लेखक परिचय

अनुप्रिया अंशुमान

अनुप्रिया अंशुमान

अनुप्रिया अंशुमान, आज़मगढ़ जिले में जन्म, आज़मगढ़ के शिबली नेशनल डीग्री कॉलेज से अँग्रेजी में स्नातकोत्तर, हिन्दी में नियमित लेखन, मुख्यरूप से स्त्री विमर्श, प्रेम व गुरु विषयों पर लेखन...

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एक बहुत ही मीठी ,मधुर ध्वनि या स्वर सुनायी  दे रही है ।आज सुबह मैं  होटल  की बालकनी मे खड़े होकर मनाली की रहस्यात्मक खूबसूरती के राज का आनंद ले रहा था। पर ये ध्वनि कहाँ  से आ रही है –एकदम मन को मोह लेनी   वाली अब तो आवाज भी आने लगी थी वो आवाज ऐसी लग रही थी जैसे की पूरी ये सुंदर्यपूर्ण वादियाँ भी उसके राग -आवाज में अपनी सहभागिता निभा रहीं हों।मेरे हृदय मे तीव्र उत्कंठा हुई यह जानने की ,ये  आवाज किस कंठ से निकल रहे है जिसमे प्रकृति भी अपना योगदान दे रही हैं ,मैं उस आवाज की तलाश में निकाल गया ,कहीं आस –पास से ही आ रही थी ।सुनते –सुनते पहुँच ही गया उस आवाज को मिलने ।वहाँ देखा तो खुद को और भी प्रकृति के समक्ष  पाया ।वो नाजुक थी ,मोहक थी,उसकी आवाज मे स्वयं सरस्वती राग सुना रही थी ।उसकी आंखे ऐसी जिसमे कई जहां ढूंढ लूँ ।वो उसका झुकना ,मुड़ना ,मुसकुराना ,हर बात जैसे उसकी मेरे मेरे दिल मे जगह बनती गयी ।वो गा रही थी हाथ मे सितार लिए ,जैसे की  सरस्वती माँ का प्रतिबिंब हो ।और एक बड़े से हाल मे लोग उसे सुन रहे थे ।मैं बाहर से ही उसे सुनता रहा ।उस वक़्त जिंदगी  एक नए और अनूठे अनुभव को अपने भीतर समेट  रही  थी  ।गाने की समाप्ती पर  लोग उसके पास कुछ रुपए रख रहे थे उस समय मुझे उसके करीब जाने का बहाना मिल गया था ।पर थोड़ा संकोच भी था इसीलिए जब सभी चले गए तो मैं  वो अंतिम व्यक्ति बना जो उसे करीब से देखना चाहता  ।

आप –आप कौन हैं ?मैं संकोच से भरा था इसके पहले की मैं कुछ कहूँ उसने ही कहा – कि  लगता है नए आए है ॥मैंने अपनी बाहर की चुप्पी तोड़ी और कहा की हाँ जी मैं यहाँ घूमने आया हूँ  आपकी आवाज सुनी तो मैं खुद को रोक नहीं पाया ।इसके बाद बिना कुछ बोले वो वहाँ से चली गयी मैं पुकारता रहा की सुनिए –सुनिए फिर कब गाना गायेंगी आप ?।पूरा दिन तो घूमता रहा पर रात मे सोने गया तो आंखे बंद होने पर वही आवाज सुनाई दे रही थी सोचने लगा की उसकी सूरत ज्यादा अच्छी थी या आवाज —- दिल तपाक से बोल उठा कि -दोनों   ।   मैं बयान नहीं कर नही पा रहा था कि  क्या पाया था मैंने यहाँ  मनाली मे आकर  ।  एक ओर प्रकृतिक सौन्दर्यता अपना बाहरी रूप दिखाकर मेरा मन मोह रही थी तो दूसरी तरफ उस लड़की की खूबसूरती, उसके हाव -भाव सब मुझे उसकी तरफ आकृष्ट कर रहे थे ।यही सोच के सो गया की चलो कल फिर मुलाक़ात करता हूँ ।

