लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

पंकजजी का मुझे संबोधित लेख प्रस्‍तुत है। प्रवक्‍ता पर बहुत विवाद हो गए। हम इस विवाद कांड को यही पर रोक रहे हैं। मेरी स्‍वयं की भी विचारधारा है, इसलिए सहज है कि मैं भी तमाम विचारधाराओं का विरोधी हूं लेकिन मेरे मन में वैचारिक विरोधी लेखकों के प्रति तनिक भी द्वेष नहीं है। पता चला है कुछ लोग प्रवक्‍ता की प्रगति से मर्माहत हैं। इससे मुझे कष्‍ट हुआ है। जो लोग वेबजगत के बारे में थोड़ा-बहुत भी जानते हैं, वे जानते होंगे कि कितनी मेहनत लगती है वैकल्पिक मीडिया को समर्पित वेबसाइट को चलाने में।  कोई काम जब शुरू होता है तो इस तरह की बाधाएं मार्ग में आती है। लेकिन हमें स्‍वामी विवेकानंद का वचन अच्‍छी तरह याद है कि ‘’हर एक बड़े काम को चार अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है: उपेक्षा, उपहास, विरोध और अंत में विजय।’’ यही वचन हमारा सम्‍बल है और आगे काम करने का हौसला मिलता है। वेबजगत में ही कई अच्‍छी वेबसाइटें सामने आईं लेकिन समय का थपेड़ा उन्‍हें लील गया। हम आदर्शवाद के हमसफर हैं और अपनी जिद्द के चलते लाभ-हानि के चक्‍करों से मुक्‍त होकर हिंदी की ध्‍वजा पूरे विश्‍व में फहराना चाहते हैं। हम चाहते हैं लोगों में नागरिक बोध प्रबल हो, वैज्ञानिक नजरिया पुष्‍ट हो और राष्‍ट्रवादी चेतना का विकास हो।

पंकजजी बार-बार एक ही सवाल खड़ा कर रहे हैं, ‘’यह समय सीधे तौर पर निष्कर्ष की मांग करता है…. क्या संपादक द्वारा किसी एक लेखक को ज़रूरत से ज्यादा जगह देना उचित है…’’ साथ में आपने यह भी पूछा है, ‘’बहस के किसी ठोस निष्कर्ष से हम पाठकों को ज़रूर अवगत कराएं’’ तो पंकजजी मैं कोई न्‍यायाधीश नहीं हूं कि सीधे-सीधे दो टूक फैसला दे दूं, यही तो सामंती और फासीवादी प्रवृत्ति का लक्षण है। और मनुष्‍य के बारे में बिना किसी बड़े कारण के दो टूक फैसला करना अन्‍याय होगा। हमारा मानना है कि हम प्रवक्‍ता पर जाति, मजहब, क्षेत्र, भाषा और लिंग के आधार पर विद्वेष फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने वाले लेखों को स्‍थान नहीं देंगे। इसलिए मैं यही निवेदन करूंगा कि जगदीश्‍वरजी प्रतिदिन एक लेख लिख रहे हैं तो आप दो विचारशील लेख लिखिए।

प्रवक्‍ता के सभी पाठकों को दीपावली के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित-

आपका, संजीव

आ. संजीव जी. आपने अपने चुनौतीपूर्ण लेख में मुझे यह कहा था कि मेरे ‘झूठ’ का अंजाम मैं जानता हूँ. तो इस झूठ की बुनियाद जनता के सामने है. हां… अंजाम मुझे नहीं पता लेकिन अंजाम तक इस बहस के रिश्ते को पहुंचना मुमकिन हो, ये इच्छा ज़रूर है. हम बिलकुल यह नहीं चाहते कि आप इस बहस को एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ दें. पंडित जी के शब्द उधार लेकर कहूँ तो आपको ‘आर या पार’ का फैसला करना चाहिए, प्रणाली चाहे आप जो भी अपनाएं.

