लेखक परिचय

शाहिद नकवी

शाहिद नकवी

मै फिलहाल स्‍वतंत्र हूं ।इसके पहले देश के कई अखबारों मे उप सम्‍पादक और रिर्पोटर के रूप मे काम कर चूंका हूं ।

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साल के बारह महीनों में रमजान का महीना मुसलमानों के लिए खास मायने रखता
है।यह मुबारक महीना है,यह संयम और समर्पण के साथ खुदा की इबादत का महीना
माना जाता है जिसमें हर आदमी अपनी रूह को पवित्र करने के साथ अपनी
दुनियादारी की हर हरकत को पूरी तत्परता के साथ वश में रखते हुए केवल
अल्लाह की इबादत में समर्पित हो जाता है। हर इंसान यही कोशिश करता है की
गुनाहों से बचे और साल भर में यदि कोई बुरी आदत पद गयी हो तो उस बुराई को
इस महीने में खुद से दूर कर सके | लेकिन खुदा कि सिफात के आईनेदार ,तमाम
सिफात के मरकज़ मुसलमानों के चौथे खलीफा हजरत अली (अ.स) आज से करीब 1352
साल पहले 661 ई. मे माहे रमज़ान मुबारक की 21 वीँ तारिख को कूफे की मस्जिद
मे सुबह की नमाज़ के वक्त शहीद कर दिये गये थे। 19 रमज़ान को सहरी के बाद
जब सुबह की नमाज़ अदा की जा रही थी तो नमाज़ियोँ के बीच खड़े कातिल रहमान
इब्ने मुलज़िम ने ज़हर से बुझी तलवार से मौला अली पर वार कर दिया ।आप इसके
बाद दो दिन तक बिस्तर रहे ।रवायत है कि मोहम्मद मुस्तफा स.स. ने मौला अली
को कातिल की पहचान और उसके बारे मे बता दिया था कहा जाता है कि 19 रमज़ान
को नमाज़ के वक्त मौला अली ने ये जानते हुये कि यही कातिल है ,उसे नमाज़ के
लिए उठाया था ।अब देखिये अली का इंसाफ ,हमले के बाद नमाज़ियोँ ने इब्ने
मुलज़िम को पकड़ लिया था ।मौला अली ने र्निदेश दिया कि इसके खाने पीने का
पूरा ख्याल रखा जाये और चूंकि इसने तलवार से एक वार किया है इस लिए इस पर
भी एक ही वार किया जाये ।तमाम इतिहासकारों ने लिखा है कि इंसानी कलम मे
इतनी ताक़त नही कि इमाम अली की तारीफ कर सके ।उन्होेने बुलंद फिक्र वा
खयालात, मखलूस अंदाज़ मे एक खास मेयार पर ज़िँदगी बसर की वह निराले अंदाज़
मे रहे और खास अंदाज़ मे इस दुनियाँ से गये। अल्लाह ने तमाम आलमें
इंसानियत की हिदायत के लिये इस्लाम में कई ऐसी हस्तियों को पैदा किया
जिन्होने अपने आदात व अतवार, पाकीज़गी व इंकेसारी, इबादत, रियाज़त,
सख़ावत और फ़साहत व बलाग़त से दुनिया ए इस्लाम पर अपने गहरे नक्श छोड़े
हैं, उन में से एक हजरत अली भी हैं।आपका जन्म अल्लाह के घर पवित्र काबे
शरीफ मे हुआ था। कहा जाता है कि आपकी वालदा आपकी विलादत के पहले जब काबे
शरीफ के पास गयीँ तो अल्लाह के हुक्म से काबे की दीवार ने आपकी मां को
रास्ता दे दिया था ।
हजरत अली का किरदार इतना बलंद था की जब उन्होंने
दुनिया छोड़ दी और उनको दफन के लिए ले जाया जा रहा था तो गरीबों के
मोहल्ले से किसी ने पुछा यह कौन था ,जब लोगों ने बताया की यह हजरत अली थे
और तीन दिन बीमार रह के दुनिया से चले गए तो वो सारे गरीब रोने लगे की
हाय अब उनका क्या होगा यही तो था जो रोज़ उनके घरों में अनाज रात के
अँधेरे में पहुँचाया करता था| यह वही अली थे जो कहा करते थे कि मेरी रचना
केवल इसलिए नहीं की गई है कि चौपायों की भांति अच्छी खाद्य सामग्री मुझे
अपने में व्यस्त कर ले या सांसारिक चमक-दमक की ओर मैं आकर्षित हो जाऊं और
उसके जाल में फंस जाऊं। मानव जीवन का मूल्य अमर स्वर्ग के अतिरिक्त नहीं
है अतः उसे सस्ते दामों पर न बेचें। हज़रत अली का यह कथन इतिहास के पन्ने
पर एक स्वर्णिम समृति के रूप में जगमगा रहा है कि ज्ञानी वह है जो अपने
मूल्य को समझे और मनुष्य की अज्ञानता के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वह
स्वयं अपने ही मूल्य को न पहचाने। हजरत अली ने अपनी खिलाफत के समय
जनतांत्रिक सरकार की स्थापना की और उनके शासन का आधार न्याय था।उनके समाज
में जनता की भूमिका ही मुख्य होती थी और वे कभी भी धनवानों और
शक्तिशालियों पर जनहित को प्राथमिक्ता नहीं देते थे। जिस समय उनके भाई
अक़ील ने जनक्रोष से अपने भाग से कुछ अधिक धन लेना चाहा तो हज़रत अली
अलैहिस्सलाम ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने पास रखे दीपक की लौ अपने भाई
के हाथों के निकट लाकर उन्हें नरक की आग के प्रति सचेत किया। वे न्याय
बरतने को इतना आवश्यक मानते थे कि अपने शासन के एक कर्मचारी से उन्होंने
कहा था कि लोगों के बीच बैठो तो यहां तक कि लोगों पर दृष्टि डालने और
संकेत करने और सलाम करने में भी समान व्यवहार करो। यह न हो कि शक्तिशाली
लोगों के मन में अत्याचार का रूझान उत्पन्न होने लगे और निर्बल लोग उनके
मुक़ाबिले में न्याय प्राप्ति की ओर से निराश हो जाएं।मुसलमानो के चौथे
ख़लीफा और पैग़म्बरे इस्लाम के दामाद हज़रत अली एक ऐसे आदर्श महापुरुष थे
जिनका पूरा जीवन ईश्वरी उपदेश के सांचे मे ढ़ला हुआ था ।उन्हेँ अमीरुल
मोमिनीन ,हैदरे र्करार ,इमामुल मुत्तकीन ,असदुल्लाह,वसी ए रसूल और ना
जाने कितने लकब दिये गये ।इतने सारे लकब उन्हेँ यूँ ही नही दिये गये
थे।वरन हर नाम की सिफत को उन्होने ने अपने चरित्र मे उकेर लिया था
।अल्लाह के जो उपदेश वह लोगोँ को देते थे खुद पर अमल कर के दिखाते थे
।इमाम और खलीफा होने के बाद भी उनके जीवन का बड़ा हिस्सा इबादत मे बीता था

