लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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मानिक बन्द्योपाध्याय

भीतर और बाहर से गम्भीर होकर उस दिन प्रमथ घर लौटा। बहुत दिनों के बाद आज वह गहरी शान्ति महसूस कर रहा है, परम मुक्ति का स्वाद आज उसे मिला है। सोचविचार कर, भावना चिन्ता कर मन स्थिर कर पाने के बाद ही आश्चर्यजनक रूप से उसका मन शान्त हो गया है।

आज दफ्तर में सारे दिन उसने कोई काम नहीं किया है, कर ही नहीं पाया। बहुत से जरूरी काम थे। अन्य दिन ऑफिस के काम में डूबकर अन्दर की अकबकी से कुछ हद तक मुक्ति पा सका है। काम जितनी अधिक जिम्मेदारी और महत्व के रहे हैं, उतनी ही अधिक गहराई से वह अपने आपको भूल पाया है। कर्तव्यपालन की तत्परता उसके अन्दर हमेशा से ही काफी जोरदार रही है, अभ्यास पुराना है।

लेकिन काम भी हर वक्त अच्छा नहीं लगता । बीच बीच में हठात् काम के प्रति प्रबल उत्साह कैसे तो ठंढा पड़कर गहरी उदासी और अवसाद छा जाती हैं। ऐसा भी लगता है कि इस तरह जिया नहीं जा सकता। गीता की याद आई है, गीता के साथ जीवनयापन की अर्थहीनता। चार सालों के संघात, ग्लानिबोध, विरक्ति और हताशा के कवल से रिहाई पाने की चरम व्यवस्था उसने कर ली है। अब और उसे गीता के कारण संकीर्ण, स्वार्थप्रधान, आदर्शच्युत, श्रीहीन जीवनयापन नहीं करना पड़ेगा। बहुत बड़े, अतिपालनीय कर्तव्यपालन करने का गौरव भी उसे मिलेगा, आत्मविरोधी जीवनयापन से रिहाई भी पाएगा। केवल कपड़े-गहने, अच्छा खाना पीना, अड्डेबाजी, सिनेमा और विरामहीन चाहत,मतान्तर, रूठना मनाना लेकर ऊबना नहीं होगा। दो चार दिनो के भीतर ही आन्दोलन शुरु होगा। आन्दोलन में शामिल होकर वह जेल जाएगा। गीता की पकड़ से बाहर।

कदाचित् गीता की अच्छी शिक्षा हो। नौकरी की माया न करते हुए, घर-संसार की बात नहीं सोचकर, उसकी सम्पूर्ण रूप से उपेक्षा कर देश के लिए उसका पति जेल जा सकता है. यह आघात हो सकता है उसको पूरी तरह बदल दे। उसके जेल में रहने की लम्बी अवधि में कदाचित् वह सोचना सीखेगी कि जीवन का कितना अधिक महत्व है। हल्के, स्वार्थपर और अर्थहीन जीवन के प्रति कदाचित् उसके मन में स्थाई रूप से वितृष्णा आ जाए। जेल से निकलने के बाद कदाचित् वह गीता के साथ सुखी हो सके, उनके बीच सामञ्जस्य स्थापित होगा। देश और समाज की बात सोचकर कदम कदम पर टकराने के बदले कुछ कुछ काम और त्याग खुशी खुशी स्वीकार करते हुए।

रास्ते पर चलते लोग आज उसे खुश लग रहे थे। उसकी तरह कहीं उनलोगों के जीवन में भी विरामहीन, प्रतिकारहीन संघर्ष स्थाई रोग-यन्त्रणा की तरह लगातार बनी हुई अशान्ति छाई हुई है कि नहीं—यह प्रश्न आज जैसे उसके मन से मिट गया था।

