लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

Posted On by &filed under समाज.


 

saadhusनिर्मल रानी
किसी भी रंग को वैसे तो किसी धर्म या समाज विशेष की संपत्ति नहीं कहा जा सकता। परंतु उसके बावजूद तमाम रंग ऐसे हैं जिन्हें विभिन्न समाज के लोगों ने अपनी पहचान व अस्मिता के साथ जोड़ लिया है। इन्हीं रंगों में एक रंग है गेरुआ,केसरी अथवा भगवा रंग। इस रंग को भारतीय प्राचीन संस्कृति से जोडक़र देखा जाता है। और अब हमारे देश में एक विशेष विचारधारा रखने वालों पर यही भगवा रंग इस कद्र चढ़ गया है कि यदि कोई व्यक्ति भगवा रंग की आलोचना करता है तो इन भगवा को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बताने वालों की त्यौरी पर बल आ जाता है। परंतु आक्रामकता का प्रदर्शन कर या झूठी व बेबुनियाद दलीलें देकर वास्तविकता को कभी छुपाया या दबाया नहीं जा सकता। यदि आतंकवाद की घटनाओं में सलिप्त ऐसे लोगों की बातें छोड़ भी दें तो भी इस समय हमारे देश में तमाम भगवा वस्त्रधारी ऐसे हैं जिन्होंने हमारे देश, भगवा संस्कृति,धर्म, विश्वास,सदाचार तथा गुरु व पुजारी परंपरा आदि सभी को बर्बाद व बदनाम कर रखा है। रेलवे स्टेशन पर पड़े रहने वाले भगवा वेशधारी भिखारियों से लेकर तथाकथित स्वामी नित्यानंद जैसे मठाधीशों तक ने अपने दुष्कर्मों के चलते आम लोगों से इस सम्मानित समझे जाने वाले भगवा चोले का विश्वास ही समाप्त कर दिया है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अपनी भक्त महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने वाला स्वामी नित्यानंद पिछले दिनों प्रयाग में आयोजित हुए कुंभ मेले के अवसर पर महामंडलेश्वर जैसी सम्मानित साधू पदवी से भी सुशोभित कर दिया जाता है। इतना ही नहीं इसी व्याभिचारी नित्यानंद के समक्ष नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं को नतमस्तक होते हुए भी देखा जा सकता है। अब यह राजनीति, भगवा चोला तथा दुराचार का संयुक्त नेटवर्क है या फिर कुछ और? जो भी है देश की सीधी-सादी, भोली-भाली तथा साधू-संतों पर व भगवा चोले पर विश्वास करने वाली तथा इसका आदर व सम्मान करने वाली आम जनता के साथ यह बहुत बड़ा विश्वासघात ज़रूर है।
पिछले दिनों हरियाणा के अंबाला जि़ले की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने संजय रकवार उर्फ शैलेंद्र पुरी नामक एक बहुरूपिये भगवाधारी को 31 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा व जुर्माना सुनाया। यह ढोंगी भगवाधारी कई संगीन अपराधों का दोषी था। फिलहाल इसे अंबाला जि़ले के एक कस्बे से गत् 12 दिसंबर 2012 को एक किशोरी को बहला-फुसला कर उसका अपहरण करने तथा तीन महीने तक उसके साथ विभिन्न स्थानों पर बलात्कार करने का आरोप था। यह भगवाधारी शैलेंद्र पुरी लोगों को एक मंदिर में दीक्षा भी देता था और प्रवचन भी सुनाता था। जिस किशोरी के साथ इसने तीन महीने तक बलात्कार किया उसी के साथ सर्वप्रथम उसने मंदिर में भी बलात्कार करने की कोशिश की थी। वह बच्ची अपने परिजनों के साथ इसके प्रवचनमें हिस्सा लेने आती रहती थी। हैरान करने वाली बात यह है कि संजय रकवार नामक यह व्यक्ति कानपुर में एक कत्ल के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा भी पा चुका है। परंतु सज़ा सुनाए जाने के बाद अपने उपचार के बहाने लखनऊ जाते समय पुलिस को चकमा देकर यह हत्यारा भाग निकला। और भगवा वस्त्र धारण कर इधर-उधर घूमता रहा। अपनी फरारी के ही दौरान उसने हरियाणा के कैथल से भी एक लडक़ी का अपहरण व बलात्कार किया था। परंतु अंबाला की पुलिस ने उसे आखिरकार धर दबोचा और साधू वेशधारी यह शातिर अपराधी अब एक बार फिर जेल की सलाखों के पीछे है।
इस शातिर अपराधी ने अदालत में स्वयं को बचाने के लिए यह तर्क भी पेश किया कि वह नपुंसक है तथा बलात्कार नहीं कर सकता। परंतु अदालत इसके पूर्व ही उसकी मेडिकल जांच करवा चुकी थी तथा उसे पूरी तरह स्वस्थ पाया गया था। यहां एक प्रश्र यह है कि आिखर अपने बचाव में शैलेंद्र पुरी नामक इस पाखंडी,बलात्कारी व हत्यारे अपराधी को स्वयं को नपुंसक बताए जाने की प्रेरणा कहां से मिली? उसके दिमाग में यह बात कैसे आई कि स्वयं को नपुंसक बताकर अदालत को गुमराह कर अपनी जान बचाई जा सकती है? आपको याद होगा कि जब नित्यानंद स्वामी को व्याभिचार के मामले में हिमाचल प्रदेश से गिरफ्तार किया गया था उस समय उसने भी अदालत में अपना यही पक्ष रखा था कि वह नपुंसक है और संभोग नहीं कर सकता। और अब संजय रकवार उर्फ शैलेंद्र पुरी भी अदालत में यही गुहार लगाते देखा गया कि वह नपुंसक है। ऐसा प्रतीत होता है कि बलात्कारी तथा अपराधी प्रवृति के भगवा वेषधारी अपने ही पाखंडी समाज में से अपने आदर्श व प्रेरणास्रोत भी चुन लेते हैं। और उन्हीं के पदचिन्हों का अनुसरण भी करते हैं। निश्चित रूप से तभी संजय रकवार ने भी नित्यानंद की ही तरह स्वयं को नपुंसक बताकर अदालत से इस तर्क के आधार पर कुछ राहत मिलने की उम्मीद लगाई होगी।