अगर ग़ौर करें तो रसूल(स.) के बाद हज़रत अली की
जिंदगी पर तो उसके दो हिस्से हमारे सामने ज़ाहिर होते हैं। पहला हिस्सा,
जबकि वे शासक नहीं थे, और दूसरा हिस्सा जबकि वे शासक बन चुके थे। दोनों
ही हिस्सों में हमें उनकी जिंदगी नमूनये अमल नज़र आती है। बहादुरी व
ज्ञान में वे सर्वश्रेष्ठ थे, सच्चे व न्यायप्रिय थे, कभी कोई गुनाह उनसे
नहीं हुआ और कुरआन के बताये रास्तेी पर पूरी तरह खरे उतरते थे । रसूले
खुदा के बाद जनाब हज़रत अबुबक्र र.अ. को पहला खलीफा बनाया गया ।दूसरे
खलीफा जनाब उमर रज़ीअल्लाह ताला और तीसरे खलीफा जनाब हज़रत उस्मान र.अ.
बनाये गये ।इन करीब 25 सालोँ के बाद अली चौथे खलीफा बने ।वह अपनी ज़िँदगी
यहूदी के बाग़ मे नैकरी करके बसर करते थे ।खाने मे हमेशा जौ की रोटी और
नमक या फिर दूध लेते थे ।खलीफा बनने के बाद भी सरकारी खज़ाने से अपने लिए
और ना ही रिश्तेदारोँ के लिए कुछ लेते थे ।उनकी सादगी पसन्द ज़िँदगी का
ज़िर्क तमाम यूरोपी और अंग्रेज़ लेखकोँ ने किया है। जहाँ तक बहादुरी की बात
है तो हज़रत अली ने रसूल(स.) के समय में तमाम इस्लामी जंगों में आगे
बढ़कर शुजाअत के जौहर दिखाये।इस्लाोमी मामलों के खोजकर्ता रिप्ले ने खैबर
की जंग का वर्णन करते हुये लिखा है कि इस जंग मे मौला अली ने खेबर के
किले का 880 पौण्ड वज़नी दरवाज़ा एक हाथ से उखाड़ दिया था।वह कभी गुस्से व
तैश में कोई निर्णय नहीं लेते थे। न पीछे से वार करते थे और न कभी भागते
हुए दुश्मन का पीछा करते थे।किताबों मे मिलता है कि हज़रत अली मुफ्तखोरी
व आलस्य से सख्त नफरत करते थे। मज़दूरों से कैसा सुलूक करना चाहिए इसके
लिये हज़रत अली का मशहूर जुमला है कि मज़दूरों का पसीना सूखने से पहले
उनकी मज़दूरी दे दो।उनको बाग़ों को लगाने और कुएं खोदने का शौक था। यहाँ
तक कि जब उन्होंने इस्लामी खलीफा का ओहदा संभाला तो बागों व खेतों में
मजदूरी करने का उनका अमल जारी रहा। उन्होंने अपने दम पर अनेक रेगिस्तानी
इलाकों को सब्ज़ बाग में बदल दिया था।कहा जाता है कि मदीने के आसपास
उनके लगाये गये बाग़ात आज भी मौजूद हैं।अली इंसाफ पसंद थे और निजी कामोँ
के लिए सरकारी खज़ाने से जलने वाला चिराग भी बुझा देते थे ।इसी ईमानदारी
और ईश्वर के उपदेशोँ की पैरोकारी की वजह से तमाम सरदार उनके मुखालिफ हो
गये थे ।इस्लाशमिक दस्ताकवेजों के मुताबिक हज़रत अली में न्याय करने की
क्षमता गज़ब की थी।हदीसों के अनुसार उनका एक मशहूर फैसला ये है जब दो
औरतें एक बच्चे को लिये हुए आयीं। दोनों दावा कर रही थीं कि वह बच्चा
उसका है।हज़रत अली ने अपने नौकर को हुक्म दिया कि बच्चे के दो टुकड़े
