लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

(पाण्डवों का हस्तिनापुर में प्रत्यागमन)

कांपिल्यनगर में कृष्णा का स्वयंवर समारोह समाप्त हो गया, विवाह समारोह भी संपन्न हो चुका था किन्तु श्रीकृष्ण द्वारिका जाने का नाम नहीं ले रहे थे। वे हमारे सान्निध्य में एक लंबी अवधि तक महाराज द्रुपद के राजकीय अतिथि के रूप में कांपिल्यनगर में रहे। मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षण थे वे। अतीत को पुनर्जीवित करने की कोई विधि होती, तो मैं उन अविस्मरणीय क्षणों को वापस ले आता, उन्हीं में जीता। दुखद अतीत की स्मृतियां भी अत्यन्त मधुर होती हैं, लेकिन अतीत यदि शहद से भी मधुर रहा हो तो? मात्र कल्पना की जा सकती है कि उसकी स्मृति कितनी सुखद और मधुर हो सकती है। स्वयंवर के पश्चात श्रीकृष्ण के साथ व्यतीत किए गए उन स्वर्णिम पलों की स्मृति, बाद के संघर्षपूर्ण जीवन की प्रेरणा-स्रोत बनी।

मैंने अपने पूरे जीवन काल में श्रीकृष्ण को ही सर्वश्रेष्ठ के रूप में मान्यता दी। उनके दर्शन मात्र से मेरे अंदर का स्व विलुप्त हो उनके चरण-कमलों में अर्पित हो जाता था। मुझे दो बातों का गर्व जीवन में रहा – प्रथम, देवी कुन्ती के पुत्र होने का, द्वितीय, श्रीकृष्ण के प्रथम श्रेणी का सखा होने का। इन दोनों संबंधों ने जीवन में मुझे क्या कुछ नहीं दिया! मुझे जो भी यश और कीर्ति प्राप्त हुई, वह इन्हीं के कारण।

कांपिल्यनगर में द्रौपदी के स्वयंवर के समय श्रीकृष्ण के प्रथम दर्शन किए। मुझे ज्ञात नहीं था कि वे स्वयंवर में आएंगे। गोकुल, मथुरा और द्वारिका में व्यतीत उनकी बाल्यावस्था, कैशोर्य और यौवन की विगत घटनाएं किंवदन्तियां बन चुकी थीं। उनके चमत्कार, शौर्य, आकर्षण, उनकी कलाएं, कृतियां, वृत्तियां, पूरे आर्यावर्त्त में चर्चा के विषय थे। उनके सान्निध्य की प्रबल इच्छा मन में सदैव बलवती रही लेकिन जन्म से लेकर स्वयंवर तक कभी अवसर ही नहीं मिला कि द्वारिका जाकर उनके दर्शन-श्रवण का सौभाग्य प्राप्त करूं। मुझे विश्वास हो गया कि जिस पर जिसका सत्य स्नेह होता है, उससे मिलना निश्चित होता है। मुझे घोर आश्चर्य तब हुआ, जब वे कांपिल्यनगर में कुम्हार के घर बलरामजी और उद्धवदेव के साथ हमसे मिले। वास्तव में अगर श्रीकृष्ण हमसे नहीं मिलते, तो क्या होता? द्रौपदी ने उस दिन जिस प्रकार मुझ पर तिर्यक दृष्टिपात किया था, मैं घबरा गया था। मैं निःशब्द था। कभी-कभी मौन भी समस्याओं के समाधान में सहायक बन जाता है। बोलने के लिए सिर्फ वाणी की आवश्यकता होती है लेकिन चुप रहने के लिए वाणी और विवेक, दोनों की आवश्यकता होती है। यदि उस क्षण कुछ बोलता, तो निश्चित रूप से वह पांचाली के अन्यायपूर्ण विभाजन के पक्ष में नहीं जाता। मेरे मन में ऐसा विचार प्रवेश भी कर गया था।

द्रौपदी का हम पांच भ्राताओं की भार्या बनना किस प्रकार उचित था और देश, काल, परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप था, यह श्रीकृष्ण ने ही हमें समझाया। धर्म की नई व्याख्या के साथ कर्त्तव्यों के गठबन्धन का ज्ञान देते हुए, उन्होंने द्रौपदी को भी उसके सम्यक स्थान का भान कराया। उस दिन यथार्थ रूप में मुझे आभास हुआ कि आने वाली प्रत्येक विषम परिस्थिति में, मेरी माँ देवी कुन्ती और हम भ्राताओं के पीछे हिमालय जैसे अविचल सुरक्षा भाव से अगर कोई खड़ा है, तो वे हैं – स्वयं श्रीकृष्ण। इस घटना के तुरन्त बाद ही स्वयं बिना किसी प्रयास के मेरे और उनके भावबन्धन दृढ़तर होते चले गए।

हम भ्राताओं के द्रौपदी के साथ एकान्त के कठोर नियम श्रीकृष्ण और माता कुन्ती ने तय किए। हम सभी भ्राताओं का उसके साथ कैसा व्यवहार हो, श्रीकृष्ण ने समझाया। कुलवधू होने के नाते द्रौपदी का आचरण, कर्त्तव्य और व्यवहार किस तरह होने चाहिए, यह भी माता कुन्ती और श्रीकृष्ण ने ही बताया। वे अपनी अपेक्षा औरों के विषय में इतनी सूक्ष्मता से सोचते हैं, यह हम सबको भान हुआ। उनकी उपस्थिति में अपने विषय में कुछ भी सोचने और निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं थी। मैं कब और कैसे अपना सर्वस्व उनको समर्पित कर बैठा, मुझे ज्ञात नहीं। हां, मुझे इतना अवश्य ज्ञात है कि ऐसा करके मुझे अत्यन्त प्रसन्न्ता की अनुभूति हो रही थी।

