लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

Posted On by &filed under राजनीति.


akhileshडा. राधेश्याम द्विवेदी

1. समाजवाद आर्थिक-सामाजिक दर्शन :- समाजवाद (Socialism) एक आर्थिक-सामाजिक दर्शन है। समाजवादी व्यवस्था में धन-सम्पत्ति का स्वामित्व और वितरण समाज के नियन्त्रण के अधीन रहते हैं। आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक प्रत्यय के तौर पर समाजवाद निजी सम्पत्ति पर आधारित अधिकारों का विरोध करता है। उसकी एक बुनियादी प्रतिज्ञा यह भी है कि सम्पदा का उत्पादन और वितरण समाज या राज्य के हाथों में होना चाहिए। राजनीति के आधुनिक अर्थों में समाजवाद को पूँजीवाद या मुक्त बाजार के सिद्धांत के विपरीत देखा जाता है। एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में समाजवाद युरोप में अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में उभरे उद्योगीकरण की अन्योन्यक्रिया में विकसित हुआ है।

2.गाँधीवादी समाजवाद  :-ब्रिटिश राजनीतिक विज्ञानी हैरॉल्ड लॉस्की ने कभी समाजवाद को एक ऐसी टोपी कहा था जिसे कोई भी अपने अनुसार पहन लेता है। समाजवाद की विभिन्न किस्में लॉस्की के इस चित्रण को काफी सीमा तक रूपायित करती है। समाजवाद की एक किस्म विघटित हो चुके सोवियत संघ के सर्वसत्तावादी नियंत्रण में चरितार्थ होती है जिसमें मानवीय जीवन के हर सम्भव पहलू को राज्य के नियंत्रण में लाने का आग्रह किया गया था। उसकी दूसरी किस्म राज्य को अर्थव्यवस्था के नियमन द्वारा कल्याणकारी भूमिका निभाने का मंत्र देती है। भारत में समाजवाद की एक अलग किस्म के सूत्रीकरण की कोशिश की गयी है। राममनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और नरेन्द्र देव के राजनीतिक चिंतन और व्यवहार से निकलने वाले प्रत्यय को ‘गाँधीवादी समाजवाद’ की संज्ञा दी जाती है।

3.परिभाषा:- समाजवाद अंग्रेजी और फ्रांसीसी शब्द ‘सोशलिज्म’ का हिंदी रूपांतर है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस शब्द का प्रयोग व्यक्तिवाद के विरोध में और उन विचारों के समर्थन में किया जाता था जिनका लक्ष्य समाज के आर्थिक और नैतिक आधार को बदलना था और जो जीवन में व्यक्तिगत नियंत्रण की जगह सामाजिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे। समाजवाद शब्द का प्रयोग अनेक और कभी कभी परस्पर विरोधी प्रसंगों में किया जाता है; जैसे समूहवाद अराजकतावाद, आदिकालीन कबायली साम्यवाद, सैन्य साम्यवाद, ईसाई समाजवाद, सहकारितावाद, आदि – यहाँ तक कि नात्सी दल का भी पूरा नाम ‘राष्ट्रीय समाजवादी दल’ था। समाजवाद की परिभाषा करना कठिन है। यह सिद्धांत तथा आंदोलन, दोनों ही है और यह विभिन्न ऐतिहासिक और स्थानीय परिस्थितियों में विभिन्न रूप धारण करता है। मूलत: यह वह आंदोलन है जो उत्पादन के मुख्य साधनों के समाजीकरण पर आधारित वर्गविहीन समाज स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है और जो मजदूर वर्ग को इसका मुख्य आधार बनाता है, क्योंकि वह इस वर्ग को शोषित वर्ग मानता है जिसका ऐतिहासिक कार्य वर्गव्यवस्था का अंत करना है।

