लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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– विजय कुमार

कुछ बातें कुछ लोगों के साथ चिपक जाती हैं, या यों कहें कि जबरन चिपका दी जाती हैं। कुछ ऐसा ही सत्याग्रह और गांधी जी के साथ है। निःसंदेह गांधी जी ने सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग कर जन-जन में स्वाधीन होने की इच्छा जगाई। लाखों लोग सड़कों पर उतरे। यद्यपि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि इससे देश को स्वाधीनता नहीं मिली; पर 1947 के बाद सत्ताधारी कांग्रेस ने निजी स्वार्थ हेतु स्वाधीनता का कारण गांधी जी और उनके चरखे की चूं-चूं को घोषित कर दिया। इसके साथ ही एक बड़ा झूठ गांधी जी के साथ यह चिपका दिया गया है कि सत्याग्रह का सर्वप्रथम प्रयोग उन्होंने ही किया। पहले उन्होंने इसे अफ्रीका में आजमाया और फिर भारत में। इसलिए दुनिया में कहीं भी कोई सत्याग्रह करे, तो उसे गांधी का प्रभाव मान लिया जाता है। यद्यपि अब इसकी गंभीरता इतनी घट गयी है कि इसे मजाक में ‘गांधीगीरी’ कहा जाने लगा है।

वस्तुतः भारत में सत्याग्रह का प्रयोग विभिन्न रूपों में सदा से होता रहा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्वज महाराजा दिलीप निःसंतान थे। अतः पूरे परिवार एवं राजमहलों में उदासी छायी रहती थी। अपने कुलगुरु के आदेश पर राजा और रानी ने नंदिनी गाय की सेवा का व्रत स्वीकार किया। कुलगुरु ने उन्हें बताया कि नंदिनी की सेवा (और उसके अमृतमयी दूध के साथ आवश्यक औषधियां लेने, पथ्य परहेज करने आदि से) उनके महल में निश्चित ही किलकारियां गूंजेंगी। संतान का आकर्षण किसे नहीं होता? राजा और रानी ने इस कठोर व्रत को स्वीकार कर लिया। अब जब नंदिनी बैठती, तब ही वे बैठते। जब वह सोती, तब उसे मक्खी-मच्छरों से बचाने के लिए दोनों पंखा करते। सोते हुए भी उसे कष्ट न हो, अतः दोनों में से कोई एक अवश्य जागता रहता। नंदिनी के लिए नरम घास का बिस्तर बनाते और स्वयं चटाई पर लेटते। उसे भरपेट भोजन कराने के बाद ही वे अन्न-जल मुंह में डालते। वह जंगल में चरने जाती, तो वे उसके साथ जाते और वापस लौटते। इस प्रकार कई महीने बीत गये। भारतीय इतिहास और पुराण ग्रंथों में बहुत सी बातें प्रतीकों के रूप में कही गयी हैं। ऐसा कहते हैं कि भगवान भोलेनाथ उनकी सेवा भावना से प्रसन्न हुए। वे उन्हें संतान का वर तो देना चाहते थे; पर अंतिम रूप से वे एक प्रत्यक्ष परीक्षा लेना चाहते थे। अतः एक बार जब नंदिनी जंगल में घास चर रही थी, तो अचानक एक सिंह ने प्रकट होकर उसे दबोच लिया। राजा दिलीप बड़े असमंजस में पड़ गये। वे निःशस्त्र थे और इस सेवा साधना के दौरान कैसी भी हिंसा वर्जित थी। मजबूर होकर राजा ने सिंह से गाय को छोड़ देने की प्रार्थना की। इस पर सिंह बोला कि उसे भूख लगी है और पशु उसका स्वाभाविक आहार है। यदि राजा उसके लिए कोई और पशु ला दे, तो वह गाय को छोड़ देगा। अहिंसा व्रत का पालन कर रहे राजा के लिए यह भी संभव नहीं था। इधर सिंह की भूख बढ़ रही थी। वह नंदिनी पर दबाव बढ़ा रहा था। नंदिनी भयभीत नेत्रों से राजा की ओर देख रही थी। अंततः राजा ने सत्याग्रह का निर्णय लिया। उन्होंने सिंह से आग्रह किया कि वह उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा ले और गाय को छोड़ दे। सिंह मान गया। राजा प्राणों का मोह छोड़कर सिर झुकाकर घुटनों के बल बैठ गये; पर काफी समय बीतने पर भी जब सिंह ने आक्रमण नहीं किया, तो राजा ने सिर उठाया। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। क्योंकि वहां तो भगवान भोलेनाथ स्वयं उपस्थित थे। उसके बाद उन्होंने राजा को इच्छित वर दिया, जिससे उनका वंश खूब फला-फूला। राजा शिबि की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक बार जब वे दरबार में बैठे थे, तो एक कबूतर उनकी गोद में आकर छिप गया। उसका पीछा एक भूखा गरुड़ कर रहा था। गरुड़ ने भी राजा से कहा कि वह कबूतर को उसे सौंप दे; पर शिबि शरणागतों के रक्षक थे। उन्होंने मना कर दिया। अंत में यह सहमति हुई कि राजा कबूतर के भार के बराबर अपना मांस गरुड़ को दे दें। दरबार में ही तराजू मंगाया गया। एक पलड़े पर कबूतर और दूसरे पर राजा अपने शरीर के टुकड़े रखते गये; पर कबूतर का पलड़ा नीचे ही रहा। अंततः शिबि स्वयं दूसरे पलड़े पर बैठ गये। ऐसा होते ही भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गये, जो राजा के शरणागत रक्षा वाले वचन की परीक्षा ले रहे थे। राजा ने सत्याग्रह के माध्यम से अपने वचन को सत्य सिद्ध कर दिखाया।

