लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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जाति और राष्ट्र को अतीत की स्मरण कराने वाले, उनकी रगों-नसों में प्राणों का संचार कराने वाले तथा उन्हें पूर्वजों की वीरता एवं गरिमा की ओर प्रेरित कर कर्तव्य पथ पर अग्रसर कराने वाले पताका, ध्वज अथवा झण्डे में नेतृत्व,अनुशासन और संघशक्ति तीनों एक ही साथ निहित समाहित हैं ।अतिप्राचीन काल से ही बाल-वृद्ध, सैनिक-शिक्षक, गृहस्थ-तपस्वी, पुरूष-स्त्री, शासक-शासित किसी न किसी रूप में झण्डे के उपासक रहे हैं और उसकी रक्षा के लिए हँसते-हँसते प्राणों का विसर्जन करना एक साधारण सी बात मानी जाती रही है । नेतृत्व, शासन तथा संघशक्ति के प्रतीक झण्डे का प्रयोग ध्वज संकेतात्मक विद्या के द्वारा वर्तमान काल में समुद्र, रणस्थल तथा रेलवे में किया जाता है । स्काऊटिंग में तो इसके द्वारा सन्देश भी भेजा जाता है तथा झण्डे के विविध संचालन के द्वारा बातें भी की जाती हैं । सैन्य, शिविर, रणयात्रा, अभियान, रणक्षेत्रादि में तथा राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक उत्सवों-अवसरों पर प्रयोग होने वाले झण्डे की भावना का उद्रेक मानव-ह्रदय में उस समय हुई होगी, जिस समय वह अनेक समुदायों में विभक्त होकर जीवन-यापन में संशक्त हुआ होगा और अपने-अपने गिरोह , समुदाय अथवा समूह की कल्याण-कामना की भावनाएँ उसके ह्रदय में हिलकोरें मारने लगी होंगी । विद्वानों का मत है कि मनुष्य के मस्तिष्क में झण्डे की भावना को उद्बुद्ध करने का सम्पूर्ण श्रेय मानव-गिरोह, समुदाय की लड़ने तथा संरक्षा करने वाली मनोवृति का है । झण्डा संग्राम और शान्ति का संसूचक संकेत है । वर्तमान काल में भी अधिकांश जनजातियाँ, छोटानागपुर के उराँव और मुण्डा, संथालपरगना के संथाल (सौंताल),राजपूताने (राजस्थान) के भील तथा सरगुजा के कोरवादि जनजातियाँ दलों में विभक्त हैं । प्रत्येक दल का अपना झण्डा होता है ।उत्सव के अवसरों पर या ऋतु-परिवर्तन के समय वे अपने झण्डों का प्रयोग करते हैं । झण्डों को बड़ी श्रद्धा एवं सभय-सत्कार की दृष्टि से देखा जाता है । प्रत्येक गिरोह, समुदाय के झण्डे का रंग एवं चिह्न अलग-अलग होता है । प्रत्येक जत्था (छोटानागपुर में जिसे खोढ़ा अथवा खोढ़हा कहा जाता है) अपने झण्डे के नीचे नाचता-गाता और उछलता है । उनके झण्डों की रक्षा वीर और अनुभवी नौजवान करते हैं । कोई भी अपने झण्डे का अपमान, तिरस्कार न देख सकता है और न सह सकता है । हर एक जत्थे की पहचान झण्डे से होती है । शान्ति और समृद्धि के समय भी मानव गिरोह झण्डे के नीचे एकचित होकर अपने कल्याण की बात सोचते हैं और अपने सांग्रामिक कौशल का प्रदर्शन करते हैं । वस्तुतः मानव समाज के विकास की आवश्यकताएँ झण्डे के विकास के निदान कारण हैं, एवं झण्डे के अस्तित्व और विकास मानव-गिरोह की हस्ती तथा समृद्धि से जुड़े हुए हैं । प्राचीन काल से झण्डा गिरोह के विचारों और उसकी कामनाओं का संकेतात्मक चिह्न रहा है । प्रत्येक सांग्रामिक क्षेत्र में, जहाँ संगठन और अनुशासन की अपेक्षा है, झण्डे सी वस्तु की नितांत आवश्यकता होती है । झण्डे से शिविरों का पता चलता है ।सैनिकों की श्रेणी या पंक्ति ठीक की जाती है । कूच करने और लड़ने के समय झण्डा संबल का कार्य करता है तथा आत्मिक शक्ति को प्रेरित करता है । अपने इन्हीं गुणों के कारण विभाजन पश्चात भारत में भी 1949 से प्रतिवर्ष सात दिसम्बर को सशस्त्र सेना झण्डा दिवस मनाया जाता है। झण्डा दिवस अर्थात देश की सेना के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन, उन जांबाज सैनिकों के प्रति एकजुटता दिखाने का दिन, जो देश की तरफ आंख उठाकर देखने वालों से लोहा लेते हुए बलिदान हो गए। सशस्त्र सेना झण्डा दिवस अथवा  झण्डा दिवस भारतीय सशस्त्र बलों के कर्मियों के कल्याण हेतु भारत की जनता से धन का संग्रह के प्रति समर्पित एक दिन है। इस दिन झण्डे  की खरीद से होने वाली आय शहीद सैनिकों के आश्रितों के कल्याण में खर्च की जाती है ।इस रूप में झण्डे के विकास का साहित्यिक पक्ष पर विचार करना समीचीन प्रतीत होता है ।
विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में भारतीय ज्ञान-विज्ञान का अंकुर है । भारतीय सभ्यता-संस्कृति, आचार-विचार, युद्ध-कौशलादि की प्रथम झलक इस प्राचीन ग्रन्थ में मिलती है । विद्वानों के अनुसार, ऋग्वैदिक आर्य गिरोहों (समूहों) में निवास करते थे । इन्हें आर्येतर जातियों से सदा लड़ना-भिड़ना पड़ता था । इस दिव्य ग्रन्थ में युद्ध और ध्वजा दोनों का उल्लेख अंकित है, परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि किस वस्तु का प्रयोग सर्वप्रथम झण्डे के रूप में किया गया होगा?