4.आदिकालीन साम्यवादी:-  आदिकालीन साम्यवादी समाज में मनुष्य पारस्परिक सहयोग द्वारा आवश्यक चीजों की प्राप्ति और प्रत्येक सदस्य के आवश्यकतानुसार उनका आपस में बँटवारा करते थे। परंतु यह साम्यवाद प्राकृतिक था; मनुष्य की सचेत कल्पना पर आधारित नहीं था। आरंभ के ईसाई पादरियों की रहन-सहन का ढंग बहुत कुछ साम्यवादी था, वे एक साथ और समान रूप से रहते थे, परंतु उनकी आय का स्रोत धर्मावलंबियों का दान था और उनका आदर्श जनसाधारण के लिए नहीं, वरन् केवल पादरियों तक सीमित था। उनका उद्देश्य भी आध्यात्मिक था, भौतिक नहीं। यही बात मध्यकालीन ईसाई साम्यवाद के संबंध में भी सही है। पीरू (Peru) देश की प्राचीन इंका (Inka) सभ्यता को ‘सैन्य साम्यवाद’ की संज्ञा दी जाती है, परंतु उसका आधार सैन्य संगठन था और वह व्यवस्था शासक वर्ग का हितसाधन करती थी। नगरपालिकाओं द्वारा लोकसेवाओं के साधनों को प्राप्त करना, अथवा देश की उन्नति के लिए आर्थिक योजनाओं के प्रयोग मात्र को समाजवाद नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि इनके द्वारा पूँजीवाद को ठेस पहुँचे। नात्सी दल ने बैंकों का राष्ट्रीकरण किया था परंतु पूँजीवादी व्यवस्था अक्षुण्ण रही।

5.उन्नीसवीं सदी का समाजवाद:- समाजवाद की राजनीतिक विचारधारा उन्नीसवीं सदी के तीसरे और चौथे दशकों के दौरान इंग्लैण्ड, फ़्रांस तथा जर्मनी जैसे युरोपीय देशों में लोकप्रिय होने लगी थी। उद्योगीकरण और शहरीकरण की तेज गति तथा पारम्परिक समाज के अवसान ने युरोपीय समाज को सुधार और बदलाव की शक्तियों का अखाड़ा बना दिया था जिसमें मजदूर संघों और चार्टरवादी समूहों से लेकर ऐसे गुट सक्रिय थे जो आधुनिक समाज की जगह प्राक्-आधुनिक सामुदायिकतावाद की वकालत कर रहे थे। मार्क्स और एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित वैज्ञानिक समाजवाद का विचार सामाजिक और राजनीतिक उथलपुथल की इसी पृष्ठभूमि में विकसित हुआ था। मार्क्स ने सैं-सिमों, फ़ूरिए और ओवेन के विचारों से प्रेरणा तो ली, लेकिन अपने ‘वैज्ञानिक’ समाजवाद के मुकाबले उनके समाजवाद को ‘काल्पनिक’ घोषित कर दिया। इन पूर्ववर्ती चिंतकों की तरह मार्क्स समाजवाद को कोई ऐसा आदर्श नहीं मानते कि उसका स्पष्ट ख़ाका खींचा जाए। मार्क्स और एंगेल्स समाजवाद को किसी स्वयं-भू सिद्धांत के बजाय पूँजीवाद की कार्यप्रणाली से उत्पन्न होने वाली स्थिति के रूप में देखते हैं। उनका मानना था कि समाजवाद का कोई भी रूप ऐतिहासिक प्रक्रिया से ही उभरेगा। इस समझ के चलते मार्क्स और एंगेल्स को समाजवाद की विस्तृत व्याख्या करने या उसे परिभाषित करने से भी गुरेज़ था। उनके लिए समाजवाद मुख्यतः पूँजीवाद के नकार में खड़ा प्रत्यय था जिसे एक लम्बी क्रांतिकारी प्रक्रिया के ज़रिये अपनी पहचान ख़ुद गढ़नी थी। समाजवाद के विषय में मार्क्स की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना ‘क्रिटीक ऑफ़ द गोथा प्रोग्रैम’ है जिसमें उन्होंने समाजवाद को साम्यवादी समाज के दो चरणों की मध्यवर्ती अवस्था के तौर पर व्याख्यायित किया है।

6.मार्क्सवादी समाजवाद:- गौरतलब है कि मार्क्स की इस रचना का प्रकाशन उनकी मृत्यु के आठ साल बाद हुआ था। तब तक मार्क्सवादी सिद्धांतों में इसे ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता था। इस विमर्श को मार्क्सवाद के मूल सिद्धांतों में शामिल करने का श्रेय लेनिन को जाता है, जिन्होंने अपनी कृति ‘स्टेट ऐंड रेवोल्यूशन’ में मार्क्स के हवाले से समाजवाद को साम्यवादी समाज की रचना में पहला या निम्नतर चरण बताया। लेनिन के बाद समाजवाद मार्क्सवादी शब्दावली में इस तरह विन्यस्त हो गया कि कोई भी व्यक्ति या दल किसी ख़ास वैचारिक दिक्कत के बिना ख़ुद को समाजवादी या साम्यवादी कह सकता था। इस विमर्श की विभाजक रेखा इस बात से तय होती थी कि किसी दल या व्यक्ति के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों का तात्कालिक और दूरगामी लक्ष्य क्या है। यानी अगर कोई ख़ुद को समाजवादी कहता था तो इसका मतलब यह होता था कि वह साम्यवादी समाज की रचना के पहले चरण पर जोर देता है। यही वजह है कि कई समाजवादी देशों में शासन करने वाले दल जब ख़ुद को कम्युनिस्ट घोषित करते थे तो इसे असंगत नहीं माना जाता था।