भारतीय इतिहास में ऐसे एक नहीं, हजारों उदाहरण हैं। ‘रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जांहि पर वचन न जाई’ भी तो सत्य और अपने वचन पर आग्रह का ही उद्धोष करता है। राजा दशरथ चाहते, तो कैकेयी को दुत्कार सकते थे। पूरा राज्य राजा के साथ था; पर राजा ने अपने वचन का पालन किया। और श्रीराम ने तो पिता के आदेश की प्रतीक्षा भी नहीं की। वे वचन की बात सुनते ही वन को चल दिये। भरत भी 14 वर्ष तक उनकी पादुकाओं को सिंहासन पर रखकर व्रत-उपवास के साथ जीवन बिताते रहे। शत्रु का सगा भाई होते हुए भी शरणागत वत्सल श्रीराम ने विभीषण को अभयदान दिया। यह सत्याग्रह नहीं, तो और क्या है? बालक धु्रव और प्रह्लाद, सीता, सावित्री, द्रौपदी और राजा हरिश्चंद्र आदि की कथाएं भी सत्याग्रह का अनुपम उदाहरण हैं। भीष्म की प्रतिज्ञा और उसके पालन के लिए अस्त्र-शस्त्रों का त्याग, अभिमन्यु की वीरगति का समाचार पाकर अर्जुन की प्रतिज्ञा और उसके पूरा न होने पर चितारोहण की तैयारी, श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल की 100 गालियों को सहन करना, कर्ण द्वारा सब जानते हुए भी कवच और कुंडलों का त्याग, द्रोणाचार्य द्वारा अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार सुनकर शस्त्र त्याग आदि सत्याग्रह के ही तो उदाहरण हैं। फिर भी न जाने क्यों सत्याग्रह का प्रणेता गांधी बाबा को बता दिया जाता है। रामायण और महाभारत काल को सत्य मानने से जिनके पेट में दर्द होता हो, वे मुगल हमलों के काल को तो मानते ही होंगे, जब इस सत्याग्रह ने कई बार ‘सद्गुणविकृति’ का रूप भी लिया है। राजा पृथ्वीराज चौहान ने 16 बार मौहम्मद गौरी को क्षमा किया। राजा हम्मीर ने अलाउद्दीन खिलजी के भगोड़े सैनिक मुहम्मदशाह को अभयदान दिया। परिणाम दोनों बार इनके और देश के विरुद्ध गये। मुगल काल में वीर हकीकत, गुरु तेगबहादुर, भाई मतिदास, सतिदास और दयाला, बन्दा बैरागी, जोरावर और फतेह सिंह आदि के बलिदान भी तो सत्याग्रह ही हैं। यदि वे मुसलमान बन जाते, तो अपार धन सम्पदा और सुख-सुविधाएं पा सकते थे; पर उन्होंने सत्य का आग्रह नहीं छोड़ा और मृत्यु का वरण किया। हजारों हिन्दू वीर माताओं और बहिनों का जौहर भी तो सत्याग्रह ही है। थोड़ा और आगे चलें। जिला सुरेन्द्र नगर, गुजरात के मुली कस्बे में गत 600 वर्ष से तीतर की रक्षा के हित में हुए युद्ध की याद में एक मेला होता है। सिंध के निवासी सोधा परमार जाति के लोग 1474 ई0 में मुली गांव में आकर बसे। एक बार सूर्य देवता के प्रतीक मंडावरै जी की प्रतिमा के पीछे एक घायल तीतर छिप गया। उसे ढूंढ़ते हुए चाबड़ जाति के शिकारी आये, पर परमारों के मुखिया लखबीर जी की मां जोमबाई ने शरणागत को वापस करने से मना कर दिया। इस बात पर हुए युद्ध में लखबीर के छोटे भाई मुंजोजी सहित 200 परमार तथा 400 चाबड़ योध्दा मारे गये। क्या यह सत्याग्रह नहीं था? 5 सितरबर, 1730 (भादों शुक्ल दशमी, वि0संवत 1787) को अलवर के पास ग्राम खेजड़ली में हरे पेड़ों की रक्षा के करते हुए इमरती देवी के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों और बच्चों द्वारा 27 दिन तक लगातार चलाये गये बलिदान पर्व को क्या कहेंगे? 28 वें दिन राजा को स्वयं वहां आकर इन पर्यावरण प्रेमियों के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा मांगनी पड़ी। आज भी उस घटना की स्मृति में वहां विशाल मेला होता है। अंग्रेजी तोपों के आगे खड़े होने वाले कूकाओं और हंसते हुए फांसी का फन्दा चूमने वाले भगतसिंह आदि क्रांतिवीरों के सत्याग्रह के आगे गांधीवादियों का सत्याग्रह कुछ नहीं बेचता। ऐसे प्रसंग भारत के चप्पे-चप्पे पर बिखरे हैं। वस्तुतः गांधी जी ने इनसे प्रेरणा लेकर सत्याग्रह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक युगानुकूल शस्त्र का रूप दिया जिससे स्वाधीनता आंदोलन को भरपूर लाभ हुआ। गांधी जी के मन पर बचपन में अपनी मां से सुनी श्रीराम, श्रीकृष्ण, ध्रुव, प्रह्लाद, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, अभिमन्यु आदि की उन कहानियों का बहुत प्रभाव था, जिनमें बार-बार सत्य और अपने वचन पर आग्रह की बात आती है। इससे ही गांधी जी के मन में सत्याग्रह की भूमिका बनी होगी। गांधी जी निःसंदेह सत्य के आग्रही थे; पर उन्हें सत्याग्रह का प्रणेता बताकर भारत की लाखों वर्षों की परंपरा पर धूल डालना निरा दुराग्रह है।

