लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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 संदर्भ-सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा रोकथाम (न्याय एवं क्षतिपूर्ति) विधेयक 2011

प्रमोद भार्गव

kanunकेंद्र की यूपीए सरकार विशुद्ध रूप से वोट बैंक मजबूत करने की कुटिल राजनीति पर उतर आई है। सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्टें इसी सबब का पर्याय थीं। अब ठंडे बस्ते में पडे़ सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 को आगामी सत्र में पेश करने की तैयारी नये सिरे से की जा रही है। यह एक ऐसा कटुता बढ़ाने वाला खतरनाक कानून है, जो हर हाल में बहुसंख्यक समाज को सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी ठहराएगा। इस कानून के मसौदे को तैयार सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् कर रही है। इस मसौदे में भागीदारी सैय्यद शहाबुद्दीन और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे उन नुमाइंदों की है, जिनके धर्मनिरपेक्ष चरित्र को निर्विवाद नहीं माना जाता ? इस कानून की विडंबना है कि यह किन्हीं दो धार्मिक समुदाओं के बीच सद्भावना व सहानुभूति पैदा करने की बजाय कटुता व दूरी बढ़ाने का काम करेगा। हालांकि कानून का वजूद में आना इतना आसान नहीं है, लेकिन इससे इतना साफ हो गया है कि मनमोहन सिंह और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का मकसद सिर्फ अल्पसंख्यक मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति रूझान पैदा करना है। सत्ता में बने रहने की इसी मंशा के चलते केंद्र सरकार जेहादियों, माओवादियों और राष्ट्र विरोधी तत्वों के प्रति तो न केवल नरम रूख अपना रही है बल्कि देश के दुश्मनों को मनमानी करने की छूट भी दे रही है। बहुसंख्यक हिंदुओं को दंगाई घोषित करने का अर्थ होगा देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को खो देना। मुस्लिम अल्पसंख्यक कितने धर्मनिरपेक्ष हैं, इसका साक्षात उदाहरण कश्मीर है, जहां की लगभग समस्त हिन्दू आबादी जिहादियों के भय से पलायन कर चुकी है।

राष्ट्रीय एकता व संप्रभुता कायम रखने के नजरिये से होना तो यह चाहिए कि सोनिया गांधी और उनकी परिषद् समान नागरिक कानून बनाने की पहल करतीं और सरकार व संसद से कानूनी दर्जा दिलाते। लेकिन कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हो विपरीत रहा है, महज मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए। वैसे भी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् एक गैर संवैधानिक संस्था होने के साथ, केवल सोनिया गांधी के आभा मण्डल को महिमा मंडित बनाए रखने के लिए है न कि सुपर कैबिनेट की भूमिका में आकर अपनी राय थोपने के लिए ? इसीलिए प्रस्तावित कानून के मसौदे का जो मजमून बाहर निकलकर आया है, उससे साफ हो गया है कि परिषद् के नुमाईंदे पूर्वग्रही दुष्टि से काम ले रहे हैं। उन्होंने पहले से ही मान लिया है कि सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए केवल बहुसंख्यक समाज जिम्मेबार है। जबकि यह नजरिया भ्रामक है। हकीकत यह है कि देश में जब तक बहुसंख्यक समाज धर्मनिरपेक्ष व समावेशी भावना का अनुगामी है, तभी तक देश की धर्मनिरपेक्षता बहाल रह सकती है। इस विधेयक को कानूनी जामा पहना दिया जाता है तो स्वाभाविक है न केवल देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र खतरे में पड़ जाएगा, बल्कि सांप्रदायिक दुर्भावना को भी मजबूती मिलेगी। इसलिए यह पक्षपातपूर्ण विधेयक वजूद में लाने की बजाय ऐसे कारगर उपाय अपनाने चाहिए जिससे 1984 के सिख विरोधी और 2002 जैसे मुस्लिम विरोधी दंगों के हालात बनंे ही नहीं। ख्याल इस बात का भी जरूरी है कि कश्मीर और पश्चिम बंगाल के देगंगा में जिस तरह से बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी ने हिन्दुओं को खदेड़ा है, उसकी पुनरावृत्ति तो हो ही नहीं, उनकी मूल निवास स्थलों में वापिसी भी हो ?

जब संविधान और व्यवस्था हमें समान नजरिया देने के हिमायती हैं तो परिषद् या सरकार को क्या जरूरत है कि वह इसे बांट कर संकीर्णता के दायरे में तो लाए, ही भावनाओं को भड़काकर विस्फोटक हालात भी पैदा करे। क्योंकि मसौदे में जिस तरह से सांप्रदायिक व जातीय हिंसा को ‘समूह’ के आधार पर परिभाषित किया गया है, वह हालातों को तो दूषित करने वाला है ही रोकथाम के उपायों को भी विरोधाभासी नजरिए से देखता है। ‘समूह’ की परिभाषा के मुताबिक इस दायरे में भाषायी और धार्मिक अल्पसंख्यक तो आएंगे ही अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां भी आएंगी। जबकि वर्तमान स्थितियों में ये जातियां अत्याचार निवारण कानून के दायरे में आती हैं। तय है, एक जाति के दुराचार से संबेधित दो तरह के कानून आशंकाएं पैदा करेंगे और एक ही चरित्र के समानांतर कानूनों का लाभ उठाकर वास्तविक आरोपी बच जायेंगे। दरअसल केन्द्र की सप्रंग सरकार द्वारा 2004 में इस कानून को अस्तित्व में लाने का वायदा किया गया था। 2005 में सरकार एक विधेयक भी ले आई, लेकिन जबरदस्त विरोध के चलते पीछे हट गई। अपने दूसरे कार्यकाल में एक बार फिर 2011 में विधेयक को लाने की कवायद की गई, किंतु मुख्यमंत्रियों के विरोध के चलते इस कानून को फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। अब लोकसभा चुनाव के ठीक पहले केन्द्र सरकार अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इसे शीत सत्र में लाने की कवायद कर रही है, जो पूरी नहीं होगी।