संजीव जी, यह समय अद्भुत है. इस समय की सबसे अच्छी उपलब्धि यह है कि इसने तकनीक के साथ ज्ञान को भी विकेंद्रीकित किया है. इस समय को कोई फतवा नहीं चाहिये, कोई पंडित नहीं चाहिए. इस समय ने अपना विवेक जगत खुद विकसित किया है. इस जगत को कोई इश्वर नहीं चाहिए. कोई पंडित नहीं चाहिए. यह समय, हर व्यक्ति, पेशा या समूह को शंका के नज़रिए से देखता है. तर्क की कसौटी पर कसता है. बुद्धि के तराजू पर तौलता है. यह समय विवेक के बाट का इस्तेमाल करना जानता है. यह समय ज्ञान-गरीबी-हरि-भजन, कोमल वचन अदोष, क्षमा शील संतोष की भाषा समझता है. इस समय को कोई अहंकारी नारेबाज नहीं चाहिए, इसे व्यावहारिकता की बात करने वाला, सीधे तौर पर सरल भाषा में संवाद करने वाला अपना आम आदमी चाहिए. यह समय ऐसे हर व्यक्ति को दुत्कारता है जो विचारधारा को कॉमन सेन्स से अलग करता हो. इस समय की नज़र में विचारधारा नान-सेन्स से तय नहीं हुआ करते. यह समय उसे आचरण में उतारने लायक बनना और बनाना चाहता है. यह समय जगत किसी को यह अधिकार नहीं देता कि वह उसे अविवेकी कह दे. यह समय बहस करता है, विमर्श में भागीदार होता है. तकनीक ने उसे एकतरफा संवाद या वकवाद झेलने की मजबूरी से मुक्ति दी है. इस समय ने हर व्यक्ति को सहभागी बनाया है. यह समय नयी मीडिया में भरोसा करता है. इस समय ने संवाद की अनेक़ विधा विकसित की है. यह समय मात्र 140 शब्दों की सीमा में देश की राजनीति और नेताओं के भविष्य को तय करने का हुनर जानता है. इस समय ने खुद नए तरह का तकनीकी समाज, अपना आभासीय मार्ग निर्मित किया है और उस पर यह समय सरपट दौड रहा है, दौड़ना चाहता है. यह समय लाख व्यस्तता के बावजूद अपने इस नए बनाए लोक में मदमस्त हो विहार भी करता है.

यह समय मीडिया के Interactive स्वरुप से प्यार करता है. यह समय बहस को केवल बुद्धि-विलास का साधन मात्र, खाए-अघाए लोगों का प्रलाप मात्र नहीं मानता है. यह समय सीधे तौर पर निष्कर्ष की मांग करता है. यह समय गलती बार-बार करता है, लेकिन समझ आने पर गलती को स्वीकार भी करता है. समय अनुसार तब्दीली भी करना जानता है. तो यह समय सीधे तौर पर आपके प्रवक्ता से भी कुछ आग्रह करता है, कुछ मांग करता है, आप चाहे तो इसे चुनौती भी समझ सकते हैं.

तो आ. संजीव जी, यह समय अद्भुत तो है, लेकिन कई मायनों में यह समय कठिन भी है. इस समय का सबसे बड़ा संकट भरोसे का है. यह समय आपसे न केवल ईमानदार होने अपितु ईमानदार दिखने की अपेक्षा भी करता है. अन्यथा यह समय तुरंत पारदर्शिता को नंगापन कहने में समय नहीं लेता. इस समय में हमें वैचारिक संघर्ष बनाम नूराकुश्ती, सार्थक बहस बनाम सस्ती लोकप्रियता के लिए प्रयास, मतभिन्नता बनाम मनभेद, विचार बनाम प्रोपगंडा आदि के मध्य की महीन रेखा को मोटी करना होता है. सीधे तौर पर हमें निष्कर्ष तक पहुचंने की जुगत भिड़ानी होती है. खैर.

