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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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sarabjitवीरेन्द्र सिंह चौहान

लाहौर के जिन्ना अस्पताल में सरबजीत सिंह  मृत्यु की डगर पर कोमा से एक कदम और आगे बढ़ गया है। खबर है कि उसका मस्तिष्क काम करना बंद कर चुका। चिकित्सकों की बोली में इस स्थिति को ब्रेन-डेड होना कहा जाता है। अब इस अभागे स्वदेश लौटने की तो क्या, उसके जीवित आईसीयू से बाहर निकलने की उम्मीदें समाप्तप्रायः हो चुकी हैं। यह दर्दनाक स्थिति सच्चे अर्थों में सरबजीत सिंह पर जेल के भीतर हमला करने वालों की ही नहीं पाकिस्तान के शासन-तंत्र की भी जीत है। ऐसी जीत जिसमें मानवता हार रही है, मानवाधिकार तार-तार हुए हैं और कहीं न कहीं भारत सरकार भी हार की कगार पर हैै।

सरहद के उस पार मनाएजाने वाले जीत के इस जश्न में दुनिया जमात-ए-इस्लामी, जमात-उद-दावा और तालिबान सरीखे हिंदुस्थान विरोधी नापाक-पाकिस्तानी तत्वों को भी शुमार पाएगी। ऐसा इसलिए चूंकि इन्हीं के कथित राजनीतिक और उन्मादी दबाव या फिर पाकिस्तानी सत्ता-प्रतिष्ठान पर इनकी पकड़ के कारण सरबजीत की जेल से रिहाई संभव नहीं हो पाई। याद रहे कि किसी और के गुनाह के लिए फांसी की सजा-प्राप्त सरबजीत की रिहाई के लिए जारी चौतरफा प्रयास पिछले साल लगभग सिरे ही चढ़ गए थे। समाचार माध्यमों में 28 जून को यह खबर आई कि राष् ट्रपति जरदारी ने उसकी सजा माफ कर उसकी रिहाई का रास्ता खोल दिया है। मगर इस ऐलान के करीब पांच घंटे के बाद यकायक एक सरकारी स्पष्टीकरण आ टपका था कि रिहाई सरबजीत की नहीं बल्कि किसी दूसरे कैदी सुरजीत सिंह की होने जा रही है। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान ने भले ही उस दिन अपने इस छल-यंत्र को सूचना-तंत्र की चूक करार देकर अपनी झेंप मिटाने का प्रयास किया था, मगर सच्चाई छन- छन कर कुछ समय बाद बाहर आ ही गई थी। और सच्चाई यह थी कि पाकिस्तानी शासन-तंत्र को भारत विरोधी जमातों की कट्टरपंथी घेरेबंदी के सामने चंद ही घंटों में घुटने टेकने पड़ गए थे। सरबाजीत सिंह की रिहाई होते होते रोक दी गई थी और सुरजीत सिंह की रिहाई और दोनों नामों की साम्यता तो महज इस आंतरिक कुचक्र को ढ़कने के लिए रचा गया ठकोसला था।

अंग्रेजी की एक कहावत है जिसका भावार्थ है कि नाम में भला क्या रखा है? मगर यह कहावत हर सूरत और संदर्भ में खरी नहीं उतरती। बेचारे सरबजीत के मामले में तो यह कतई सही साबित नहीं हुई। लाहौर के जिन्ना अस्पताल में इस समय वेंटिलेटर से दी जा रही  अप्राकृतिक सांसों के सहारे मृत्यु की देहलीज पर पड़े सिसकते सरबजीत के साथ नाम के नाम पर एक नहीं दो-दो बार गड़बड़ी हुई। पहली बार तब जब उसे पाकिस्तान की पुलिस ने उस गुनाह के लिए सूली पर लटकवाने की ठानी जो खुद पाकिस्तानी अभियोजकों के अनुसार सरबजीत सिंह ने नहीं बल्कि मनजीत सिंह ने किया था। पाकिस्तानी जांच एजेंसियों ने सरबजीत सिंह को 1990 में लाहौर और फैसलाबाद में हुए बम धमाकों का आरोपी मंजीत सिंह मान लिया था। दूसरी बार नाम के ही भ्रम में या फिर नाम के भ्रम के बहाने से पाकिस्तान सरकार ने उसकी रिहाई को आखिरी क्षणों में रोक दिया था। कैसी विडंबना है कि मंजीत के नाम की सजा काट रहा सरबजीत जब रिहा होने को हुआ तो उसके हिस्से की रिहाई भी कोई सुरजीत की झोली में जा गिरी।

