लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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छात्र जीवन में मैंने ‘सादा जीवन उच्च विचार’ पर कई बार निबन्ध लिखा है। निबन्ध में यहां-वहां का मसाला, कई उद्धरण और उदाहरण डालकर चार पंक्ति की बात को चार पृष्ठ बनाने में मुझे महारथ प्राप्त थी। मेरे निबन्ध को इसीलिए सर्वाधिक अंक भी मिलते थे। वस्तुतः किसी भी बात के, बिना बात विस्तार को ही निबन्ध कहते हैं। विश्वास न हो, तो प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ पढ़ लें। 

पिछले दिनों सफाई के दौरान मुझे कक्षा आठ में लिखा ऐसा एक निबंध मिल गया। मैंने उसमें लिखा था कि यदि किसी के जीवन में सादगी है, तो उसके विचार अपने आप उच्च हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो जिसके विचार उच्च हैं, उसका जीवन अनिवार्यतः सादा ही होगा। संस्कृत साहित्य में इसे ‘चंद्रचंद्रिकान्याय’ कहते हैं। अर्थात जहां चांद होगा, वहां चांदनी भी अवश्य होगी; और यदि कहीं चांदनी है, तो चांद भी होगा ही।

मैंने इसके लिए गांधी जी का उदाहरण दिया कि वे आधी धोती पहनते और जरूरत पड़ने पर बाकी आधी ओढ़ लेते थे। उनकी चप्पल, चश्मा और लाठी भी बहुत साधारण थी। लोग गाय या भैंस का दूध पीते हैं; पर वे स्वयं को भारत के गरीबों का प्रतिनिधि मानकर बकरी का दूध पीते थे। मैंने प्रख्यात गांधीवादी मोरारजी देसाई की सादगी की भी प्रशंसा की थी, क्योंकि वे केन्द्रीय मंत्री रहते हुए भी प्रायः रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बे में यात्रा करते थे।

जब मैं कुछ और बड़ा हुआ, तो मुझे एक पुस्तक मिली, जिसमें गांधी जी और उनके गांधीवाद को चार नंबर की महीन छलनी में छाना गया था। उसमें लिखा था कि चूंकि गांधी जी बकरी का ही दूध प्रयोग करते थे, इसलिए वह बकरी भी यात्रा में उनके साथ चलती थी। नियमों के पक्के होने के कारण गांधी जी तो रेल में टिकट लेकर चलते थे; पर बकरी के टिकट की उस पुस्तक में कोई चर्चा नहीं थी। गांधी जी की पदयात्राएं तो इतिहास में दर्ज हैं; पर उस बेचारी बकरी का योगदान लोग भूल ही गये। गांधी जी के साथ के कांग्रेसियों के वंशज तो आज भी राजनीति में हैं; पर उस बकरी के वंशज न जाने किसके पेट में हजम हो गये होंगे।

उन दिनों गांधी जी देश के सर्वोच्च नेता थे। इसलिए उनके साथ उस कांग्रेसी बकरी को भी हर जगह वी.आई.पी. जैसा सम्मान मिलता था। उसे देखकर बाकी बकरियां हसरत से आहें भरती थीं, ‘‘हाय, हम गांधी जी की बकरी न हुए।’’ गांधी जी नाश्ते में भले ही दूध या दही लेतेे हों; पर बकरी ढेर सारे बादाम, काजू और किशमिश खाती थी, जिससे उसका दूध गाढ़ा, मीठा और पौष्टिक हो सके। स्वाधीनता संग्राम के लिए गांधी जी का, और गांधी जी के लिए बकरी का पूर्ण स्वस्थ रहना बहुत जरूरी था। इस मामले में कोई खतरा नहीं उठाया जा सकता था। यद्यपि गांधी जी का सारा खर्च बिड़ला जी उठाते थे, फिर भी गांधी जी से अधिक उनकी बकरी पर हो रहे खर्च को देखकर एक नेता जी ने एक बार दिल की भड़ास निकाल ही दी कि बापू, आपकी सादगी हमें बहुत महंगी पड़ रही है।

