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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-अनिल त्यागी

भ्रष्टाचार- भ्रष्टाचार, हर किस्म का भ्रष्टाचार जिस किस्म का आपको देखना है देख सकते है। वैसे तो पूरे देश में है पर उ.प्र. मे तो खुले आम है किसकी सरकार है? कैसी सरकार है? कौन नेता है? कौन नहीं? कुछ फर्क नहीं पड़ता। एक अकेली नीरा यादव के मामले में हमाम में कुछ नंगे नजर आ रहे हैं इन्हें बाहर आने दीजिये, नंगों की अगली खेप सामने होगी। नोयडा में जमीन आंवटन में मनमानी। अडवानी हों या मायावती अफसर हो या जज व्यवसायी हो या रिश्तेदार सबके सब ही सामने आ रहें है।

सुकून की बात है कि चाहे पन्द्रह साल बाद ही सही बेइमाने की कुछ तो पोल खुली, पहली बार लगा कि व्यवसायी जिसे आम तौर पर दब्बू और बेइमान माना जाता है उन्हीं की एसोशियेसन की रिट याचिका पर ये सब कुछ हो पाया, इससे आम व्यापारी का हौसला बढना तय है और जब जब व्यापारी चैतन्य होता है तब तब कुछ न कुछ नया होता आया है।

नीरा यादव को चार साल की जेल साथ ही भ्रष्ट व्यवसायी को भी इतना ही बडा झटका, ये तो बानगी भर है आगे आगे देखिये होता है क्या? ऐसे में सवाल उठना लाजिम है कि जब नीरा यादव का भ्रष्टाचार 1995 या 2004 या इसके बाद उजागर हो गया तो क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्यवाही की गई। माना कि जो भी सरकार रही उसमें उनके रसूख काम आये पर ऐसे में विपक्ष क्या करता रहा? माना कि विपक्ष के पुराने नेताओं से उनकी सैटिग रही पर क्या इस पन्द्रह साल के दौरान कोई नया विधायक सामने नहीं आया। तहलका और दुर्योधन जैसे स्टिंग आपरेशन इस मामले में खामोश क्यों रहे? अधिकांश खोजी पत्रकारिता का दम भरने वाले चैनल इसी दौरान वजूद में आये किसी ने इस और क्यों नहीं ध्यान दिया?

इस राज्य या उस राज्य किसी भी तरफ नजर दौडाए, भ्रष्टाचार की नई सस्कृति परिलक्षित होती है। भ्रष्टाचार के दूध की धारा ऊपर से नीचे को बहकर जब जन सतह पर पहुंचती है तो बेहद जानदार मलाई के रूप मे तैयार हो जाती है जिसे फिर से ऊपर वाले कब्जा लेते हैं क्योंकि मलाई पचाने के लिये पाचन तत्र आम आदमी के पास नहीं होता परिणामस्वरूप पानी आम जनता के हिस्से और मलाई अफसरों और राजनेताओं के हिस्से में आ जाती है, जब कोई कहने वाला ही नहीं तो सुनने वाला कौन हो?

नोयडा जो सन् 1995 तक एक सुविधाहीन ठिकाना था अब सुविधाओं के गढ में बदल गया है जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के नाम पर पहले सिटी बसें थी अब मेट्रो का आगाज हो गया है। जहॉ पहले अखबार के संवाददाता तक नहीं थे आज वहां आज भारत के बडे समाचार पत्रो के ही नहीं बल्कि समूहों के बडे बडे आलीशान दफतर है। बडे स्टूडियो फिल्म सिटी और बडे चैनलों के ताम झाम हैं ऐसे में यकीन नहीं होता कि कोई भ्रष्टाचार छिपा रह सकता है। पर ऐसा होने के पीछे सबसे बडा कारण है कि इनमें से अधिंकांश ने नीरा यादव के जमाने में ही नोयडा में जगह पाई पता नहीं क्या कारण है कि आज कोई बडा व्यवसायी हो या मिल मालिक, अफसर हो या जज, नेता हो या अभिनेता न जाने क्यों नोयडा में बसने को आतुर है। यह किसी जॉच का नहीं बल्कि शोध का विषय है कि सब के सब तथाकथित बडे लोग नोयडा ही क्यो पंसद करते हैं। लगता है कि अपनी नयी बिरादरी भ्रष्टाचारी समाज अपना नया शहर बसाने की कोशिश में ऐसे में यदि आप उनकी उपविधियों में निर्धारित योग्यता की पूर्ति नहीं करते तो कृपया नोयडा छोड कहीं और बसें।

नीरा यादव का एक घोटाला तो इस प्रदेश की खिचडी मे एक चावल मात्र है अभी तो देखिये कौन कौन से घोटाले खुलते है। खाद्यान्न घोटाला, रेलवे सेफटी फंड घोटाला, कर्जामाफी घोटाला मनरेगा, इदिरा आवास, जैसे घोटाले और पता नहीं कौन कौन से घोटाले यहॉ हुए और हो रहे है। जितनी चिकनी सडके बन रहीं है उतनी ही चिकने घडे ये घोटाले बाज हो रहे है। लगता है विकास बाद में पहले तो अब तक के विकास के फलितार्थ ही श्रव्य और दृश्व्य है। यहां भ्रष्टाचार काले या सफेद रग मे नहीं सतरंगा है जिसे जिस रंग मे रंगना हो रंग ले अपना चोला।

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1 Comment on "सतरंगा भ्रष्टाचार… नीरा यादव तो मात्र प्रतीक है"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
भृ षटाचार को सतरंगा कहने की बजाय श्वेेत या सफेद कहें तो अधिकअच्छा होगा. जैसे झूंट के लिए” सफ़ेद ”झूंठ ”उपयुक्त ”है, .सफ़ेद में सभी रंग समाहित हैं. तमिलनाडु,बंगाल,म.प्र. ,राजस्थान ,बिहार ,उ. प्र,दिल्ली,महाराष्ट्र कौनसा प्रदेश हैं जहाँ इन राजनीतिक सेवादारों ने अपनी और अपने परिवार की सेवा न की हो?इनके बेटे.behuen,भाई,काका मामा चाचा ताऊ, ताई सभी एक से एक उत्तम पदों पर.यहाँ तक की इनके कारों के ड्राइवर,खानसामे ,तक इनकी कंपनियों के डायरेक्टर। ये लोग सरकार से जमीन लें कौड़ियों के दाम ,और उसे बेच दे ”मुंबई” के मरीन ड्राइव के भाव पर। इन सेवकों के पास ऐसी जादुई छड़ी… Read more »
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