दरअसल, पाकिस्तान की जांच एजेंसियां और उनकी रिपोर्टों के आधार पर वहां के अभियोजक सरबजीत सिंह को मनजीत सिंह साबित कर सजा दिलाने में कामयाब रहे। मनजीत सिंह पाकिस्तान के अनुसार 1990 में हुए बम धमाकों की उस श्रंखला का आरोपी है जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई थी। इधर,खुद सरबजीत, उसके परिजनों और अन्य स्रोतों से यह बात असंदिग्ध रूप से साबित हो चुकी है कि सरबजीत सिंह वस्तुतः पाकिस्तान का वांछित आरोपी मंजीत नहीं है। इस नाम से उसे कभी जाना या पुकारा ही नहीं गया। वह तो सरहद पर बसे गांव का एक साधारण का किसान था जो एक शाम शराब के नशे में भूल से पाकिस्तानी सीमा में पंहुच गया था और सरहद के पाकिस्तानी पहरेदारों ने उसे धर दबोचा।

खैर, आज सरबजीत सिंह जिस मुकाम पर पंहुच चुका है, वहां किसी नाम या पहचान के अर्थ नहीं रह जाते। मगर उसके मौजूदा हश्र ने एक बार फिर हमारे पड़ौसी मुल्क के शासन-तंत्र का अमानवीय चरित्र बेपर्दा कर दिया है। सच यही है कि पाकिस्तानी अदालतों से सरबजीत को न्याय नहीं मिला। जानकार कहते हैं कि उसे दंडित करने की प्रक्रिया में हर कदम पर आवश्यक न्यायिक व कानूनी तौर-तरीकों को जबरदस्त अनदेखी की गई। मसलन, अंग्रेजी में चली मुकदमें की कार्रवाई के दौरान इस पंजाबी भाषी किसान को कोई अनुवादक ही मुहैया नहीं कराया गया। बम विस्फोटों के कथित प्रत्यक्षदर्शियों के सामने जब शिनाख्ती परेड़ हुई तो कोई मजिस्टेट मौजूद नहीं था। कालांतर में उसकी वकालत करने वाले पाकिस्तानी वकील पर तो यह आरोप लगा कि उसने सरबजीत के परिजनों से खूब पैसा ऐंठा मगर उसकी पैरवी निहायत अनमने मन से की। इस बात का प्रमाण दस्तावेजों में भी है और इस तथ्य से भी मिलता है कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट में सरबजीत की अपील इसलिए खारिज हो गई थी कि उसका वकील पेशी पर ही नहीं पंहुचा। इनके अलावा भी अनेक ऐसे तथ्य हो सकते हैं जो पाकिस्तान की जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष को तकनीकी आधार पर कटघरे में घसीटने के लिए काफी हैं।

पाकिस्तान में सरबजीत के वकील औवेस शेख और सरबजीत के परिजनों के इस आरोप में भी दम लगता है कि सरबजीत पर जेल के भीतर हुआ जानलेवा हमला केवल उन दो कैदियों का कृत्य नहीं हो सकता जिनके खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर जेल के अधिकारी भी इस साजिश में शामिल रहे हों, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। सरबजीत की जान को खतरा होने की बात काफी पहले सार्वजनिक हो चुकी थी और यह बात पाकिस्तान व भारत के सरकारी रिकार्ड और अधिकारियों की जानकारी में भी थी। इसके बावजूद उसे जेल के भीतर बेरहमी से पीटकर मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया गया। यह सब अनायास या स्वाभाविक घटनाचक्र किसी भी कोण से नहीं लगता।

ऐसे में यह समय इस बात के आकलन का भी है कि क्या भारत सरकार ने पड़ौसी देश की जेल में बरसों सड़े अपने इस नागरिक का बचाव करने में यथोचित रुचि व सक्रियता दिखाई ? इसका भी अध्ययन व जांच क्यों न हो कि सरबजीत की पैरवी में दिल्ली ने कितना दम लगाया और उसकी जान को खतरा होने की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली ने इस्लामाबाद पर कितना और कैसा दबाव बनाया? जो पाकिस्तान करगिल घुसैपठ के बाद भारतीय जमीन पर मारे गए अपने ही शहीद सैनिकों को पहचानने व अपनाने से इनकार कर सकता है, वह सरबजीत के मामले में अपनी चूक कबूल करेगा, इसकी अपेक्षा करना ही बेमानी है। पाकिस्तानी जांच तथ्यों को उघाड़ने के बजाय उन पर पर्दा डालेगी, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। मगर आज हम अपना घर तो संभालें। भारतीय शासन भी इस सवाल के साथ आत्मावलोकन अवश्य करे कि हमारी भूमिका में कहां कहां चूक हुई। इसके लिए अगर किसी अधिकारी या अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सके तो भविष्य के लिए हमारी मशीनरी के कुछ पंगुत्व-ग्रस्त मानवीय अंगों को भी आंख हो जाएगी।

 

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