लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-

salmanगैर इरादतन हत्या का दोषी ठहारए जाने के मामले में फिल्म जगत के मशहूर अभिनेता सलमान खान को अखिरकार पांच साल की सजा सुना दी गई। हालांकि उन्होंने और उनके वकीलों ने मामले को बघित करने की बहुतेरी कोशिशें कीं। नतीजतन ममला 13 साल बाद कानून के शासन की पहली सीढ़ी पार कर पाया है। अभी ऊपरी अदालतों में सत्र-न्यायालय द्वारा दिए गए इस फैसले की न्यायिक समीक्षा के अवसर हैं। संभव है,सलमान अपनी प्रसिद्धी और पहुंच के बूते बच निकलें ? ऐसा हुआ तो न्याय-व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है ? हालांकि जिस जल्दबाजी में बंबई उच्च न्यायालय ने सलमान को दो दिन की जमानत दी,उससे यह साफ हो जाता है सजा पाए दोषी की हैसियत अदालतों को प्रभावित करती है। फिर भी सलमान को मिले दण्ड से जनमानस में यह संदेश तो पहुंचा ही है कि कानून के हाथ बहुत लंबे हैं और उनकी पकड़ से बचना नमुनकिन है। यही हश्र आसमान से जमीन पर आए इस सितारे का हुआ है।

सलमान खान की कार दुर्घटना से जुड़ा यह ऐसा मामला है,जिसकी पड़ताल करने से साफ होता है कि सक्षम लोगों को कानून और न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ करने की कितनी सुविधाएं हासिल हैं। अकसर न्याय में देरी का कारण अदालतों और जजों की कमी को माना जाता है। इसका अक्सर ठीकरा केंद्र और राज्य सरकारों पर फोड़कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है। लेकिन इस मामले की क्रमबार तहकीकात करने से पता चलता है कि फैसलों में देरी के लिए अदालतें भी एक हद तक दोषी हैं। 27-28 सितंबर 2002 को तड़के करीब पौने तीन बजे सलमान की लैंड कू्रजर कार बांद्रा में स्थित अमेरिकन एक्सप्रेस बेकरी के बाहर पैदल-पथ पर सो रहे लोगों पर चढ़ गई थी। इस दुर्घटना में नुरूल्लाह महबूब शरीफ नाम का व्यक्ति मारा गया था और चार अन्य घायल हुए थे। गरीबी की लाचारी के चलते इनका उचित इलाज भी नहीं हो पाया था। लिहाजा अब आजीवन अपंगता का दंश भोग रहे हैं। यही वे प्रमुख गवाह हैं, जिन्होंने पुलिस को अदालत में बयान दर्ज कराया था कि सलमान खुद कार चला रहे थे और शराब के नशे में धुत्त थे। गोया,सलमान की 28 सितंबर 2002 को गिरफ्तारी भी हुई। बाद में सलमान जमानत पर छूट भी गए। इसी क्रम में सलमान के सुरक्षाकर्मी और मुंबई पुलिस में आरक्षक रविंद्र हिम्मतराव पाटिल ने पुलिस को दिए बयान में तस्दीक की कि सलमान ने शराब पी रखी थी और चेतावनी के बावजूद काफी तेज रफ्तार से कार चला रहे थे। नतीजतन कार काबू से बाहर हो गई और फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर चढ़ गई। इन घायल और चश्मदीदों के बयानों के आधार पर 7 अक्टूबर 2002 को सलमान के खिलाफ गैर इरातन हत्या और शराब पीकर लापरवाही से वाहन चलाने का मामला दर्ज हुआ। इस प्रथम सूचना प्रतिवेदन में दर्ज गैर इरादन हत्या की धारा 304 को सत्र-न्यायालय में सलमान द्वारा एफआईआर से निकालने की चुनौती दी गई,लेकिन न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।

इस खारिज फैसले की अपील बांबे हाईकार्ट में की गई। हाईकोर्ट ने जून 2003 को दिए फैसले में गैर इरादन हत्या की धारा 304 को उचित नहीं माना। इस धारा को बनाए रखने की अपील देश की शीर्श अदालत में की गई। दिसंबर 2003 में दिए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सुरक्षित रखा। इस फैसले की बाध्यता के चलते अंततः अक्टूबर 2006 को मुख्य मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट कोर्ट मुंबई में गैर इरादतन हत्या की बजाए लापरवाही से कार चलाने का ममला दर्ज किया गया। और मामले को निचली अदालत में स्थानातंरित कर दिया गया। तत्पश्चात सुनवाई शुरू हुई। आखिरकार 17 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद 24 जून 2013 को अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि इस मामले में तो गैर इरादतन हत्या का ही मामला बनता है। नतीजतन विलोपित की गई धारा 304 फिर से वजूद में ला दी गई।

