लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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-निर्मल रानी-
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जब भी दुनिया जल संरक्षण दिवस मनाती है या फिर जिन दिनों में धरती गर्मी के भीषण प्रकोप का सामना करती है प्राय: उन्हीं दिनों में हम जैसे तमाम लेखकों, समीक्षकों व टिप्पणीकारों को जल संरक्षण हेतु कुछ कहने, सुनने व लिखने का ख्याल आता है। हमारा देश एक बार फिर गर्मी की ज़बरदस्त तपिश का सामना कर रहा है। अभी से देश के कई भागों से पानी की कि़ल्लत के समाचार सुनाई देने लगे हैं। कहीं भू जल स्तर नीचे गिरता जा रहा है तो कहीं देश की छोटी नदियां खुश्क हो रही हैं। देश का संरक्षित जल स्त्रोत समझे जाने वाले तालाबों का तो देश से अस्तित्व ही लगभग समाप्त हो गया है। हमारी नई पीढ़ी तो कुंओं और तालाबों के बारे में जानती ही नहीं है इनके विषय में वह केवल किताबों में ही पढ़ती है। आज के बच्चों को किताबों से यह पता चलता है कि गुज़रे काल में तालाब कैसे हुआ करते थे और कुंओं की क्या उपयोगिता थी। जगह-जगह लगे होने वाले हैंड पंप भी अब नदारद होते जा रहे हैं। गोया अगर चलता-फिरता कोई मुसाफिर गर्मी के दिनों में पानी पीने की ज़रूरत महसूस करे तो उसे दो घूंट पानी की तलाश करने में पसीने छूट जाते हैं। हां वही प्यासा मुसाफिऱ यदि अपनी जेब ढीली करने को तैयार है तो बंद बोतल पानी लगभग हर दुकान पर उपलब्ध हो सकता है। अर्थात् प्रकृति द्वारा नि:शुल्क और निस्वार्थ रूप से मानव को दिया जाने वाला जल जैसा बेश$कीमती व जि़ंदगी जीने का सबसे ज़रूरी तोह$फा मानव के ही एक व्यवसायी वर्ग द्वारा धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। आ$िखर कैसा है यह कुचक्र और कौन है इसके जि़म्मेदार और क्या है इन समस्याओं से निजात पाने का तरीका?

मीठे व साफ पानी के संकट से केवल भारत-पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देश ही नहीं जूझ रहे हैं बल्कि कई अफ्रीकी देश भी इस समय बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। साफ व मीठे पानी की कमी से आधी से अधिक दुनिया जूझ रही है। निश्चित रूप से विश्व पर जनसंख्या का निरंतर बढ़ता जा रहा दबाव तथा इसके चलते पानी की बढ़ती खपत इसके लिए सबसे अधिक जि़म्मेदार हैं। और यही बढ़ती जनसंख्या, ग्लोबल वार्मिंग अर्थात् पृथ्वी के बढ़ते तापमान का भी एक प्रमुख कारण है। ज़ाहिर है ग्लोबल वार्मिंग भी पानी की लगातार होती जा रहीे कमी की एक बहुत बड़ी वजह है। रही-सही कसर जल संकट के ऐसे दौर में उन लोगों द्वारा पूरी कर दी जाती है जो जाने-अनजाने पानी का दुरुपयोग करते रहते हैं। चाहे वह किसान हों, उद्योग हों, रेल व बस की सफाई नेटवर्क हो या घरेलू इस्तेमाल में खर्च किए जाने वाले पानी का दुरुपयोग करते रहते हों। हर जगह पानी का दुरुपयोग होते देखा जा सकता है। पानी को प्रदूषित करने की रही-सही कसर वे धर्मांध लोग पूरी कर देते हैं जो कहीं अपने घर का कूड़ा-कचरा, पूजा-पाठ की सामग्री आदि नदियों आदि में प्रवाहित कर देते हैं। कहीं दुर्गा व गणेश की मूर्तियां जल प्रवाहित की जाती हैं। मरे जानवरों तथा मृतक इंसानों को भी नदियों में फेंक देने का हमारे देश में एक चलन सा बन चुका है। हद तो यह है कि जीवनदायनी समझी जाने वाली वह गंगा नदी जिसका जल हाथ में लेकर श्रद्धालू आचमन करते हैं तथा बोतलों में भरकर अपने घरों में लाकर रखते हैं उसी गंगा नदी में गंगा के आसपास के नगरों के लोग अपने परिवार के मृतक व्यक्ति के शरीर को प्रवाहित करने में पुण्य समझते हैं। यदि आप वाराणसी में गंगा घाट पर जाएं तो वहां बाकायदा ऐसी विशेष कश्तियां देखने को मिलेंगी जिनमें मुर्दों को लटका कर मुख्य घाट से कुछ दूरी पर ले जाकर मृतक के शरीर को गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। ऐसा करने वाले लोगों का यह विश्वास है कि यह शरीर सीघे बैकुंठ धाम अथवा स्वर्ग की ओर चला जाता है। परंतु हकीकत में उसी गंगा नदी के किनारे कुछ दूरी पर आपको अनेक ऐसे मानव कंकाल मिलेंगे जिन्हें गंगा नदी कुछ ही दूर ले जा कर अपने किनारे पर लगा देती है। उसके बाद कुत्ते और सियार जैसे जानवर ‘बैकुंठ धाम’ को जाने वाले शरीर को बीच रास्ते में ही रोककर अपनी भूख मिटाने लगते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान पवित्र गंगा नदी का क्या हाल होता होगा और सदियों से गंगा जी के साथ होते आ रहे इस खिलवाड़ ने गंगा को कितना प्रदूषित कर दिया है इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