7.बीसवीं शताब्दी का समाजवाद:- बीसवीं शताब्दी में समाजवाद का अंतर्राष्ट्रीय प्रसार तथा सोवियत शासन व्यवस्था एक तरह से सहवर्ती परिघटनाएँ मानी जाती हैं। यह एक ऐसा तथ्य है जिसने समाजवाद के विचार और उसके भविष्य को गहराई से प्रभावित किया है। उदाहरणार्थ, क्रांति के बाद सोवियत संघ उसके समर्थकों और आलोचकों, दोनों के लिए समाजवाद का पर्याय बन गया। सोवियत समर्थकों की दलील यह थी कि उत्पादन के प्रमुख साधनों के समाजीकरण, बाज़ार को केंद्रीकृत नियोजन के मातहत करने, तथा विदेश व्यापार व घरेलू वित्त पर राज्य के नियंत्रण जैसे उपाय अपनाने से सोवियत संघ बहुत कम अवधि में एक औद्योगिक देश बन गया। जबकि उसके आलोचकों का कहना था कि यह एक प्रचारित छवि थी क्योंकि विराट नौकरशाही, राजनीतिक दमन, असमानता तथा लोकतंत्र की अनदेखी स्वयं ही समाजवाद के आदर्श को खारिज करने के लिए काफी थी। समाजवाद के प्रसार में सोवियत संघ की दूसरी भूमिका एक संगठनकर्ता की थी। समाजवादी क्रांति के प्रसार के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल जैसे संगठन की स्थापना करके उसने ख़ुद को समाजवाद का हरावल सिद्ध किया। इस संगठन ने विश्व की कम्युनिस्ट पार्टियों का लम्बे समय तक दिशा-निर्देशन किया। सोवियत संघ की भूमिका का तीसरा पहलू यह था कि उसने पूर्वी युरोप में कई हमशक्ल शासन व्यवस्थाएँ कायम की। अंततः सोवियत संघ समाजवाद की प्रयोगशाला इसलिए भी माना गया क्योंकि रूसी क्रांति के बाद स्तालिन के नेतृत्व में यह सिद्धांत प्रचारित किया गया कि समाजवादी क्रांति का अन्य देशों में प्रसार करने से पहले उसे एक ही देश में मजबूत किया जाना चाहिए। कई विद्वानों की दृष्टि में यह एक ऐसा सूत्रीकरण था जिसने राष्ट्रीय समाजवाद की कई किस्मों के उभार को वैधता दिलायी।

