लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

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प्राचीन काल से ही भारत विभिन्न धर्मों तथा मतों के अनुयायियों का निवास स्थल रहा है। इन सबमें मेल-जोल और आपसी भाईचारा बढ़ाने के लिए संतों ने समय-समय पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे संतों में समाज सुधारक व कवि रविदास अर्थात रैदास (1398-1518) का नाम अग्रगण्य है। गुरु स्वामी रामानन्द के शिष्य और संत कबीर के गुरूभाई  रविदास को रामदास, गुरु रविदास, संत रविदास, रैदास के नाम से भी जाना जाता है । अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संत कुलभूषण कवि रविदास की रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत  रविदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।रैदास की वाणी, भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उनकी शिक्षाओं का श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था।रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर होने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बतलाया और सबको परस्पर मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर गाया करते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को, समाज में फैली छुआ-छूत, ऊँच-नीच के भेद को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बचपन से ही संत मत की ओर झुकाव रखने वाले रविदास के संत  कबीर गुरूभाई थे क्योंकि दोनों के गुरु स्वामी रामानन्द थे। । रविदास की मशहूर उक्ति ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ मनुष्य को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्रदान करती है। रविदास के पद, नारद भक्ति सूत्र और रविदास की बानी उनके प्रमुख संग्रहों में से हैं। मानवता के उद्धारक रविदास का संदेश संसार के लिए अत्यंत कल्याणकारी है। ऐसे महान संत की गणना केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के महान संतों में की जाती है। इन्हें संत शिरोमणि गुरु रविदास की संज्ञा से विभूषित किया गया है। संत रविदास की वाणी के अनुवाद संसार की विभिन्न भाषाओं में पाए जाते हैं। संत रैदास की समन्वयवादी व स्वानुभूतिमयी चेतना ने भारतीय समाज में जागृति का संचार किया और उनके मौलिक चिन्तन ने शोषित और उपेक्षित वर्गों में आत्मविश्वास का संचार किया। परिणामत: वह ब्राह्मणवाद की प्रभुता के सामने साहसपूर्वक अपने अस्तित्व की घोषणा करने में सक्षम हो गये। संत रैदास ने मानवता की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उनके मन में इस्लाम के लिए भी आस्था का समान भाव था। कबीर की वाणी में जहाँ आक्रोश की अभिव्यक्ति है, वहीं दूसरी ओर सन्त रैदास की रचनात्मक दृष्टि दोनो धर्मो को समान भाव से मानवता के मंच पर लाती है। संत रैदास वस्तुत: मानव धर्म के संस्थापक थे। गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रैदास उच्च-कोटि के विरक्त संत थे। उन्होंने ज्ञान-भक्ति का ऊँचा पद प्राप्त किया था। उन्होंने  अपनी वाणी व रचनाओं में समता और सदाचार पर बहुत बल दिया। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय था। विश्व भर में रैदास के भक्तों की एक लंबी श्रृंखला है और उनके मत के अनुयायी रैदासी या रविदासी कहलाते हैं। रविदास का जन्म दिन माघ मास की पूर्णिमा तिथि मानी जाती है । सम्पूर्ण भारत में माघ महीने के पूर्ण के चन्द्रमा दिन अर्थात माघ पूर्णिमा पर प्रतिवर्ष संत रविदास की जयंती या जन्म दिवस को बड़े हर्षोल्लास व उत्साह के साथ किसी उत्सव या त्योहार की तरह मनाया जाता है ।

 

