लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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sleep

लोकजीवन में कहावतों का बड़ा महत्व है। ये होती तो छोटी हैं, पर उनमें बहुत गहरा अर्थ छिपा होता है। ‘‘जो सोता है, वो खोता है’’ और ‘‘जो जागे सो पावे’’ ऐसी ही कहावते हैं।

लेकिन एक भाषा की कहावत दूसरी भाषा में कई बार अर्थ का अनर्थ भी कर देती है। एक हिन्दीभाषी संत पंजाब में प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने हारमोनियम और ढोलक के साथ सुर-ताल मिलाते हुए पुरुषों की ओर देखकर कहा, ‘‘बिन हरि भजन निज समय अकारथ भाइयो तुम तो खोते हो।’’ फिर महिलाओं की ओर देखकर बोले, ‘‘बिन हरि भजन निज समय अकारथ बहनो तुम भी खोती हो।’’

कुछ देर बाद हारमोनियम और ढोलक की ताल ने गति पकड़ ली। अब भजन के बाकी शब्द तो कहीं खो गये। बस एक ही लाइन बाकी रह गयी, जिसे संत जी झूमते हुए बार-बार दोहरा रहे थे, ‘‘भाइयो तुम तो खोते हो, बहनो तुम भी खोती हो।’’

पंजाब में खोते का अर्थ गधा होता है। ये संत जी को मालूम नहीं था। कुछ देर तक तो लोग चुप रहे; पर सहने की भी एक सीमा होती है। जब वह टूटी, तो लोगों ने डंडे उठा लिये। फिर क्या था, संत जी को बोरिया-बिस्तर समेट कर तत्काल वहां से प्रस्थान करना पड़ा। जो दान-दक्षिणा पिछले कुछ दिन में उन्हें मिली थी, उसे भी लोगों ने वहीं रखवा लिया। किसी ने ठीक ही कहा है, ‘‘न खुदा ही मिला, न बिसाले सनम। न इधर के रहे न उधर के रहे।’’

लेकिन कुछ लोगों का सोना दूसरों के लिए बड़ा हितकारी होता है। रावण के भाई कुंभकर्ण को ही लें। सुना है कि वह छह महीने सोता और छह महीने जागता था। कुछ लोगों का मत है कि उसके लगातार सोने के कारण ही लंका को ‘सोने की लंका’ कहते थे। वैसे आजकल भी जो लोग दिन-रात मिलाकर बारह घंटे बिस्तर को अपनी सेवाएं देते हैं, वे कुंभकर्ण के आधुनिक अवतार ही हैं।

पर उस कुंभकर्ण की नींद से लंका के लोग बहुत खुश रहते थे। क्योंकि जागते ही वह खाने को मांगता था। यदि न मिले, तो फिर आसपास मानव हो या राक्षस, पशु हो या पक्षी, जो मिले उसे ही खा जाता था। इसलिए लंका के लोग उसके सोते रहने की ही कामना करते थे। जब राम जी से युद्ध करते हुए वह सदा की नींद सोया, तब जाकर लंका वालों को चैन की नींद नसीब हुई।

नींद के किस्से हजारों हैं। गरीब मजदूर और मेहनती किसान को कहीं भी नींद आ जाती है। क्योंकि ‘‘भूख न जाने सूखी रोटी, नींद न जाने टूटी खाट।’’ लेकिन कुछ लोग मालपुए खाकर और ए.सी. कमरे में आरामदायक गद्दों पर लेटकर भी करवट बदलते रहते हैं। कहते हैं कि एक राजा नींद की तलाश में एक किसान की फटी कमीज ही मांग लाया था। फिर भी नींद उससे कोसों दूर रही। ऐसे लोगों के लिए ही कहा है, ‘‘मौत को एक दिन मुकर्रर है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।’’ लेकिन जब नींद आती है, तो ऐसी आती है कि लोग कितना भी चाहें, पर वह नहीं टूटती, ‘‘बड़े गौर से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गये दास्तां कहते-कहते।’’