मसौदे का जो ब्यौरा सामने आया है, उसके एक अध्याय में यह भी विसंगति है कि सांप्रदायिक हिंसा के जो मामले सामने आएंगे, उनको अलग-अलग वर्गों में बांटकर देखा जाएगा। इन मामलों को केंद्र सरकार जांचेगी-परखेगी। जबकि हमारे संघीय ढांचे में यह जिम्मेबारी राज्य सरकारों की है। यह प्रस्ताव अथवा विचार इस बात का संकेत है कि जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, उनके कानूनी अधिकारों पर केंद्र सरकार अतिक्रमण करना चाहती है। केंद्र सरकार के माध्यम से इस कानून का जो समिति अमलीकरण करेगी, उसमें सात सदस्य होंगे। यह समिति एक प्राधिकरण के रूप में वर्चस्व में आएगी। जिसे पर्याप्त स्वायत्तता दिए जाने की उम्मीद है। इसमें हैरानी में डालने वाली बात यह है कि इसके चार सदस्य अल्पसंख्य समुदायों से होंगे। इसके उलट इस तरह के मामलों में जो लोग अपराध के दायर में आएंगे, वे बहुसंख्यक समुदायों से होंगे। लिहाजा इस समिति के प्रति न्याय की कसौटी पर खरी उतरने की आशंका हमेशा बनी रहेगी। इस प्रारूप से यह भी दृष्टि झलकती है कि सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी केवल बहुसंख्यक समाज है। ऐसे मामलों में अल्पसंख्यकों को दोषी नहीं माना जाएगा। जबकि अपराध एक प्रवृत्ति होती है, और वह किसी भी समाज के व्यक्ति में हो सकती है। इस प्रवृत्ति का वर्गीकरण हम अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक दायरों में नहीं कर सकते। आपराधिक मामले चाहे वे किसी भी प्रकार के हों, उन्हें एकपक्षीय दृष्टि से नहीं देखा जा सकता । इस दृष्टि का दुष्परिणाम हम दहेज, बलात्कार और दलित उत्पीड़न से संबंधित मामलों मंे देख भी रहे हैं। वैसे भी एकांगी कानूनों ने अब तक सामाजिक समरसता बढ़ाने की बजाय सामाजिक कटुता बढ़ाने का काम किया है। इसलिए यह मसौदा कानून का रूप ले, इससे पहले इसे एकांगी पक्षधरता रखने वाले कानूनों की कसौटी पर भी परखना चाहिए।

इस कानून में यह भी साफ नहीं है कि जो सार्वजनिक समानता का भाव पैदा करने वाले मुद्दे हैं, उनके परिप्रेक्ष्य में इस कानून की क्या भूमिका परिलक्षित होगी। यदि कोई राजनीतिक दल धारा 370 हटाने, समान नागरिक संहिता को लागू करने और किस्तवाढ़ एवं मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के विरोध में प्रदर्शन करते हैं, तो क्या ये बहुसंख्यक समाज के आंदोलनकारी इस कानून के मातहत अभियुक्त के रूप में देखे जाएंगे ? हाल के मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर यही देखने में आया है। जबकि मुजफ्फरनगर में दंगा एक युवती के छेडछाड से जुड़े मामले में समुदाय विशेष के मनचलों को कानूनी संरक्षण देने के प्रतिरोध में भडका था और किस्तवाढ़ में दंगा स्वतंत्रता दिवस के दिन एक समुदाय द्वारा भारत विरोधी नारे लगाये जाने के कारण भडका था। यहां सबाल यह भी खडा होता है कि कश्मीर से जिन अल्पसंख्यक हिंदुओं को बेदखल कर दिया गया है, क्या उन्हें बेदखल करने वालों के विरूद्ध इस कानून के तहत मुकद्मे चलाए जाएंगे ? जम्मू-कश्मीर या केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार इतना जोखिम उठा पाएगी ? या विस्थापित कश्मीरी पंडितों की मांग करने वाले राष्ट्र प्रेमियों को जेलों में ठूंस दिया जाएगा ? विश्व प्रसिद्ध बंगला देश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन के विरोधियों को यह कानून किस नजरिये से देखेगा ? हालांकि इस कानून का अभी परिषद् द्वारा बनाए प्रारूप का ब्यौरा ही सामने आया है। राज्यसभा और लोकसभा में पेश होने से पहले इसे केंद्रीय मंत्रीमण्डल की समिति से भी गुजराना होगा। इस कारण यह इतना आसान भी नहीं है कि तमाम नए विवादों का जनक बनने जा रहे इस एकपक्षीय कानून को इकतरफा स्वीकार भी कर लिया जाए ?

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1 Comment on "सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाला कानून"

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mahendra gupta
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सद्भाव तो चाहिए ही किसे है अगर वह स्थापित हो गया तो इनकी दुकानदारी खत्म हो जायेगी.इस लिए इनको दूर दूर रख और दूर करते रहो ताकि जनता लड़ती रहे और ये नेता अपनी रोटियां सेंकते रहें.

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