अब ऊपरी अमूर्त बातों के बरक्स कुछ सीधी-साधी बातें. जब यह बहस शुरू हुई तो कहीं भी किसी तरह का व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह नहीं था. सीधे तौर पर कुछ मोटे-मोटे से सवाल थे जिसे आपने अपने लोकतांत्रिक निष्ठा का परिचय देते हुए अपनी एक टिप्पणी के साथ सीधे ‘लोक’ को अग्रेसित कर दिया. उस लोक को जिसका संग्रह आपने काफी मिहनत से किया है. उस लोक को जिस पर वास्तव में प्रवक्ता को गर्व है. उस लोक को जिसके बौद्धिक और वैचारिक होने से पंडित जी के अलावा किसी को भी इनकार नहीं है. उस लोक को जो आपकी, हमारी, हम सबकी थाती है. उस लोक को जो केवल टिप्पणीकार नहीं हैं. वह Examinee Is Better Then Examinar हैं. आपकी सबसे बड़ी सफलता यही है कि आपने ऐसा लोकमंच खड़ा किया जहां सभी विचारों का सम्मान है. इस पर आने वाले पाठक या टिप्पणीकार लेखक से कई गुना विद्वान-बुद्धिमान, सरोकार और संस्कारवान हैं.

तो इस विमर्श या लोकमत संग्रह ने सभी संबंधित लोगों को लाभान्वित ही किया है. हम जैसे नए लोगों को प्रेरित उत्साहित किया है. सैकड़ों नए लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है. सचिन जी जैसे वामपंथी रुझान वाले तो समन्वय जी जैसे राष्टवादी युवक को शानदार आलेख लिखने को प्रेरित किया है. माननीय टिप्पणीकारों द्वारा सभी लेखकों को सार्थकता भी प्रदान की गयी है. और तो और पंडित जी जैसे विद्वानों को भी पुनर्विचार करने का, अपनी शैली को थोडा बहुत बदलने का भी मौका दिया है. (यह इस बात से भी साबित होता है कि आ. जगदीश्वर जी अब दूसरे के लेखों पर टिप्पणी भी देने लगे हैं).

लेकिन यह तमाम लाभ इस बहस के उप-उत्पाद (By-Product) की तरह ही है. इसका असली साफल्य इस बात में होगा कि, बहस में उठाये गए सवालों का जबाब ढूंढ कर प्राप्त निष्कर्ष से हम पाठकों को अवगत कराया जाय. सवाल सीधे थे कि क्या संपादक द्वारा किसी एक लेखक को ज़रूरत से ज्यादा जगह देना उचित है? या लेखक से यह निवेदन किया जाय कि उन्हें जो भी कहना हो एक या दो लेखों में संक्षिप्त और सारवान रूप से कहें? क्या यह उचित है कि अगर ज़रूरत हो और जनमत इसके पक्ष में दिखे तो संपादक को भी अपनी संपादकीय नीति में थोडा-बहुत फेरबदल करने के लिए स्वतः-प्रेरित होना चाहिए…आदि-आदि.

तो संजीव जी, निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पंडित जी को संबोधित लेख में इस पाठक ने संचार शोध के प्रचलित तरीकों के साथ निष्कर्ष तक पहुचने का आह्वान किया था. लेकिन उनका इस आह्वान पर भी क्या रुख है वह उनकी टिप्पणियों से साबित हो गया. लेकिन आप चूंकि लोकतंत्र में भरोसा करते हैं तो इन्ही तथ्यों को, प्राप्त आंकड़ों को मैं आपसे लोकतंत्र के नज़रिए से देखने की गुजारिश करता हूँ. उसी तरीके से आप निष्कर्ष तक पहुचें, हम पाठकों को बताएं, और अगर निष्कर्ष हमारे पक्ष में दिखे तो घोषित रूप से अपनी नीति में यदि रद्दोबदल ज़रूरी लगें तो करें भी. ऐसे स्वीकार्यता से आपका कद ही ऊंचा होगा. इन दोनों तरीकों के अलावा अगर निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए आप किसी अन्य माडल पर भी विचार करना चाहें तो वो भी करने को आप स्वतंत्र हैं.

आ. संपादक जी. आपका दायित्व निश्चय ही काँटों के ताज जैसा है. व्यक्तिगत रूप से आपकी निष्ठा पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है. लेकिन बहस के बाद से ही कई लोगों ने व्यक्तिगत बातचीत-लिखचीत में इस बहस को प्रोपगंडा साबित करने की कोशिश की है. तो अब जब यह विमर्श एक उबाऊ रूप लेता जा रहा है लेकिन बावजूद उसके चीज़ें वही की वही हैं. अभी भी पंडित जी पूर्ववत धुरछार लगातार पोस्टियाते जा ही रहे हैं और साथ-साथ बहस भी चल रहा है कि ऐसा होने दिया जाय कि नहीं. खैर.