नित्यानंद या संजय रकवार के रूप में भगवा वस्त्र को बदनाम करने वाले यह कोई पहले या आखिरी ढोंगी नहीं हैं। बल्कि लंबे समय से यह वस्त्र अपराधियों को शरण देता आ रहा है। इसका भी एक कारण यह है कि आज साधूवेश धारण करने के लिए या साधू बनकर किसी मंदिर, मठ अथवा धर्मस्थान में डेरा जमाने हेतु किसी शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान व तपस्या की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए खासतौर से इस दौर में तो यही देखा जा रहा है कि जो व्यक्ति जीवन के दूसरे सांसारिक क्षेत्रों में असफल हो जाता है, अपनी पारिवारिक व गृहस्थी जि़म्मेदारियों से मुंह मोडऩा चाहता है, अपने मां-बाप, बीवी-बच्चे आदि के प्रति उस के जो नैतिक कर्तव्य हैं उन्हें पूरा नहीं करना चाहता या फिर किसी छोटे से लेकर गंभीर से गंभीर अपराध में संलिप्त हो जाता है ऐसा व्यक्ति बड़ी ही आसानी के साथ भगवा वेशभूषा को अपने बचाव के रूप में प्रयोग कर लेता है। दाढ़ी-मूंछ और जटा आदि रखकर ऊपर से भगवा चोला धारण कर वह स्वयं को एक साधू या संत के रूप में प्रस्तुत करने लगता है। और चूंकि ऐसा व्यक्ति वास्तव में अपनी अंतरात्मा से साधू नहीं होता उसका दूर-दूर तक अध्यात्म से या ईश्वर के भजन से कोई लेना-देना या वास्ता नहीं होता इसलिए वह इस वेष में आने के बाद भी अपनी अपराधी प्रवृति वाली हरकतों व आदतों से बाज़ नहीं आता।
सवाल यह है कि इस प्रकार के अपराधी, पाखंडी, दुराचारी तथा साधू-समाज एवं भगवा रंग को बदनाम करने वाले लोग कब तक इसी प्रकार खुले सांड की तरह घूमते रहेंगे? और किसी न किसी इज़्ज़तदार परिवार की बहन-बेटियों को अपनी हवस का शिकार बनाते रहेंगे? हमारे देश का सम्मानित साधू समाज जिसे आज भी पूरी आस्था व श्रद्धा के साथ समाज में सम्मानपूर्वक स्थान हासिल है वह इन भगवा चोले के दुश्मनों को किस नज़रिए से देखता है? ज़ाहिर है आम आदमी की नज़रें वास्तविक साधू एवं ढोंगी साधू के मध्य अंतर कर पाने की क्षमता नहीं रखतीं। एक साधारण व्यक्ति प्रत्येक जटाधारी व भगवाधारी को साधू या बाबा कह कर ही संबोधित करता है तथा उसके साथ श्रद्धा व सम्मान के साथ पेश आता है। पूरे भारत में रेलवे स्टेशन तथा भारतीय रेल दोनों ही इनके कारण प्रभावित होते हैं। ट्रेन में बेटिकट यात्रा करना, रेल के डिब्बों में गंदगी फैलाना, रेलवे प्लेटफार्म तथा रेलवे परिसर के आसपास गंदगी करना, नशा करना, नशे का कारोबार करना, आते-जाते यात्रियों को नशे की हालत में छेडऩा तथा आपत्तिजनक अवस्था में नेश में धुत होकर पड़े रहना इनकी फितरत में शामिल है। और इसी पाखंडी भगवावेशधारी झुंड के बीच तमाम बलात्कारी, हत्यारे, चोर और डाकू तथा इन्ही के बीच में यह किसी बदनसीब की अपहृत की गई बहन-बेटी को साथ लेकर पनाह भी लिए रहते हैं।
क्या देश की सरकार या देश का वास्तविक, मान्यता प्राप्त तथा सच्चा साधू समाज इस समस्या के निदान के लिए अपने पास कोई कार्यक्रम रखता है? क्या देश की सरकार व संत समाज के पास इन पाखंडी भगवाधारियों से निपटने की कोई योजना, स्कीम या फार्मूला है? मेरे ख्याल से शायद सरकार या साधू-संतों के एजेंडे में इस प्रकार की कोई चीज़ शामिल नहीं है। लिहाज़ा आम लोगों को अपना व अपने परिवार का, अपने मान-सम्मान व अपनी बहु-बेटियों की रक्षा करने का प्रबंध स्वयं करना होगा। और इसका सबसे बड़ा तरीका यही है कि अपने घरों में बैठकर अपने ईश्वर या देवी-देवताओं का सिमरन करें, उनकी अराधना करें, भगवाधारियों से सचेत रहें, उन्हें संदेह की नज़रों से देखें, उनपर आंख मूंदकर विश्वास न करें। ऐसे ढोंगी भगवाधारियों पर संदेह होने पर पुलिस को इसकी सूचना दें। पुलिस व प्रशासन को भी चाहिए कि इन की पहचान व शिनाख्त के विषय में जानकारी हासिल करे। अन्यथा भगवा चोले का यह आतंक दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाएगा।