बेशक धनाढ्यों, नवधनाढ्यों तथा जल की स्वच्छता का ज्ञान रखने वाले लोगों ने पीने के पानी के लिए बंद बोतलें खरीदनी शुरू कर दी हैं। अपने घरों में ऐसे लोगों ने जल शोधन के कई उपाय कर रखे हैं। परंतु देश की बहुसंख्य साधारण आबादी अभी भी पानी के प्राचीन व सामान्य स्त्रोतों पर ही आश्रित है। उसे आज भी नदियों, नहरों, हैंडपंप या सरकारी टोंटियों के साधारण पानी को इस्तेमाल करना पड़ता है। जब नदियां हद से ज़्यादा प्रदूषित हो जाएं और भूजल स्तर प्रत्येक वर्ष निम्र से निम्र स्तर पर जाता रहे, तालाब व कुंए सूख चुके हों ऐसे में आम आदमी को पानी के लिए होने वाली परेशानी का अंदाज़ा अपने-आप लगाया जा सकता है। हमारे देश में प्राय: गर्मी के दिनों में यह खबरें सुनाई देती हैं कि राजधानी दिल्ली से लेकर देश के कई राज्यों में जल माफिया सक्रिय हो उठता है। यह लोग टैंकर में पानी भरकर साधारण लोगों की बस्तियों में जाकर दस-पंद्रह और बीस से पच्चीस रुपये प्रति बाल्टी की दर से पानी बेचते हें। इन्हीं दिनों में सरकारी पाईप लाईन में आने वाले पानी के लिए लंबी कतारें लगने की खबरें आती हैं तथा इसी लाईन में अपनी बारी के लिए लोगों के लड़ाई-झगड़े करने के समाचार भी सुनाई देते हैं। राजस्थान जैसे पानी के गहन संकट वाले इला$कों में पीने के पानी के लिए महिलाओं को अपने घरों से 5-6 किलोमीटर की दूरी तक जाना पड़ता है। तथा इतनी दूर से अपने सिरों पर पानी के बर्तन उठाकर लाना पड़ता है। राजस्थान में तो कुंआ खोदने पर भी पानी नसीब नहीं होता। और यदि कहीं पानी निकल भी आए तो उसका जलाशय इतना छोटा होता है कि कुछ ही समय के जलदोहन के बाद वह भी सूख जाता है। वैसे भी ऐसे इलाकों में पथरीली ज़मीन को खोदकर पानी के स्त्रोत तक पहुंचना आसमान से तारे तोड़ कर लाने से कम नहीं है।