करके दोनों को आधा आधा दे दिया जाये। ये सुनकर उनमें से एक रोने लगी और
कहने लगी कि बच्चा दूसरी को सौंप दिया जाये। हज़रत अली ने फैसला दिया कि
असली माँ वही है क्योंकि वह अपने बच्चे को मरते हुए नहीं देख सकती।
एक ईसाई लेखक अली की महानता के बारे मे लिखते हैं
कि इस महान व्यक्ति को चाहे आप पहचानें या न पहचाने वह गुणों और महानताओं
का आसीम तत्व है। शहीद और शहीदों का सरदार, मनुष्य की न्याय की पुकार और
इस्ला्मी जगत का अमर व्यक्तित्व है।अली हमेशा सत्य के मार्ग पर डटे रहे
और उन्होंने अपनी पवित्र प्रवृत्ति और बुद्धि,आस्था एवं ईमान की शक्ति के
सहारे भ्रष्ट शक्तियों के अत्याचार व पूंजीवाद से मुकाबिला किया।अली उस
दौर मे थे जब वैज्ञानिक खोजों और अविश्यपकारों की बात सोंची भी नही जा
सकती थी ।लेकिन कहा जाता है कि वह एक महान वैज्ञानिक भी थे और एक तरीके
से उन्हें पहला मुस्लिम वैज्ञानिक कहा जा सकता है।हज़रत अली ने वैज्ञानिक
जानकारियों को बेहतर ढंग से आम आदमी तक पहुँचाया। एक प्रश्नकर्ता ने उनसे
सूर्य की पृथ्वी से दूरी पूछी तो जवाब में बताया कि एक अरबी घोड़ा पांच
सौ सालों में जितनी दूरी तय करेगा वही सूर्य की पृथ्वी से दूरी है। उनके
इस कथन के चौदह सौ सालों बाद वैज्ञानिकों ने जब यह दूरी नापी तो
149600000 किलोमीटर पाई गई। अरबी घोडे की औसत चाल 35 किमी प्रति घंटा
बतायी जाती है और इससे यही दूरी निकलती है। इसी तरह एक बार अंडे देने
वाले और बच्चे देने वाले जानवरों में फर्क इस तरह बताया कि जिनके कान
बाहर की तरफ होते हैं वे बच्चे देते हैं और जिनके कान अन्दर की तरफ होते
हैं वे अंडे देते हैं।वह कहा करते थे कि आप उसी नजाकत के साथ रियाया की
देखभाल करें, जैसे आप अपने बच्चों की करते हैं, उनके सामने कभी यह बखान न
करें कि आपने उनकी भलाई के लिए अमुक काम किया है और न ही उनके प्रति
असम्मान जाहिर करें।यहां ये कहने मे हर्ज नही कि हजरत अली के लिए सत्ता
की अवधारणा सर्वजनहिताय थी।लेकिन दुर्भाग्यवश दुनिया उनके विचारों को
अपनाने के लिए तैयार नहीं थी उन्हें और उनके परिवार यहां तक की पीढियों
को भी पूरी जिंदगी इसकी कीमत चुकानी पड़ी।वह अपने इस भरोसे के लिए 21वीं
रमजान को कुर्बान हो गए। यह विडंबना ही है कि मौजूदा दौर में भी मुसलमान
हज़रत अली की नसीहतों से दूर हो गया जिससे बुराइयां उसमें पनपने लगीं हैं
।जिसके चलते आतंकवाद जैसे आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है।लेकिन अगर
वह आज भी ज्ञान प्राप्ति की राह पर लग जाए और पेगम्बंर के बताये रास्तेर
पर चले तो उसकी हालत में सुधार हो सकता है।
** शाहिद नकवी **

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