लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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save water

पानी

प्रवीण दुबे
‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून।।
रहीम के इस प्रेरणादायी दोहे से यदि हमने सीख ली होती तो शायद आज पेयजल के लिए हमारी सरकार को कानून बनाने की बात नहीं कहना पड़ती। सच पूछा जाए तो हमारा दर्शन, हमारी संस्कृति और हमारे पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक उस समस्या के प्रति सचेत किया गया है जिससे आज हमारा देश जूझ रहा है।
रहीम ने दशकों पूर्व ही कितनी खूबसूरती से ऊपर लिखे अपने दोहे के माध्यम से समाज को सचेत करते हुए इंगित किया कि ‘पानी के बिना सब कुछ सूना हैÓ पानी के बिना मानव जीवन के उबरने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

हमारी संस्कृति में बहुत पहले ही कह दिया गया था ”जल ही जीवन हैÓÓ युगों-युगों से हम यह संदेश देते रहे हैं। सच पूछा जाए तो हमारे धर्म ग्रंथों और महापुरुषों द्वारा दी गर्ई सीखों को लेकर हमारे समाज की गति उस कहानी जैसी रही जिसमें साधू द्वारा अपने यहां पाले गए तोतों को शिकारी से सावधान रहने की सीख को तोतों ने रट तो लिया लेकिन कर्म रूप में उसका अनुसरण नहीं किया परिणाम यह निकला शिकारी द्वारा फैलाए गए जाल में तोते फंस गए और फंसे होने के बावजूद साधू द्वारा दी गई रटी-रटाई सीख को वह दोहराते जा रहे थे-
शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा।
जाल में फंसना नहीं।।
परिणाम सभी को पता था शिकारी ने तोतों को कैद किया और साधू की सीख धरी की धरी रह गई। जल ही जीवन का बोध वाक्य हो अथवा पानी के महत्व को प्रतिपादित कर रहीम का दोहा हमारे समाज में खूब उल्लेख किया जाता है। लेकिन कर्म रूप में पानी की जितनी बर्बादी हमारे देश में की जाती है शायद पूरी दुनिया में उतना पेयजल तो लोगों को उपलब्ध ही नहीं है।

यहां यह बताने की कतई आवश्यकता नहीं कि हम और हमारा समाज सुबह से लेकर शाम तक कितना पानी बेवजह बर्बाद कर देते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक स्व. सुदर्शन जी कहा करते थे कि हम पीने के लिए एक गिलास पानी मांगते हैं लेकिन आधा गिलास पीकर शेष आधा गिलास फेंके जाने के लिए छोड़ देते हैं। पूरे देश में यदि ऐसे ही आधा गिलास पानी बचाया जाए तो हम हजारों गैलन पानी बर्बाद होने से बचा सकते हैं। बात वहीं आकर रुक जाती है, हमने कभी इन सीखों पर गौर नहीं किया।

आज स्थिति इतनी भयावह है कि देश के कुछ प्रांतों में 16 साल का सबसे भयानक सूखा पड़ रहा है, यहां के लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। वॉटर रिसोर्स और रिवर डेव्हलपमेंट सेक्रेटरी शशि शेखर के मुताबिक केन्द्र सरकार पानी को लेकर कानून बनाने की तैयारी कर रही है। इसका मॉडल अगले एक पखवाड़े में देशवासियों के सामने आने की संभावना है।

संभावना है कि इस कानून के अन्तर्गत पानी की बर्बादी को रोकने उसके विभिन्न स्रोतों का सही उपयोग तथा जमीन के नीचे के पानी के ज्यादा दोहन को लेकर नियम सख्त किए जाएंगे। जहां तक सरकार की बात है समस्या की गम्भीरता को लेकर उसकी सजगता होना अच्छी बात है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कानून के डंडे से पानी की समस्या का समाधान संभव है। शायद नहीं।

इस समस्या का एकमात्र हल देशवासियों का स्वयं जागरुक होना है। पानी का सही व उचित मात्रा में उपयोग होगा तथा जमीन के नीचे के पानी का जितना कम दोहन होगा पानी उतना ही बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही वर्षा जल का संरक्षण व वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीक का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करके हम पानी संकट का समाधान निकाल सकते हैं। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि हमको आपको और पूरे समाज को पानी की बर्बादी से बचने की आदत भी डालना होगी। यदि ऐसा होगा तभी पानी बचेगा। कानून से नहीं अपनी आदतें सुधारने की जरुरत है।
वाशिंगटन स्थित अर्थ पॉलिसी इंस्टीट्यूट के जाने-माने वैज्ञानिक लेस्टर ब्राउन के मुताबिक आने वाले दिनों में भारत में जबरदस्त जल संकट आने वाला है। इसकी वजह पानी का जबरदस्त दोहन है जो पिछले बीस सालों में तेजी से बढ़ा है।

यदि पानी का अपव्यय नहीं रूका तो पीने के पानी के लाले पड़ जाएंगे। देश में पानी का सर्वे कर रहे फ्रेड पियर्स के मुताबिक निम्न जल स्तर वाले इलाकों में पानी की किल्लत जबरदस्त ढंग से बढ़ रही है। यह इससे भी साबित होता है कि पिछले दस सालों में इन इलाकों में दो सौ से लेकर एक हजार मीटर तक की गहराई वाले अनगिनत कुएं खोदे जा चुके हैं जिनमें से अधिकांश सूख गए हैं या सूखने के कगार पर हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक वाटर लेबल हर साल दो से छह मीटर तक नीचे जा रहा है।