आज सुबह –सुबह ही  ढोलक की आवाज मेरे कानों मे गयी  और नींद खुल गयी थी मेरी ,और साथ मे वही आवाज थी ।मैं भागा गया ,पहुँचकर देखा की ढोलक बज रही है कुछ बच्चे है जो नाच गा रहे है और वो लड़की किसी बात पर हाँ मे सिर हिलाती तो कभी ना मे शायद सीखा रही रही थी ।वास्तव मे मैं उस लड़की के बारे में  जानना चाहता था मुझे नहीं पता क्यू? पर जैसे उसके बारे मे जान लेने से मेरी बेचैनी कम हो जाएगी ।कोशिश कि उस से बात करने की पर वो मुझे अनदेखा कर गयी शायद अजनबी समझकर या फिर जानबूझकर ……

मैं  वापस होटल आ गया फिर से मनाली ट्रिप पर निकल गया दिन भर मैं बस खूबसूरती निहारते रहता था ,वो पर्वत ,उस पे हिम का अच्छादित  रहना ,और अद्धभूत नजारा था नदियो का ,यहाँ के रास्तों को अपनी विशेषताओं  का अंदाजा  था।  काश मैं कवि होता तो इस दृश्य पर एक गीत लिखता ।हृदय भरता नहीं था यहाँ की सुंदरता से , पर आंखे भर आती थी ये सोचकर की जिसकी बनायी हुई दुनिया इतनी अढ्भुत है, वो कैसा होगा ।

शाम को जब होटल वापस लौटा तो थोड़ा थका सा था ,तो ऐसे ही टेलिविजन ऑन किया तो देखा की वहाँ के लोकल चैनल पर ही वो लड़की अपनी गीत प्रस्तुत कर रही थी –

छोडकर हमको कहीं , दूर जाओगे तो नहीं

चले जाओगे  तो क्या ,याद आओगे भी  नहीं।

चाँद  एक होता है चकोरो की गिनती होती नहीं

तन्हाइयों मे हमको रुलाओगे तो नहीं ।

मैं खामोश  सोचता रहा कि आखिर क्या बात है इस लड़की मे, आवाज तो कईयों  की अच्छी होती है ,पर यही क्यूँ इतना बेचैन कर रही है और ऐसा गाना क्यूँ गा रही है ।   ढुखी प्राणी — ये शब्द मेरे होठों ऐसे  अनायास ही निकल  पड़े ।

रात मे ही मैं उसके घर गया  डोर बेल बजाई तो एक 5 साल की होगी ,उस बच्ची ने दरवाजा खोला –अंकल आप कौन हो ?उस प्यारी सी गुड़िया ने पूछा ।मैंने कहा की वो जो गीत            गाती है मुझे उनसे मिलना  है… इतने मे देखता हूँ कि  सामने  वही खड़ी थी ,मम्मा देखो कौन आया है।

आप इस वक़्त ? संकोच और आश्चर्य पूर्ण थी वो। और उस छोटी बच्ची से कहा की सुहानी बेटा आप अंदर जाओ । ओके मम्मा कहकर वो चली गयी ।

आइये ॥ जब  आ ही गए हैं तो पूछिये क्या जानना है आपको –मैंने थोड़ी बेचैनी  की हालत में अपने प्रश्न पूछने शुरू किए जो कब से मेरे मन मे चल रहे थे  । चलो ठीक है आप बच्चो को संगीत सिखाती हैं पर उस  दिन लोग आपको पैसे क्यू दे रहे थे ? ये बच्ची आपको मम्मा क्यू कह रही है ?आप उदास है नहीं पर उदास सी दिखती क्यू है?आपकी सूरत अच्छी है पर गाने आप हमेशा उदासी के ही क्यू गाती  हैं ?ना जाने कितने सवाल कर डाले थे उस  से मैंने ।और उसका पहला ही वाक्य था की अगर मैं आपको ना बताऊँ तो – मैंने उस वक़्त अपने आप को एक अकथनीय अवस्था मे पाया ।और बस यही कहा की जैसी आपकी मर्जी ।मैं उठकर जाने लगा तो थोड़ी देर मौन के बाद मेरे पीछे से आवाज आयी  की  आइये बैठ के बातें करते है ।

