लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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raksha-bandhan18 अगस्त पर विशेष:-

मृत्युंजय दीक्षित
विविध संस्कृतियों के देश भारत में पर्वों की एक महान श्रृंखला चली आ रही है। पर्वों की उसी कड़ी में श्रावण शुक्ल मास की पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व का भारतीय समाज व संस्कृतिमें अत्यंत महत्व है। रक्षाबंधन के पर्व का अर्थ बहन द्वारा भाई के हाथों में राखी बंधवाना ही एकमात्र उददेश्य नहीं है अपितु रक्षाबंधन पर्व का महत्व वर्तमान राजनैतिक, सामाजिक परिस्थितियों में और भी अधिक बढ़ गया है। देश वर्तमान समय में चारंों ओर से चुनौतियों से घिरता चला जा रहा है। हम इस रक्षासूत्र के बहाने अपने देश व समाज को एकसूत्र में पिरेाकर रखने का भी संकल्प लेते हंैे। रक्षाबंधन मेें राखी या रक्षासूत्र का विशेष महत्व है। यह राखी कच्चे सूत जैसी वस्तु से लेकर रंगीन कलाव, रेशमी धाग, सोने या चांदी जैसी महंगी वस्तु की भी हो सकती है। राखी बांधने का प्रचलन समाज में व्यापक है। लगभग पूरे भारत में यह पर्व मनाया जाता है।
भारतमें तो आधुनिक युग में जहां इस पर्व का भी डिजिटलाइजेशन व सोशल मीडियाकरण हो गयाहैं वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति में भी इस पर्व को बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। सभी राजनेतिक दलों के नेतागण एक दूसरे को राखी बांधते हैं व आपसी राजनैतिक वैमनस्य को भुलवाकर एक दूसरे को रक्षाबंधन पर्व की बधाई देते हैं। नेताओं के राखी बंधवाने से समाज मे राष्ट्रीय एकता व समाजिक समरसता की भावना जागृत होती है। भारत के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति सहित सभी उच्चपदों पर विराजमान लोग रक्षासूत्र बांधकर व बंधवाकर देश की व समाज की सुरक्षा करने का वचन लेते व देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम उमंग व उत्साह के साथ मनाता है। यह एकमात्र ऐसा सामाजिक संगठन है जोकि सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने के लिए यभी सदस्यों को आपस में राखी बंधवाकर पर्व मनाता है और समाज की रक्षा का संकल्प लेता है।
रक्षाबंधन पर्व पर संघ परिवार का संदेश है कि, ”प्राचीनकाल से ही अपने देश के उत्सव एवं सामाजिक समरसता एवं सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ाने वले हैं ।रक्षाबंधन उत्सव इसी परम्परा की एक कड़ी है।“
राखी के इन सुकोमल धागों में भाई बहन का अटूट स्नेह बंधन गंुथा हुआ है। इन धागों में छिपा है नारी के सम्मान की रक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण करने वाले वीर पुरूषों का इतिहास। राजा बलि के साम्राज्यवाद से पृथ्वी को मुक्त कराने की वामनावतार की अदभुत गाथा का ये स्मरण हमें कराते हैं। इन पवित्र धागों से जन -जन के हृदय जोड़ने का नाम ही रक्षाबंधन है। समाज में अभी भी ऊंच- नीच,छूत- अछूत के भाव विद्यमान हैं। हम अपने सामने भगवान श्रीराम के आदर्श को सामने रखें । जिन्होंने निषादराज का आतिथ्य,भीलनी शबरी के बेर आदर और स्नेह के साथ ग्रहण किये। रक्षाबंधन के पर्व पर हमसभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम भेदभाव ,छूआछूत की दीवारें ढहा दें। संकल्प लेना चाहिए कि हम सब भारतमाता की संताने हैं ।एक हैं। हम सब इस विशाल हिंदू समाज के अंग हैं।“इस बार रखाबंधन के पव का और भी महत्व बढ़ गया है क्योंकि एक ओर जहां पीएम मोदी ने 15 अगस्त को संबोधनमें जातिवाद और संप्रदायवाद को न पनपने देने की बात कही थीं वहीं अ बवह एक बार फिर नये सिरे से पूरी ताकत के साथ बेहद खतरनाक ढंग से सिर उठा रहा है। रक्षाबंधन के दिन नेताओं के तो राखी बांधी ही जाती है भारतीय सेना के जवानों को भी राखी बांधी जाती है। सेना के जवानों के लिए विशेष प्रकार की तैयारियां की जाती हैं व पूरे देशभर से उनको राखी भेजी जाती है।