समाज में भाईचारा बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने वाले भारत के संतों में अग्रगण्य संत रविदास का जन्म सन् 1398 में काशी (उत्तरप्रदेश) में हुआ था। रैदास अथवा संत रविदास कबीर के समसामयिक कहे जाते हैं। मध्ययुगीन संतों में रैदास का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनका समय सन् 1398 से 1518 ई. के आस पास का माना जाता है । कुछ विद्वान काशी में जन्मे रैदास का समय 1482-1527 ई. के मध्य मानते हैं। अपने पूर्ववर्ती और समसामायिक भक्तों के सम्बन्ध में रविदास के द्वारा अपनी रचनाओं में लिखे गयेनिर्देशों से ज्ञात होता है कि कबीर की मृत्यु उनके सामने ही हो गयी थी। रैदास की अवस्था 120 वर्ष की मानी जाती है। कबीर के ही अंत: साक्ष्य- ‘नीचे से प्रभु आँच कियो है कह रैदास चमारा’ के आधार पर रैदास का चर्मकार जाति का होना सिद्ध होता है। काशी के रहने वाले संत रैदास को रामानन्द का शिष्य माना जाता है ।रैदास के पिता का नाम रग्घु और माता का नाम घुरविनिया बताया जाता है।कुछ इतिहासकार रविदास का जन्म पिता संतोख के घर और माता कलसी देवी जी की कोख से गाँव सीर गोवर्द्धनपुर में हुआ मानते हैं । रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वह अपना काम को पूरी लगन तथा परिश्रम से तय अर्थात नियत समय पर पूर्ण करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी उनसे अत्यन्त प्रसन्न रहा करते थे।तत्कालीन काशी के अत्यंत प्रसिद्ध व लब्धप्रतिष्ठित संत स्वामी रामानन्द की शिष्य-मण्डली के महत्त्वपूर्ण सदस्य रविदास प्रारम्भ से ही अत्यन्त परोपकारी तथा दयालु प्रवृति के थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष सुख का अनुभव होता था। बचपन से समाज के बुराइयों को दूर करने के प्रति अग्रसर रहने वाले संत रविदास के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके विशिष्ठ गुणों का पता चलता है। शैशवावस्था से ही सत्संग के प्रति उनमें विशेष अभिरुचि थी। अत: रामजानकी की मूर्ति बनाकर पूजन किया करते थे। साधु – संतों से भी इनका विशेष लगाव था और वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहा करते थे। इसलिए कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर रहने और तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करने लगे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। ये परम संतोषी और उदार व्यक्ति थे। इनकी विरक्ति के सम्बन्ध में एक प्रसंग मिलता है कि एक बार किसी महात्मा ने उन्हे पारस पत्थर दिया और उसका उपयोग भी उसने बतला दिया। पहले तो संत रैदास ने उसे लेने से ही अस्वीकार कर दिया। किन्तु महात्मा के बार – बार आग्रह करने पर उन्होंने ग्रहण कर लिया और अपने छप्पर में खोंस देने के लिये कहा। तेरह दिन के बाद लौटकर उक्त साधु ने जब पारस पत्थर के बारे में पूछा तो संत रैदास का उत्तर था कि जहाँ आपने रखा होगा, वहीं से उठा लो और सचमुच वह पारस पत्थर वहीं पड़ा मिला।

लोकप्रिय कहावत ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ के शुरूआत के सन्दर्भ में संत रैदास से सम्बंधित कथा भी उनके विशिष्ट गुणों का परिचायक है।कथा के अनुसार,एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, ‘गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को आज ही जूते बनाकर देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि आज मैं जूते नहीं दे सका तो वचन भंग हो जायेगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इस कठौती के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।’ कहा जाता है कि रविदास के इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’

 

ऐसा प्रसिद्ध है कि, ये अनपढ़ थे, किंतु संत-साहित्य के ग्रंथों और गुरु-ग्रंथ साहब में इनके अनेक पद पाए जाते हैं।उपनिषदों से लेकर महर्षि नारद और शाण्डिल्य के  भक्ति तत्व की अनेक प्रकार से व्याख्या की है। रैदास ने भक्ति में रागात्मिका वृत्ति को ही महत्व दिया है। नाम मार्ग और प्रेम भक्ति उनकी अष्टांग साधना में ही है। रैदास की अष्टांग साधना पध्दति उनकी स्वतंत्र व स्वछंद चेतना का प्रवाह है। उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित – भावना तथा सदव्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। संत रैदास के अनुसार, परम तत्त्व सत्य है, जो अनिवर्चनीय है – यह परमतत्त्व एकरस है तथा जड़ और चेतन में समान रूप से अनुस्यूत है। वह अक्षर और अविनश्वर है और जीवात्मा के रूप में प्रत्येक जीव में अवस्थित है। वह नित्य, निराकार तथा सबके भीतर विद्यमान है। सत्य का अनुभव करने के लिये साधक को संसार के प्रति अनासक्त होना पड़ेगा। रैदास के ज्ञान का प्रकाश संसार में ऐसा फैला कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा गुरु जी के शिष्य बन गए। उनके शिष्यों में राजा नागर मल (हरदेव सिंह), राजा वीर बघेल सिंह, सिकंदर लोदी, महाराणा संग्राम सिंह, राजा चंद्र प्रताप,, बिजली खान, राजा रतन सिंह, महान संत मीराबाई जी, बीबी कर्माबाई जी, बीबी भानमती जी आदि प्रमुख हैं। भारत के संविधान निर्माता डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी गुरु रविदास को अपना गुरु माना।संत रैदास अपने समय के प्रसिद्ध महात्मा थे। कबीर ने संतनि में रविदास संतकहकर उनका महत्त्व स्वीकार किया है।नाभादास कृत भक्तमाल में रैदास के स्वभाव और उनकी चारित्रिक उच्चता का प्रतिपादन मिलता है। प्रियादास कृत भक्तमाल की टीका के अनुसार चित्तौड़ की झालारानी उनकी शिष्या थीं, जो महाराणा सांगा की पत्नी थीं। मीरा के अनेक पदों में रैदास का गुरु रूप में स्मरण होने के कारण कुछ लोगों का अनुमान है कि यह चित्तौड़ की रानी मीराबाई ही थीं और उन्होंने रैदास का शिष्यत्व ग्रहण किया था। वर्तमान में भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण संत रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि मिली और यही कारण है कि संत कुलभूषण कवि रैदास को आज भी लोग श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

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