उस दिन जो पैसे मेरे पास लोग रख रहे थे वो दान था कि मैं बच्चो  के लिए एक स्कूल खोल सकूँ।  उसके बदले में मैंने उनके सामने गीत प्रस्तुत किया था ताकि उन लोगों को ये लगे कि उन्होंने दान दिया हैं भीख नहीं । और ये छोटी बच्ची बेटी है मेरी । । मैंने आश्चर्यचकित होकर कहा, “बेटी?” “हाँ”, उसने बड़ी सहजता से कहा । मैं स्तब्ध था क्योंकि पत्नी के श्रींगार जैसा  उसने कुछ भी नहीं किया था । फिर उसने पूछा कि कहाँ रहते हैं आप?मेरे जवाब में नरमीपन था कहा कि बस आपके घर के पीछे वाली गली मे ।मैं यहाँ प्रकृति का एक नया रूप यहाँ देखने आया हूँ ।आपसे मुलाक़ात कर के अच्छा लगा।

तो अब मैं चलता हूँ ।जाते –जाते मैंने उससे कहा कि मैं बुरा इंसान नहीं हूँ  कम से कम आप मुझे अपना नाम तो बता ही सकती है । हम दोनों के होठों पर मुस्कुराहट थी  अच्छा तो चलता हूँ ,जाने लगा तो पीछे से आवाज आयी  कि मेरा नाम सौंदर्या है और तब  मैंने भी खुद को धवल बताया ।

दिल मे खुशी और एक  खलल लेकर लौटा था ।कि  बेटी ??  पर थोड़ा निश्चिंत सोया था उस रात –हर सुबह प्रकृति अपना एक नया ही रंग दिखाती थी और मैं हमेशा कि तरह आश्चर्य  व्यक्त करता था ।मैं यही सोचता था कि अभी कितने पर्दे खुलने बाकी है । न जाने  कौन सा पर्दा खुले और वो  राज अपनी नग्न अवस्था में दिखे जिसे लोग ईश्वर कहते है।  ये जीवन एक रहस्य है इस बात की पुष्टि ये आते  -जाते बादल और पर्वत क्षृखलाओ पर अपनी रोशनी बिखेरता सूरज पल –पल करता है ।सौन्दर्यता का  उन्माद यहाँ पर प्रतिपल मिलता है ।

इस बीच काफी घुल –मिल गए  थे हम और सुहानी भी । एक दिन  मन किया की सौंदर्या से मिल लूँ अगर संभव हो सकेगा तो दो चार बातें कर लूँगा ।घर गया तो देखा दरवाजा पहले से खुला था और सौंदर्या कोई किताब पढ़ रही  थी ।मैंने मज़ाक के लहजे मे  कहा  अरे क्या बात है आज दरवाजा पहले से ही खुला है आपको पता था की मैं आप से मिलने आ रहा हूँ ।सौंदर्या ने अचानक अपना ध्यान दरवाजे पर दिया और कही अरे आप –  नहीं –नहीं अभी ही सुहानी बाहर गयी है अपने दोस्तो के यहाँ । सौंदर्या ने बहुत ही मित्रवत व्यवहार  किया ।आज कुछ संतुष्ट  सी लग रही थी ,कोई रूखापन पन नहीं ,ना ही किसी से शिकायत ।शायद वो भी अब इस बात से राजी हो गयी थी कि उसको मेरे जैसा एक दोस्त मिल गया था । अब अजनबी नही थे हम ।ये कौन सी किताब पढ़ रही थी: प्रेम क्या है “हाँ यही शीर्षक था उसका..तो सौंदर्या ने कहा कि ये वो प्रेम नहीं है हम और आप करते है ।मैंने कहा तो फिर ये किताब क्यू पढ़ना ।तो उसने बड़े प्रेम से कहा कि धवल ये तभी तो मैं पढ़ रही हूँ  ताकि उस प्रेम को समझ सकूँ  जो हम और आप  नहीं जानते ।पर मैं समझता हूँ  सौंदर्या प्रेम किताब पढ़ने से नहीं होता जब तक कि स्वयं  प्रेम मे ना पड़ो ।तब इतराते हुए सौंदर्या ने कहा कि अच्छा तो आपको किसी से प्यार है।  जब उसने ये  पूछा तो मन  हुआ कि कह दूँ- हाँ शायद हो रहा है तुमसे प्यार मुझे ।पर मैं ये ना कह सका बात को बदलते हुए कहा मैंने कि हाँ करता हूँ ना प्रेम… इस प्रकृति से ,इसीलिए तो मैं इस पर कोई किताब नहीं पढ़ता ।दोनों एकदूसरे को देखकेर हंसने लगे ।तुम हँसते हुए बहुत अच्छी  लगती हो सौंदर्या ,ऐसे ही खुश रहा करो ,तुम तो ऐसे रहती हो जैसे जिंदगी से कोई शिकायत हो ।

