लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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अर्थ और उत्पत्ति

छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए आये दिन नक्सली होने के आरोप को झेलना और पुलिसिया अत्याचार को सहना आम बात है। हालात इतने बदतर हो गये हैं कि पुलिस उनको नक्सली समझती है और नक्सली उनको पुलिस का मुखबिर मानते हैं।

लिहाजा अपनी बदहाल स्थिति से निजात पाना ही आदिवासियों का शुरु से मूल उद्देश्य रहा है और यह तभी संभव है जब नक्सलियों को वे अपने घर, गाँव से बाहर खदेड़ने में सफल होते हैं।

इस संदर्भ में एक अरसे से आंतक और भय के माहौल में जी रहे सीधे-साधे आदिवासियों के प्रतिकार के प्रतीक के रुप में सलवा जुडूम के गठन को देखा जा सकता है।

के मधुकर राव के आह्वान पर छत्ताीसगढ़ के बीजापुर जिला के कुतरू ब्लॉक के अम्बेली गाँव में स्वत:स्फूर्त तरीके से सलवा जुडूम संगठन का जन्म 4 जून 2005 में हुआ। अम्बेली गाँव के साथ-साथ आस-पास के अनेक गाँव के लोग, जोकि नक्सल विरोधी थे, इस आंदोलन से जुड़ गये।

आंदोलन के जनक

के मधुकर राव पेशे से एक शिक्षक हैं। वे नक्सलियों की हिंसक और नकारात्मक मंशा से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। वे जानते हैं कि नक्सली कभी गरीब आदिवासियों का भला नहीं करेंगे। करोड़ों-अरबों की उगाही से वे सिर्फ अपना भला कर रहे हैं। विकास से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

विकास

अपनी स्थापना के साथ ही इस संगठन के सदस्य गाँव-गाँव में जाकर अपने आकार में वृद्धि के लिए प्रयास करने लगे। उनका कारवां आगे बढ़ता गया और लोग इस कारवां का हिस्सा बनते गये। इस कवायद में राजनीतिज्ञ भी इस आंदोलन से जुड़ गए। पुलिस इनको सुरक्षा प्रदान करने लगी। साथ ही पुलिस आदिवासियों को इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित भी करने लगी। कालांतर में आंदोलन के पक्ष में स्थिति इतनी सकारात्मक बन गई कि इस आंदोलन के विरोधी भी इससे जुड़ गये।

हजारों की संख्या में आदिवासी अपने गाँवों को छोड़कर कैम्प में रहने लगे। दरअसल इस आंदोलन का हिस्सा बनने के बाद उनके लिए गाँव में रहना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए उनके लिए जरुरी हो गया था कि वे सुरक्षित जगह पनाह लें।

इन कैम्पों में 1 रुपये की दर से सभी को अनाज उपलब्ध करवाया जाता था। जरुरत के मुताबिक उनको नरेगा के तहत मजदूरी भी उपलब्ध करवाई गई। सभी को 35000 रुपये घर बनाने के लिए दिये गए। सभी तरह की स्वास्थ एवं शैक्षणिक सुविधा से कैम्प को सुसज्जित बनाया गया।

पूरे राज्य में इसतरह के 23 कैम्प की स्थापना की गई। 14 बीजापुर जिले में और 9 दंतेवाड़ा जिला में। गंगालुर कैम्प में 600 सलमा जुडूम के समर्थक रहते थे। अब 300 लोग ही इस कैम्प में रहते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे नक्सल प्रभावित इलाकों में तकरीबन डेढ़ लाख सलवा जुडूम समर्थक अपने घर-गाँव छोड़कर कैम्प में रहने के लिए आये थे, जो आज घटकर बीजापुर में 8000 रह गये हैं और दंतेवाड़ा में 35000 ।

एक समय में चर्चित रहा नारा ”सलवा जुडूम जिंदाबाद, नक्सल भगाओ बस्तर बचाओ” आज कहीं अंधेरे के गर्त में खो गया है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो अब शुरुआती दौर का धधकता आग ठंडा हो चुका है।

पतन

आंदोलन के आगाज के दिनों में सभी कार्यकत्तर्ाा अपने निकट संबंधियों की मौत का बदला लेने की भावना से लबरेज थे। उनमें जबर्दस्त उत्साह था। वे पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना चाहते थे। अपने आंदोलन को वे क्रांति की तरह देखते थे।

इस तारतम्य में सलवा जुडूम आंदोलन को उपयोगी बनाने और राज्य सरकार की पुलिस को ताकतवर बनाने के लिए स्पेशल पुलिस ऑफिसियल (एसपीओ) का गठन किया गया।

नक्सलियों को कमजोर करने में एसपीओ ने अपनी प्रभावशाली भूमिका भी निभाई, परन्तु उन्हें नक्सलियों के गुस्से को भी झेलना पड़ा। 2006 में गंगालुर गाँव में 7 एसपीओ को बर्बर तरीके से मार डाला गया। आगे भी एसपीओ नक्सलियों के षिकार बनते रहे।

इसी बरक्स में बिडम्बना यह है कि इसके एवज में उनको महज 2100 रुपयों की मासिक वेतन मिलता था। हाल ही में उनकी तनख्वाह को 2100 से बढ़ाकर 3000 किया गया है। इसके अलावा इन एसपीओ को न कभी किसी पुरस्कार से नवाजा गया और न ही उन्हें राज्य की नियमित पुलिस बल में शामिल किया गया।