विश्व व्यापार पर अपनी पैनी नज़र रखने वाले कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एक ओर जहां अनपढ़, अज्ञानी, गैरजि़म्मेदार वर्ग जल की बेतहाशा बरबादी का बड़ा जि़म्मेदार है, वहीं बढ़ती जनसंख्या व बढ़ते उद्योगों के चलते पानी की खपत बढ़ती जा रही है तथा प्रदूषित जल बहती नदियों को भी ज़हरीला बनाता जा रहा है। वहीं दूसरी ओर पानी को बेचने के व्यवसाय में लगी कई अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां इस वातावरण को अपने व्यवसाय के लिए शुभ अवसर समझ रही हैं। उन्हें भलीभांति मालूम है कि जितनी जल्दी नदियां प्रदूषित होंगी और जितना अधिक भूजल का स्तर नीचे गिरता जाएगा उतना ही स्वच्छ जल की आपूर्ति का उनका व्यवसाय परवान चढ़ता जाएगा। कहा तो यहां तक जा रहा है कि देश में होने वाले एक्सप्रेस वे के निर्माण में तथा इन एक्सप्रेस वे के किनारे बसने वाली नई टाऊनशिप की परिकल्पना के पीछे भी अंतर्राष्ट्रीय जल व्यवसायियों की सोच निहित है। उन्हें मालूम है कि जहां से होकर नए रास्ते गुज़रेंगे या नए नगर बसाए जाएंगे वहां-वहां निश्चित रूप से पानी की ज़रूरत के चलते जलदोहन शुरु होगा और भूजलस्तर नीचे की ओर जाएगा। आंकड़ों के अनुसार अब तक भारत में लगभग 70 प्रतिशत भूजल भंडार खाली होने के समाचार हैं। गोया हमारे कदम जल संकट से होने वाली तबाही व बरबादी की ओर बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं। यदि जल की बरबादी की गति यूं ही बरकरार रही और जल संरक्षण व जल के कम ख्रर्च की ओर हमने ध्यान नहीं दिया तो दस वर्षों से भी कम समय के भीतर हमें पानी के संकट के वह दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पानी के लिए दो व्यक्तियों के आपस में लड़ऩे की बात तो हम अभी से सुनते ही रहते हैं आने वाले समय में तो जल के मुद्दे पर विश्व युद्ध होने तक की संभावना व्यक्त की जा रही है।

सवाल यह है कि उपरोक्त परिस्थितियों में हमारा अपना दायित्व क्या है? सर्वप्रथम तो हमें अपने-आप को पानी की फुज़ूलखर्ची से रोकना चाहिए। ज़रूरत के अनुसार ही पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। पानी की टोंटी में रबड़ का पाईप लगाकर अपने घरों की सफाई करने तथा इसी रबड़ पाईप से क्यारियों में अत्यधिक पानी देने की प्रवृति से बाज़ आना चाहिए। अपने घर के बच्चों को भी इसप्रकार जल की बरबादी से बचने की सीख देनी चाहिए न कि उन्हें अपने ही ढर्रे पर चलाते हुए जल की बरबादी के उपाय सिखाए जाएं। खेती-बाड़ी के तौर तरीके भी बदलने की ज़रूरत है। ग्रामीण इला$कों में भूजल स्तर गिरने का प्रमुख कारण ट्यूबवेल के द्वारा पानी की मोटी धार से खेतों का सींचा जाना है। इस पर भी नियंत्रण रखने की ज़रूरत है। यदि प्रकृति की ओर से वर्षा न हो या कम हो तभी ज़रूरत के अनुसार ट्यूबवेल से जलदोहन करना चाहिए, अन्यथा नहीं। नहरों के किनारे लगने वाले खेतों में तो नहरों के पानी का ही इस्तेमाल सिंचाई के लिए किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त जल संरक्षण के लिए भी न केवल सरकार को आम जनता के बीच जाकर प्रशिक्षित करना चाहिए तथा इस संबंध में सरकारी सहायता देनी चाहिए, बल्कि गांव के लोगों को स्वयं इस विषय पर गंभीरतापूर्वक चिंतन कर प्रत्येक गांव में ऐसे तालाब खोदने चाहए जिनमें बरसात का पानी संरक्षित किया जा सके। और वह पानी न केवल पशुओं के काम आ सके बल्कि गर्मी में पानी की कमी के समय खेतों को सींचने के काम भी आ सके। इसी प्रकार के साफ-सुथरे व सुरक्षित तालाब भी बनाए जा सकते हैं जो साफ पानी के जलाशय के रूप में हमारे पीने व घरेलू उपयोग के काम भी आ सकें। हमें यह बात समझनी होगी कि जल संरक्षण ही धरा संक्षण है।

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