8.द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का समाजवाद:- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुई वि-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के दौरान समाजवाद और राष्ट्रवाद का यह संश्रय तीसरी दुनिया के देशों में समाजवाद के विकास का एक प्रारूप सा बन गया। चीन, वियतनाम तथा क्यूबाजैसे देशों में समाजवाद के प्रसार की यह एक केंद्रीय प्रवृत्ति थी। सोवियत समर्थित समाजवाद के अलावा उसका एक अन्य रूप भी है जिसने पूँजीवादी देशों को अप्रत्यक्ष ढंग से प्रभावित किया है। मसलन, समाजवाद के तर्क और उसके आकर्षण को प्रति-संतुलित करने के लिए पश्चिम के पूँजीवादी देशों को अपनी अर्थव्यवस्था के साँचे को बदल कर उसे कल्याणकारी रूप देना पड़ा। इस संदर्भ में स्कैंडेनेवियाई देशों, पश्चिमी युरोप तथा आस्ट्रेलेशिया क्षेत्र के देशों में कींस के लोकोपकारी विचारों से प्रेरित होकर सोवियत तर्ज़ के समाजवाद का विकल्प गढ़ने का प्रयास किया गया। माँग के प्रबंधन, आर्थिक राष्ट्रवाद, रोजगार की गारंटी, तथा सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र को मुनाफाखोरी की प्रवृत्तियों से मुक्त रखने की नीति पर टिके इन कल्याणकारी उपायों ने एकबारगी पूँजीवाद और समाजवाद के अंतर को ही धुँधला कर दिया था। राज्य के इस कल्याणकारी मॉडल को एक समय पूँजीवाद की विसंगतियों— बेकारी, बेरोज़गारी, अभाव, अज्ञान आदि का स्थाई इलाज बताया जा रहा था। इस मॉडल की आर्थिक और राजनीतिक कामयाबी का सुबूत इस बात को माना जा सकता है कि अगर वामपंथी दायरों में इन उपायों की प्रशंसा की गयी तो दक्षिणपंथी राजनीति भी उनका खुला विरोध नहीं कर सकी। दूसरे विश्व-युद्ध की समाप्ति के बाद तीन दशकों तक बाज़ार केंद्रित समाजवाद का यह मॉडल काफी प्रभावशाली ढंग से काम करता रहा। लेकिन सातवें दशक में मंदी और मुद्रास्फीति की दोहरी मार तथा कल्याणकारी पूँजीवाद के गढ़ में बढ़ते सामाजिक और औद्योगिक असंतोष के कारण इस मॉडल के औचित्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे। मार्क्सवादी शिविर के विद्वान भी लगातार यह कहते आ रहे थे कि कल्याणकारी भंगिमाओं ने असमानता और शोषण को खत्म करने के बजाय पूँजीवाद को ही मजबूत किया है। इस मॉडल का एक आपत्तिजनक पहलू यह भी प्रकट हुआ कि कामगार वर्ग को जीवन की बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने वाली मशीनरी के द्वारा राज्य उस पर नियंत्रण करने की स्थिति में आ गया।

9.नव-उदारतावादी समाजवाद:- बाजार को कायम रखते हुए समाजवाद के कुछ तत्त्वों पर अमल करने वाले इस मॉडल का नव-उदारतावादी बुद्धिजीवी शुरू से ही विरोध करते आये थे। सातवें दशक में यह वर्ग जोर-शोर से कहने लगा था कि समाजवाद न केवल अर्थव्यवस्था को जड़ (निर्जीव) बना देता है बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन लेता है। नवें दशक में जब सोवियत संघ के साथ पूर्वी युरोप की समाजवादी व्यवस्थाएँ एक के बाद एक ढहने लगी तो समाजवाद की इस आलोचना को व्यापक वैधता मिलने लगी और समाजवाद के साथ इतिहास के अंत की भी बातें की जाने लगी। विजय के उन्माद में उदारवादी बुद्धिजीवियों ने यह भी कहा कि मनुष्यता के लिए पूँजीवाद ही एकमात्र विकल्प है लिहाजा अब उसके विकल्प की बात भूलकर केवल यह सोचा जाना चाहिए कि पूँजीवाद की कोई और शक्ल क्या हो सकती है।

 

10.उत्तर प्रदेश समाजवादी सरकार की आधुनिक व्यवस्था :-
उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के दो कार्यकालों को पूरा कर लेने के बाद समाजवादी पार्टी के युवा नेता मा.अखिलेश यादव के अथक प्रचार प्रसार  तथा इसी पार्टी के तीन बार मुख्य मंत्री रहे धरतीपुत्र मा. मुलायम सिंह यादव के पुराने कार्यों पर यकीन करते हुए प्रदेश की जनता ने मार्च 2012 में स्पष्ट विशाल बहुमत देकर सत्तासीन किया था. सर्व प्रथम इस सरकार ने अपने करीबियो तथा खास लोगों को वोट बैंक के लिहाज से कन्या विद्या धन तथा बेरोजगार भत्ता देना शुरू किया. इसके बाद अपने खास आदमियों को विभिन्न विभागों एवं निगमों में राज्यमंत्री का मानद पद बांटना शुरू कर दिया. पुलिस लेखपाल, शिक्षमित्रों आदि अनेक तरह के विवदित तथा पक्षपात पूर्ण भर्तियां की जाने लगी.
कानून व्यवस्था के मामले में इस पार्टी पर हमेशा उंगली उठती रही है .इस पार्टी के शासन में अराजकता तथा अफरातफरी का माहौल उत्पन्न हो जाता है. जनता को किये गये कुछ वादे पूरे तो कुछ अधूरे ही रह गये हैं. नेता जन उल्टा सीधा बयान देकर भ्रमित करते रहे हैं. दागियों को महिमा मंडित किया जाने लगा है. रेवड़ियां बंटने लगी हैं. सुरक्षा एजेसियों द्वारा पकड़े गये आतंकवादियों तथा माफियाओं को जेलों से मुक्त किया जाने लगा है. हजारो एवं करोड़ों के भ्रष्टाचार में आरोपी यादव सिंह जैसे अन्यानेक के कृत्यों की जांच रोकने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरूप्योग किया जाने लगा है. अनिल यादव जैसे अपने व्यक्तिगत प्रभाव वाले लोगों को राज्य लोक सेवा आयोग तथा माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है. इनके पक्षपात पूर्ण निर्णयों की न केवल आलेचना हुई है अपितु सरकार की पूरी किरकिरी भी हुई है. अमरमणि तथा राजा भैया जैसे लोगों को तरह तरह सुविधायें दी जाने लगी है. न्यायालयों को वेवकूफ बनाने तथा बरगलाने के प्रयास किये जाने लगे हैं. लखनऊ, इलाहाबाद के उच्च न्यायालयों तथा माननीय उच्चतम न्यायालय को बार बार हस्तक्षेप करना पड़ा है. फटकार भी लगी और उससे कोई नसीहत भी नहीं मानी गई है. देश के मंहगे एवं नामी गिरामी वकील जैसे श्री रामजेठ मलानी तथा कपिल सिब्बल आदि को लगाकर केसों की पैरवियां की गई है. बार बार सरकार को माननीय कोर्टो द्वारा लताड़ा गया है.

