लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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ygनिर्मल रानी
भारतवर्ष में साधू व संतो को बेहद आदर-सम्मान व श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। संतों द्वारा धारण किया जाने वाला भगवा चोला भी भारतीय संस्कृति के लिए एक सम्मानजनक चोला अथवा वेशभूषा मानी जाती है। इस वेशभूषा को धारण करने वाले व्यक्ति को भारतीय समाज में एक सज्जन,ज्ञानवान,धर्मपरायण, मधुर वाणी बोलने वाला,बुद्धिमान,मार्गदर्शक तथा सदाचार का पालने करते हुए मानव जाति को सद्भाव का संदेश देने वाले महापुरूष के रूप में समझा जाता है। परंतु इन साधू-संतों ने राजनीति में प्रवेश क्या पा लिया गोया अब यह अपने पद व चोले की गरिमा को त्याग कर ऐसी भाषाएं व अपशब्द बोलने लगे हैं जिससे न केवल ऐसे संतों की अपनी प्रतिष्ठा धूमिल होने लगी है बल्कि इनकी वजह से अब संतों का चोला भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। ज़ाहिर है जब संतों के चोले में असंतों के बोल बोले जाने लगेगें तो ऐसे संतो के चोले के प्रति आम लोगों में अनादर का भाव उत्पन्न होना स्वाभाविक है। चाहे वह भगवा वस्त्र धारण कर स्वयं को साधू-संत बताने वाला कोई हिंदू धर्म का स्वयंभू ठेकेदार बनने वाला कथित संत हो अथवा ज़हरीले बोल बोलने वाला अरबी रूमाल व लंबी दाड़ी धारण करने वाला किसी मस्जिद का सफेदपोश मौलवी या फिर ज़हरीले वचनों को अपने अनुयाईयों तक पहुंचाने वाला किसी अन्य धर्म का कथित संत। ऐसे सभी लोग धार्मिक होने का ढोंग तो ज़रूर करते हैं परंतु संभवत: प्रेम,सद्भाव व शांति का संदेश देने वाली सभी धर्मों की वास्तविक धार्मिक शिक्षाएं इनसे कोसों दूर रहती हैं।
गोरखपुर स्थित संत गोरखनाथ की मुख्य पीठ के गद्दीनशीन योगी आदित्यनाथ का नाम आजकल के फायर ब्रांड संतों में सर्वोपरि समझा जा रहा है। वैस्ेा तो योगी आदित्यनाथ भारतीय जनता पार्टी से गोरखपुर से सांसद चुने जाते हैं। परंतु उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी के नाम से पूर्वांचल के बेरोज़गार व उत्साही हिंदू युवकों को संगठित कर रखा है। योगी आदित्यनाथ अपने उत्तेजनापूर्ण भाषणों के बल पर पूर्वांचल के हिंदू युवाओं में काफी लोकप्रिय होते जा रहे हैं। और संभवत: उन्होंने अपने विवादित व आपत्तिजनक बयानों को ही अपनी लोकप्रियता का आधार समझ लिया है। परिणामस्वरूप वे आए दिन कोई न कोई ऐसे नए विवादित व आपत्तिजनक वक्तव्य देते आ रहे हैं। जो न केवल हिंदू धर्म की सहिष्णुशील मान्यताओं व परंपराओं के विरुद्ध हैं बल्कि ऐसे वक्तव्यों की इजाज़त भारतीय संविधान,हमारे देश् का कानून तथा नैतिकता भी नहीं देती। पिछले दिनों उन्होंने हरिद्वार में एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बयान यह दे डाला कि हर की पौड़ी पर गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने उत्तराखंड की सरकार,हरिद्वार के साधू-संतों तथा स्थानीय पंडा समाज से आगे आने की अपील की। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में जहां प्रत्येक धर्मस्थल पर प्रत्येक धर्म व विश्वास के मानने वाले लोगों का आना-जाना लगा रहता है। यहां तक कि हरिद्वार जैसे देश के सैकड़ों धर्मस्थल देश के पर्यट्न स्थलों की सूची में शमिल हैं,ऐसी जगहों पर क्या इस प्रकार की व्यवस्था की जा सकती है क यहां गैर हिंदुओं के प्रवेश को वर्जित कर दिया जाए? खासतौर पर हरिद्वारे में कुंभ जैसे महापर्व के अतिरिक्त और भी कई त्यौहार व स्नान आदि गंगा किनारे मनाए जाते हैं। इनमें शासन-प्रशासन द्वारा देखरेख की जाती है। शासन व प्रशासन में सभी धर्मों के लोग डयूटी पर तैनात होते हैं। क्या योगी आदित्यनाथ की सलाह के मद्देनज़र ऐसी जगहों पर केवल हिंदू धर्म के कर्मचारियों व अधिकारियों को ही डयूटी पर तैनात किया जाना चाहिए?  देश-विदेश से आने वाले हमारे पर्यटकों को क्या उस ‘संत के इस निर्देश के अनुरूप कि हर की पौड़ी पर गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, यहां आने से रोक देना चाहिए? पिछले दिनों पूर्वांचल के एक जि़ले में योगी आदित्यनाथ के अपने संगठन हिंदू युवा वाहिनी के बैनर तले एक जनसभा का आयोजन किया गया था। इस सभा में योगी जी स्वयं मंच पर मौजूद थे। उनकी मौजूदगी में वाहिनी के एक नेता ने अपने एक उत्तेजनात्मक भाषण में अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध कई घोर आपत्तिजनक बातें कहीं। उसने यहां तक कहा कि अमुक धर्म विशेष की महिलाओं को कब्रों से बाहर निकाल कर उनके साथ बलात्कारकरना चाहिए। जिस समय इतना आपत्तिजनक व अभद्र भाषण दिया जा रहा था उस समय योगी जी मंच पर बैठे मुस्कुरा रहे थे। तथा उसके बाद उन्होंने अपने संबोधन में भी उस बयान का खंडन अथवा उसकी आलोचना नहीं की। संभवत: आदित्यनाथ इस बातका विश्वास कर चुके हैं कि देश के अल्पसंख्यक समुदाय को अपमानित करना तथा उनके लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना ही उनकी राजनैतिक सफलता का मूलमंत्र है? अपने एक और विवादित भाषण में उन्होंने अपने समर्थकों को खुश करने के लिए एक चुटकुला रूपी कहानी गढक़र सुनाई  तथा उपस्थित लोगों की तालियां बटोरीं। उन्होंने कहा कि- ‘पिछले दिनों मैं बैंगलोर गया तो पता चला कि टीपू सुल्तान के वंशज वहां रिक्शा चला रहे हैं। इसी प्रकार जब मैं कोलकाता गया तो पता चला कि बहादुरशाह जफर के वंशज बर्तन मांज रहे हैं’। उसके पश्चात उन्होंने मुसलमानों को संबोधित करते हुए बेहद आपत्तिजनक वाक्य का प्रयोग किया जिसका यहां उल्लेख करना ज़रूरी नहीं है। परंतु सोचने का विषय है कि टीपू सुल्तान व बहादुरशाह ज़फर के हवाले से उन्होंने जो बयान दिया उससे हिंदू समुदाय या भारतवर्ष का सिर तो कतई ऊंचा नहीं होता? यदि योगी आदित्यनाथ की बात में सच्चाई भी है तो यह भी पूरे देश के लिए शर्म और अपमान का विषय है। जिस टीपू सुल्तान ने अपनी बहादुरी से अंग्रेज़ी सेना के छक्के छुड़ा दिए और जो बहादुरशाह ज़फर 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम का महानायक रहा हो और जिसके बेटों के कटे सिर अंग्रेज़ों ने उनके आगे उन्हें प्रताडि़त करने के रूप में पेश किए हों उस महान स्वतंत्रता सेनानी के वंशज यदि आज आर्थिक संकट के दौर से गुज़र भी रहे हैं तो उसमें भारतवासियों,हिंदू समुदाय के लोगों अथवा योगी आदित्यनाथ जैसे कथित संतों के लिए गर्व का विषय नहीं होना चाहिए।