Leave a Reply

3 Comments on "‘भगवा चोले’ का आतंक"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
इक़बाल हिंदुस्तानी
Guest

जनता को जागरूक करके ही इस समस्या से मुक्ति पाई जा सकती है.

बीनू भटनागर
Guest
बीनू भटनागर

दुष्कर्म को किसी रंग जाति या धर्म से जोड़ना ही ग़लत है।धर्म के ठेकेदार चाहें वे श्वेत, भगवा, हरा, नीला या
लाल किसी भी रंग से जुड़े हैं।अन्धविश्वासों मे जकड़ी जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं, पर जब
लुटने वाले ख़ुद को लुटा रहे हैं तो आप या मै विरोध के सिवा क्या कर सकते हैं।

इंसान
Guest
परिधीय परिस्थितियों को बिना समझे इस लेख के विषय के साथ कैसे कोई अपेक्षित न्याय कर सकता है? गरीब साधु के भगवे चोले में ही क्यों, नेता के स्वेत खादी में अपराधी को पहचानने में क्योंकर भूल हो रही है? भगवे चोले में ढोंगी साधु कुछ एक को ठगता है लेकिन लाखो, करोड़ों, व अरबों का मालिक स्वेत खादी में ढोंगी नेता तो सम्पूर्ण देश को पिछले पैंसठ वर्षों से ठगे जा रहा है| आज के भारतीय सामाजिक वातावरण में भगवा चोला पहने साधु के स्थान पर राजनीतिज्ञ, व्यापारी, पुलिस कर्मी, चिकित्सक, अध्यापक, अथवा पारस्परिक विश्वास व सामान्य नैतिकता का… Read more »
wpDiscuz