लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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sneezingमुझे फिल्म देखने का कभी शौक नहीं रहा। हां, अच्छे गीत सुनने से मन-मस्तिष्क को आराम जरूर मिलता है। बालगीत भी बहुत अच्छे लगते हैं। ऐसे कुछ गीत और कविताएं मैंने भी लिखी हैं। कई बड़े अभिनेताओं ने बालगीत गाये हैं, यद्यपि वे स्थापित गायक नहीं है। इनमें अशोक कुमार द्वारा फिल्म ‘आशीर्वाद’ में गाया ‘रेलगाड़ी छुक-छुक, छुक-छुक, बीच वाले स्टेशन बोले रुक-रुक रुक-रुक’ और फिल्म ‘नटवरलाल’ में अमिताभ बच्चन द्वारा गाया गीत ‘मेरे पास आओ मेरे दोस्तो, एक किस्सा सुनो’ बहुत प्रसिद्ध हैं।

अमिताभ ने उस गीत में एक जंगल का किस्सा सुनाते हुए बताया कि कैसे उन्हें एक शेर ने खा लिया। इस पर एक बच्चा आश्चर्य से बोला, ‘‘खा गया…, लेकिन आप तो जिन्दा हैं ?’’ इस पर अमिताभ चौंकते हुए कहते हैं, ‘‘अरे ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ?’’

बस, ऐसी ही कुछ बात शर्मा जी की खांसी की है। कई दिन से वे खांस रहे हैं। कई दिन से नहीं, कई महीने से। कोई गंभीरता से पूछे, तो उनकी पत्नी बताती हैं कि उन्हें यह रोग कई साल से है। मौसम बदलने पर या धूल आदि में खांसी बढ़ जाती है। कई तरह के इलाज कराये; पर स्थायी लाभ नहीं हुआ। कोई ‘होम्योपैथी’ लेने की सलाह देता है, तो कोई ‘एलौपैथी’। कुछ लोग ‘नैचुरोपैथी’ के पक्ष में भी हैं; पर मैं तो इन सबसे आगे बढ़कर ‘सिम्पैथी’ का समर्थक हूं। मेरा मत है कि यदि डॉक्टर की मरीज के प्रति ‘सिम्पैथी’ नहीं है, तो मरीज का ठीक होना कठिन है।

ऐसी ही ‘सिम्पैथी’ के दर्शन पिछले दिनों तब हुए, जब ‘दिल्ली पुलिस दिवस’ पर आयोजित समारोह में नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसौदिया, किरण बेदी जैसे बड़े-बड़े लोग मिले। मिले ही नहीं, तो पास-पास बैठे भी। दिल्ली चुनाव में किरण बेदी को लगे घाव अभी ताजे ही हैं। इसलिए वे तो चुप रहीं; पर मोदी और राजनाथ सिंह ने ऐसी हार-जीत का स्वाद कई बार लिया है। इसलिए हल्की-फुल्की बात होने लगी।

बातचीत के बीच में ही केजरीवाल खांसने लगे। राजनाथ सिंह ने उनसे इस रोग के बारे में पूछा, तो नरेन्द्र मोदी ने ‘सिम्पैथी’ दिखाते हुए बंगलुरु के एक चिकित्सक डा. नागेन्द्र से सलाह लेने को कहा, जो पुरानी खांसी के विशेषज्ञ हैं। वे दवा के साथ ही योग, आसन, प्राणायाम और प्रार्थना आदि का भी सहारा लेते हैं। केजरीवाल ने कहा कि मैं उनसे जरूर मिलूंगा।

शर्मा जी मेरे पुराने मित्र हैं। उनकी खांसी से मुझे भी सहानुभूति है; पर आज मैं सोचता हूं कि खांसी हो तो केजरीवाल जैसी। जिस पर राजनाथ सिंह ‘सिम्पैथी’ दिखाएं और प्रधानमंत्री खुद सलाह दें, उसे खांसी नहीं, वी.वी.आई.पी. खांसी कहना अधिक उचित है।

मेरे एक मित्र राजनीति में बड़े ऊंचे स्थान पर हैं। अतः काफी व्यस्त रहते हैं। किसी जमाने में उनसे जब चाहे तब मिल लेते थे; पर अब तो पांच मिनट मिलने के लिए भी कई दिन पहले समय लेना पड़ता है। ऐसे बड़े आदमी को हर दिन किसी ने किसी कार्यक्रम में भी जाना पड़ता है। वहां खाने-पीने के लिए तेज मिर्च-मसाले वाली चटपटी बाजारी चीजें अधिक मिलती हैं। न खाएं, तो मेजबान नाराज; और खाएं तो शरीर दुखी। यानि ‘आगे कुआं और पीछे खाई’। बीमार होने पर अगले कार्यक्रमों में व्यवधान आ जाता है। इसलिए वे बहुत संभल कर रहते हैं।

