लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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कश्मीर में भारतीय नेतृत्व की समझ और हमारे वीर सैनिकों की वीरता का परिचय मिल रहा है। भारत की केन्द्र सरकार के नीति नियंता पहली बार कश्मीर और आतंकवाद को लेकर जनता की आलोचना के पात्र नही बन रहे हैं। कुल मिलाकर कश्मीर से निपटने के सरकारी ढंग और सैन्य वीरता को सर्वत्र समर्थन मिल रहा है। ऐसी स्थिति को बहुत ही संतोषजनक और उत्साहप्रद कहा जाएगा। देश का विपक्ष अब समझ गया है कि उसने जेएनयू के कन्हैया को समर्थन देकर कितनी बड़ी भूल की थी? इसलिए वह भी मौन है।

इससे पूर्व की सरकार के समय कश्मीर में हमारे सैनिक बंधे हुए हाथों से आतंकियों के सामने खड़े होते थे, जिससे हमें सैनिक क्षति भी उठानी पड़ती थी और हमारी सेना को अपनी ही भूमि पर अत्यंत अपमानजनक और अशोभनीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। बात

30 अप्रैल 2010 की है। कश्मीर के कच्छिल सैक्टर में आतंकियों ने उत्पात मचा रखा था। हमारी सेना के कर्नल डी.के. पठानिया को कश्मीर में अपने जवानों की एक एक करके वीरगति देखने की अपमानजनक परिस्थिति में खड़े होने को बाध्य होना पड़ गया था। कर्नल डी.के. पठानिया को दिल्ली से कोई संंकेत या संदेश नही मिल रहा था, जिससे वह शत्रु से ढंग से निपट सकते। मनमोहन सरकार ने पूरे देश का मनोबल तोडक़र रख दिया था जिस पर आतंकी खुला उत्पात मचाने और हमारे सैनिकों को मारने का उत्सव मनाने की स्थिति में पहुंच गये थे।
हमारा कर्नल प्रतिदिन अपने हाथों अपने किसी सैनिक का अंतिम संस्कार करता और मन मसोसकर रह जाता। तब दिल्ली सरकार की नीति थी कि यदि आपने कुछ कहा तो अनर्थ हो जाएगा

, चुप रहो और चुप सहो। इन आतंकियों को विदेशों का समर्थन प्राप्त है, और यदि हमने इनका प्रतिशोध किया तो भारत को अनचाहे में ही भारी विनाश का सामना किसी युद्घ के रूप में करना पड़ सकता है। इस सोच ने देश के नेतृत्व को दब्बू बना दिया था। फलस्वरूप सवा अरब की जनसंख्या का देश मुट्ठी भर आतंकियों के उत्पात को झेलने के लिए बाध्य हो गया था।
यह अच्छा रहा है कि देश के वर्तमान नेतृत्व ने भारत ने भारत में आतंकवाद और भारत की उससे निपटने की रणनीति व समस्याओं से विश्व समुदाय को अवगत कराया। हमारी विदेशनीति में परिवर्तन आया और हमने आतंकवाद को पोषित करने वाले पाकिस्तान को विश्वमंच पर अकेला और नंगा करना आरंभ कर दिया।

पर जिस समय कर्नल डी.के. पठानिया आतंक का सामना कर रहे थे उस समय ऐसी परिस्थतियां नही थीं। तब हमारे सैनिकों के मनोबल को तोडऩे वाला नेतृत्व देश पर शासन कर रहा था। उसके वश में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व जनमत को अपने पक्ष में करने की क्षमता और सामथ्र्य नही थी। कर्नल डी.के. पठानिया सरकारी नपुंसकता के विरूद्घ विद्रोही हो उठे। उन्हें रोज-रोज के मरने से एक दिन का मरना अच्छा लगा। इसलिए उन्होंने देश के प्रति अपने कत्र्तव्य को वरीयता दी और इस पावन कार्य में सहयोग मिला अपने साथी मेजर उपेन्द्र