 
पूरे देश में इस राज्य की सरकार की जग हंसाई होने लगी है.  इस सरकार ने जिन विवादित मुद्दों पर मात खाई है और न्यायालयों में इसकी किरकिरी हुई है उनमें कुछ का आगे उल्लेख किया जाना सम सामयिक है.
1.आतंकियों की रिहाई:- समाजवादी का वोट वैंक का आधार पिछड़ी जातियों को प्रलोभित तथा अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में आकर्षित करना रहा है. वह इन अल्प संख्यकों का खुलेआम समर्थन करती है. इसी क्रम में सुरक्षा एजेन्सियों द्वारा पकड़े गये आतंकियों को राजाज्ञा द्वारा केस वापस लेने का सिलसिला भी शुरू किया गया. यह बात उच्च न्यायालय के संज्ञान में आने पर वह सरकार से न केवल तीन साल में वापस किये गये मुकदमों की सूची मांग लिया अपितु सख्त लहजे में सरकार की नीयत पर भी सवाल उठाये हैं. बाद में यह मामला उच्चतम न्यायालय तक भी गया है.

2.मुजफ्फरनगर का दंगा:- सरकार ने समय रहते इस दंगे पर प्रभावी कदम नहीं उठाये थे और उस समय सारा सरकारी अमला सैफई महोत्सव में आनन्द ले रहा था. बाद में इसका ठीकरा मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा पर थोपकर अपने को अल्पसंख्यको का हितैषी घोषित करते हुए अपनी पीठ थपथपाई गई. उच्चतम न्यायालय ने सरकार की नाकामयाबियों पर खूब लताड़ लगाई थी. इतना ही नहीं यह मुद्दा इतना प्रभावी रहा कि लोक सभा चुनाव में इस पार्टी को करारी हार का मुख देखना पड़ा.

3.बदायूं रेप पीड़ित मामला:- इस मामले में कुछ स्वजातीय तथा पुलिस के लोगों के नाम आने से त्वरित कार्यवाही नही हो पाई थी औेर सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी. इतना ही नहीं माननीय मुलायम सिंह जी के बयान ने भी उस समय एक तूफान खड़ा कर दिया था. महिला संगठनों ने इसका पुरजोर विरोध किया था.

4.पुलिस नेता गठजोड़ः- देश के अन्य भागों की अपेक्षा उत्तर प्रदेश में गैगरेप के मामले बढ़े है. नेता के साथ साथ पुलिस वालों के खातों में यह पाप ज्यादा ही आया है. इन सजातीय पुलिस वालों को राजनीतिक संरक्षण होने के कारण इस बुराई खत्म करने के बजाय बढावा देना शुरू कर दिया. आज के जमाने में पुलिस आम लोग की रक्षा कम कर रही है तथा नेताओं व अपराधियों के साठगांठ के फलस्वरूप आम जनता को पुलिस से दोचार होना पड़ रहा है. गृह विभाग तथा पुलिस विभाग नेताओं एवं अपराधियों के चंगुल में आ गया है. इसमें सब ओर से जनता ही पिस रही है.

