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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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सूर्यास्त्र द्वारा प्रकाशित व शाहज़ाद फ़िरदौस द्वारा लिखित उपन्यास ‘व्यास’ का लोकार्पण
भारतीयता जड व चेतन है उसे साहित्यिक रूप देना जरूरी

नईदिल्ली। प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेला के अवसर पर आज प्रवक्ता डॉट कॉम व राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) के सौजन्य से ‘साहित्य में भारतीयता की अवधारणा विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री कुुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीयता अंदर से निकलती है ओर हमें एहसास कराती है कि हम कितना भी बदल ले , नागरिकता बदल लें , दूसरे देश में चले जाये किन्तु जब देश में कुछ हो तो अगर अंदर से दर्द है तो यह भारतीयता है। इस बात को साहित्य में समावेश करना चाहिये। उन्होने इस बात अपने एक मित्र का संदर्भ भी बताया और यह बात प्रस्तुत करने की कोशिश की कि भारतीय कहीं भी रहें लेकिन उनके चेतन में जो समाहित हो चुका है उसे उनके अन्र्तमन से हटाया नही जा सकता।
कार्यक्रम में वक्ता के तौर पर बोलते हुए दूरदर्शन में अतिरिक्त महानिदेशक रंजन मुखर्जी ने महाभारत का सन्दर्भ प्रस्तुत करते हुए यह कहा कि हम पौराणिक चीजों से बहुत कुछ सीख सकते है और इस काम को एक एैसे सख्स ने किया है कि हम बयान करते हुए गर्व महसूस करते है । उन्होने कहा कि शाहज़ाद फ़िरदौस जो कि ‘व्यास’ नामक कृति के लेखक है उन्होने असाधारण काम किया है। इतना ही नही महाभारत के लेखक वेदव्यास पर अपनी शोध कर एक एैसी दिशा दिखायी है जिससे बहुत कुछ समझ में आता हैं। इस व्यवस्था को आगे बढाने की जरूरत है। साहित्य पर शोध करने की आवश्यकता है। इतना ही नही अगर हमें अपने धार्मिक ग्रन्थों को शोध में शामिल करें तो देश की तरक्की होगी और भारतीयता सामने आयेगी।
संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुूए शाहज़ाद फ़िरदौस ने कहा कि वो उस क्षेत्र से आते है जो कि मिश्रित क्षेत्र है और जहां उन्होने जन्म लिया वहां हिन्दू मुस्लिम में मतभेद आम बात है। इस दायरे से निकलने व अलग कुछ काम करने की जरूरत थी, हमने किया और आज वह इस किताब की शक्ल में सबके सामने है। उन्होने कहा कि मन साफ है और पूरी कोशिश है कि भारतीयता के उस क्षण को पिरोया जाय जो उस काल के समय महसूस की गयी होगी । शहजाद के अनुसार कई वर्षो जंगलों में अध्ययन करने के बाद यह संभव हो पाया, उम्मीद है कि लोग इस कृति ‘व्यास’ को पसंद करेगें।
मुख्य वक्ता के रूप् में बोलते हुए वरिष्ठ साहित्यकार व दिल्ली विश्वविधालय के रिटायर्ड प्राफेसर डा सुंदर लाल कथूरिया ने कहा कि पहले धर्म, अर्थ काम और मोक्ष होता था, लोग मोक्ष को प्राप्त करना चाहते थे । कर्म प्रधान होता था, क्या उस दौर में कबीर, जायसी, रसखान, रहीम आदि नही हुए। उस समय समाज ने उनको स्वीकार नहीं किया लेकिन अब जात-पात, सहिष्णुता ने सब खत्म कर दिया। अब लोग पुराण, उपनिषद, गीता, रामायण आदि की ओर नही देखना चाहते, बाइबिल व अन्य रास्ते देखना चाहते हैं। लेकिन अंदर से जब कोई आवाज आती है तो हमें जड चेतन की याद दिलाती है जिसे हमें हर हाल में स्वीकार करना ही पडता है।
कार्यक्रम में वक्ता के रूप में बोलते हुए अनंत विजय ने कहा कि शुरू से ही हिन्दी साहित्य को दूसरे दर्जे का माना गया है इसे खत्म करने का प्रयास 1921 में ही शुरू हो गया था जब इसे बौध से तुलना कर कम करने का प्रयास किया जाने लगा था उसके बाद भारत की खोेज में गलत तथ्यों को रखा गया। इसके बाद हिन्दी को आम जनजीवन से बाधित करने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से बड़ा और महान कोई हिन्दी लेखक नही है लेकिन उनका भी मूल्याकंन चल रहा है, उनकी कृति ‘शेखर’ सिविल सेवा परीक्षा का हिस्सा है लेकिन वह कुछ नही हैं, नयी पीढी उनका नाम तक नही जानती, यही हाल निराला, दिनकर जी का हुआ, निराला जी का कार्यक्रम था और उनकी कृतियां जिनके लिये वो जाने जाते थे वह प्रकाश में नही आयी।
इस संगोष्ठी का संचालन जाने-माने साहित्यकार अलका सिंन्हा ने किया व सभी आये हुए अतिथियों का स्वागत प्रवक्ता डाट काम के संस्थापक व प्रबंध सम्पादक भारत भूषण जी ने किया जबकि धन्यवाद ज्ञापन संपादक संजीव सिन्हा ने दिया ।

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