कांपिल्यनगर में एक लंबी अवधि तक श्रीकृष्ण का हमारे साथ रहना, उनकी भविष्य की योजनाओं का एक अंग था। वे आनेवाले संघर्षों के लिए हमलोगों को तैयार कर रहे थे। भ्रमण करते, भोजन करते, आमोद-प्रमोद करते समय, विनोद में ही उन्होंने जीवन के प्रत्येक आयाम पर हमारे कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का बोध कराया। हमें हमारे अधिकारों और कर्त्तव्यों के प्रति सचेत किया। हस्तिनापुर को पुनः प्राप्त करने के लिए यदि सैन्य आक्रमण की आवश्यकता पड़े, तो उसका विकल्प भी सुरक्षित रखने के वे पक्षधर थे। वैसे उन्हें पूर्ण विश्वास था कि पितामह भीष्म और महात्मा विदुर हम लोगों के जीवित बच जाने का समाचार पाकर हस्तिनापुर में हमारे ससम्मान प्रत्यागमन का कोई मार्ग अवश्य निकालेंगे।

हमारे प्रत्यागमन का मार्ग निकल आया था। महात्मा विदुर बहुमूल्य अलंकार और रत्नों की भेंट लेकर महाराज द्रुपद की राजसभा में उपस्थित हुए। उन्हें एक लंबे अन्तराल के बाद देख, आंखें नम हो आईं। वे हमलोगों के प्राणदाता थे। पिता के स्वर्गवासी हो जाने के पश्चात उन्होंने हम पांचो को पिता के स्नेह के अभाव की अनुभूति नहीं होने दी। पिताजी के ज्येष्ठ भ्राता ने तो लाक्षागृह के माध्यम से हमें जीते जी अग्नि को समर्पित कर ही दिया था। ये तो हमारे काका – पिताजी के कनिष्ठ भ्राता की सूक्ष्मदृष्टि और दूरदर्शिता का परिणाम था कि माँ के साथ हम सभी जीवित थे। हमें प्रत्यक्ष देख महात्मा विदुर की भी आंखें भर आई थीं। हमसे मिलने की प्रसन्नता छिपाए नहीं छिप रही थी। विद्वान और धर्मज्ञ विदुरजी, न्याय के अनुसार बड़े-छोटे के क्रम से महाराज द्रुपद, श्रीकृष्ण और हमलोगों से मिले। हम सबसे कुशल, मंगल और स्वास्थ्यविषयक प्रश्न कर, सन्तोषजनक उत्तर प्राप्त करने के उपरान्त, उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र की ओर से, द्रौपदी, महाराज द्रुपद के पुत्रों, महाराज द्रुपद, माता कुन्ती तथा हमलोगों के लिए भेजे गए रत्न और आभूषणों की भेंट, राजसभा में महाराज द्रुपद को अभिवादन समेत सौंप दी। पश्चात अत्यन्त नम्रतापूर्ण मधुर वाणी में महाराज धृतराष्ट्र का सन्देश सुनाया –

“राजन! कुरुकुल श्रेष्ठ शातनुनन्दन भीष्म और महाराज धृतराष्ट्र ने आपकी कुशलता, उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की शुभकामनाएं मेरे माध्यम से भेजी है, आप स्वीकार करें। पांचाल नरेश! राजा धृतराष्ट्र आपके संबन्धी होकर अपने आप को कृतार्थ मानते हैं। हम सबके प्रिय पाण्डव दीर्घ काल से परदेश में निवास कर रहे हैं। समस्त कुरुवंशी कौरवकुल की श्रेष्ठ नारियां, हमारे हस्तिनापुर नगर तथा राष्ट्र के सभी नगरवासी, ग्रामवासी अपनी प्रिय कुलवधू पांचाल राजकुमारी कृष्णा को देखने की इच्छा हृदय में संजोए, उनके शुभागमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। नरश्रेष्ठ पाण्डव और देवी कुन्ती भी अपना नगर देखने हेतु उत्सुक हो रहे होंगे। अतः माता और पत्नी सहित सभी पाण्डवों को हस्तिनापुर जाने की आज्ञा दीजिए। महाराज धृतराष्ट्र ने स्वयं आग्रह किया है।”

श्रीकृष्ण, महाराज द्रुपद और अग्रज युधिष्ठिर की गहन मंत्रणा के बाद हस्तिनापुर वापस लौटने का निर्णय लिया गया। पांचालराज ने उपहारस्वरूप सोने के आभूषणों और हौदों से सज्जित एक हजार हाथी, एक हजार रथ, उत्तम जाति के पचास हजार अश्व, स्वर्णनिर्मित अनेक शय्याएं, आसन-पात्र, हीरे-मोती, रत्नजटित अनगिनत आभूषण और सुन्दर वस्त्रालंकारों से विभूषित अनेक दास-दासियां हमें अर्पित की। अनेक वाद्य-यन्त्रों की मंगलमय ध्वनि के बीच राजकुमार धृष्टद्युम्न ने अपनी भगिनी को अत्यन्त स्नेह के साथ हाथ पकड़कर रथ में बैठाया और अश्रुपूरित नेत्रों से हस्तिनापुर के लिए विदा किया।

क्रमशः

 

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