हम जैसे कनिष्ठ लोगों को इतना महत्व देकर बहस को इतना रोचक बनाने के लिए सभी टिप्पणीकारों-पाठकों-लेखकों एवं आ. जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के साथ-साथ आपके प्रति भी अनन्य-अशेष आभार प्रकट करता हूँ. साथ ही यह विनम्र निवेदन दुहरा भी रहा हूँ कि बहस के किसी ठोस निष्कर्ष से हम पाठकों को ज़रूर अवगत कराएं. यह अन्य चीज़ों के साथ हम सबके विश्वसनीयता के लिए भी आवश्यक है….धन्यवाद एवं सादर….आपका ही.

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15 Comments on "संजीव जी, ‘अंजाम’ हमें नहीं पता, आप बताएं."

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सुशान्त सिंहल
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यह जान लेने के बाद कि श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी जो कुछ लिखते हैं, वह कूड़ाघर से अधिक कुछ भी नहीं है, किसी को भी उनके कारण स्वयं को निर्वासित नहीं करना चाहिये। श्री चतुर्वेदी चूंकि ईमानदार चिंतक नहीं है, सिर्फ कम्यूनिस्म की एडवर्टाइज़िंग एजेंसी हैं, उनके लिखे हुए कचरे को लेकर चिंतित क्यों हुआ जाये?

इक़बाल हिंदुस्तानी
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कमाल है प्रवक्ता पर ऐसा भी हो चुका है? येह तो सरासर तानाशाही और फासीवाद है कि आप सम्पादक से अपनी मर्झी का निश्कर्श चाह्ते है

ravikirirti
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आदरणीय संजीव जी, मै प्रवक्ता का नया पाठक हू| आज पंकज जी ,चतुर्वेदीजी और आपके इन प्रसंगों को पढ़ा ,बहुत दुःख हुआ |हिंदी में एसे ही बहुत कम साईट है उसमे भी बिना वजह की टिप्पणिया|मुझे समझ मै नहीं आता,आखिर हम एक सार्थक बहस के माध्यम से देश को आगे इस जड़ता से ले जाना चाहते है या कुछ और …… ईमानदारी से लिख रहा हू ,चतुर्वेदी जी के लेखो मे आलोचना के सिवा कुछ नहीं है |मैंने उनके लेखो को पढ़ा ,लेकिन टिप्पणी नहीं दी,क्योकि इनको उपैझित करना ही ठीक है,इस देश मे जिसको देखो आलोचना मे लगा है… Read more »
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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“आप में से अधिकतर लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं.फलस्वरूप आप लोग यथार्थ को देख ही नहीं पाते.इसी श्रेणी में पंकजजी जी भी आते हैं.जगदीश्वर चतुर्वेदीजी भी आते हैं.श्री मीणा और डाक्टर कपूर भी मेरे विचार से इसी श्रेणी में आते हैं.”

श्री आर सिंह जी, सकारात्मक आलोचना के लिए धन्यवाद!

R.Singh
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परिस्थितियाँ कुछ ऐसी रही की प्रवक्ता से इधर बहुत दिनों से दूर रहा,पर अब जब पुराने अंकों को अवलोकन करने चला हूँ तो पाता हूँ की इसी बीच बहुत कुछ हो चूका है और काफी कुछ बदल गया है.मैंने पहले भी लिखा है और आज भी दुहरा रहाहूं की आप में से अधिकतर लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं.फलस्वरूप आप लोग यथार्थ को देख ही नहीं पाते.इसी श्रेणी में पंकजजी जी भी आते हैं.जगदीश्वर चतुर्वेदीजी भी आते हैं.श्री मीणा और डाक्टर कपूर भी मेरे विचार से इसी श्रेणी में आते हैं.आप सज्जन यह क्यों सोच लेते हैं की आप जो कह… Read more »
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