, हवलदार देवेन्द्र कुमार, लांस नायक लखमी व सिपाही अरूण कुमार का। इन देशभक्तों ने कांग्रेसी सरकार के हर आदेश को मानने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप उनकी फडक़ती बाजुओं और देशभक्ति से लबालब भरे हृदय ने अब आतंकियों का सामना अपने बल पर करने का निर्णय लिया। यह भारत की परंपरा भी रही है कि जब नेतृत्व दुर्बल हो जाये तो सैनिकों को मातृभूमि की रक्षा अपने विवेक से करनी चाहिए। बस, इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए हमारे वीर सैनिकों ने शहजाद अहमद, नियाज अहमद, व मौहम्मद शफी को मार गिराया।
इतना करना था और आतंकियों में खलबली मच गयी। उनके ठिकानों में यह समाचार बड़ी तीव्रता से फैल गया कि अब भारत के वीर सैनिकों ने उठ खड़ा होने का निर्णय ले लिया है। आतंकियों को हमारे सैनिकों के साहस और वीरता का भली प्रकार ज्ञान था, इसलिए उन्होंने वेश बदलकर बुरका पहन लिया।

पर इधर हमारी तत्कालीन सरकार को हमारे सैनिकों और कर्नल पठानिया की यह देशभक्ति रास न आयी उसने इसे अपने विरूद्घ एक विद्रोह के रूप में लिया। फलस्वरूप देशभक्तों को प्रताडि़त करने का समय आ गया। हमारे देशभक्त सैनिकों और उनके प्रेरणा स्रोत कर्नल पठानिया को सरकारी आतंकवाद और उत्पीडऩ का सामना करना पड़ा। 30 अप्रैल 2010 को उन्होंने आतंकियों को क्यों मारा? इस अपराध में उन्हें सरकारी तंत्र ने उत्पीडि़त करना आरंभ कर दिया। उस समय देश के रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी थे। ईसाई होने के कारण वह सोनिया गांधी को बहुत ही प्रिय थे। इस ईसाई रक्षामंत्री को एक हिंदू देशभक्त सैन्याधिकारी का अपने देश के प्रति समर्पण भाव जंचा नही और उसने हमारे इन वीर सैनिकों की वर्दी उतरवा ली। इतना ही नही इन देशभक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी। दोष केवल यह था कि वह अपने पूर्वजों की बसाई कश्मीर को लेने के लिए या उसे उनके हाथों से छीनने वाले दुष्ट आतंकियों के विरूद्घ इतने आक्रामक क्यों हो गये थे? सारा देश अपनी ही सरकार की आतंकी नीति को देखकर भी चुप रह गया। पर राष्ट्रवादियों को यह खराब दृश्य भीतर तक साल गया। वह समझ गये कि देश की एकता और अखण्डता के प्रति सरकार का दृष्टिकोण क्या है?

आज कश्मीर में अशांति केवल इसलिए है कि अब देश का नेतृत्व अपने सैनिकों के साथ है आज वहां देशभक्ति सम्मानित हो रही है। यह अच्छी बात है कि इस अभियान में महबूबा मुफ्ती भी साथ हैं और वह देश की मुख्यधारा के साथ खड़ी हैं। किसी भी आतंकी का या आतंकवाद को बढ़ावा देने वालों का यह साहस नही हो रहा है कि हमारी सेना का सामना किया जाए या उसके हस्तक्षेप की निंदा की जाए। इस सारी कार्यवाही में जहां केन्द्र सरकार की अभी तक की रणनीति सराहनीय है वहीं हमारे विपक्ष और जम्मू कश्मीर के राजनीतिक दलों की भूमिका भी कम सराहनीय नही है, जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रश्न पर किसी भी प्रकार का समझौता न करने का राष्ट्रभक्ति से भरा हुआ निर्णय लेकर सरकार के राष्ट्रवाद (सरकारी आतंकवाद के वे दिन अब लद गये जो अपने ही सैनिकों के विरूद्घ प्रयोग किया जाता था) को समर्थन दिया है। इस देशभक्ति भरे परिवेश के लिए वे सारी शक्तियां बधाई और अभिनंदन की पात्र हैं जो आज बुरहान के साथ न होकर अपनी सेना के साथ हैं और आज मौन रहकर कर्नल पठानिया और उनके साथियों के कार्यों पर भी पुष्प वर्षा कर रही हैं, इतिहास बदल रहा है-बुरहान मर रहा है और कर्नल पठानिया और उनके साथी ‘नायक’ बनते जा रहे हैं। कर्नल पठानिया को इस लेखनी का कोटिश: नमन।

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1 Comment on "कश्मीर के कर्नल पठानिया को नमन"

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​शिवेंद्र मोहन सिंह
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​शिवेंद्र मोहन सिंह

हम सब राष्ट्रभक्तों का कोटिशः नमन कर्नल पठानिया को।

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