ऐसे लोगों के लिए भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा है –

सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापै जगत गति॥

भगवान इन मूढ़ों से भारत की रक्षा करें। हे राम।

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4 Comments on "सत्याग्रह और गांधी जी"

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panuti ram verma
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बहुत से लोग नहीं जानते के हमारे देश को आज़ादी कैसे मिली ,गांधीजी की बजह से तो बिलकुल भी नहीं मिली , उनको तो फालतू में हीरो बना दिया अगर किसी को मालूम हो तो मेल करे नहीं तो २ दिन बाद में इसका उत्तर दूंगा

sunil patel
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श्री विजय कुमार जी ने बहुत बडा सत्य कह दिया है। धन्यवाद। भारत हमेश से वीर देश रहा है। हमारे लोग सहिष्णु किन्तु वीर और साहसी होते हैं। किन्तु आज की परिस्थिती में कायरता और अहिन्सा में अन्तर करने की जरूरत है। इतिहास गवाह है कि कभी भी कोई भी देश हाथ जोड़कर नहीं जीवित रहां है। किसी भी ने अहिन्सा से आजादी नही पाई है। हर क्रान्ति के पीछे हिन्सा छिपी है। गीता मे कहा गया है कि कर्म तो करना पड ता है। सिर्फ अहिंसा से भारत आजाद हो गया तो लाखों करोड लोगो ने व्यर्थ में अपना… Read more »
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
इस तरीके के तर्कों के आधार पर तो कोई भी नकारात्मक या आलोचनात्मक सोच का व्यक्ति कुछ भी सिद्ध कर सकता है! आज समाज को सम्मान, शांति, विकास (दमितों का भी), भ्रष्टाचार एवं अत्याचार मुक्त व्यवस्था और भयमुक्त वातावरण की ज्यादा जरूरत है! -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में 4393 आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)।… Read more »
दीपा शर्मा
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Nishchit roop se hamare desh me ese kai udahran he. Jo btate hein ki humre desh me satay ke lye mar-mitne ki parmpara rahi he. Mahoday aapse nivedan he ki is baat ko sadharan tarike se bhi kaha ja sakta tha. Gandhi ji ko kyn ghasit laye. Gandhi ji ko iraq na bnao ki sare expriment un par hi hon.
Shubkamnao ke sath.

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