आज हमारे देश में केवल बहादुरशाह ज़फर या टीपू सुल्तान ही नहीं बल्कि सैकड़ों ऐसे हिंदू राजघरानों के लोग भी मिल जाएंगे जिनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है, जो बैंकों के कजऱ्दार हैं तथा अपने प्रीवीपर्स अथवा ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए बांड के ब्याज़ पर अपना गुज़र-बसर कर रहे हैं। राजा-महाराजा या नवाबों की आर्थिक दुर्दशा की तो बात ही क्या करनी हमारे देश में तो हज़ारों स्वतंत्रता सेनानियों के ऐसे परिवार मिलेंगे जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर देश को आज़ाद कराया तथा अंग्रेज़ों को देश छोडक़र जाने के लिए मजबूर किया। परंतु हमारे देश के  भ्रष्ट एवं स्वार्थपूर्ण राजनीतिज्ञों  के पास इतनी फुर्सत नहीं कि वे ऐसे परिवारों की चिंता कर सकें। लिहाज़ा केवल धर्म के आधार पर टीपू सुल्तान या बहादुरशाह ज़फर के वंशजों को निशाने पर लेना और वह भी केवल इसलिए ताकि हिंदूवादी सोच रखने वाले युवाओं को खुश किया जा सके,कतई मुनासिब नहीं है।
योगी आदित्यनाथ की ही तरह और भी कई भगवाधारी व कथित संत इस समय अत्यंत मुखरित होकर समाज को धर्म व जाति के आधार पर विभाजित करने वाली विवादित बातें करते फिर रहे हैं। कई तो ऐसे भी हैं जिन्होंने विवादित बयानबाजि़यों तथा धर्म विशेष के विरुद्ध ज़हर उगलने को ही अपनी प्रसिद्धि तथा मीडिया में चमकने का माध्यम समझ रखा है। ऐसा चोला धारण कर इस प्रकार की दुर्भाग्पूर्ण,विवादित तथा किसी धर्म व संप्रदाय विशेष को निशाना बनाकर की जाने वाली बातों से परहेज़ करना चाहिए। संतों का चोला पहनकर अपने मुंह से सद्वचन तथा मधुर वाणी निकालने के प्रयास करने चाहिए जैसाकि हमारा समाज हमेशा से उनसे यही उम्मीद करता आया है। बजाए इसके कि संतों का चोला धारण कर असंतों की वाणी बोली जाए और संतों के चोले को बदनाम व संदेहपूर्ण दृष्टि से देखने का मौका दिया जाए?

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2 Comments on "संतों का चोला-असंतों के बोल ?"

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SURENDRA PAL SINGH
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निर्मल रानी JI
KUCH CRISTIAN, MUSLIMS KE BARE ME BHI LIKH LIYA KARO, YA MUSLIMO, CRISTIANO KO AAP LOG HATYARE AUR DESHDROHI HI MANTI HO.

suresh karmarkar
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आजकल यह एक वृत्ति बन गयी है की चर्चा में रहने हेतु उटपटांग बयां दिए जाएं. कभी महिलाओं के बारे में शरद यादव,कभी गिरिराजसिंघ कभी प्रकाश जायसवाल ,आदि. हिन्दू मुस्लिम में विद्वेष उत्प्पन करने के लिए ओवेसी, और ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए सांसदों के प्रवचन , मुस्लिमो को मताधिकार से वंचित करने के विचार ,आदि,आदि कश्मीर में तो पाकिस्तान के झंडे फहराये जा रहे हैं. वहांकी मक्कार सरकार आतंकवादियों ,पत्थर फेंकनेवालों को जेल से छोड़ रही है। वास्तव में एक विधेयक संसद में ऐसा पेश किया जाय जिसमे ”राष्ट्रविरोधी” गतिवधियों का उल्लेख हो जिसमे भाषण ,रेल्ली ,प्रदर्शन ,को… Read more »
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