एक बात प्रमथ निश्चित रूप से जानता है। इस सम्बन्ध में अपने निकट कोई धोखाधड़ी नहीं है। देह-मन से इस तरह से उसके हल्का हो जाने का कारण और कुछ नहीं, गीता के हाथ से मुक्ति पाने की कल्पना ने ही उसे इस तरह भारमुक्त कर दिया है। इस बात को वह महत्व नहीं देता, इसके बारे में वह सोचता भी नहीं। मुक्तिलाभ की यह राह चुनने का एक पहलू और भी है। गीता को जीवन से निकालकर रिहाई पाने के बहुत से सहज, साधारण और इतर रास्ते हो सकते थे, लेकिन उसने उस तरह से मुक्ति पाने की चेष्टा नहीं की थी, न ही स्थिति का प्रतिकार करने के गलत उपाय अपनाए। पति और प्रेमी के कर्तव्य वह बराबर करता रहा है। गीता को अच्छी तरह देख सुनकर विवाह करने की भूल उसकी थी, गीता को दण्ड देकर अपने मन की ज्वाला मिटाने जैसा अन्याय उसने कभी नहीं किया। अगर यह रास्ता नहीं सूझता तो हमेशा के लिए उसे आत्मविरोध भरा बन्दी का जीवन जीना पड़ता। इस किस्म के गौरव का दावा तो वह कर सकता है।

घर में घुसते ही उसने अपने छोटे भाई सुमथ के शिशु बेटे को बारामदे पर असमय में सोया हुआ देखा। शादी के दो साल के अन्दर सुमथ को बेटा हुआ है। चार सालों से अधिक बीत जाने पर भी गीता को अभी तक एक सन्तान की माँ होने के लिए वह राजी नहीं करा पाया था। इरादा और भी पक्का हो गया प्रमथ का।

गीता घर में नहीं थी। ऑफिस से घर लौटने पर शायद ही कभी उसकी गीता से भेंट होती है। नहाने धोने, कपड़े बदलने के बाद सुमथ की पत्नी ने उसे नाश्ता दिया। उसका लटका हुआ चेहरा देखकर उसे माया हुई। उसने सुमथ से कहा, “दादा का चेहरा बहुत सूखा हुआ देखा।”

सुमथ ने गम्भीरता से सर हिलाया,” इतनी अशान्ति! दादा हैं, जो बर्दाश्त करते हैं,। मैं होता तो ——“

“क्या करते? “

“घर से निकाल देता।“

“नहीं कर पाते, तुम भी तो दादा के भाई हो।“

प्रगटतः सुमथ हँसा, लेकिन मन से इस युक्ति को नहीं मान पाया। वह हँसा, पत्नी की इस घोषणा पर कि दादा की जगह पर होने पर वह भी गीता को नहीं निकाल पाता।

रात के लगभग आठ बजे गीता लौट आई। वह एक भड़कीली साड़ी पहने हुए थी। उसके चेहरे-मोहरे और चलने फिरने में खुशी का भाव छलक रहा था।

“ जानते हो, कहाँ गई थी मैं? “, बोलती बोलती सामने आकर प्रमथ का मुँह देखकर अपने ओठ टेढ़ा किया उसने – “नाराज हुए हो ?“

“ नहीं, गुस्सा नहीं किया है मैंने। एक बात सोच रहा था, तुम्हारे ऊपर अब कभी भी गुस्सा नहीं करुँगा। “

“ इसका मतलब? “

“कपड़े बदलकर शान्त होकर बैठो, बोलता हूँ। “

“ ओ बाबा! तब तो कोई गम्भीर बात है । “

लेकिन उसकी नहीं कही गई बात को उसने कोई खास तवज्जुह नहीं दिया, यह बात प्रमथ समझ गया। शायद गीता ने मान लिया है कि प्रमथ कुछ उपदेश झाड़ेगा, व्याख्या करके कोई बात समझा देने की कोशिश करेगा। गीता के लौटकर आने में आधा घण्टा लगने पर इसी अनुमान की पुष्टि हुई। अगर वह मानती कि उसे कुछ नई बात कहनी है, तो इतनी देर कौतूहल दबाए रखना उसके लिए मुमकिन नहीं होता।