निचली अदालात से ऊपरी अदालत के क्रम में ये वे बाधाएं थीं,जिनकी सुविधा आरोपी को बख्शने के लिए उसकी आर्थिक हैसियत के बूते मिल पाती है। मसलन 11 साल मामला केवल कानूनी पेंचों के जरिए लंबित होता रहा। हकीकत में ये कानूनी सुविधाएं सक्षम व्यक्ति के लिए कानून से खिलवाड़ का पर्याय हैं। ये विधि के शासन की उस अवधारणा को ठेंगा दिखाती हैं,जो यह साबित करने में लगी रहती है कि कानून की नजर में अमीर-गरीब,सक्षम-अक्षम सब बराबर हैं ? यहां यह भी गौरतलब है कि देश में केवल अदालतों और जजों की कमी की वजह से नहीं, ऐसे कानूनी पेचों से भी अदालती कार्रवाही लंबित होती हैं। गोया मामलों के निपटारे में जरूरत से ज्यादा देरी न हो,इसके लिए उपरोक्त पेंचों को सुलझाने की जरूरत है। इस दिशा में सही और सार्थक पहल सर्वोच्च न्यायालय स्वंय भी कर सकती है ?

धारा 304 की बहाली से सलमान के विरूद्ध जब एक बार फिर से मामला पुख्ता हो गया तो मामले को बाधित करने के नए उपाय अमल में लाए गए। 25 जुलाई 2013 को अदालत को जानकारी दी गई कि चालान से केस डायरी व 56 गवाहों के बयान गायब हैं। लेकिन इस जानकारी के सामान आने के पहले अदालत स्वंय 17 गवाहों के बयान दर्ज कर चुकी थीं,इसलिए उसने पुलिस द्वारा दर्ज अन्य गवाहों के बयानों को महत्व नहीं दिया। दरअसल,रसूखदार लोगों को बचाने के लिए पुलिस गवाहों की संख्या महज इसलिए बढ़ा देती है,जिससे विरोधाभास पैदा हो और आरोपी पतली गली से बच निकल जाए।

जब यह फंडा काम नहीं आया तो सलमान को बचाने के लिए 27 मार्च 2013 को एक और कुचक्र रचा गया। सलमान खान के चालक अशोक सिंह ने एकाएक अदालत में पेश होकर हलफनामा दिया कि कार सलमान नहीं ,मैं चला रहा था। इस शपथ-पत्र के आधार पर 30 मार्च 2015 को अशोक का अदालत में बयान दर्ज हुआ। अदालत ने 13 साल बाद दिए अशोक के बयान को सरासर झूठा माना। लिहाजा सलमान को सुनाए फैसले के दिन झूठी गवाही देने के ऐबज में अशोक को भी हिरासत में ले लिया गया। यहां सवाल उठता है कि क्या वाकई शपथ लेकर झूठा बयान देने के आरोप में अशोक पर स्वाभविक रुप से चल रही न्यायिक-प्रक्रिया में बाधा पहुंचाने का मुकदमा दर्ज होगा ? गोया, अशोक पर प्रकरण पंजीबृद्ध होना ही चाहिए, साथ ही उन चेहरों से भी पर्दाफश होना चाहिए जो कानून की पैरवी करते हुए, झूठे गवाहों को अक्समात खड़ा करके अड़ंगों का फरेब रचते हैं। फिलहाल इस हाई-प्रोफाइल मामले में न्याय हुआ लग रहा है और प्रभावित कमोबेश संतुष्ट हैं। लेकिन अभी मामले की सुनवाई उच्च और सर्वोच्च न्यायालय की कानूनी प्रक्रिया के दौर से गुजरनी है। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि फैसले से सामने आया न्याय वहां भी यथावत बना रहेगा ?

इस फैसले के बाद सिने जगत से जुड़ी कुछ हस्तियों के हृदयहीन व निर्दयी बयान आए हैं। यहां तक कि गायक कलाकार अभिजित ने कहा है कि ‘कुत्ता सड़क पर सोएगा तो कुत्ते की मौत मरेगा ही।‘यह बयान इस बात को दर्शाता है कि हमारे देश में आर्थिक-रूप से संपन्न एक तबका ऐसा हो गया है,जो देश को भारत और इंडिया को विभाजित खानों में बांटता है। अव्वल तो फरीयादि सड़क पर नहीं फुटपाथ पर सो रहे थे,और सड़क पर कुछ लोग सो भी रहे थे,तब भी सलमान उनसे कहीं ज्यादा दोषी इसलिए हैं,क्योंकि एक तो वे शराब पीकर कार चला रहे थे, दूसरे उनके पास वाहन चलाने का उस वक्त लाइंसेंस भी नहीं था ? इस नाते इस दुर्घटना के दोषी सलमान हैं। उनके प्रति सहानुभूति जताने वाले लोग एक तरह से गरीबी और लाचारी का उपहास उड़ाने का काम कर रहे हैं। उनकी यह करतूत मानवीय गरिमा के विरूद्ध तो है ही,आर्थिक रुप से शाक्तिशाली लोगों को कानून से ऊपर मानने की भी हैं। यह अलोकतांत्रिक जड़ता अदालत के ऐसे ही कठोर फैसलों से टूटेगी ?

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