नींद के भी कई प्रकार हैं। नवजात शिशु 20 घंटे सोता है, तो बूढ़े बाबा चार घंटे ही मुश्किल से सो पाते हैं। विद्यार्थी के लिए श्वान निद्रा की बात कही गयी है। जब लोग रात में सोते हैं, तो चौकीदार ‘जागते रहो’ की रट लगाता रहता है। कोई उससे ये नहीं पूछता कि यदि हमें ही जागना है, तो फिर तुम किस मर्ज की दवा हो ? शायद वह खुद को जगाए रखने के लिए ऐसा कहता होगा।

एक चोर अपने काम पर कुछ जल्दी पहुंचकर पलंग के नीचे छिप गया। वहां उसे नींद आ गयी और वह खर्रांटे लेने लगा। फिर क्या हुआ, आप समझ ही सकते हैं। कहते हैं कि जेल से आने के बाद भी ‘चोर कल्याण सभा’ ने ऐसे गैरजिम्मेदार आदमी को अपने दफ्तर में नहीं घुसने दिया। एक चोर की घरवाली ने राशन लाने को कहा, तो वह बोला, ‘‘थोड़ा धैर्य रखो बेगम, बाजार तो बंद होने दो। फिर महीने भर का राशन एक साथ ले आऊंगा।’’ इस ‘चौर्य कला’ की बातें हम-आप क्या जानें ? ये बहुत ऊंची चीज है।

कई सरकारी संस्थान ‘अहर्निश सेवामहे’ का उद्घोष करते हैं। यद्यपि उनके कार्यालय दिन में आठ घंटे ही खुलते हैं। उसमें भी वे बिना मेवा लिये कितनी देर सेवा करते हैं, इसका उत्तर कोई भुक्तभोगी ही दे सकता है। अब सरकार चाहती है कि बाजार चौबीस घंटे खुलें। जिससे दुकानदार और उसके कर्मचारी रात में भी चैन से न सो सकें। मोदी जी खुद तो बहुत कम सोते हैं। उनके कारण विपक्ष वालों की भी नींद हराम है। अब शायद वे आम जनता को भी सोने देना नहीं चाहते।

पिछले दिनों एक विपक्षी नेता की नींद पर बहुत चर्चा हुई। समझ नहीं आता कि कुछ देर संसद में सो जाना क्या पाप है ? पर बुरा हो वहां लगे कैमरे और उन पत्रकारों का, जिन्होंने तिल का ताड़ बना दिया। जरा सोचिए, लोकसभा में पूरे 44 लोग हैं उनके। कुछ राज्यों में सरकारें भी हैं। उन्हें संभालना और लगातार हो रही हार को पचाना कितना कठिन है ? घर पर काफी समय अपने कुत्तों को और कुछ समय आने-जाने वालों को देना होता है। देर रात अपने विदेशी मित्रों से भी बतियाना पड़ता है। ऐसे में थकान तो हो ही जाती है।

जहां तक संसद की बात है, तो आओ और चुपचाप अपनी सीट पर बैठकर झपकी ले लो। गरमी में ठंडा, सरदी में गरम। बढ़िया गद्देदार कुरसी। कुछ पहले आ जाएं, तो और अच्छा। मेरी तो सलाह है कि वे अपनी सीट आगे की बजाय बिल्कुल पीछे करवा लें। इससे वे कैमरे की निगाह से बचे रहेंगे। बोलने के लिए संसद में उनकी पार्टी के काफी लोग हैं। वैसे भी जब तक कोई लिख कर न दे, वे बोल नहीं सकते। उल्टा-सीधा बोलने से तो चुप रहना या फिर सोना ही ठीक है। किसी ने ठीक ही कहा है –

बाबा, उनकी नींद भली।

उनके सोने से लोगों की, जाने कितनी विपद टली

बाबा, उनकी नींद भली।

दिन में सोकर जगें रात में, ऐसी आदत कहां डली

बाबा, उनकी नींद भली।

जिन्हें देख मुरझा जाती है, हंसती-गाती हुई कली

बाबा, उनकी नींद भली।

घर जाएं तो सुख-दुख पूछे, ऐसी कोई नहीं मिली

बाबा, उनकी नींद भली।

 

विजय कुमार

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