आज प्रमथ को यह बात साफ साफ समझ में आ गई कि उपदेश देकर गीता को बदल देने की कोशिश बेवकूफी थी । अपने को कितना हताश और निरुपाय पाकर वह गीता में उस तरह से संशोधन करने के तरीको को अन्धे की तरह जकड़ कर रखे हे था, यह बात सोचने पर आसन्न मुक्ति का रुप और भी विराट हो उठा।

और यह सोचकर भी कि उसकी बातें सुनकर गीता किस तरह चौंक उठेगी, प्रमथ बहुत पुलकित हो रहा था।

लौट कर आने पर गीता इधर उधर देखने के बाद टेबल पर रखी रंगीन जिल्द की एक किताब उठाकर सोने के कमरे की ओर बढ़ी। प्रमथ ने कुछ खास कहने की बात उसे कही थी, यह बात जैसे वह बिलकुल भूल गई थी। उसको पुकारते पुकारते प्रमथ चुप हो गया। करीब पन्दरह मिनट वह चुपचाप बैठा रहा। उसके बाद शान्त मुद्रा में सोने के कमरे में गया।

“ मैं कह रहा था। “

गीता अपने बिस्तर पर लेट गई थी। किताब रखकर उबासी लेते हुए उदासीन रूप से बोली, “क्या कह रहे थे?”

प्रमथ नजदीक जाकर बिस्तर पर ही बैठा, उसने सारी बातें सम्भालकर कही, जोरदार, साफ भाषा में। लेकिन लगा नहीं कि गीता कहीं से चौंकी हो। बातों को उसने थोड़ा सा भी महत्वपूर्ण समझा है या नहीं, इस सम्बन्ध में भी सन्देह लगा।

“ ओ, यह बात। और मैं समझूँ कि तुम नाराज नहीं हो? “

“नाराजगी की क्या बात है इसमें?”

“मेरे कारण जेल जाओगे, फिर भी तुम कहते हो कि तुम नाराज नहीं हो। कभी डाँट कर कहोगे कि तुम नाराज नहीं हो। ”

“ तुम्हारे कारण जेल नहीं जा रहा हूँ, गीतू। “

“तो फिर किसके लिए? स्वदेशी कर जेल जाने के लिए ही तुमने तीन सौ रुपयों की नौकरी की और विवाह किया?

जेल जाओगे ना, खाक। ऐसा करके तुम मुझे कहना चाहते हो कि मैंने तुम्हारा जीना दूभर कर दिया है।” गीता की आँखें छलछला गईं। “क्या दोष किया है मैंने? माफी माँगती हूँ। ऐसा क्यों करते हो ?“ प्रमथ अवाक् होकर उसकी ओर देखता रह गया। यह अभिनय है या बचपना। बचपना ही होगा। उसका स्वभाव ही ऐसा विकारग्रस्त है!

“तुम्हें कहकर क्या होगा? तुम नहीं समझोगी। ”

“ नहीं समझूँगी ? क्या मैं नासमझ हूँ? बेवकूफ हूँ? या कि बदमाश हूँ?”

प्रमथ फिर कुछ नहीं बोला। शान्त, निर्विकार होकर चुपचाप बैठा रहा। इससे गीता का क्रोध और भी बढ़ गया। कुछ देत तक इकतरफा झगड़ा करती रहकर वह रोती रही। प्रमथ तब भी पत्थर की मूर्ति की तरह बैठा रहा, उसकी ओर घूम कर भी नहीं देखा।

सात दिनों के बाद प्रमथ और बहुत लोगों के साथ गिरफ्तार हुआ। मुकदमे के बाद उसे तीन साल की कारावास की सजा हुई।

जेल में प्रमथ का समय अकेले अकेले बीतता रहा। बूढ़ी माँ, सुमथ और अन्य रिश्तेदार चिट्ठियां लिखते, बीच बीच में मुलाकात करने भी आया करते। गीता न तो चिट्ठी लिखती, न मिलने ही आती। मुकदमा चलने के समय वह कोर्ट में आती थी, आहत विस्मय और तीखे अभियोग से भरी दृष्टि से उसकी ओर देखती रहती। सुमथ से उसको जानकारी मिली कि मुकदमा खत्म होते ही गीता अपने पिता के पास ढाका चली गई है। यह बात प्रमथ की समझ में आती है, लेकिन मिलने के लिए एक बार भी क्यों नहीं आती? चिट्ठी क्यों नहीं लिखती?

