लेखक परिचय

हिमकर श्‍याम

हिमकर श्‍याम

वाणिज्य एवं पत्रकारिता में स्नातक। प्रभात खबर और दैनिक जागरण में उपसंपादक के रूप में काम। विभिन्न विधाओं में लेख वगैरह प्रकाशित। कुछ वर्षों से कैंसर से जंग। फिलहाल इलाज के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से रचना कर्म। मैथिली का पहला ई पेपर समाद से संबद्ध भी।

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हिमकर श्याम

सत्ता में वापसी के बाद यूपीए सरकार सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पार्टी और सरकार की मुक्तिदायिनी और चतुर सारथी सोनिया के न रहने से यह संकट और बढ़ गया है। पार्टी और सरकार दोनों बेलगाम और खस्ताहाल नजर आ रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सोनिया सारथी की भूमिका अब तक अच्छी तरह से निभाती रहीं हैं] लेकिन अपने इलाज के लिए अमेरिका जाते वक्त उनसे एक चूक हो गयी। सोनिया ने समस्याओं में उलझी पार्टी और भंवर में फंसी सरकार को संभालने का जिम्मा ऐसे लोगों के हाथों में थमा दिया जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं। संकट के इस दौर में ऐसे नेता की जरूरत थी जो पार्टी को सही नेतृत्व दे सके, न कि इसे और मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दे। पार्टी में सक्षम योद्धाओं और योग्य नेताओं की कोई कमी नहीं है लेकिन विडंबना यह है कि ऐसे योद्धा हमेशा ही नेपथ्य में रहे हैं।

सोनिया बीमार हैं] मनमोहन लाचार हैं और युवराज अनिर्णय के शिकार। कांग्रेस और यूपीए सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। पार्टी यथास्थितिवाद में फंसी हुई है। सरकार की हर चाल उल्टी पड़ रही है। सरकार और संगठन में तालमेल का अभाव साफतौर पर दिख रहा है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर अन्दरूनी मतभेद सामने आते रहे हैं। पार्टी अलग सुर अलापती है तो सरकार अलग। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान यह मतभेद चरम पर पहुंच गया। पार्टी अपने ही बनाये चक्रव्यूह में फंसती गयी। अन्ना के अनशन के दौरान सरकार और कांग्रेस ने वही किया जिसमें उसे महारत हासिल हो चुकी है यानि] गलत लोगों से गलत काम एवं गलत मौके पर गलत बयान। सरकार की गलतियों ने ही एक साधारण गांधीवादी इंसान को एक असाधारण और ताकतवर नायक बना दिया और उसका आंदोलन देश भर के गुस्से के इजहार का सबब बन गया। गलतियों पर गलतियां कर रही सरकार आज पूरी तरह से आमजन के निशाने पर है।

विडम्बना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान सरकार की साख पर लगा बट्टा और इसकी दयनीय दशा के जिम्मेदार लोग ही पार्टी में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। पार्टी को चलाने के लिए चार लोगों की टीम बनायी गयी थी। चार लोगों की इस टीम में राहुल गांधी, ए.के. एंटनी, अहमद पटेल और जनार्दन द्विवेदी शामिल थे। संकट के समय इन चारों की सक्रियता कहीं नजर नहीं आयी। कपिल सिब्बल] पी चिदंबरम और मनीष तिवारी के कारनामों ने तो पार्टी का बंटाधार कर दिया है। हाल के एक सर्वे में अन्ना के समर्थन में उमड़ता समर्थन और सरकार के विरोध में उठता स्वर, सत्तारूढ़ गठबंधन खासकर कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है। चंद महीने पहले तक निर्विवाद रूप से पहले स्थान पर चल रही कांग्रेस इस सर्वे में प्रतिद्वंदी बीजेपी से पिछड़ती दिख रही है। दरअसल इसे भाजपा की बढ़त के रूप में नहीं, कांग्रेस की गिरावट के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल का आकलन करें तो वह घोटालों के नाम रहा। पिछले एक साल के दौरान एक के बाद एक घोटाले उजागर होने के बावजूद सरकार ने किसी भी भ्रष्टाचारी के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छा नहीं दिखाई। इतना ही नहीं सरकार बड़ी बेशर्मी से घोटाले से ही इनकार करती रही। पूर्व संचार मंत्री ए राजा और राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी जेल में गए तो इसका श्रेय उच्चतम न्यायालय की कड़ी निगरानी को जाता है। आजाद भारत में ऐसा मौका कभी नहीं आया जब भ्रष्टाचार के आरोपों में इतने बड़े लोगों पर एक साथ गाज गिरी हो। सरकार के साथ साथ मनमोहन सिंह की साख को भी बट्टा लगा। सीबीसी की नियुक्ति के मामले में मनमोहन सिंह पर पहली बार ऊंगली उठी। सीवीसी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध करार दिया, जिससे प्रधानमंत्री की काफी फजीहत हुई। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सर्तकता आयुक्त के पद पर पीजे थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए कहा है कि उनके नाम की अनुशंसा कानून के अनुरूप नहीं हैं। मनमोहन सिंह ऐसे सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं जो आजादी के बाद अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार कही जाने लगी है। नोट के बदले वोट मामले में अमर सिंह की गिरफ्तारी सरकार के लिए मुसीबत का एक और सबब लेकर आयी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था को नियंत्रण से मुक्ति दिलानेवाले मनमोहन सिंह से लोगों को बड़ी उम्मीदें थीं। इस अराजनैतिक शख्स का रवैया महत्वपूर्ण मौकों पर ढीला-ढाला रहा है। कई मौकों पर प्रधानमंत्री अपनी मजबूरियों और कमजोरियों को स्वीकार भी कर चुके हैं। इस दौरान न तो बड़े सुधार हुए हैं, न ही सामाजिक क्षेत्र में कोई निवेश। कई महत्पूर्ण विधेयक अंदरूनी कलह में फंसे हुए हैं। जिस समावेशी विकास के वादे से यूपीए सत्ता मे लौटी, वह अब भी दूर की कौड़ी है। चुनाव के समय पार्टी का नारा था- ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’ लेकिन सत्ता में आने के बाद लगता है वही हाथ अब आम आदमी के खिलाफ काम कर रहा हैं। देश गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। मुनाफाखोरी और जमाखोरी के कारण महंगाई बढ़ती जा रही है। बाजार पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। आम आदमी को मिलनेवाली सुविधाएं दुर्लभ हो रही हैं। आतंकी और माओवादी चुनौती पेश कर रहे हैं। आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था बेहद खराब है। आतंकियों ने देश की राजधानी दिल्ली को एक बार फिर दहला दिया है।

जिस कांग्रेस को सरकार चलाने के लिए स्वाभाविक पार्टी कहा जाता है और जिसे सरकार चलाने का लंबा अनुभव भी है नेतृत्व की कमी की वजह से दिशाहीन हो गयी है। कहा जाता है कि एक अच्छे नेता का उदय संकट के समय में होता है। राहुल के पास पार्टी और सरकार के बीच संतुलन बनाने का बेहतर मौका था, जिसे राहुल ने गंवा दिया। जब पार्टी और सरकार अपने कठिनतम दौर से गुजर रही है कांग्रेस के युवराज राहुल की खामोशी सवालों के घेरे में है। पार्टी को मजबूत इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता वाले नेता की दरकार है, फिलहाल राहुल में ऐसे नेता का अक्स नजर नहीं आ रहा है।

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