नहीं धवल मुझे जिंदगी से नहीं ,जिंदगी को मुझसे शिकायत है ।सौंदर्या इन वाक्यो एक को कहते हुए शिथिल से हो गयी थी ।मैं तो मस्त मौला हूँ इसीलिए खुश रहता हूँ मैंने कहा .. अभी भी सौंदर्या उदास थी उसी अंदाज में वो कही की धवल आज आपके और मेरे बीच  रिश्ता बना है शायद दोस्ती का, उस रिश्ते से मैं  आपसे  कुछ  कह रही हूँ मैं  आपसे  – आप  बहुत ही अच्छे हो धवल कभी ऐसी बातें किसी ने कितने जमाने से नहीं किया है । पर आज आप कह ही रहे हो तो- सुनो मेरी जिंदगी का एक और रहस्य जो आप  जानना चाहते थे ।

मैं भी कभी आपकी  तरह  ही थी  एक नाचती हुई तितली थी ,माँ –पापा की दुलारी ,और मेरे दोस्त ही मेरी दुनियाँ थी ।तुम्हारी ही तरह  प्रकृति प्रेम,चाँद की सुंदरता जितनी आसमान में थी उस से कहीं ज्यादा मेरी रूह में थी ।कभी वो दिन था जब एक पायल की तरह खुद को ही अपने पैरो मे बाँध कर थिरकती रहती थी ।   और इसी खूबसूरती के साथ मैं किसी के प्रेम में पड़ गयी ।पर मेरा करना ,मेरे माँ –पापा का दिल तोड़ दिया और जिसको मैं चाहती थी उसने मेरा। शायद प्रेम काइयों से होता हो ,ये मेरा अनुभव नहीं है इसीलिए मैं कुछ कह नहीं पाऊँगी पर मैं जानती हूँ की प्रेम मे प्रेमी भले ही बदलते हो पर प्रेम नहीं बदलता है ।

उसकी अवाज में भरी पन था ।सौंदर्या आज अपने सारे जज़्बात बताना चाहती थी जो सालों  से किसी से कहना चाहती थी ,वो इस वक़्त वो बाट रही थी मैं बस उसे सुनता रहा ।  मन मे बिना प्रश्न लिए ।वो हिम्मत दिखते हुए एक गहरी सांस ली और बोली जो जिससे प्रेम करे उसे उसका हो जाना चाहिए । मेरा मन अचानक कहा की हाँ जिसे चाहो उसके ही हो जाओ ,।सौंदर्या आगे कहती ही रही कि …  मैंने उसे आसानी से  जाने दिया और खुद पे सारे ज़ख़म लेती गयी ,खुद का दिल बहुत ही दुखाया है मैंने ।पर क्या करती मैं ज़बरदस्ती उसकोपसंद तो नहीं आ सकती थी ना ,दुख बस इस बात का है की अगर पसंद नहीं थी तो क्यूँ प्रेम का नाटक किया जिसको मैंने हकीकत समझ रही थी । उसकी झूठी प्रेम कि बातों मे मेरी सच्ची भावनायें जाती रहीं । पर आज भी कहीं ना कहीं लगता है कि उसको भी मुझसे प्रेम था पर समाजिकता से उसका ज्यादा लगाव था ।

जैसे कई पत्थरों  का बोझ सम्हाले हुए बोल रही हो  ।तुमने उसे यूं ही जाने दिया …मैंने पूछा ,तो उसने कहा की  उसका प्रेम खतम हो गया था मेरा प्रति , पर मेरा नहीं।  मैंने उससे वादा किया था की मेरी वजह से उसको कभी कोई तकलीफ नहीं होगी ।

मेरे घरवालो ने बहुत चाहा की मैं शादी कर लूं,।पर नहीं कर सकती थी  ऐसा क्यूँ कि  जब मेरे और आकाश के बीच प्रेम था तब वो रिश्ता नहीं चल पाया तो तो जिस रिश्ते मे प्रेम नहीं वो कैसे चलता ।गुस्से मे आकर घर वालों ने कहा की या तो शादी केर ले या तो चली जा यहाँ  से क्यूँ की उनको समाज को जबाब देना था की आपकी बेटी शादी क्यूँ नहीं कर रही है  ।

आपसे पूछती हूँ  धवल क्या बिना शादी किए हम लड़कियां अपने माँ –पापा के घर नहीं रह सकती हैं क्या बेटी होना और प्रेम करना दोनों ही गुनाह है ?मैं चुप था ।  और वो जैसे सारे प्रश्नों के जबाब जान लेना चाहती थी ।

आगे वो कहती रही की इसके बाद मैं भी निकल पड़ी घर से बिना कुछ सोचे समझे  , और किसी ने रोका भी नहीं ।मैं नादान थी समाज मे चल रहे दाव –पेंचो को लेकर । मित्रों  की सहायता हमेशा मिली मुझे ।मुझे संगीत का थोड़ा बहुत ज्ञान था तो दोस्तो ने कहा की मैं संगीत की कोचिंग कर लूं बस यही से शुरुवात हुई जाविका चलने  की और जीने की भी ।

दोस्तों  के हाथ थाम के आगे बढ़ती गयी ।पर मेरा  अकेले रहना मुझे भी खल रहा था और इस समाज को भी ,अकेली लड़की को किराए पर घर नहीं देंगे जाओ पहले घर वालों को ले आओ ,शादी क्यू नहीं किया अभी तक ? अकेली रह लेती हो ? ऐसे न जाने कितनों के सवालो के जबाब मैंने दिये जो मेरे दर्द को और बढ़ा देते थे ।भावनात्मक स्तर पर बहुत ही चोट खाई है मैंने जिसका  निष्कर्ष ये है की मेरे हृदय का कोई कोना हमेशा रोता है ,।तभी मैंने एक बच्ची को गोंद लिया फिर तो मेरी दुनियाँ सच मे बदलने लगी ।

पर धवल औरत होकर जाना की इस समाज मे हमारी क्या  स्थिति  हैं दुनियाँ के हर रिश्ते का एक पहलू है हम ,पर हमारी खुद की कोई औकात नहीं है इस प्रतिष्ठित समाज मे ।जितना दर्द मुझे अपने दर्द से नहीं हुआ था उस से कहीं ज्यादा तकलीफ मुझे औरत होने पर होने लगी थी मैं अभी भी चुप था बस उसको सुनता ही रहा और वो भी कहती ही जा रही थी ।

उसकी आंखो मे आँसू थे ,उसका दर्द अब एक आवाज बन के बाहर  आ रहा था वो आसू शायद उसके दर्द की कराह थे जो आज जुबां से उसके बयां हो रहे थे  वो कह रही थी की …हाँ मैं नाराज हूँ अपने प्रेम से ,हाँ मैं नाराज हूँ अपने माँ –पापा से- वो मुझे बुला तो सकते थे क्या रीति रिवाज परंपरा एक बेटी से बढ़कर होती है ? नाराज हूँ मैं इस समाज  से जो ये कहते है की बेटियो को भी खुल के जीने का हक़ हैं आज मेरी स्थिति जो है सो है पर मुझसे बत्तर लोग है यहाँ जिनका शोषड बस इसीलिए हो रहा है क्यूँ  कि  वो लड़की है ।आज महिलाओ की जो स्थिती  है वो तमाचा है, इस देश  को संस्कृति ,सभ्यता का देश कहने वालों के मुह पर ।

आज फूट फूट कर रोयी थी वो ,पर अपने जख्मो को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया था उसने ।मैं अपने प्रेम के लिए  मिटी थी इस बात की सराहना किसी ने नहीं की ,,किसी ने आकाश को गलत नहीं ठ्हराया था ।प्यार किया मैंने उस पे भरोशा किया मैंने ये मेरी गलती है कहकर जमाने ने ताना मारा ।आज किसी तरह खुद को खड़ा कर पायी हूँ फिर भी लोगो का नजरिया नहीं बादल पायी हूँ ।

वो मेरी तरफ इतने अपनेपन से देखी और मुझे पर चोट करते हुए बोली की प्रकृति प्रेमी बने बैठे हो कभी  संसार के गोल माल को भी देखो ।दुनियाँ को सुंदर कह देने से वो सुंदर हो नहीं जाती ….।

आज की तारीख मे हम ,,मैं  और मेरी बेटी खुशी से इस दुनियाँ मे जी लेंगे क्यूँ कि  हम दोनों एक दूसरे का सहरा है  । आपने इतना अच्छे  से सुना  मुझे आपका  शुक्रिया । मैं उस से कैसे कहता की  बाहर सी सौंदर्यता को देखते –देखते मैं उसकी आंतरिक सुन्दरता मे खो गया हूँ ।अब शायद मैं भी उसके जैसा हो गया हूँ  ॥मुझे सच मे उस से प्यार हो गया था ।तभी दूर बेल बजी अरे अंकल आप,।सुहानी आई मैंने उसे अपनी गोंद मे उठा लिया था और खेलने लगे थे हम दोनों । तब  तक सौंदर्या भी सहज हो चुकी थी और मैं खुश था की कुछ दर्द वो मुझसे कह पायी थी ।

उस वक़्त मेरे शब्द खाली हो गए थे ,कुछ सुझा नहीं तो कहा मैंने कि अच्छा तो अब मैं  चलूँ ….. सौंदर्या ने फिर मेरा धन्यवाद किया  अच्छा लगा की आप आए और मेरे दोस्त बने ।ऐसे ही आते रहना सुहानी को भी अच्छा लगेगा ।

मैं चल आया पर मेरी तकलीफ ये थी की मैं कैसे कहूँ की यहाँ  मैं नजारे देखने आए था , पर अब उसी का हो कर रह गया था मैं ।मैं मस्त  रहता था, पर अब मैं मजबूर हो गया था महिलाओ के पहलुओ के बारे मे सोचने के लिए ।इस दुनियाँ को अब नए ढंग से देखने लगा था मैं । कभी सोचता था की कमबखत ये वो क्या चीज़ है जो प्यार के नाम से मशहूर है ॥ आज वही मुझे होने लगा था ।रास्ते मे चलते ही सोचा कीक्यूँ न उसे बता दूँ की मुझे तुमसे प्रेम है प्यार है । आखिर मुझे कल परसो मे यहाँ से जाना ही है  ।यही सोचकर मैं   वापस मुड़कर  उसकी गली की तरफ मुड़ गया ।दरवाजे से ही लौट आया शायद आकाश था जो अपने किए पर उस से माफी मांग रहा था । कह रहा था की काफी खोजने के बाद वो उसे ढूंढ पाया था ।

इतना सुनते ही मैं  वह से चला आया ।दूसरे दिन  ही सौंदर्या मुझे ढूंढते हुए मेरे होटल आयी थी मैं वाशरूम में था निकला तो देखा की वो सामने बैठी थी मैं असहज महसूस कर रहा था ॥वो परेसान थी इसीलिए उसने कहना शुरू किया कि कल तुम्हारे जाने के बाद आकाश आया था माफी मांग रहा है ।जब उसकी मुझे जरूरत थी तो वो नहीं था वो अब क्यूँ  आया है ॥ और सब से बड़ी  बात कि जिसका मैं  हमेशा से इंतजार करती  थी आज उसके आने पर मुझे खुशी नहीं है मैं क्या करू धवल ?  तुम मेरे दोस्त हो कुछ तो बताओ ॥उस वक़्त मैं  अपना दर्द छिपा भी नहीं पा  रहा रहा था और कह भी नहीं प रहा था ।बस इतना ही कहा कि तुम स्वयं फैसला कर लो ,,और वो चली गयी /वो जा ही रही थी तो मैंने कहा कि मैं  कल चला जाऊंगा ,तो उसने कहा कि सुहानी से मिलते जाना ।

अब मेरा मनाली से वापस जाने का समय हो आया था सोचा अंतिम  बार मिल लेता हूँ  सुहानी से ,वहाँ पहुंचा तो देखा सुहानी सो रही थी ।सौंदर्या  ने कहा कि आओ बैठो॥तो तुम जा रहे हो? मैंने कहा हाँ… सुहानी तो सो गयी हैं ।  उसके लिए ये कुछ तोफ़े लाया था उस को दे देना  और कहना कि मैं हमेशा उसे प्यार करता रहूँगा वो मेरी भी बेटी है ।तो चलूँ मैं  अब फिर न जाने कब मुलाक़ात होगी। इतना ही कहा कि सौंदर्या ने कहा कि  मैंने आकाश का प्रस्ताव ठुकरा दिया है आज मुझे उसकी कोई जरूरत नहीं है ।मैंने धीरे से कहा कि “अच्छा ठीक है” ।ये अपनी डायरी नहीं ले जाओगे?   सौंदर्या ने अचानक कहा ,मैंने देखा तो …”अरे” ये तो मेरी है तुम्हें कहाँ  से मिली ?उस दिन तुमसे मिलने गयी थी , तो जब तुम वाशरूम मे थे तो मैंने देखा कि इसमे मेरे बारे मे कुछ लिखा है तो मैं इसे ले आयी थी ।

ये वो डायरी थी जिसमे मैंने अपने हर जज़्बात लिखे थे।वो चाहे प्रकृति कि सुंदरता हो या सौंदर्या की ।सौंदर्या अब तक ये समझ चुकी थी की मैं उससे प्यार करता हूँ ।मैंने चुपचाप वही खड़ा था   आंखो में आँसू लिए उस समय मैं  कुछ बोल नहीं पा रहा था बस मेरे अश्क ही मेरे जुबान  हो गए थे ।धवल एक  बार प्रेम मे धोखा होने पर प्रेम से मेरा विश्वास  उठ गया है  ।पर मुझे जिंदगी में आगे बदना होगा सुहानी के लिए ।आंखो में आँसू थे फिर भी मैं उसके  निष्पक्षता को  देख पा रहा था। धवल जब आकाश अपनी  जिंदगी में  आगे बढ़ सकता है तो मैं  क्यूँ नही ।जीवन मैं अपने अनुभवों को ही धर्म माना है और उन्ही के आधार पर इस समाज कि बंधी बधाई इकाई मे नहीं पड़ सकती । मैं जानती ही कि तुम मुझे प्रेम करते हो शायद मैं भी … पर जीवन मे खोने का दर्द पाने कि खुशी से ज्यादा होता हैं  । मैं तुम्हें खोकर पाना चाहती हूँ ,पाकर खोना नहीं… । जिस दिन तक हम लड़कियां इस सो कॉल्ड समाज मे प्रेम और सम्मान से वंचित रहेंगी ,उस दिन तक तुम्हारे जैसा सच्चा प्रेमी भी प्रेम  वंचित होता रहेगा ।

मैं शांत होकर एक और सुंदरता को अपनी बाहो मे भर कर आगे बढ़ता गया ।और प्रेम कि एक अलग परिभाषा को  परिभाषित करने कि चेष्ठा करता रहा ।

 

 

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