5.यादव सिंह मामला:- यादव सिंह नोयडा विकास प्राधिकरण का चीफ इंजीनियर था. उस पर हजारों करोड़ो से अधिक रूपये के घोटाले का आरोप था. वैसे तो यह अधिकारी पिछली मायावती सरकार के जमाने से ही  अपनी काली करतूतों के कारण चर्चा में रहा. इसने समाजवादी सरकार को इतना प्रभावित कर लिया था कि इसे बचाने तथा इसमें लिप्त पार्टी के लोगों का नाम उजागर होने के भय से इसकी सीबीआई जांच ना करने तथा राज्य सरकार द्वारा स्वयं इसकी जांच करने का भरपूर प्रसास किया गया था. सरकार ने हाई कोर्ट में भी अपना पक्ष रखा थां जिसे पहले हाई कोर्ट ने तथा बादमें सुप्रिम कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया था. इन दोनो न्यायालयों ने दोनों सरकारों की निश्ठा पर प्रष्न चिन्ह लगाये थे. इसे भ्रश्टाचार का एक बहुत बड़ा नमूना बताया गया है.

6.लोक सेवा तथा माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग:- उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग तथा माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं वर्ग विशेष को लाभ पहुचाने का प्रयास किये हैं. जिसका छात्रों ने व्यापक विरोध तथा जन आन्दोलन चलाया था. सरकार ने नियमो का पालन न करते हुए अपने चहेतों को इन आयोगो का अध्यक्ष बना दिया था. इनके कारनामों ने प्रदेश में तूफान खड़ा कर दिया था. इस पर न्यायालय को हसतक्षेप करना पड़ा था. जिसने अनिल यादव, लाल विहारी पाण्डेय व उसके तीन सदस्यो तथा सुनील कुमार की नियुक्ति को अवैध करार कर उन्हें उनके पदो ये हटवा दिया गया था.

7.शिक्षक भर्तीः- पिछली मायावती सरकार के समय 72 हजार से अधिक प्राथमिक शिक्षक की भर्ती में समय समय पर मानक बदलते देखे गये हैं. इस पर कई बार न्यायालय को हस्तक्षेप भी करना पड़ा है. शिक्षक पात्रता की मेंरिट के बजाय शैक्षणिक अंको के आधार पर भर्तियां की गयी है. शैक्षणिक अंक योग्यता के आधार तो हो सकते हैं किन्तु हासिल किये गये अंको की गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगता ही है, जबकि प्रवेश परीक्षा में यह खतरा कम से कम होता है. इस पर पहले उच्च न्यायालय ने रोक लगाया था तो सरकार सर्वोच्च न्यायालय गई जहां उच्च न्यायालय का निर्णय को ही उचित ठहराया गया.

8.मनरेगा घोटालाः- मनरेगा जहां आम जनता के हित के लिए शुरू किया गया था वहीं उसका दुरूप्योग प्रभावशाली लोग करके सरकारी धन का बन्दर बांट भी करते देखे गये हैं. यह बात आडिट में पकड़ में आने पर इस पर खूब राजनीति चली है. इसकी सीबीआई से जांच की मांग उठी तो सरकार इसे रोकवाने के लिए पहले हाई कोर्ट में अपील की जहां उसकी दलील खारिज हो जाने पर वह सर्वोच्च न्यायालय में पुनः अपील कीं यह भी खारिज हो जाने पर इस बात का बल मिला कि सरकार की मिली भगत से उसके खास लोग ही इस घोटाले के कर्ताधर्ता हैं.

9.अवैध खनन:- सत्ता के निकट रहने वाले लोगों ने अपनी राजनीतिक पहुँच होने का लाभ उठाते हुए प्रदेश के खनन नियमों की अनदेखी करते हुए प्राकृतिक श्रोतों- जैसे पहाड़, नदियां तथा जंगलों की सम्पदाओं का खनन तथा दोहन करना शुरू कर दिया है. सरकार इसे रोक पाने में पूर्ण अक्षम पायी गयी है. अनेक वफादार अधिकरियों का खनन माफियाओं का शिकार होकर जान भी गवांनी पड़ी. खनन को लेकर प्रदेश में माफिया, राजनेता, अधिकारी तथा ठेकेदारों को एक सूचनातंत्र काम कर रहा है. उच्च न्यायालय के द्वारा इस विशय पर टिप्पणी करने पर सरकार के विवादित खनन मंत्री गायत्री प्रजापति सहित पूरी सरकार विपक्ष के आलोचनाओं के निशाने पर रहे है.