लेकिन इतनी सावधानी के बावजूद एक बार उनका पेट खराब हो गया।  बस फिर क्या था। ‘सिम्पैथी’ दिखाने वालों की चांदी हो गयी। कोई भी इस स्वर्णिम अवसर को खोना नहीं चाहता था। नेता जी आराम के मूड में थे; पर मित्र लोग इस अवसर पर ‘सिम्पैथी’ प्रकट करने से बाज नहीं आ रहे थे। जिसे पता लगा, वही दौड़ पड़ा। घर के आगे मिलने वालों की लाइन लग गयी। राजनीति में रहना है, तो लोगों को नाराज भी नहीं किया जा सकता था। इसलिए उन्होंने कुछ लोगों से मिलना उचित समझा। उनके सहायक एक-एक कर लोगों को अंदर भेजने लगे।

एक सज्जन बड़े सी हंडिया में मट्ठा लाये थे। बोले, ‘‘हमारे घर में तीन पीढ़ियों से देसी गाय पल रही हैं। उसके दूध से मट्ठा भी प्राचीन विधि से तैयार करते हैं। आज तो मेरी मां ने खास तौर पर इसे आपके लिए ही बनाया है। आप इसका सेवन करें। क्या मजाल जो पेट ठीक न हो। एक गिलास तो आप अभी पी लें। इससे मुझे ही नहीं, मेरी मां को भी बहुत संतुष्टि होगी।’’

नेता जी ने मट्ठा रख लिया और जैसे-तैसे उन्हें टाला। तब तक दूसरे सज्जन आ गये। वे एक ‘चमत्कारी दवा’ लाये थे। उन्होंने बताया कि उनके दादा जी को किसी संत ने यह दवा बतायी थी; पर इसके साथ शर्त यह भी थी कि वे इसका फार्मूला किसी को नहीं बताएंगे और इसके लिए किसी से एक पैसा नहीं लेंगे। अन्यथा इस दवा का चमत्कार समाप्त हो जाएगा। उन्होंने भी यही कहा कि एक खुराक आप अभी ले लें और एक कल सुबह। फिर इसका कमाल देखिये। अगले कई साल तक पेट खराब नहीं होगा।

वे टले, तो तीसरे सज्जन ‘च्यवनप्राश’ लेकर प्रकट हो गये। उन्होंने कहा कि हम अपने प्रयोग के लिए शास्त्रीय विधि से हर साल एक क्विंटल देसी आंवले से च्यवनप्राश बनाते हैं। उसमें सोने और चांदी की शुद्ध भस्म भी डाली जाती है। बस, वही मैं आपके लिए लाया हूं। आप रात को सोते समय गुनगुने दूध से इसे लें। पेट तो ठीक होगा ही, दिल और दिमाग को भी काफी ताकत मिलेगी।

घंटे भर की इस भेंट में किसी ने असली हरड़ की गोली दी, तो किसी ने देसी अमरूद। एक सज्जन तो ‘एनीमा’ के यंत्र-तंत्र ही साथ लाये थे और उसे लगवाने की जिद पकड़ ली। उन्हें टालने में सबसे अधिक कठिनाई हुई। लोग तो और भी कई मिलना चाहते थे; पर तब तक नेता जी का पेट फिर गुड़गुड़ाने लगा। उन्होंने सबसे क्षमा मांगी और शौचालय में घुस गये।

कल जब मैं शर्मा जी के घर गया, तो वे फिर खांस रहे थे। मैंने अमिताभ बच्चन की तर्ज पर कहा, ‘‘ये खांसी भी कोई खांसी है शर्मा जी ? खांसी हो तो केजरीवाल जैसी। जिसे वी.आई.पी. सिम्पैथी और वी.वी.आई.पी. सलाह मिल सके।’’

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2 Comments on "व्यंग्य बाण : वी.वी.आई.पी. खांसी"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar

यदि शर्माजी को बाबा शामदेव मिलते ,तो तपाक से कहते”कपल भाति ”और अनुलोन विलोम ”कर लो खांसी गायब. और देशी गाय के शुद्ध घी में यह दवाई चुटकी भर.

आर. सिंह
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आपका व्यंग्य वाण तो अच्छा है.यह उन सब लोगों के मुंह पर तमाचा है,जो बिना मांगे सलाह दिया करते हैं,खासकर बीमारियों में. पर जाने या अनजाने उसमे आपने माननीय प्रधान मंत्री का नाम भी जोड़ दिया.

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