मोरारजी भाई भी पक्के गांधीवादी और सादगी के प्रेमी थे। इसलिए उनका किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। उनके तृतीय श्रेणी में यात्रा करने के चर्चे जब कुछ अधिक ही होने लगे, तो एक बार कुछ खोजी पत्रकार किसी तरह उस डिब्बे में घुस गये। वहां का वैभव देखा, तो उनकी आंखें चैंधिया गयीं। डिब्बा बाहर से भले ही तृतीय श्रेणी का था; पर अंदर की सुविधाएं प्रथम श्रेणी को भी मात कर रही थीं।

पिछले दिनों हमारे चिंटू को भी उनके विद्यालय में इस विषय पर निबन्ध लिखने को कहा गया। चिंटू ने गांधी जी और मोरारजी भाई की तो नहीं; पर दिल्ली में अवतरित इनके नूतन संस्करण अरविंद केजरीवाल की चर्चा जरूर सुनी थी। इसलिए उसने निबन्ध में उनका ही वर्णन कर दिया।

उसने लिखा कि केजरी ‘आपा’ जैसा सादा जीवन किसी का नहीं हो सकता। वे खुद ही नहीं, उनके घरेलू नौकर, नौकरानियां, माली, कारचालक और चौकीदार आदि भी सादगी से रहते हैं। आज के युग में वातानुकूलित चार कमरों वाले छोटे से मकान में रहना कितना कठिन है ? मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने केवल पांच कमरों वाले दो बंगलों की ही तो मांग की थी; पर मूर्ख मीडिया ने शोर कर दिया, तो वे चार कमरों पर ही सहमत हो गये। इतना सादा जीवन भला किसका हो सकता है ? यद्यपि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद भी वे वहीं डटे हैं; पर बाकी नेता तो कई साल तक मकान नहीं छोड़ते। यदि उन्होंने चार-छह महीने रख लिया, तो क्या हो गया ?

केजरी ‘आपा’ की सादगी का दूसरा उदाहरण देखिये। उन्होंने पहले दिन ही साफ कह दिया था कि वे ‘आम आदमी’ हैं, इसलिए सुरक्षा नहीं लेंगे। यद्यपि इस कारण दिल्ली और उ.प्र., दोनों राज्यों की पुलिस को उनकी सुरक्षा करनी पड़ी। जब उन्होंने रात में रजाई में घुसकर धरना दिया, तो 50 पुलिस वाले घोर सर्दी में उनके आसपास पहरा देते रहे। सरकार का कहना है कि सुरक्षा न लेने के कारण उन पर चैगुना खर्चा हो रहा है।

अब जब वे मुख्यमंत्री नहीं हैं, तो भी मीडिया हाथ धोकर उनके पीछे पड़ा है। विशेष विमान से यात्रा, रात्रिभोज में दस और बीस हजार रु. चंदा, पुराने साथियों का विद्रोह, बिना हिसाब का विदेशी धन… आदि मीडिया की आंखों में चुभ रहा है। सारा मीडिया चोर और नरेन्द्र मोदी का दलाल जो ठहरा। कुछ मीडियाकर्मियों से भले ही उनकी सांठगांठ हो; पर ‘‘भारत में बस वे ही सच्चे, बाकी सब नेता हैं लुच्चे।’’ कितने उच्च और श्रेष्ठ विचार हैं उनके।

शर्मा जी का कहना है कि ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ वाले लोग दुनिया में सदा रहे हैं और आगे भी रहेंगे; पर ये लोग अपनी सादगी का ढिंढोरा नहीं पीटते। सच तो ये है कि उनके बल पर ही ये धरती टिकी है; पर जो पाखंडी और नाटकबाज हैं, उनके बारे में किसी ने ठीक ही लिखा है –

इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा
करते हैं कत्ल, हाथ में तलवार पर नहीं।।

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