उसका नाराज होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या उसका मन इतना विकृत है कि नाराजगी किसी तरह कम नहीं होती, चिट्ठी के जवाब में कमसेकम दो लाइन लिख पाने के लायक?

प्रमथ क्षुब्ध हुआ, उसका मन खराब हो गया। अगर उसके कारागार वरण करने की यही प्रतिक्रिया गीता के मन में हुई हो तो उसके हृदय और मन में किस परिवर्तन की आशा प्रमथ कर सकता है।

लेकिन जो भी हो, मुक्ति तो उसे मिली है। उसके आत्मविरोधी जीवन का अवसान हमेशा के लिए हो गया है। बाकी जीवन शान्ति से हो, अशान्ति से हो, सुख से हो या दुःख से हो, अपनी मतिगति और आदर्श के साथ सामञ्जस्य रखते हुए बीता पाएगा।

जेल में डेढ़ साल पूरा होने पर एक दिन हठात् गीता पास से एक अजीब सी चिट्ठी उसे मिली। चिट्ठी बहुत संक्षिप्त थी। गीता ने लिखा थाः इतने दिनों तक चिन्ता करते करते वह समझ पाई है कि प्रमथ और सके मन में मेल नहीं रहने से वे लोग कभी सुखी नहीं हो सकेंगे.। इसीलिए उसने निश्चय किया है कि अपने आपको ठोंक पीटकर प्रमथ के उपयुक्त करने के लिए कुछ दिनों तक एक शिक्षासदन में रहेगी। वह चिन्ता नहीं करे, यथासमय भेंट होगी।

प्रमथ बार बार चिट्ठी पढ़ता रहा, उसकी बौखलाहट कम होने का नाम नहीं ले रही थी। शिक्षासदन? इस किस्म का शिक्षासदन कहाँ है, जहाँ औरतों को ठोंकपीटकर अपने पति के उपयुक्त करने की व्यवस्था है? साधना, भजन, जप-तप कर अपने सुधारने के लिए किसी साधु संन्यासी के आश्रम जाने की सूझ तो नहीं हुई है गीता में? या क्या गीता का दिमाग पूरी तरह बिगड़ गया है, पागलपन के आवेश में एक आबोल ताबोल चिट्ठी लिख डाला है गीता ने। अगर अपनी गलती समझ पाती गीता तो उतना ही काफी होता। आदर्शहीन जीवन की व्यर्थता का भान पाने, जिम्मेदारी का एहसास होने से प्रमथ खुद ही उसे आसानी से सुधार लेता।

मन में नाना किस्म की भावनाएँ घुमड़तीं, लेकिन एक नया आनन्द और उत्साह भी प्रमथ अनुभव करता. उसकी आशा पूरी तरह व्यर्थ नहीं हुई. आखिरकार गीता ने सोचना सीखा है, मन का मेल नहीं होने से वे लोग सुखी नहीं हो पाएँगे।

गीता ने अपना पता नहीं दिया था। प्रमथ ने उसके पिता के ढाका आवास के पते पर जवाब दिया। उसने लिखा गीता ऐसा नहीं सोचे कि प्रमथ उसे बिलकुल अपने मन के अनुसार साँचे में ढालना चाहता है. कभी भी उसने गीता पर अपना अधिकार नहीं जताया है,कभी जताने की इच्छा भी नहीं हुई है उसकी। उनकी आपसी विरोधिता का अवसान होने पर ही वे लोग सुखी हो पाएँगे, इत्यादि बहुत सी बातें।