पुरातन धर्मग्रन्थों में झण्डे का उल्लेख शहर, शिविर, सरिता, रणयात्रा, तथा रणक्षेत्र के सम्बन्ध में तथा भिन्न-भिन्न आकार, रंग तथा योजना के झण्डों का निर्माण, मह्त्वादि पर विशद् वर्णन अंकित मिलता है । ऋग्वेद 1/27/11 में झण्डे के लिए धुमकेतू शब्द विशेषण के तौर पर प्रयुक्त हुआ है । ऋग्वेद 1/27/12 में झण्डे के लिए द्रप्स शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ।

ध्वज और पताका पर्यायवाची शब्द हैं । ध्वजा का शाब्दिक अर्थ है – ध्वजति (गच्छति) इति ध्वजः – जो फहराता है, वह ध्वज है । पताका की व्युत्पति इस प्रकार है- पत्यते (बोध्यते) योद्धादिभेदः अनया सा पताका। अर्थात- वह चिह्न जिसके द्वारा योद्धादि भेद व्यक्त हो पताका कहलाता है । ध्वज और पताका का अर्थ त्रिकोण या चतुष्कोण वस्त्र है । पुरातन काल में पताका त्रिकोण होती थी और ध्वजा चतुष्कोण । समय के अंतराल में यह भेद लुप्त हो गया तथा जिस पर त्रिकोण या चतुष्कोण कपड़ा फहराता हो, वह पताका या ध्वजयष्टि कहलाने लगा । युक्तिकल्पतरू में ध्वजा-निर्माण का विशद् वर्णन अंकित पाया जाता है । युक्तिकल्पतरू के अनुसार झण्डा राजाओं, सम्राटों का चिह्न है । विद्वानों के अनुसार वाचस्पत्य शब्दकोष में युक्तिकल्पतरू से अनेकानेक उद्धरण लिए गए हैं । वाचस्पत्य कोषकार ने तालबृक्ष के लिए ध्वजद्रुम शब्द का प्रयोग किया है । ध्वजद्रुम का अर्थ झण्डे का पेड़ है । सम्भवतः किसी अन्य पेड़ को आज तक यह संज्ञा प्रदान नहीं की गई है । आर्यों के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ महाभारत के उत्कृष्ट पात्र और सुप्रसिद्ध योद्दा भीष्मपितामह तालध्वज प्रयुक्त करते थे । महाभारत विराट पर्व 56/12 में कहा गया है-