रक्षाबंधन पर्व का भारतीय पुराणों व साहित्य में वर्णन मिलता है। मुगलकालीन व स्वाधीनता संग्राम में भी रक्षाबंधन पर्व के महत्व व प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। अब फिल्मी दुनिया व टी वी के क्षेत्र में भी रक्षबंधन पर्व को दिखाया जाता है। जिसके चलते इस पर्व का खूब प्रचार- प्रसार भी हो रहा है तथा इस पर्व का उपयोग राजनैतिक दल व सामाजिक संगठन अपने हित साधन मे भी करने लग गये है। देश की लगभग सभी सरकारें इस पर्व का उपयोग नारी शक्ति को अपने पक्ष में करने के लिए तमाम तरह की घोषणाएं भी करती हैं। रक्षाबंधन पर्व का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागरण के लिए भी सहारा लिया गया।
बंगालमें रवींद्र नाथ ठाकुर ने बंगभंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन पर्व को बंगाल निवासियों के लिये पारस्परिक एकता का प्रतीक बनाकर इस पर्व का राजनैति उपयोग प्रारम्भ किया। 1905 में उनकी प्रसिद्ध कविता मातृभूमि वंदना का प्रकाशन हुआ। लार्ड कर्जन ने बंगभंग करके वंदेमातरम के आंदोलन से भड़की एक छोटी- सी चिंगारी को शोले में बदल दिया। 16 अक्टूबर 1905 के दिन बंगभंग की नियत घोषणा के दिन रक्षाबंधन की योजना साकार र्हुअ और लोग गंगास्नान करे सड़कों पर उतर आये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित तमाम हिंदू संगठनों की ओर से समाािजक समरसता ओर विश्व बंधुत्व की भावना को प्रबल बनाने के लिए रक्षासूत्र बांधने का आयोजन किया जाता है।इस बार पूरे देशभरमें दलितों के बीच व्यापक पैमाने पर रक्षाबंधन बनाया जा रहा है।
भारत के प्रत्येक प्रांत में यह पर्व किसी न किसी नाम से जाना जाता है। उत्तरांचल में इस पर्व को श्रावणी कहते हैं। अमरनाथ यात्रा का समापन भी रक्षाबंधन के दिन होता है। महाराष्ट्र में इस दिन लोग नदी या समुद्र के किनारे एकत्र होते हैं और पवित्र होकर नया जनेऊ धारण करते हैं। यही कारण है कि इस दिन मुंबई के समुद्र तट नारियल के फलों से भर जाते हैंै। राजस्थान में यह पर्व रामराखी और चूड़ाराखी के नाम से जाना जाता है। इस दिन यह बांधने की परम्परा भी राजस्थान में हैं। तमिलनाडु ,केरल ,महाराष्ट्र और ओडिशा के दक्षिण में इस पर्व को अवनिअवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीत धारी ब्राहमणेंा के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन पवित्र होने के बाद ऋ़षियों का तर्पण करके नया जनेऊ धारण किया जाता है। स्वच्छ जीवन प्रारम्भ करने की प्रतिज्ञा की जाती है। व्रज में हरियाली तीज से लेकर श्रावणी पूर्णिमा तक समस्त मंदिरांे में ठाकुर जी झूलों विराजमान रहते हैं। रक्षाबंधन के दिन झूलन दर्शन समाप्त होता है।
अनेक साहित्यिक ग्रंथोें में रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है। इसमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण हरिकृष्ण प्रेमी का नाटक रक्षाबंधन है जिसका 1991 में 18वां संस्करण प्रकाशित हो चुका है। मराठी साहित्य में भी रक्षाबंधन का उल्लेख मिलता है। यही नहीं 1950 और 60 के दशकमें रक्षाबंधन हिंदी फिल्मों का मुख्य विषय रहा है। 1947 व 1962में राखी नाम से दो फिल्मे बनीं सन 62 में आई फिल्म को ए. भीम सिंह ने बनाया था। सन 1972 में एस. एम. सागर ने फिल्म बनायी थी राखी और हथकड़ी जबकि सन 1976 में राधाकान्त शर्मा ने बनायी थी राखी और राइफल । जिसमें दारासिंह ने मुख्य भूमिका अदा की थी और यह मसाला फिल्म थी।
एक प्रकार से देखा जाये तो रक्षाबंधन नारी अस्मिता व उसकी रक्षा का पर्व तो है ही साथ ही सामाजिक समरसता को बढ़ाने का भी पर्व है। लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि आज भी नारी उत्पीड़न तेजी से बढ़ रहा है। रक्षासूत्र बंधवाने का काम तभी सफल होग जब देश का युवा नारी को सम्मान दे तथा साज में बढ़ रही अपराधिक वृत्तियों के रोकथाम में सहायक बनें। आज बहनें अपने घर परिवार में ही सुरक्षित नहीं रह गयी हैं। अतः रक्षाबंधन का पर्व तभी सार्थक माना जायेगा जब हमारी बहनें व नारी शक्ति हर जगह अपने आपको पूर्ण रूप से सुरक्षित महसूस कर सकें। यहपर्व पूरी तरह से सामाजिक समरसता लाने व देश को एकता के सूत्र में पिरोकर रखने का पर्व है।

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