लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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(अर्जुन को दिव्यास्त्रों की प्राप्ति)

विपिन किशोर सिन्हा

हिमालय और गंधमादन पर्वत को लांघते हुए अति शीघ्र मैं इन्द्रकील पर्वत पर पहुंचा। मुझे देवराज इन्द्र का साक्षात्कार हुआ। उनके परामर्श पर मैंने तपस्या आरंभ की – देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने हेतु। मैंने घोर तपस्या की। अन्ततः भगवान शंकर प्रसन्न हुए। उन्होंने आशीर्वाद के रूप में अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र मुझे प्रदान किया। इसकी महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा –

“महापराक्रमी पाण्डव कुमार! मेरे अतिरिक्त कोई योद्धा इस अस्त्र के धारण, प्रयोग और उपसंहार का ज्ञाता नहीं है। इसे इन्द्र, कुबेर, यमराज अथवा वायु देवता भी नहीं जानते। इस पृथ्वी पर तुम्हीं ऐसे धनुर्धर हो जो मेरी तरह ही इसके धारण और संचालन की योग्यता रखते हो लेकिन इसका सदैव ध्यान रखना कि किसी अल्पशक्ति योद्धा पर इसका प्रयोग न किया जाय। अगर ऐसा हुआ तो यह संपूर्ण जगत का नाश कर देगा। चराचर प्राणियों सहित, समस्त त्रिलोक में कोई ऐसा मनुष्य नहीं है जिसका वध इस अस्त्र द्वारा नहीं हो सके। इसका प्रयोग करने वाला पुरुष अपने मानसिक संकल्प से, दृष्टि से, वाणी से तथा धनुष-बाण द्वारा भी शत्रुओं को अपनी इच्छा अनुसार नष्ट कर सकता है।”

मैंने श्रद्धा से पूरित हो, उनके चरणों पर अपना मस्तक रखा। उन्होंने बड़े स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरा, कन्धे को पकड़कर खड़ा किया और आलिंगनबद्ध कर लिया। माता उमा ने भी आशीर्वाद दिए। पश्चात दोनों विभूतियां देखते ही देखते अदृश्य हो गईं। सामने रह गए, हिमाच्छादित श्वेत शिखर। मेरा रोम-रोम पुलकित हो रहा था। मुझे दिव्य आनन्द की अनुभूति हो रही थी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि अभी-अभी कुछ ही पल पूर्व, पिनाकपाणि भगवान शंकर ने मूर्तिमंत होकर मुझे साक्षात दर्शन दिए थे और अपने कर कमलों से मेरे अंगों का स्पर्श किया था। अब मुझे अपनी विजय पर तनिक भी शंका नहीं रही।

मैं, कृतार्थ अर्जुन, भगवान शंकर का नेत्र बंदकर स्मरण कर रहा था और आनन्द के सागर में गोते लगा रहा था। ब्रह्म से मिलन ही तो आनन्द है – जीवन के सुख-दुख से परे, यही आनन्द मुझे आज मिला था, जिसने मुझे सामान्य मनुष्य के स्तर से उठाकर विशिष्ट बना दिया था। सहसा मैंने अनुभव किया – चारो ओर विद्युत ज्योति जैसा प्रकाश फैलने लगा – सुगन्धित वायु का झोंका दसो दिशाओं से आने लगा – वातावरण में संगीत की लहरें अपने आप उत्पन्न होने लगीं। मेरे नेत्र बरबस खुल गए। सामने एक अद्भुत दृश्य उपस्थित था – वैदूर्यमणि के समान कान्तिमान जलचरों से घिरे जलाधीश वरुण, स्वर्ण के समान दमकते हुए शरीर वाले धनाधीश कुबेर, सूर्य के पुत्र महातेजस्वी यमराज, इन्द्राणी के साथ देवराज इन्द्र आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाए खड़े थे। मैंने श्रद्धा, प्रेम और विनम्रता से सभी देवताओं की स्तुति की, नमन किया और आसन ग्रहण करने का निवेदन किया।

आसन ग्रहण करने के उपरान्त सर्वप्रथम धर्म के मर्मज्ञ यमराज ने अत्यन्त मधुर वाणी में मुझको संबोधित किया –

