लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

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हम स्वयंवर में आमंत्रित तो नहीं थे, लेकिन ब्राह्मणों के छद्मवेश में वहां पहुंच ही गए। स्वयंवर के लिए नगर से ईशानकोण में रंगमण्डप का निर्माण कराया गया था। आंखें चौंधिया रही थीं, उसकी भव्यता निरखकर। सुना था पांचाली को श्वेत रंग बहुत भाता था। रंगमण्डप के निर्माण में उसकी रुचि का विशेष ध्यान रखा गया था। चारों ओर कैलाश शिखर के समान श्वेत गगनचुंबी प्रासाद इसे प्रमाणित भी कर रहे थे। शीर्ष से लेकर नींव तक दीवारें श्वेत पुष्पों की मालाओं और रत्नजटित हारों से लदी थीं। अन्तःपुर की सज्जा में श्वेत जालीदार पर्दों और मोतियों की झालरों का प्रयोग हुआ था। फ़र्श और दीवारों में स्वर्णखण्ड, मणि और रत्नों की शोभा देखते ही बनती थी। सर्वत्र धूप और अगरु की सुगंध फैल रही थी। फ़र्श पर चन्दन मिश्रित जल का छिड़काव किया गया था।

सभी आमन्त्रितों के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था थी। आर्यावर्त्त के विभिन्न भागों से सफलता की कामना से पधारे नरेशों के लिए स्वर्णनिर्मित मंच पर स्वर्णिम आसनों का निर्माण हुआ था। ब्राह्मणों और विद्वानों के लिए विशिष्ट आसन प्रचुर संख्या में बने थे। लक्ष्यभेद के लिए कृत्रिम मत्स्य-यंत्र सभागार के मध्य में स्थापित था। मत्स्य-यंत्र के पास ही रत्नजटित मंच था जो राजकुमारी के लिए आरक्षित था। मंच के पार्श्व में महाराज द्रुपद का सिंहासन था। नगरजनों और पुरनारियों के बैठने की एक ओर पृथक व्यवस्था थी।

दिन का प्रथम प्रहर आरंभ हो चुका था। देश के कोने-कोने से आए, महान् बल और पराक्रम से युक्त अपने-अपने राज्य रक्षक श्रेष्ठ नगरपति अपने निर्धारित आसनों पर विराजमान होने लगे। देखते ही देखते संपूर्ण सभामण्डप आगन्तुकों से खचाखच भर गया। महाराज द्रुपद भी वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच स्वर्णिम सिंहासन पर आरूढ़ हुए। सबसे अन्त में सखियों के साथ पुष्पशोभित पालकी में भ्राता धृष्टद्युम्न के साथ याज्ञसेनी ने रंगमण्डप में प्रवेश किया। श्वेत सुगंधित बेलापुष्पों की पालकी स्वर्णमंच के समीप रुकी। दो सुन्दर आलता लगे पांव सबसे पहले बाहर निकले। उनके धरती पर स्पर्श के साथ ही साक्षात् सरस्वतीरूपा श्वेतवस्त्रावृता एक मूर्ति सामने खड़ी थी। संपूर्ण रंगमण्डप में एक मधुर गुंजारण भर गया। युवक, वृद्ध, ब्राह्मण, क्षत्रिय, स्त्री-पुरुष, राजा-राजकुमार सभी स्तब्ध! सद्यःविकसित पद्मपुष्पों की सम्मोहित कर देने वाली सुगन्ध! कहां से आ रही थी? ऐसा कौन था वहां, जो पांचाली को देख चकित न हुआ हो?

सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति में धीरे-धीरे कंपन दृष्टिगत हुआ। वह अपने नियत स्थान की ओर अग्रसर हो रही थी। उसकी चाल मंथर होते हुए भी आत्मविश्वास से पूर्ण थी। उसके व्यक्तित्व की धीरता उसके पदसंचालन से ज्ञात हो रही थी। राजकुमार धृष्टद्युम्न और सखियों ने उसे रत्नजटित आसन पर आसीन कराया।

सामान्यतया गौर वर्ण ही नारी सौन्दर्य का प्रतीक माना जाता है। याज्ञसेनी का सांवला रंग भी इतना आकर्षक हो सकता है, कल्पना से परे था। समीप खड़ी गौरवर्णा सखियों की सुन्दरता उसके आगे लज्जित हो रही थी। प्रभात रवि की भांति रश्मियां बिखेर रहा था उसका मुखमण्डल। अतीव सुन्दरी! अद्भुत कान्ति – नीलकमल की पंखुड़ियों जैसी। नितंब को स्पर्श करती सागर की लहरों सदृश घनी केशराशि। हरिण की तरह चमकती कलात्मक मनमोहक आंखें – उज्ज्वल, बुद्धिदीपा। विधाता ने अवकाश के क्षणों में, पूरे मनोयोग से गढ़ी थी यह प्रतिमा – अनिंद्य मुखशोभा, समुचित अंगसौष्ठव, दीर्घ देह, समुन्नत वक्ष, क्षीण कटि, लंबी उंगलियां, गुलाबी करतल, मोती-सी धवल दंतपंक्ति, विद्युत को लजानेवाली हास्य-रेखा, रंगमण्डप में फैलती देह की पद्मपुष्प सुगंध उपस्थित सभी नरेशों का बुद्धि-विवेक हरने में सक्षम थी। शुभ्रवसना, शुभ्रमुकुटमण्डिता, शुभ्रपद्मपुष्पधारिणी करों में स्वर्ण निर्मित जयमाला लिए हुए पांचाली को देख, सभी नरपतियों ने उसे पाने की कामना से निश्चित रूप से अपने-अपने इष्टदेवों की आराधना की होगी।

मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहितों ने यज्ञवेदी में यज्ञोक्त विधि से अग्नि प्रज्ज्वलित कर घी की आहुति डाली। स्वस्तिवाचन के उपरान्त समस्त वाद्ययंत्रों को विराम दिया गया। सन्नाटे को तोड़ते हुए अत्यन्त तेजस्वी राजकुमार धृष्टद्युम्न ने मेघगर्जन-सी गंभीर वाणी में उद्घोष किया —

“आमन्त्रित नृपश्रेष्ठ! मेरी भगिनी कृष्णा आर्यावर्त्त की श्रेष्ठ सुन्दरी ही नहीं, सर्वगुण संपन्न भी है। वह विद्यावती, विचारशीला, शास्त्रज्ञा, संगीत निपुण और दिव्यदर्शिनी है। इस धरा पर सत्य की प्रतिष्ठा और धर्म की रक्षा उसका अभीष्ट है। महाराज के प्रण के अनुसार मण्डप की छत में स्थित मत्स्य-यंत्र की कनकमीन का यंत्र के नीचे निर्मित सरोवर में प्रतिबिम्ब देखकर, जो वीर चक्षुभेद कर भूमिसात करेगा, वही कृष्णा का पति होगा। मेरी भगिनी उसी के कण्ठ में वरमाला डालेगी। उस वीर का उच्चकुलसंभूत होना अत्यन्त आवश्यक है। लक्ष्यभेद के लिए सरोवर के किनारे रखे गए एकमात्र धनुष और पांच सूची बाणों का ही प्रयोग होना चाहिए।”

राजकुमार धृष्टद्युम्न ने नाम, गोत्र, कुल के साथ उसके पराक्रम का वर्णन करते हुए समस्त प्रतिभागियों का परिचय भी सभा को दिया।