एसपीओ को छोड़ दें तो सलवा जुडूम के सामान्य समर्थक भी हमेशा नक्सलियों का निशाना बनते रहते रहे। सलवा जुडूम को कमजोर करने की रणनीति के तहत ही नक्सलियों ने द्रोणपाल में 30 सलवा जुडूम समर्थकों को लैंडमाईन ब्लॉस्ट के द्वारा उड़ा दिया था।

बाद में इस आंदोलन के समर्थक अपना प्रयोजन भूल गये। सलवा जुडूम का भ्रमजाल छीजने लगा। उनपर राजनीति और भ्रष्टाचार हावी हो गया। वे आदिवासियों को इस संगठन से जुड़ने के लिए मजबूर करने लगे। जो लोग अपना घर नहीं छोड़ना चाहते थे, उनको भी ऐसा करने के लिए विवश किया गया। इस आंदोलन के नेता कैम्पों में सरकार द्वारा मुहैया करवाई गई सुविधाओं का दुरुपयोग करने लगे।

बहुत सारे नेता मारे गये। इससे लोगों का यह भी भ्रम टूट गया कि कैम्प में रहने से उनकी जिंदगी बची रहेगी। समर्थकों को घर की याद आने लगी, क्योंकि कैम्प में वे अपनी स्वाभाविक जिंदगी को नहीं जी पा रहे थे। कैम्प का जीवन जीने का अनुभव उनके लिए जेल में जीवन जीने के समान था। वे वहाँ अपने रीति-रिवाजों का पालन करने और पर्व-त्यौहारों के उमंग को महसूस करने में असमर्थ थे।

आज गंगालुर और चेरपल कैम्प में संगठन के अधिकांश बचे हुए कार्यकर्ताओं के बीच में भारी असंतोष व्याप्त है। उन्होंने संगठन में अपना योगदान गुलामी और जिल्लत की जिंदगी से निजात पाने के लिए दिया था, किन्तु यहाँ आकर उन्हें निराशा के सिवाए कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

फिलहाल सलवा जुडूम के सदस्य के रुप में उनकी पहचान ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। अब वे न तो इस घाट के रहे हैं और न ही उस घाट के। मंझधार से निकलना उनके लिए असंभव हो गया है।

सलवा जुडूम से होने वाले फायदे

सलवा जुडूम के कारण ही आज छत्तीसगढ़ में अनेकानेक सकारात्मक परिवर्तन आये हैं। नक्सल इलाकों में पुलिस का मुखबिर बेस बढ़ा है। पहले 157 ग्राम पंचायतों में से केवल 70 ग्राम पंचायतों में ही पुलिस की पहुँच थी। आज यह बढ़कर 100 हो गई है। ग्राम पंचायतों में 21वीं शताब्दी की सुविधाएँ पहुँच रही हैं। सड़क के द्वारा गाँव शहर से जुड़ रहे हैं। सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ भी धीरे-धीरे गाँवों में प्रवेश कर रही हैं। बासगुड़ा और लिंगागिरि ऐसे गाँव हैं जहाँ पूर्व में नक्सलियों की मजबूत पकड़ थी, पर अब वहाँ उनकी पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

पश्चिम बंगाल में सलवा जुडूम

भले ही सलवा जुडूम छत्तीसगढ़ में असफल हो गया है। फिर भी उसकी उपयोगिता को खारिज नहीं किया जा सकता है। सलवा जुडूम के प्रणेता के मधुकर राव अब भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के सफाये में सलवा जुडूम की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं।

पश्चिम बंगाल में सीपीएम और राज्य सरकार की पुलिस ने मिलकर सलवा जुडूम के गठन की संकल्पना को साकार किया है। डेढ़ साल से इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए ताना-बाना बुना जा रहा था और अब यह पूर्ण रुप से सक्रिय हो चुका है। नक्सल प्रभावित जिलों क्रमश: लालगढ़, पुरुलिया और बांकुड़ा में यह फिलवक्त ज्यादा प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है और इसके फायदे भी स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

बदलते संदर्भ में उपयोगिता

दंतेवाड़ा में सुरक्षा बल के सदस्यों की नृषंस हत्या के बाद यह जरुरी हो गया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ऐसे विकल्प पर विचार किया जाये जो नक्सलियों के सफाये में पुलिस और अर्द्धसैनिक बल को संबल प्रदान कर सके। इस घटना के बाद यह भी पूर्ण रुप से साफ हो गया है कि आदिवासियों या जंगल के वाषिंदो के सहयोग के बिना सरकार नक्सलियों पर कभी काबू नहीं पा सकती है। विकल्पों के संक्रमण के दौर में सलवा जुडूम नक्सल समस्या के समाधान में सहयोगी साबित हो सकता है। अस्तु इस विकल्प को पुनश्‍च: मजबूत करने की आवश्‍यकता है, अगर इसे पूर्व में की गई गलतियों से मुक्त कर दिया जाए, तो निश्चित रुप से नक्सलियों का जड़ से सफाया हो सकता है।

-सतीश सिंह

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1 Comment on "सलवा जुडूम: नई सोच की जरुरत"

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Jeet Bhargava
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बहुत ही जानकारी -परक लेख. वाकई में सलवा जुडूम जैसे एक जन आन्दोलन को समर्थन मिलना चाहिए. क्योंकि यह जनता द्वारा जनता के लिए एक आन्दोलन है.

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