ऐसे में बरसात का पानी संरक्षित कर इस आसन्न संकट से उबरा जा सकता है। केन्द्रीय मौसम विज्ञान के मुताबिक देश में सालाना औसतन 1,170 मिमी बारिश होती है- वह भी महज तीन महीने में। लेकिन इस अकूत पानी का इस्तेमाल महज बीस प्रतिशत हो पाता है और अस्सी प्रतिशत बगैर इस्तेमाल के बह जाता है। इसका खामियाजा हम हर साल पानी की बेहद कमी के रूप में भुगतते हैं।

मतलब जल संरक्षण और बेहतर इस्तेमाल से पानी के संकट से उबरा जा सकता है लेकिन बात इतनी सी नहीं है। जिन इलाकों में बरसात बहुत कम होती है, वहां तो पाताल का पानी ही एकमात्र स्रोत होता है। वहां कैसे पानी की किल्लत से उबरा जाए, इस पर गौर करने की जरूरत है। पिछले कई सालों से देश के उड़ीसा, बुंदेलखंड, राजस्थान, असम, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पर्याप्त बारिश न होने के कारण लोगों को बड़ी परेशानी है।

सबसे त्रासद स्थिति इन इलाकों की पाताल के पानी का बहुत तेजी से नीचे की आ॓र जाना है। इसका कारण है बरसात कम होना और दूसरे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का पानी के धंधे के लिए सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त होना। जो इलाके देश में आज पानी के लिए तरस रहें हैं, वहां पहले भी दो-चार साल बरसात जरूरत से कम होती रही है लेकिन पानी की जैसी तंगी आज है, ऐसी कभी नहीं रही। मतलब देशभर में पानी की समस्या के तमाम कारणों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा धरती के पानी का अकूत दोहन भी है। यह तमाम सर्वेक्षणों से भी स्पष्ट हो गया है, जो इन इलाकों में कराए गए और कराए जा रहें हैं। ये कंपनियां बोतलबंद पानी के धंधे के अलावा कोल्ड ड्रिंक्स के लिए भी करोड़ों गैलन पानी पाताल से निकाल रहीं हैं। लेकिन सरकार व प्रशासन खामोश है।

तमाम इलाकों में जहां पानी को लेकर कभी अफरा-तफरी नहीं मची, आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अकूत दोहन से कुएं सूख गए हैं। लोगों को कई किमी पैदल चलकर पानी लाना पड़ता है। कई इलाकों में पानी के लिए ऊंचे दाम देने पड़ते हैं। मतलब पिछले दस-पंद्रह सालों में पैदा हुई पानी की यह किल्लत सरकार की गलत नीतियों के कारण है। इसी कारण दिल्ली, एनसीआर और पड़ोसी राज्य हरियाणा में धरती के नीचे का पानी दस से पन्द्रह फीट तक नीचे चला गया है। दिल्ली में पानी का संकट कितना गहरा है, इसे मानव विकास रिपोर्ट 2006 से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक राजधानी की 84 प्रतिशत जनसंख्या मानती है कि उनके इलाके में जलापूर्ति सामान्य तरीके से नहीं होती है और तीस प्रतिशत कहते हैं कि उन्हें साफ पानी नहीं मिलता।

दिल्ली में पानी की किल्लत की एक और प्रमुख वजह है वाहनों की सफाई में पानी का बर्बादी। एक अनुमान के मुताबिक हमारे यहां कम से कम पांच करोड़ लीटर पानी कार, बस, टैक्सी और दो पहिया वाहनों की सफाई में बर्बाद हो जाता है जबकि अमेरिका जैसे देशों में जहां कारों की संख्या भारत की तुलना में कहीं ज्यादा है, कारों की सफाई में पानी का कम से कम इस्तेमाल होता है। राजधानी साहित देश के तमाम हिस्सों में पानी के बढ़ते संकट की बड़ी पानी की बर्बादी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि यही हाल रहा तो 2020 तक लोगों को पेयजल मुहैया कराना असंभव होगा। केंद्र को जल-संकट से निपटने के लिए पानी की बर्बादी रोकने के लिए कड़े कानून बनाने होंगे, साथ ही भूजल माफिया के जरिए पानी की चोरी और व्यापार रोकने के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हो रहा दोहन भी हर हाल में रोकना होगा।

एक सच्चाई यह भी है कि पानी की बर्बादी, चोरी और अकूत दोहन न तो कानून के जरिए रोका जा सकता है और न डंडे के बल पर। इसके लिए जनजागृति सबसे कारगर हथियार है, जिसे सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं को मिलकर अपनाना होगा।

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2 Comments on "कानून से नहीं, आदतें सुधारने से बचेगा पानी"

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पवन कुमार
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पवन कुमार

श्री प्रवीण दुबे जी कितना आसान है अपने समाज को गाली देना। कृपया एक बार श्री अनुपम खेर की पुस्तक जो इंटरनेट पर भी उपलब्ध है को पढ़ने का प्रयास करे। पुस्तक का नाम है – आज भी खरे है तालाब। भाईसाहब यह साफ माथे का समाज था जिसके कारण आज तक हमको धरती से पानी मिल रहा है। यह तो तथा कथित आजादी के बाद का नेहरू का विकास मॉडल व दूषित कम्युनिस्ट सोच का परिणाम है कि पानी से लबालब रहने वाली भारत की धरती आज सूखे की चपेट में है।

हिमवंत
Guest

मैं यह संकल्प उठाता हूँ की टपकते नल को कल तक ठीक कराऊंगा, जल का उपयोग कम करूँगा.

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