बिलकुल अन्त में उसने लिखाः शिक्षासदन का क्या नाम है, गीता ने किस शिक्षासदन में योगदान किया है? उस चिट्ठी का कोई जवाब नहीं आया। कुछ दिन बाद सुमथ के मुलाकात करने आने पर उससे उस विषय में पूछा। किन्तु सुमथ कोई खबर नहीं दे पाया। गीता ने अभी तक उनलोगों के पास कोई पत्र नहीं लिखा है।

“पता करूँ?”

प्रमथ ने सोच विचार कर कहा, “ नहीं,रहने दो। “

करीब चार महीने बाद हठात् कई एक और राजनैतिक बन्दियों के साथ प्रमथ को रिहा कर दिया गया। घर पहुँच करदो दिनों तक उसने आराम किया और उसके बाद ढाका के लिए रवाना हो गया।

गीता के रायबहादुर पिता ने अत्यन्त गम्भीरता से उसका स्वागत किया, “ आओ। बैठो। “

“गीता लौटी नहीं है शिक्षासदन से?”

“ किस शिक्षासदन से? “

“ मुझे उसने लिखा था कि वह शिक्षासदन जा रही है। नाम पता कुछ भी नहीं लिखा है। “

राय बहादुर ने भौं सिकोड़ते हुए कहा, “ शिक्षासदन? वह तो जेल में है। “

“ जेल में? “

“ उस लड़की की बात मत पूछो, पागल की तरह जो भी मन में आया, भाषण देकर देशद्रोह के आरोप में छः महीने की जेल की सजा काट रही है। फाइन देकर मैं सँभाल सकता था, लेकिन वह कोर्ट में मैजिस्ट्रेट के सामने ऐसी ऐसी बातें बोलने लगी——“ रायबहादुर ने मुँह से अद्भुत आवाज निकालते हुए कहा, प्रमथ को समझने में दिक्कत नहीं हुई कि यह आवाज अफसोस की आवाज है। पहले भी बहुत बार सुनी है उसने यह आवाज। “ तुम दोनो अच्छे मिले हो। “

फिर से रेल और स्टीमर की सवारी का चक्कर लगाना पड़ा। इस बार प्रमथ को लगता रहा कि पल-पल बीतना मुश्किल हो रहा है, रेल और स्टीमर बहुत धीमी गति से चल रहे हैं, समय बीत नहीं रहा है।

जेल में गीता को देखते ही वह समझ गया कि उसके चेहरे में बहुत परिवर्तन हो गया है। वह तो हमेशा की दुबली पतली रही है. लेकिन अभी बहुत कमजोर दिखती है। उसकी आँखों में चंचल दृष्टि की जगह उदास हँसी से भरी गम्भीरता है।

प्रमथ ने उलाहना देते हुए कहा, “ ख्वामख्वाह जेल आने की क्या जरूरत थी , गीतू? बदला लेने के लिए? “

गीता की आवाज और भी पतली और भी तीखी हो गई, प्रमथ की बात पर वह झनझनाकर बज उठी, “ बदला कैसा? जेल की सजा नहीं काटने से तुम्हारे साथ घर कैसे करती? हमारे बीच सामञ्जस्य रहना चाहिए न। “

प्रमथ क्षुब्ध होकर बोला, “ सो ठीक किया है तुमने। लेकिन इसके बदले यदि—– “

उसके इतने बड़े काम को प्रमथ समर्थन नहीं करता। गुस्सा और दुःख से लाल हो गया गीता का चेहरा। “ जेल में भी उपदेश झाड़ने आए हो? कुछ दिन सब्र करते नहीं बना मेरे जेल से निकलने तक ! “

प्रमथ ने घूँट भरी। गीता की आँखें मिट मिट करने लगीं।

(अनुवादक : गंगानन्‍द झा) 

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