श्रीकृष्ण अपने भ्राता बलराम के साथ प्रतियोगी नरेशों से अलग विशेष आसन पर द्रौपदी की बाईं ओर विराजमान थे। उनके दर्शन का भी मेरा यह पहला संयोग था। कृष्ण और कृष्णा सगे भ्राता और भगिनी प्रतीत हो रहे थे। श्रीकृष्ण के प्रथम दर्शन से ही आत्मा तृप्त हो गई। अद्भुत रूप, अलौकिक व्यक्तित्व और अद्वितीय कृतित्व के दिव्य संयोग का नाम था – श्रीकृष्ण – सहस्त्र पंखुड़ियों का सतरंगी कमलपुष्प – प्रत्येक पंखुड़ी अपने मृदुल स्पर्श और शान्त रंग से दिव्य आनन्द प्रदान करनेवाली। राजीव नयन – अंतर तक भेदने वाली दृष्टि। गहरे नीले रंग के केश और उसपर मोरमुकुट। अगस्त पुष्प जैसे बंकिम ललित अधर। कमल नाल जैसे हाथ-पांव, नीले आकाश सा प्रशस्त वक्षस्थल। एक बार दृष्टि पड़ी, तो हटने का नाम नहीं ले रही थी, ऐसा लग रहा था, मेरा उनका जन्म-जन्मान्तर का नाता हो। वे मेरे ममेरे भ्राता थे। उन्होंने हम पांच भ्राताओं की ओर इंगित कर बलराम के कान में कुछ कहा। हमने आंखों ही आंखों में एक दूसरे का अभिवादन किया।

उद्घोषणा के पश्चात सभी राजाओं ने विशेष रूप से निर्मित भारी भरकम धनुष को देखा। कोई उसको स्पर्श करने का साहस भी नहीं कर पा रहा था। सभी एक-दूसरे को देख रहे थे। प्रथम प्रयास पुरुवंशी दृढ़धन्वा ने किया। उत्तरीय संभालते हुए धनुष को हाथ लगाया। जोर लगाते ही धनुष हाथ से छूटा और वह तीन सौ साठ अंश के कोण पर घूम गया। लज्जित, पराजित, आरक्त मुख लिए, सिर झुकाकर वापस आ, अपने आसन पर बैठ गया।

दुर्योधन, शाल्व, कलिंगराज, वंगनरेश, क्राथ, सुनीथ, मेघसंधि, दण्डधर, मणिमान, यत्घृत, भोज, सुषेण, जरासंध, शिशुपाल जैसे अनेक नरेश बारी-बारी से आए लेकिन प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर, धनुष को हिला-डुला भी न सके। यह क्या? मद्र देश के राजा, मामा शल्य भी मंच के समीप दिखाई पड़े। यह वयस तो उनके पुत्रों के विवाह की थी, लेकिन द्रौपदी को पाने की अभिलाषा ने उन्हें भी प्रतियोगी बना दिया। उन्हें भी जयद्रथ की भांति प्राप्त हुई – मात्र असफलता। एक-एक कर सभी नरेशों ने अपने भाग्य और पराक्रम को दांव पर लगाया। परिणाम एक ही था – असफलता। सब सिर झुकाए बैठे थे। महाराज द्रुपद और राजकुमार धृष्टद्युम्न के मुखमण्डल पर विषाद और चिन्ता की रेखाएं अपनी उपस्थिति का बोध करा चुकी थीं। श्रीकृष्ण रहस्यमयी मुस्कान बिखेर रहे थे। पांचाली भावशून्य थी। रंगमण्डप शान्त था।

सभा की नीरवता अचानक भंग हुई। राधानन्दन कर्ण का लक्ष्यभेद के लिए खड़ा होना अप्रत्याशित था। वह शान्तचित्त और प्रचण्ड आत्मविश्वास के साथ सरोवर की ओर बढ़ रहा था। धनुष के पास पहुंचकर, मुस्कुराकर उसने एक बार द्रौपदी को देखा। रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसने आंखों ही आंखों मे दुर्योधन से भी बात की।

अत्यन्त सहजता से उसने धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाई। एक बाण लेकर ग्रीवा को उपर-नीचे कर, प्रतिबिम्ब के नेत्र पर ध्यान केन्द्रित कर ही रहा था कि क्षत्रिय समाज से एक तीक्ष्ण स्वर हवा में तैरता हुआ आया – “इस वीर का परिचय?”

क्रमशः

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