“नरश्रेष्ठ अर्जुन! तुम अपनी तपस्या, त्याग, धर्म के प्रति सत्याग्रह, न्यायप्रियता, अतुलनीय पराक्रम और गुरुजनों के प्रति सदा आदरभाव धारण करने के कारण भगवान शंकर और हमलोगों के दर्शन के अधिकारी हो गए हो। हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं – तुम यथा इच्छा हम सबके दर्शन करो। तुम सनातन ऋषि नर हो और तुम्हारे परम प्रिय सखा श्रीकृष्ण, स्वयं नारायण। इस पृथ्वी से अधर्म का भार मिटाने के लिए तुम दोनों का मानव रूप में अवतार हुआ है। इस पुण्य कार्य में सहयोग हेतु मैं तुम्हें अपना यमदण्ड नामक दिव्यास्त्र प्रदान करता हूं। कोई भी मनुष्य, देवता, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस इसका निवारण करने में सक्षम नहीं है।”

मैंने आदर के साथ यमदण्ड दिव्यास्त्र ग्रहण किया। मन्त्र, पूजन की विधि तथा प्रयोग-उपसंहार की विधि का संज्ञान भी लिया।

अब मुझे कृतार्थ करने के लिए लोकपाल वरुण उपस्थित थे। उनके स्वर मेरे कानों में अमृत घोल रहे थे –

“वीरवर अर्जुन! मेरी ओर देखो। मैं जलाधीश वरुण हूं। मेरा वारुण-पाश युद्ध में कभी निष्फल नहीं होता। तुम इसे ग्रहण करो और छोड़ने-लौटाने की गुप्त विधि भी सीख लो। तारकासुर के साथ घोर संग्राम में इसी पाश की सहायता से मैंने सहस्रों दैत्यों को बन्दी बना लिया था। तुम इसके द्वारा जिसे चाहो, बन्दी बना सकते हो।”

मैंने सादर, आभार सहित वारुण-पाश स्वीकार किया।

धनाधीश कुबेर भी मुझपर अत्यन्त प्रसन्न थे, बोले –

“हे धनंजय! तुम भगवान के नर रूप हो। पहले कल्प में तुमने हमारे साथ बड़ा परिश्रम किया है। इसलिए तुम मुझसे अन्तर्धान नामक अनुपम अस्त्र ग्रहण करो। यह बल, पराक्रम और तेज प्रदान करने वाला अस्त्र मुझे अति प्रिय है। इससे शत्रु अचेत होकर नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर को नष्ट करते समय इसका प्रयोग करके असुरों को भस्म कर डाला था। यह तुम्हारे लिए ही है, तुम इसे धारण करो।”

मैंने प्रसन्नतापूर्वक सभी लोकपालों की पुनः स्तुति की, पत्र, फल-फूल आदि से पूजा की। देवता आशीर्वाद देते हुए अपने-अपने धाम को प्रस्थित हुए।

सामान्यतया हम प्रत्यक्ष विपत्तियों का अनुभव कर दुखी होते हैं। लेकिन कभी-कभी विपत्ति भी ऐसा सुख दे जाती है जिसके स्मरण मात्र से रोम-रोम पुलकित हो उठता है। सारा राजपाट द्यूत में हारकर हमने वनगमन किया। मन के भीतर बार-बार प्रश्न उठता था कि हमने कौन से पाप किए थे, किसका अहित किया था कि पुनः-पुनः हमें वन की शराण लेनी पड़ी। जिन लोगों ने सदैव अधर्म का आचरण किया, वे तो महलों में रह, सुख, संपत्ति और ऐश्वर्य का भोग करते रहे और हम? सदा धर्म के पथ पर चलते हुए, कभी शतशृंग पर्वत शिखर की शिलाओं से टकराए, कभी लाक्षागृह में जलाए गए, दीन-हीन ब्राह्मण बनकर वन-वन भटके और कभी द्यूत में हारकर दुर्योधन के दास बने। नियति धर्म और न्याय के पथ पर चलने वाले पथिकों की ही परीक्षा क्यों लेती है? आज के पूर्व मन कभी नियति को कोसता था, तो कभी दैव को। लेकिन विपत्ति ने आज जो सुअवसर प्रदान किया, क्या वह महलों में रहकर प्राप्त किया जा सकता था? लोकपालों के दर्शन तो मुझे खाण्डववन दहन के समय प्राप्त हुए थे लेकिन उमासहित साक्षात महादेव के दर्शन! मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि इतनी सुगमता से कभी मुझे उनके दर्शन होंगे। मेरे जीवन की यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। अब मुझे वनवास का कोई कष्ट नहीं रहा।

क्रमशः

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