेरे चेहरे पर बने प्रश्नचिõ को देखकर वे हंसे।

– ऐसे क्या मूर्खों की तरह देख रहे हो ? जनसंख्या विशेषज्ञ कहते हैं कि सम्पन्न और शिक्षित लोग कम बच्चे पैदा करते हैं, जबकि गरीब और अनपढ़ अधिक। इस हिसाब से देखें तो इस समय दुनिया में सबसे धनी देश अमरीका है। उसकी अपनी असली जनसंख्या तो स्थिर हो गयी है; पर उस कमी को दूसरे देशों से जाने वाले पूरा कर रहे हैं। वहां जाने वालों में भारतवासियों की संख्या भी खूब है।

– अच्छा फिर ?

– दुनिया की जनसंख्या वृद्धि में भारत जैसे विकासशील देश खूब योगदान कर रहे हैं। हमसे आगे अशिक्षित और अविकसित अरब और अफ्रीकी देश हैं। चीन ने भी जनसंख्या की बढ़त को काफी हद तक रोक लिया है।

– तो.. ?

– तुम भी बुद्धि से पैदल हो वर्मा। यदि ऐसा ही चलता रहा, तो एक दिन अमरीका पर हमारा कब्जा होगा। मैं तो उस दिन की कल्पना ही से ही खुश हो रहा हूं। मेरी निगाह तो व्हाइट हाउस पर है। मैं उसे ही अपना निवास बनाऊंगा।

– शर्मा जी, सपने देखने में कुछ खर्च नहीं होता; पर इस बात को लिख लो कि ऐसा नहीं होने वाला है। आपके भाग्य में व्हाइट हाउस में रहना तो दूर, उसके पास जाना भी नहीं है।

– न हो; पर भारत में हो रहे जनसंख्या परिवर्तन को भी तो देखो।

– दिखाओ….।

– यहां का हाल भी सारी दुनिया जैसा ही है। अर्थात जनसंख्या वृद्धि की दर में क्रमशः घट रही है। कुछ समय बाद यहां की जनसंख्या भी कम होने लगेगी। मकान तो होंगे; पर उनमें कोई रहेगा नहीं। तब मैं राष्ट्रपति भवन में जाकर रहने लगूंगा।

– लेकिन शर्मा जी, भारत में किसकी संख्या घट रही है और किसकी नहीं, इस पर भी तो ध्यान दो। यदि यही हाल रहा, तो राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास में हम और आप नहीं, वे लोग रहेंगे, जो पाकिस्तान के मैच जीतने पर खुशी मनाते हैं।

– मैं तो ऐसा नहीं समझता।

– आप भले ही न समझें; पर अगले 60-70 साल में यही होना है।

– चलो छोड़ो, हमें इससे क्या लेना। तब तक किसने जीना है। इस बारे में सोच-सोचकर हम अपनी खुशी कम क्यों करें ?

काश, कोई सदाखुश बाबू की आंख में उंगली डालकर दिखाए कि जनसंख्या की संभावित कमी के जिन आंकड़ों से वे खुश हो रहे हैं, उसके पीछे कितने भयावह परिणाम छिपे हैं। कबूतर यदि बिल्ली को देखकर आंख बंद कर ले, तो खतरा नहीं टल जाता।

ऐसे सदाखुश बाबू हर जगह मिलते हैं। हो सकता है वे आपके मोहल्ले में भी हों। यह खुशी उनकी भावी पीढ़ियों के लिए दुख का कारण न बन जाए, इसके लिए उन्हें जगाना होगा। वे सोते न रह जाएं, यह देखना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।

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