10.दुर्गाशक्ति नागपाल मामलाः- उत्तर प्रदेश कैडर की 2009 बैच की आई ए एस तथा नोयडा में  एस डी एम के पद पर कार्यरत सिविल सेवा की एक महिला अधिकारी , जिसने अवैध खनन के विरूद्ध कार्यवाही करते हुए अपनी जिम्मेदारी से डियुटी निभाई थी एक समाजवादी प्रभावशाली नेता के क्रोध का शिकार बन गई थी. मुख्यमंत्री कार्यालय ये आनन फानन में उसके सस्पेंशन का आदेश जारी हो गये थे. यह मामला न केवल उत्तर प्रदश में अपितु पूरे भारत वर्ष में गरमाया था . इसमें भी न्यायालय ने हस्तक्षेप किया तब जाकर इस महिला की बहाली हुई थी. इतना ही नहीं उस महिला के पति श्री अभिषेक सिंह जो मूलतः पंजाब कैडर के 2011 बैच के आई ए एस थे उन्हें भी बदले की भवना से प्रताड़ित किया गया था.

11.शिक्षामित्रों का समायोजन: उत्तर प्रदेशके विशाल भूभाग मे शिक्षको की कमी बड़ी संख्या में रही हैं. इस कमी को पूरा करने के लिए 3500 रूपये के मानदेय पर शिक्षामित्रों की नियुक्ति की गई थी. इनकी नियुक्तियां किसी वैधानिक तरीके से न करके उस गांव के प्रधान या प्रभावशाली व्यक्ति के सिपारिशो पर कर ली गयी थी. इनके शिक्षा व योग्यता में कोई एक रूपता नहीं रखी गयी और तमाम अपात्रों का समायोजन कर लिया गया. 3500 रूपये में शिक्षक मिल जाने से नियमित शिक्षकों का चयन भी रोक दिया गया. बाद में ये शिक्षामित्रों अपने स्थायित्व के लिए जोर देने लगे. समाजवादी पार्टी ने चुनाव में इन शिक्षामित्रों के समायोजन का वादा कर रखा था. सरकार ने आनन फानन में राजाज्ञा जारी करते हुए इन्हें नियमित करना प्रारम्भ कर दिया था. तमाम योग्य तथा प्रशिक्षित शिक्षक इधर उधर मारा मारा फिर रहे थे. इनमें कुछ ने न्यायालय की शरण ले रखी थी तो सारी अनियमितताओं पर्दाफाश हुआ. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस प्रक्रिया पर रोक लगा दिया. शिक्षामित्र आन्दोलन पर उतर आये. प्रदेश सरकार को उच्चतम न्यायालय के शरण में जाना पड़ा. जहां सर्वोच्च न्यायाजय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दिया और काम चलाऊ शिक्षा वाले शिक्षामित्रों को पुनः स्थाई किये जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इन्हे शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करने का मौका दे दिया गया है.

12.विजय शकर पाण्डेय केसः- भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री विजय शंकर पाण्डेय ने काले धन के खिलाफ मुद्दा उटाया था तो उ. प्र. सरकार ने उनके विरुद्ध जांच बैठा दिया. श्री पांडे सर्वोच्च नयायालय चले गये जहां उनके विरुद्ध चल रही जांच निरस्त कर दी गयी तथा उनको परेशान करने के एवज में उ. प्र. सरकार के विरुद्ध 5 लाख हर्जाना भी लगा दिया गया. साथ ही इस कार्य को करने का कारण बनाते का निर्देश भी दिया गया. इस केस से सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी.

13.अमिताभ ठाकुर मामलाः- श्री ठाकुर आई पी एस अधिकारी थे. जो अपने सच्चे कामो के कारण एक विशेष स्थान बनाये हुए थे. इस सही काम से सरकार की छवि धूमिल हो रही थी. सपा प्रमुख मा. मुलायम सिंह यादव ने श्री ठाकुर को फोन पर धमकी दिया था तो श्री ठाकुर ने इसकी एक शिकायत थाने मे दर्ज करा दी थी. बदले की भावना से तथा अनुशासनहीनता एवं उच्च न्यायालय के निर्देषों की अवहेलना का आरोप लगाकर श्री ठाकुर को सस्पेन्ड कर दिया गया. यह अवधि और 6 माह बढ़ाया गया है. इस मामले से भी सरकार की बहुत किरकिरी हुई है. श्री ठाकुर को बहुत कठिनाइयों से गुजरना पड़ रहा है.