यस्तु श्वेतावदातेन पञ्चतालेन केतुना ।

वैडूर्यमयदंडेन तालवृक्षेन राजते ।। – महाभारत विराट पर्व 56/12

महाभारत शल्य पर्व 34/2 के अनुसार श्रीकृष्ण के भाई बलराम भी तालध्वज का व्यवहार करते थे । अग्निपुराण, युक्तिकल्पतरू एवं कालिकापुराण आदि ग्रन्थों में ध्वज के महत्व, निर्माण एवं भेदोपभेदादि का विशद् वर्णन अंकित करते हुए कहा गया है कि ध्वजदण्ड तालवृक्ष का निर्माण किया जाता था । इतिहासविदों के अनुसार बरछा या भाला युद्ध के कार्य में प्रयोग किया जाने लगा था । यह ठीक तालध्वज की आकृति का था । इसकी मूठ तालध्वज दण्ड का अनुकरण करती थी और धार केतन का। विद्वानों के अनुसार, प्राचीन इंग्लैण्ड के प्लाँटाजिनेट राजकुल में प्लाटाजेनिस्टा पेड़ झण्डे के रूप में प्रयुक्त किया जाता था । हमारे देश में प्राचीन काल से ही कोविदार, नीम, बेल, पलाश, बाँस, ताल, चम्पकादि वृक्षों के भी पताकादण्ड निर्माण किये जाते थे । युक्तिकल्पतरू में कहा गया है- वंशोऽथं जांगल शालः पलाशश्चाम्पक्स्तथा ।

नैपो नैम्बोऽथवा दण्डस्तथावैराजव्रारणः ।।

सर्वेषांचैववंशस्तुदण्डः सम्पतिकारकः । ।-युक्तिकल्पतरू

ध्वजदण्ड बाँस, वकुलवृक्ष, शाल, पलाश, चम्पक, कदम्बक, नीम और ताल के बने होते हैं । इन सभी ध्वजदण्डों में बाँस दण्ड सर्वश्रेष्ठ समझा जाता है । इसकी सर्वश्रेष्ठता का कारण हल्कापन और स्थिरत्व है । इतिहास साक्षी है कि सहस्त्राब्दियों के पश्चात भी आज के दिन वर्तमान में वंशदण्ड ही उपयोगी समझा जाता है । विद्वानों के अनुसार सम्राट अशोक के पत्थर के खम्भे ठीक तालवृक्ष के धड़ की शक्ल के होते हैं । अशोक को प्रस्तर स्तम्भों पर बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को खुदवाने की प्रेरणा ताल के प्रशस्त धड़ ने ही प्रदान की । तालवृक्ष के आकर्षण के केन्द्र इसके सीधे काण्ड, लटकते हुए पते, विशाल आकार सभी मानवचित को आकर्षित करते हैं । प्राचीन पाटलिपुत्र में तालवृक्षों की बहुलता देखकर यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं होती कि सम्राट अशोक के मन में प्रस्तर स्तम्भों की भावना तालवृक्ष के धड़ और पत्तों को देखकर ही उत्पन्न हुई होगी । इन साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मानव जाति के मन में पताका और उसके दण्ड का ज्ञान वृक्षों मुख्यतया तालवृक्ष के धड़ और उसके पत्तों को देखकर हुआ होगा ।

 

 

 

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