लेखक परिचय

पुष्पेन्द्र दीक्षित

पुष्पेन्द्र दीक्षित

शिक्षा - बी.कॉम , पोस्ट ग्रेजुएशन - एम.ए इकोनॉमिक्स लेखन - स्वतंत्र भारत ,बिज़नेस स्टैंडर्ड (हिंदी संस्करण ) अन्य राष्ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में लेख और लघु कथा का प्रकाशन संपर्क न.: 9044601505

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riverक्षिति,जल,पावक,गगन ,समीरा पांच तत्व से बना शरीरा अर्थात यह शरीर क्षिति (पृथ्वी ),जल ,पावक ,गगन और समीर (हवा ) इन पांच तत्वों से मिलकर बना है और इन पांच तत्वों मे जल एक ऐसा तत्व है ,जिसके बिना धरती पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । आधुनिक वैज्ञानिकों की मानें तो मानव शरीर का तीन-चौथाई भाग ‘जलमय’ है और इसी प्रकार हमारी पृथ्वी का भी तीन-चौथाई भाग जलमय है ।
किंतु ‘जल’ जैसी इतनी अनमोल चीज होने के बाबजूद भी उपेक्षित है;पिछले कुछ दशकों से मानव द्वारा जल और जल संसाधनों का बहुत बेदर्दी से दोहन किया गया है । जिसके फलतः जल संकट आज वैश्विक संकट के रूप में उभरा है ,जो दिन पर दिन गहराता जा रहा है । एक अध्ययन अनुसार पृथ्वी पर 71 फ़ीसदी जल उपलब्ध है ,जिसमे 97.3 प्रतिशत जल खारा होने के कारण पीने के योग्य नहीं है तथा 2.7 फ़ीसदी मीठा जल हमें नदियों ,झीलों ,तालाबों जैसे संसाधनों से प्राप्त होता है। विश्व भर की नदियों में प्रतिवर्ष बहने वाले 41000 घन किलो मीटर जल में से 14000 घन किलो मीटर का ही उपयोग किया जा सकता है । इस 14000 घन किलो मीटर जल में भी 5000 घन किलो मीटर जल ऐसे स्थानों से होकर गुजरता है ,जहाँ आबादी ही नहींहै ;यदि है भी तो उपयोग करने के लिए पर्याप्त नहीं है । इस प्रकार 9000 वर्ग किलो मीटर जल का प्रयोग पूरे विश्व की आबादी द्वारा किया ।
एक अनुमान के मुताबिक़ विश्व में प्रतिवर्ष 2,600 से 3,500 घन किलो मीटर के बीच जल की वास्तविक खपत है। मनुष्य को जीवित रहने के लिए प्रतिवर्ष एक घन मीटर पीने का पानी की तथा समस्त घरेलू कार्यों को भी शामिल कर लिया जाए तो प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 30 घन मीटर जल की आवश्यकता होती है। विश्व जल की कुल खपत 6 फीसदी हिस्सा ही घरेलू कार्यों में प्रयुक्त होता है। कृषि कार्यों में 73 फीसदी जल और उद्योगों में 21 फीसदी जल की खपत होती है। पूर्वी यूरोप के देशों में जल की कुल खपत का 80 प्रतिशत उद्योगों में प्रयुक्त होता है, जबकि तुर्की में यही खपत 10 प्रतिशत, मैक्सिको में 7 फीसदी और घाना में 3 प्रतिशत है।विश्व में कुछ देश जल की उपलब्धता की दृष्टि से सम्पन्न हैं क्योंकि उनकी जनसंख्या कम है। कनाडा में प्रतिव्यक्ति जल की उपलब्धता 1,22,000 घन मीटर प्रतिवर्ष है, जबकि वास्तविक खपत मात्र 1,500 घन मीटर है तथा मिस्र में जल की प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष उपलब्धता 1,180 घन मीटर के मुकाबले उसकी खपत 1,470 घन मीटर है।
विश्व में 1.2 अरब व्यक्तिओं को जो की विश्व की पूरी आबादी का 24 फ़ीसदी हिस्सा है ,उसको ही पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है । संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट -2015 के अनुसार ,यदि संक्षरण प्रबंधन में जल ही सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाये गए तो वर्ष 2030 तक पृथ्वी को 40 फ़ीसदी स्वच्छ जल की कमी का सामना करना पड़ेगा । इस रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया की जरुरते पूरी करने के लिए पर्याप्त पानी है ,लेकिन इस पानी के उचित प्रबंधन की बहुत आवश्यकता है । जहाँ पूरा विश्व जल संकट का सामना कर रहा है ,वहीं भारत में यह संकट भयावह रूप धारण कर रहा है । भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को ही पीने का स्वच्छ जल मिल पा रहा है । एक रिपोर्ट के मुताबिक जल संकट से जूझते विश्व की 20 देशों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली का स्थान दूसरे नंबर पर है, इतना ही नहीं इस सूची में दिल्ली के अलावा भारत के चार महानगर कोलकाता ,चेन्नई,बेंगलुरु और हैदराबाद भी शामिल है । जापान की राजधानी टोक्यो जल संकट जैसे गंभीर मामले में नंबर एक है और चीन के बीजिंग समेत कई देश जल संकट से जूझ रहे है ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट ने भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में पेयजल की स्थिति की कलई खोल दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 70 प्रतिशत बीमारिओं का संबंध दूषित जल से है तथा प्रत्येक साल करीब सात लाख 83 हजार लोगों की मौत दूषित पानी और खराब साफ-सफाई की वजह से होती है। इसमें से लगभग साढे़ तीन लाख लोग हैजा, टाइफाइड और आंत्रशोथ जैसी बीमारियों से मौत की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियां दूषित पानी और भोजन, मानव अपशष्टिटों से फैलती हैं। यही नहीं प्रत्येक वर्ष 15000 से ज्यादा लोग मलेरिया, डेंगू और जापानी बुखार की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। इन बीमारियों के वाहक दूषित पानी, जल जमाव यानी कि पानी के खराब प्रबंधन से फैलते हैं। इस रिपोर्ट से साफ होता है कि लोगों तक साफ पेयजल पहुंचाने को लेकर भारत के सामने कई मुश्किल चुनौतियां हैं। चिंता इसलिए भी और लाजिमी है कि भारत में पानी संबंधी बीमारियों से मरने का खतरा श्रीलंका और सिंगापुर जैसे छोटे और पिछड़े राष्ट्रों से ज्यादा है।
जल की चिंता वास्तव में कल की चिंता है अगर हम अपनी भावी पीढ़ी को स्वच्छ जल नही दे सके तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा शायद यही सोच कर रहीमदास जी ने कहा होगा ।
रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।।

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