14.पंचायत चुनावों में धांधलीः- उत्तर प्रदेश के 74 जिलो में कुल 3112 जिला पंचायत सदस्यों , जिलापंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और एमएलसी का निर्वाचन विगत माहों में सम्पन्न हुआ है. इसके साथ ग्राम पंचायत के प्रधानों का निर्वाचन भी हो गया है. इस चुनाव में पैसा प्रलोभन का खूब बोलबाला रहा है. साथ ही सत्ता पक्ष के लोगों ने सरकारी मशीनरी को अपने प्रभाव में लेकर चुनाव को प्रभावित करने का भी प्रयास किया है.

15.समाजवाद की नई टीम :- भारत में समाजवाद की एक अलग किस्म के सूत्रीकरण की कोशिश की गयी है। राममनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और नरेन्द्र देव के राजनीतिक चिंतन और व्यवहार से निकलने वाले प्रत्यय को ‘गाँधीवादी समाजवाद’ की संज्ञा दी जाती है। लोक नायक जय प्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राज नारायण जी,डॉ राम मनोहर लोहिया और पंडित जनेश्वर मिश्र आदि समाज वाद के दृढ स्तम्भ थे। इनसे भी आगे माननीय मुलायम सिंह जी यादव है। इनकी टीम में 22 खिलाड़ी है। आप भी समाजवाद की नई टीम और नयी परिभाषा को जान लीजिये।इसे जान कर शायद अपने को गर्व महसूस करें और शायदआप हैरत में भी पड़ जाएँ .1 – मुलायम सिंह यादव – सांसद ,2 – अखिलेश यादव (पुत्र) – मुख्य्मंत्री , 3 – रामगोपाल यादव (भाई) – सांसद,  4 – डिम्पल यादव (पुत्र बधु ) – सांसद, 5. श्री अरविन्द सिंह बिष्ट राज्‍य सूचना आयुक्‍त (डिम्पल यादव के रिस्तेदार) ,6. धर्मेंद्र यादव (भतीजे ) – सांसद, 7 -अक्षय यादव (भतीजे ) – सांसद ,8 -तेजप्रताप यादव (पोते) – सांसद, 9 -शिवपाल सिंह यादव (भाई) – विधायक(मंत्री उत्तर प्रदेश सरकार), 10 -अंशुल यादव(भतीजे) – जिलापंचायत अध्यक्ष इटावा, 11 -शंध्या यादव (भतीजी) – जिलापंचायत अध्यक्ष मैनपुरी ,12 -मृदुला यादव (भतीजे की पत्नी)- ब्लॉक प्रमुख सैफई ,13 -अजंट सिंह यादव(बहनोई) – ब्लॉक प्रमुख ,14 -प्रेमलता यादव (भाई की पत्नी) – जिलापंचायत सदस्य , 15 -सरला यादव (भाई की पत्नी) – निदेशक जिला सहकारी बेंक इटावा ,16 -आदित्य यादव (भतीजे) – PCF के चेयरमैन ,17 -अनुराग यादव (भतीजे) – राष्ट्रीय सचिव समाजबादी युवजन सभा ,18 -अरबिंद यादव (भांजे ) – एमएलसी ,19 -बिल्लू यादव (भांजे ) – ब्लॉक प्रमुख करहल ,20 -मिनाक्षी यादव (भांजे की पत्नी) – जिलापंचायत सदस्य मैनपुरी ,     21 -बंदना यादव (रिस्तेदार) – जिलापंचायत अध्यक्ष हमीरपुर और अब 22- पुत्रबधू अर्पणा यादव – प्रत्यासी विधानसभा क्षेत्र लखनऊ केंट हैं.

इस प्रकार हम देखते हैं कि समाजवादी पार्टी की सरकार लगभग चार वर्ष पूरा करने को है तथा लगभग एक साल का कार्यकाल बचा हुआ है. यद्यपि यह अगले 2017 के चुनाव की तैयारी में लगा है लेकिन इसकी रिर्पोट कार्ड इतना साफ सुथरा नही दिख रहा है कि जनता पुनः इन्हें काम करने का अवसर प्रदान करे. अतएव यदि इस सरकार ने निष्पक्षता से जनता से जुड़े मुद्दे को ठीक से संभाला नही तो इस सरकार की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz