लेखक परिचय

राजीव गुप्ता

राजीव गुप्ता

बी. ए. ( इतिहास ) दिल्ली विश्वविद्यालय एवं एम. बी. ए. की डिग्रियां हासिल की। राजीव जी की इच्छा है विकसित भारत देखने की, ना केवल देखने की अपितु खुद के सहयोग से उसका हिस्सा बनने की। गलत उनसे बर्दाश्‍त नहीं होता। वो जब भी कुछ गलत देखते हैं तो बिना कुछ परवाह किए बगैर विरोध के स्‍वर मुखरित करते हैं।

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राजीव गुप्ता

बच्चो आज 15 अगस्त है. भारतवर्ष में हर साल की इसी तिथि को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि आज ही के दिन अर्थात 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज – सरकार से हम स्वतंत्र हुए थे. हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह स्वतंत्रता हमें बहुत आसानी से नहीं मिली अपितु इसको पाने के लिए कई लोगो ने अंग्रेजी – सरकार द्वारा अमानवीय यातनाओं के स्वीकार करते हुए जेल गए तो कई लोगों ने फाँसी के तख्ते पर झूलते हुए अपने जीवन की आहुति दी. जिन्हें हम आज के दिन याद करते हुए उनके बलिदान को नमन करते है. आज उन्ही क्रांतिकारियों को याद करते हुए हर बच्चा किसी भी एक क्रांतिकारी के बारे में सबको बताएगा और बाकी बच्चे उसकी बातो ध्यान से सुनेगे और हर बच्चे की जब बात पूरी हो जायेगी तो उसके मनोबल को बढाने के लिए सभी बच्चे एक साथ करतल ध्वनि करेंगे. अध्यापिका जी के आदेशानुसार सभी बच्चो ने बारी-बारी से किसी भी एक क्रांतकारी के बारे में कुछ-न-कुछ बोला. किसी ने महात्मा गांधी के अहिंसा-आन्दोलन की कहानी सुनायी तो किसी पंडित जवाहरलाल नेहरू के पंचशील सिद्धांत की कहानी सुनायी. जब एक बच्चा बोल रहा होता तो बाकी बच्चे अनुशासन का पालन करते हुए उस कहानी को ध्यान से सुनते और अगर कोई बच्चा कुछ गलत बोल देता तो सब उसकी गलती को ठीक कराने के लिए एक साथ बोल पड़ते जिससे कक्षा में काफी शोर हो जाता तो अध्यापिका जी अपनी कुर्सी से खडी होकर सभी बच्चो को अनुशासन का पाठ पढ़ते हुए चुप करवातीं. इस क्रम में कक्षा के सबसे नटखट और होनहार बच्चे की बारी आई जिसका नाम था – नारायण ! नारायण के खड़े होते ही कक्षा के सभी बच्चे जब उसके बोलने से पहले ही हँसकर उसको चिढाते हुए ताली बजाने लगे तो अध्यापिका जी ने सभी बच्चो को शांत करते हुए नारायण को अपनी बात कहने के लिए आदेश किया. नारायण ने अपनी बात शुरू की-

 

भारत को आज़ादी मात्र शांति-पूर्वक आंदोलनों से ही नहीं मिली अपितु भारत को अंग्रेजो से आज़ाद कराने के लिए कई गुमनाम शहीदों ने अपना बलिदान दिया है जिसके बारे में हमें इतिहास में बहुत कम ही पढाया जाता है. भारत के इतिहास में एक महान क्रांतिकारी हुए जिन्होंने एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास की सजा पाई उसके मुह से यह शब्द सुनते सभी बच्चे जोर से हँसते हुए प्रश्न चिन्ह खडाकर बोले कि एक जन्म में दो जन्म का कारावास कैसे हो सकता है. इस पर नारायण ने अध्यापिका की तरफ देखते हुए सभी बच्चो को चुप कराने का निवेदन किया. अध्यापिका ने सभी बच्चो को शांत रहकर नारायण की बातो को सुनने के लिए कहा नारायण को अपनी बात रखने का आदेश दिया. अध्यापिका जी के आदेश का पालन करते हुए नारायण ने पुनः कहानी शुरू की. यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमें बहुत कम ऐसे महान क्रातिकारी के बारे में पता है परन्तु यह सच है कि भारत के इतिहास में एक ऐसे क्रातिकारी हुए है जिन्हें एक जन्म में दो जन्म का अजीवन कारावास की सजा मिली थी और ऐसे महान क्रांतिकारी का नाम था – विनायक दामोदर सावरकर. इनका जन्म महाराष्ट्र राज्य में नासिक के निकट भागुर गाँव में 28 मई 1883 को हुआ था. उनकी माता जी का नाम राधाबाई तथा पिता जी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था. इनके दो भाई गणेश जिन्हें बाबाराव के नाम से जाना जाता है व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं. जब सावरकर मात्र नौ वर्ष के थे तभी एक हैजे नामक महामारी में उनकी माता जी का देहान्त हो गया और इसके सात वर्ष पश्चात सन् 1899 में प्लेग नामक महामारी में उनके पिता जी भी स्वर्ग सिधार गए.

 

विनायक के बड़े भाई गणेश ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला. दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में गणेश के व्यक्तित्व का विनायक पर गहरा प्रभाव पड़ा. विनायक के घर का नाम “तात्या” था और पांचवी कक्षा तक गाँव के स्कूल में ही शिक्षा प्राप्त की.पांचवी पास करने के बाद आगे की पढाई के लिए इन्हें नासिक भेज दिया गया. विनायक ने शिवाजी हाईस्कूल नासिक से 1901 में मैट्रिक अर्थात दसवी की परीक्षा पास की. बचपन से ही सावरकर पढ़ाकू तो थे ही और उस उम्र में उन्हें कविताये लिखने का भी शौक था अतः उन दिनों उन्होंने कुछ कविताएँ भी लिखी थीं. आर्थिक संकट के बावजूद बाबाराव ने विनायक की उच्च शिक्षा की इच्छा का न केवल समर्थन करते हुए उनका साथ भी दिया. सन् 1901 में रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर की पुत्री यमुनाबाई के साथ उनका विवाह हुआ. उनके ससुर जी ने उनकी विश्वविद्यालय की शिक्षा का भार उठाया. उन दिनों “केसरी” नामक पत्र जो कि लोकमान्य तिलक द्वारा शुरू किया गया था की बहुत चर्चा थी. उन्ही छपे लेखो के माध्यम से उन्हें यह जानने का अवसर मिला कि किस प्रकार भारत अंग्रेजो की दासता के चंगुल में फंसा हुआ है. केसरी में छपे लेखो को पढ़कर सावरकर के ह्रदय में व्याप्त देशभक्ति की ज्वाला हिलोरे लेने लगी जिसका पता अन्य लोगो तब चला जब उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर बनाई गयी “मित्र – मेला ” संस्था के तत्वाधान में शिवाजी महोत्सव और गणेश पूजन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन कर देश के नौजवानों में चेतना भरना प्रारंभ किया. 22 जनवरी 1901 को महारानी विक्टोरिया के निधन पर भारत में जगह – जगह शोक सभाओ का आयोजन होने लगा परन्तु मित्र – मेला की बैठक में सावरकर ने बिना किसी से डरे यह घोषणा की कि ” इंग्लैण्ड की रानी हमारे दुश्मन देश की रानी है जिसके हम गुलाम है अतः उसकी मृत्यु का शोक हम क्यों मनाये ? इसके बाद तो सावरकार अपनी वाक्पटुता और लेखनी से नवयुवको पर अपनी अमिट छाप छोडी. उस समय जब “काल” ने उनकी रचनाये छापी तो वहा हर तरफ इनके पर्काशित लेखो की चर्चा दूर – दूर तक होने लगी और काल के सम्पादक श्री परांजपे सावरकर के लेखन -कौशल को देखकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने सावरकर का परिचय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से करवा दिया.

 

सन 1905 में जब सावरकार फर्ग्युसन कॉलेज से बी. ए. की पढाई कर रहे थे तो एक वदेशी वस्त्रो की होली जाने का कार्यक्रम बनाया परिणामतः लोकमान्य तिलक की अध्यक्षता में पूना के बीच बाज़ार में वदेशी वस्त्रो की होली जलाई जिसकी चर्चा पूरे देश में आग की तरह फाइल गयी फलस्वरूप इन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया. सावरकार शुरू से ही अंग्रेजो को उन्ही की भाषा में प्रतिउत्तर देना चाहते थे अतः विदेश जाकर बम इत्यादि हथियार बनाने की कला सीखना चाहते थे. उनके इस सपने को पूरा करने में बाल गंगाधर तिलक ने श्यामजी कृष्ण वर्मा जो उस समय इंग्लैंड में रहते थे से सावरकर के इंग्लैण्ड जाने के बारे में चर्चा कर अहम् भूमिका निभायी. शिवाजी छात्रवृत्ति के माध्यम से 9 जून 1906 को सावरकर इंग्लैण्ड जाने के लिए चले. लन्दन में सावरकर “इंडिया हाउस” जो उस समय श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा संचालित होता था में ही रुके. उसके बाद सावरकर के लेखन और इनके ओजस्वी भाषणों की चर्चा लन्दन के बाहर अन्य देशो में भी फैलने लगी. 10 मई 1907 को सावरकर ने 1857 के महासमर की जिसे अंग्रेज “ग़दर” व “लूट” बताकर बदनाम करते आ रहे थे को मुहतोड़ जबाब देने के लिए स्वर्णजयंती का आयोजन किया. इस कार्यक्रम का वहा रह रहे भारतीयों पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा परिणामतः भारतीय देशभक्त नवयुवक कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयो में 1857 महासमर की स्वर्णजयंती का बिल्ले लगाकर पढने गए.

 

अंततः सावरकर ने भारत में लोकमान्य तिलक को “बम मैनुअल ” भिजवाया जिसे देखकर तिलक भावविह्वल हो गए. 30 अप्रैल 1908 को खुदीराम बोस ने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए मुजफ्फरपुर में मुख्य प्रेसीडेंसी न्यायाधीश किंग्स फोर्ड पर बम फेंका जिसकी चर्चा देश भर में होने लग गयी. इसके बाद अनेक स्थानों पर हो रहे बम- विस्फोटो ने अंग्रेजी-सरकार की चूले हिला दी. इतना ही नहीं सावरकर ने 1907 में “1857 का प्रथम स्वातंत्र्य-समर ” ग्रन्थ लिखना शुरू किया जिसे प्रकाशित करवाने के लिए भारतीय देशभक्तो को नाकों चने चबाने पड़े और अंत में 1909 में यह ग्रन्थ फ्रांस से प्रकाशित करवाने में भारतीय देशभक्तो को सफलता मिली. सावरकार के अनन्य मित्र मदनलाल ढींगरा ने 1908 में लन्दन के इम्पीरियल इंस्टीटयूट के जहाँगीर हॉल में आयोजित के भरी सभा में सर कर्जन वायली को गोलियों से भून डाला जिससे सारा लन्दन थर्रा गया. कुछ अंग्रेज-भक्त भारतीयों ने इस घटना की सार्वजनिक निंदा की शोकसभा रखी तो सावरकार ने उन शोकसभाओं का पुरजोर विरोध कर अपने न केवल अदम्य साहस का परिचय दिया अपितु “टाईम्स ” में एक लेख लिखकर यह स्पष्ट तक कर दिया कि जब तक मदनलाल ढींगरा का केस अदालत में है उसे अपराधी घोषित नहीं किया जा सकता. इसी बीच सावरकर के दोनों भाई बाबाराव और गणेश दामोदर सावरकर को अंग्रेजो ने बंदी बना लिया. विनायक दामोदर सावरकर द्वारा कर्जन वायली की हत्या का खुलकर समर्थन करने से वहा की पुलिस की नजरो की ये किरकिरी बने हुए थे जिससे सावरकर पेरिस चले गए पर उन्हें वहा यह चिंता बारबार सताए जा रही थी कि लन्दन में उनके साथी सुरक्षित नहीं होंगे. अंततः सावरकर पेरिस से पुनः इंग्लैंड के लिए चले और इनके लन्दन के रेलवे स्टेशन पहुचते ही लन्दन-पुलिस द्वारा इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और इन पर पांच अभियोग लगाया गया.

 

सावरकर की गिरफ्तारी की खबर से भारतीय – जनमानस पर रोष की लहर दौड़ गयी. भारतीय देशभक्तो ने सावरकर के मुकदमो का खर्च उठाया और लन्दन की अदालत ने यह निर्णय दिया कि चूंकि सावरकर पर भारत में भी कई मुक़दमे है अतः सावरकर को भारत ले जाकर भारत में ही मुकदमा चलाया जाय. ‘मोरिया’ नामक जहाज से इन्हें भारत लाया जा रहा था. रास्ते में ही अंग्रेज सिपाहियों की नजर में धुल झोंकते हुए जहाज से बीच समुद्र में ही कूद गए और तैरते हुए फ़्रांस के तट पर जा पहुचे परन्तु दुर्भाग्य से अंग्रेज सैनिको ने फ़्रांस की पुलिस को पैसे देकर सावरकर को पकड़कर वापस जहाज में लाया गया. इस घटना के प्रकाशित होते ही सावरकर के अदम्य साहस और उनके शौर्य की भारत में हर तरफ भूरी-भूरी प्रसंशा होने लगी.

 

15 सितम्बर 1920 को भारत में सावरकर पर मुकदमा शुरू किया गया. सावरकार ने अदालत में अपना पक्ष स्पष्ट रखते हुए निडरतापूर्वक कहा कि उन्हें भारत के न्यायालय से उन्हें कोई आशा नहीं है अतः वह अपना बयान देना व्यर्थ समझते है. अंततः सावरकर को न्यायालय द्वारा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने, बम बनाने , हथियार इत्यादि भारत भेजने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी. 23 जनवरी 1911 को उनके विरुद्ध दूसरे मामलो की सुनवाई आरम्भ की गयी जिसमे 30 जनवरी 1911 को पुनः सावरकर को आजन्म कारावास की सजा सुनायी गयी. इस प्रकार सावरकर को एक ही जन्म में दो जन्मो के आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी जो कि विश्व के इतिहास में पहली एवं अनोखी सजा थी. न्यायाधीश ने जब उनसे कहा की अंग्रेज-सरकार अब आपको 50 वर्ष बाद रिहा कर देगी तो उन्होंने विनोद में कहा की क्या अंग्रेज-शासन 50 वर्षो तक भारत में राह पाएंगे साथ ही उन्होंने व्यंग्यात्मक तरीके से कहा कि इसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म के सिद्धांत को अंततः मान ही लिया.

सावरकर के गले में खतरनाक कैदी जिस पर लिखा हुआ था “दंड 1910 और मुक्ति 1960 ” का बिल्ला लटका दिया गया. यह समाचार सुनकर जब उनकी 19 वर्षीय पत्नी यमुनाबाई सवारकर से मिलने डोगरी जेल में आई तो वहां का सारा वातावरण भावाकूल के वशीभूत हो गया. तदुपरांत सावरकर को अंडमान की जेल में भेज दिया गया. जेल के सारे अमानवीय व्यवहारों को सहते-सहते उन्होंने जेल में ही उन्होंने कमला, गोमान्तक आदि जैसे साहित्यों का सृजन किया. सावरकर अंग्रेजो की इस चाल को भलीभांति जानते थे कि भारत में कोई क्रांति की ज्वाला ना भड़क जाये इसलिए इस डर से किस प्रकार अंग्रेजो ने कूटनीतिक तरीके से उन्हें भारत के स्वाधीनता – संग्राम से अलग करने हेतु ही उनको दो जन्मो का कारावास दिया. भारतीय स्वाधीनता – संग्राम से अलग होने की वजह से अंडमान जेल में सावरकर की हालत जल बिन मछली जैसी ही थी. अंततः सावरकार ने भी अंग्रेजो को जबाब कूटनीतिक तरीके से ही देने की योजना बनाई.सावरकर शुरू से ही शिवाजी के अनुयायी थे परिणामतः सावरकर ने भी शिवाजी का अनुसरण करते हुए अंग्रेजी – सरकार से उन्हें मुक्त करने का निवेदन किया जिसे अंग्रेजी शासन ने स्वीकार कर लिया और उन्हें रत्नागिरी में राजनीति से दूर नजरबन्द कर दिया गया.

 

10 मई 1937 को सावरकर को नजरबन्द से मुक्त कर दिया गया जिसे देशभक्तों ने देशभर में उल्लास के साथ मनाया. तात्कालीन कई नेताओ द्वारा सावरकर को कांग्रेस में शामिल करने की नाकाम कोशिश करने पर सावरकर ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि “कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर उनके तीव्र मतभेद है अतः वे हिन्दू महासभा का ही नेतृत्व करेंगे”. 30 दिसंबर 1937 को वे अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय महासभा सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए. सावरकर की दूरदर्शिता की कोई काट नहीं थी इसका प्रमाण हमें उस भाषण से मिलता है जिसे उन्होंने एक बार हिन्दू महासभा के मंच से एक नारा देते हुए कहा था कि “राजनीति का हिन्दुकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण” होना चाहिए. स्वतंत्रता पश्चात उनके इस विचार को जब सत्तालोलुप नेताओ ने नहीं माना तो हमें चीन के साथ युद्ध तक करना पड़ा. उनके इस विचार से सुभाष चन्द्र बोस बहुत प्रभावित थे परिणामतः उन्होंने भारत से गुप्त तरीके पलायन कर विदेश में जाकर “आज़ाद हिंद फ़ौज” की स्थापना की. सावरकर ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने मुस्लिम लीग के भारत विभाजन प्रस्ताव का न केवल विरोध किया अपितु हिन्दू महासभा में अखंड भारत सम्मलेन का आयोजन कर “पाकिस्तान बनाने की योजना” का पुरजोर विरोध किया. परन्तु उस समय के नेताओ ने सत्तालोलुपता के चलते सावरकर की एक न सुनी और अंततः भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हो गया. इस विभाजन से सावरकर का ह्रदय-विच्छेद हो गया जिसकी तड़प उनके इस वक्तव्य से समझा जा सकता है कि मुझे स्वराज प्राप्ति की खुशी है परन्तु वह खंडित है इसलिए दुःख बहुत ज्यादा है. सावरकर ने न केवल स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया अपितु उस समय भारत में व्याप्त छुआछूत, रोटीबंदी , बेटीबंदी आदि कुरीतियों को भी जड़ से मिटाने का भरपूर प्रयत्न किया.

 

सावरकर के विचार आज भी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है. अगर उनके विचारो को मान लिया जाता तो शायाद आज भारत खंडित दो देश के रूप में नहीं होता. पर वो कहानी अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है फिर कभी मौका मिलेगा तो सुनाऊंगा. परन्तु मुझे लगता है कि सावरकार आज भी अपने विचारो के माध्यम से हम सबके बीच ज़िंदा है कहते हुए नारायण ने अध्यापिका के कहेनुसार एक महान क्रांतिकारी विनायक दमोदर सावरकार की कहानी सुनायी. कक्षा के सभी विद्यार्थियों ने नारायण द्वारा कही गयी कहानी का खड़े होकर तालियों की गडगडाहट से अभिनन्दन किया. इतने में स्कूल की घंटी बजी और सब बच्चे अपने – अपने घर जाने को तैयार हुए.

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1 Comment on "सावरकर आज भी है"

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suresh maheshwari
Guest

Thank you for spreading the right message to the new generation.

suresh maheshwari

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